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पढ़िए अरण्य कांड – तृतीय संस्करण: सती अनसूया और देवी सीता का मिलन – वह क्षण जिसने नारी धर्म को नया आयाम दिया !
अरण्य कांड

पढ़िए अरण्य कांड – तृतीय संस्करण: सती अनसूया और देवी सीता का मिलन – वह क्षण जिसने नारी धर्म को नया आयाम दिया !

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सती अनसूया से सीताजी का मिलन

सती अनसूया से सीताजी का मिलन

महर्षि अत्रि द्वारा पूजा-सत्कार व स्तुति के उपरांत, आश्रम की आश्रयदात्री माता अनसूया का भी सीताजी से मिलन होता है। अत्रि मुनि ने अपनी पत्नी को संकेत किया होगा या स्वयं सीता जी आदरवश माता समान अनसूया के पास गईं। दोनों परम तेजस्विनी महिलाएँ एक-दूसरे को देखकर प्रेम से भर जाती हैं:

चौपाई: “अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥”

व्याख्या: श्रेष्ठ पतिव्रता सती अनसूया के चरण पकड़कर परम शीलवती और विनयी माता सीता ने उन्हें प्रणाम किया और उनसे भेंट की। ऋषि पत्नी अनसूयाजी के मन में अत्यधिक सुख भर गया। उन्होंने प्रेमपूर्वक आशीष देकर सीताजी को अपने पास बैठा लिया।

इस हृदयस्पर्शी मिलन में दोनों के गुण परस्पर प्रकट होते हैं – सीता अपने से बड़ी वृद्द महिला (और तपस्विनी) को माँ समान सम्मान देते हुए चरण स्पर्श करती हैं। अनसूया जी सीता की विनम्रता-शील देखकर प्रसन्न होती हैं और ढेरों आशीषों के साथ स्नेह से उन्हें समीप बिठाती हैं। एक ओर त्रैलोक्य में सुप्रसिद्ध पतिव्रता, दूसरी ओर स्वयं लक्ष्मी स्वरूपा जनकनंदिनी – दोनों का मिलन अत्यंत शुभ और मंगलमय हो उठा।

इसके बाद माता अनसूया सीताजी को आत्मीयता से कुछ उपहार देती हैं:

चौपाई: “दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥”

व्याख्या: अनसूया माता ने सीता को दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो सदा नए जैसे निर्मल और सुहावने बने रहते थे। फिर उस ऋषि पत्नी ने मधुर एवं कोमल वाणी में कुछ बहाने से स्त्रियों के धर्म पर प्रवचन आरंभ किया।

यह चौपाई कई बातें उजागर करती है: सती अनसूया अपनी पूज्य अतिथि सीता को दिव्य वस्त्राभूषण प्रदान करती हैं। इन अलंकारों की विशेषता तुलसीदास बताते हैं कि वे कभी पुराने नहीं होते, सदा चमकते नए जैसे रहते हैं – यह सतीत्व के तेज का प्रतीक है, जिसे अनसूया ने अपने तपोबल से प्राप्त किया था।

इन उपहारों के माध्यम से अनसूया स्नेहपूर्वक सीता का श्रंगार करती हैं, मानो अपनी पुत्री की तरह। इसके बाद वे बहाने से (यानी प्रसंग छेड़कर) सीताजी को पतिव्रत धर्म की बातें समझाने लगीं। यद्यपि सीताजी स्वयं आदर्श पत्नी हैं, फिर भी अनसूया जैसी वरिष्ठ सती के मुख से धर्मोपदेश सुनना उनके लिए और संसार के लिए कल्याणकारी है।

संभवतः अनसूया जानती थीं कि सीता को आगामी वनवास काल में कठिन विपत्तियों का सामना करना पड़ेगा, अतः उनको मानसिक रूप से दृढ़ करने हेतु तथा पतिव्रत्य के महत्त्व पर बल देने हेतु यह संवाद हुआ।

अनसूया द्वारा पतिव्रत धर्म का उपदेश

अनसूया जी अब स्त्री के पतिव्रत धर्म पर विस्तार से उपदेश देती हैं। उनके उपदेश को तुलसीदासजी ने चौपाईयों की शृंखला में पिरोया है, जिसमें पतिव्रता नारी के गुण, कर्तव्य और प्रकार समझाए गए हैं:

चौपाई: “मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥”
(अरण्य कांड, चौपाई 3)

व्याख्या: अनसूया कहती हैं – हे राजकुमारी जानकी! सुनो – माता, पिता और भाई ये सब हमारा हित करने वाले होते हैं, लेकिन इनसे मिलने वाला सुख मर्यादित (सीमित) होता है। परंतु हे वैदेही! पति तो अनंत (अमित) सुख प्रदान करने वाला है (यहाँ “मोक्ष रूपी परम सुख” का भी संकेत है)। वो स्त्री बहुत अधम (निकृष्ट) है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।

