विस्तृत उत्तर
धर्म' शब्द हिंदू दर्शन का सबसे केंद्रीय और बहुआयामी शब्द है। इसका अंग्रेजी में कोई एक शब्द समकक्ष (equivalent) नहीं है।
व्युत्पत्ति
धर्म' = 'धृ' धातु + 'म' प्रत्यय। 'धृ' = धारण करना।
'धारयति इति धर्मः' — जो धारण करे वह धर्म है। अर्थात् जो समाज, प्रकृति और जीवन को धारण (sustain) करे — वही धर्म।
वैशेषिक दर्शन (कणाद)
*'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः'*
— जिससे अभ्युदय (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (मोक्ष/परम कल्याण) दोनों की सिद्धि हो, वह धर्म है।
धर्म के विभिन्न आयाम
- 1सामान्य/सार्वभौमिक धर्म — सत्य, अहिंसा, दया, दान, शौच (स्वच्छता) — सभी मनुष्यों के लिए।
- 2वर्ण धर्म — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का अपना-अपना कर्तव्य।
- 3आश्रम धर्म — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास — जीवन के चार चरणों का धर्म।
- 4स्वधर्म — व्यक्ति का अपना कर्तव्य। गीता (3.35): *'स्वधर्मे निधनं श्रेयः'*
- 5राज धर्म — शासक का कर्तव्य।
- 6युग धर्म — युग के अनुसार धर्म।
मनुस्मृति (6.92) — धर्म के 10 लक्षण
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
— धैर्य, क्षमा, संयम, अचौर्य, शौच, इंद्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध — ये धर्म के 10 लक्षण हैं।
सारांश: 'धर्म' = Religion नहीं। यह कर्तव्य, नैतिकता, प्राकृतिक नियम, न्याय, सत्य और जीवन को धारण करने वाली सम्पूर्ण व्यवस्था है।