यहाँ अनसूया जीवन में विभिन्न संबंधों की भूमिका समझा रही हैं – माता-पिता-भाई जीवन में महत्वपूर्ण हैं, पर उनका दिया सुख सांसारिक और सीमित है। पति एक स्त्री के जीवन में परम तारणहार है, जो न केवल सांसारिक बल्कि आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष) का भी कारण बन सकता है। इसलिए जो स्त्री ऐसे पति की सेवा नहीं करती, उसे अनसूया अधम अर्थात निकृष्ट मानती हैं। इस कथन से वे सीता जैसी आदर्श नारी के माध्यम से हर विवाहिता को शिक्षा देती हैं कि पति की सेवा और श्रद्धा ही स्त्री धर्म का मूल है।

चौपाई: “धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥”

व्याख्या: धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री – इन चारों की परीक्षा विपत्ति (संकट) के समय में ही होती है। अनसूया आगे उदाहरण देकर समझाती हैं: यदि पति वृद्ध हो, रोगी हो, मूर्ख (अज्ञानी) हो, निर्धन हो, अंधे या बहरे हो जाएं, अत्यंत क्रोधी या दीन हीन अवस्था में हों – तब पत्नी के धर्म और प्रेम की वास्तविक परीक्षा होती है।

अर्थ यह है कि सुख-समृद्धि में साथ निभाना सरल है, परंतु जब पति किसी भी वजह से दुर्बल स्थिति में हो तो पत्नी का कर्तव्य है कि वह धैर्यपूर्वक अपने धर्म का पालन करे। जिस प्रकार धैर्य की परख मुश्किल घड़ी में होती है, धर्म की कसौटी भी विकट परिस्थिति में होती है, मित्र की निष्ठा संकट काल में जांची जाती है, उसी प्रकार पत्नी का सच्चा स्नेह और समर्पण भी पति के कष्ट में परीक्षा से गुजरता है। एक पतिव्रता स्त्री कठिन परिस्थितियों में अपने पति का साथ नहीं छोड़ती, यही सच्ची सेवा है।

चौपाई: “ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥”

व्याख्या: यदि किसी का पति उपर्युक्त प्रकार का अक्षम या दुर्गुणी हो (यानी चाहे जैसा भी हो), तब भी उसका अपमान करने से स्त्री को मरने के बाद यमलोक में असंख्य दुःख भोगने पड़ते हैं। स्त्री के लिए तो बस एक ही धर्म, एक ही व्रत, एक ही नियम है – शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना।

इस उपदेश द्वारा माता अनसूया नारी धर्म का सार बताती हैं: स्त्री चाहे कैसी परिस्थिति में हो, अपने पति का अनादर या त्याग करना उसके लिए महापाप है, जिसके परिणामस्वरूप उसे मरकर यमपुर (नरक) में भयंकर यातनाएँ भुगतनी होंगी। इसलिए हर विवाहित स्त्री को अपना तन, मन और वचन पूरी तरह पति की सेवा और प्रेम में ही नियोजित रखना चाहिए – यही उसका परम धर्म-व्रत है। पतिपरायण होना ही पत्नी का श्रेष्ठ गुण है, अन्य सब आचार उससे गौण हैं।

पतिव्रता स्त्रियों की चार श्रेणियाँ

अनसूया आगे पतिव्रताओं की श्रेणियाँ बताती हैं। वे कहती हैं कि पतिव्रता स्त्रियाँ चार प्रकार की होती हैं। वेद-पुराणों के अनुसार उनकी श्रेणियाँ इस प्रकार हैं:

1. उत्तम पतिव्रता

जो मन, वचन, कर्म से पूर्णतः अपने पति को ही परमेश्वर मानती है और स्वप्न में भी किसी अन्य पुरुष का विचार नहीं करती। ऐसी स्त्री सबसे उत्तम श्रेणी की पतिव्रता मानी गई है। उसके मन में सदा यही भाव रहता है कि मेरे पति के सिवा जगत में कोई पुरुष है ही नहीं। यह अत्यंत आदर्श स्थिति है – जैसे माता अनसूया स्वयं हैं, या माता सीता हैं, जिनका सारा जीवन पति के चरणों में ही केंद्रित है।

2. मध्यम पतिव्रता

जो स्त्री दूसरे पुरुष को देखती तो है, लेकिन उसे अपने भाई, पिता या पुत्र के समान मानती है। अर्थात अपने समवयस्क परपुरुष को भाई के समान, आयु में बड़े को पिता के समान और छोटे को पुत्र के समान देखती है। वह धर्म का विचार कर और अपने कुल-शील की मर्यादा समझकर दूसरे पुरुष से स्वयं को दूर रखती है।

ऐसी स्त्री को मध्यम श्रेणी की पतिव्रता कहा गया है। तुलसीदासजी ने वेद-वचन के आधार पर इसे “निकृष्ट” भी कहा है, क्योंकि यह उत्तम की तुलना में कमतर है – यहाँ स्त्री का मन संयम और मर्यादा के कारण नियंत्रण में है, पर उसे दूसरों की ओर देखने में सतर्क रहना पड़ता है। फिर भी वह पतिव्रता ही मानी जाएगी क्योंकि वह मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती।

3. निम्न (अधम) पतिव्रता

जो स्त्री मौका न मिलने के कारण या सिर्फ भयवश पति के प्रति वफादार बनी रहती है, उसे अधम श्रेणी की स्त्री समझना चाहिए। यानी उसका मन अवसर पाते ही डोल सकता है, किंतु सामाजिक भय या परिस्थितिवश वो वैसे कार्य से बची हुई है। ऐसी स्त्री सच्चे अर्थों में पतिव्रता नहीं, बल्कि ऊपर से मजबूरीवश पालन कर रही है।

इसे पतिव्रता की सबसे निकृष्ट श्रेणी कहा जा सकता है। शास्त्र कहते हैं कि मन में कपट या परपुरुष के प्रति आसक्ति रखते हुए केवल डर या लोकलाज से पति का साथ देने वाली स्त्री अधम है – उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता।

4. पतिव्रत से भ्रष्ट (कुलटा) स्त्री

जो स्त्री पति को छलती है और परपुरुष से प्रेम या व्यभिचार करती है, वह घोर पापिनी है और उसे अनेक (सौ) कल्पों तक रौरव नरक में गिरना पड़ता है। यह चौथी प्रकार की (या कहें कि पतिव्रता की श्रेणी से ही बाहर) स्त्री है, जो पतिव्रत धर्म का पूरी तरह त्याग कर चुकी है।

ऐसे आचरण का परिणाम अनसूया भीषण नरक भोग के रूप में बताती हैं। कहने का अर्थ है कि स्त्री द्वारा पति को धोखा देना महापातक है और इससे बढ़कर गिरा हुआ कर्म कोई नहीं।

अनसूया जी इन श्रेणियों के माध्यम से सीताजी को समझा रही हैं कि उन्हें उत्तम पतिव्रता बनकर अपने धर्म पर डटे रहना है। सीताजी तो स्वयं जगदम्बा स्वरूपा हैं, उनके लिए यह सब स्वभाविक है, पर अनसूया के उपदेश से समस्त संसार की स्त्रियों को शिक्षाप्रद संदेश मिलता है।

अनसूया अपने उपदेश के अंत में कहती हैं – हे सीते सुनो, तुम्हारा तो नाम स्मरण करके ही स्त्रियाँ पतिव्रत का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्रीराम प्राणों के समान प्रिय हैं। (मैं जानती हूँ कि तुम स्वयं आदर्श पत्नी हो) यह पतिव्रत धर्म की कथा मैंने संसार के हित के लिए कही है।

सीताजी को अनसूया माता के उपदेशों से बड़ी संतुष्टि मिली – उन्होंने हृदय से उस ज्ञान को आत्मसात किया और गुरु रूपी सास जैसी अनसूया को प्रणाम करके आशीर्वाद लिया। उधर दिन ढल चुका था; संभवतः रातभर राम-सीता-लक्ष्मण आश्रम में ही ठहरे और अगली प्रातः उन्होंने आगे जाने की अनुमति मांगी। श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से महर्षि अत्रि से अगली यात्रा के लिए आज्ञा मांगी।

इस मिलन के अंत में अत्रि मुनि व अनसूया माता ने प्रभु से कुछ वरदान भी माँगे होंगे। रामचरितमानस अनुसूया प्रसंग के कुछ पाठांतर में उल्लेख है कि माता अनसूया ने सीताजी को कभी सौभाग्यवती (सुहागन) रहने का वर दिया और भविष्य के लिए धैर्य रखने को कहा। श्रीराम ने भी अत्रि मुनि को सतयुग में त्रेतागतिक ज्ञान प्राप्त कराने का वरदान दिया (कुछ टीकाओं में ऐसा संकेत मिलता है)। कुल मिलाकर यह आश्रम का पावन सत्संग आगामी घटनाओं के लिए मनोबल और शुभाशीष प्रदान करता है।

आगे के प्रसंग की झलक

आगे के भाग 5 में हम देखेंगे कि अत्रि आश्रम से विदा होकर श्रीराम दंडकवन में और आगे बढ़ते हैं। वहाँ रास्ते में विराध राक्षस का वध, ऋषि शरभंग से भेंट, तथा राम का दंडकारण्य में राक्षस-विनाश का संकल्प जैसे प्रसंग क्रमशः आते हैं।

इन रोमांचक घटनाओं को जानने के लिए अगले भाग का अध्ययन करें। भगवान श्रीराम की कथा का श्रवण हमें कलियुग के पापों से मुक्ति देकर मन में धर्म, भक्ति और मर्यादा की स्थापना करता है। आइए, इस पवित्र चरित्र का श्रवण-मनन कर हम अपने जीवन को भी राममय बनाने का प्रयास करें।

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