अष्टाक्षर नारायण मंत्र: "ॐ नमो नारायणाय"
मंत्र का स्रोत
यह भी एक प्रमुख वैष्णव मंत्र है, जिसका उल्लेख अनेक पुराणों, उपनिषदों (जैसे नारायणोपनिषद्) और संहिताओं में मिलता है।
सम्बद्ध देव
भगवान् श्री नारायण (विष्णु)।
मंत्र का शब्दार्थ एवं भावार्थ
"ॐ, मैं भगवान् नारायण को नमन करता हूँ।" 'नारायण' शब्द का अर्थ है 'नार' (जल या नर से उत्पन्न) के 'अयन' (आश्रय या गति) जो हैं, अर्थात् जो समस्त जीवों के आश्रय हैं और जल में शयन करते हैं। यह सृष्टि के आधार और परम आश्रय भगवान् के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
शास्त्रोक्त फलश्रुति
यह एक सिद्ध मंत्र माना गया है। इसके जप से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है, और वह भगवत्कृपा का पात्र बनता है ।
विस्तृत जप-विधि एवं अनुष्ठान प्रक्रिया
विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायों में इसकी जप विधि में किंचित भिन्नता हो सकती है, परन्तु सामान्यतः ५ लाख जप से इस मंत्र की सिद्धि प्राप्त होने का विधान है। द्वादशाक्षर मंत्र की भांति, यह मंत्र भी अपनी व्यापकता के बावजूद, विशिष्ट फलश्रुतियों और सिद्धि के विधान के कारण अल्पज्ञात शक्तियों से युक्त है। इसका "अष्टाक्षर" स्वरूप विशिष्ट ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं से सम्बंधित हो सकता है। "अष्टाक्षर" स्वरूप का विशेष उल्लेख इसकी ध्वन्यात्मक संरचना के महत्व को इंगित करता है; आठ अक्षर विशिष्ट देवताओं या शक्तियों से सम्बंधित हो सकते हैं, जो मंत्र के प्रभाव को और गहन बनाते हैं। चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का आश्वासन इसे एक सामान्य मंत्र से ऊपर उठाकर महामंत्र की श्रेणी में रखता है, जिसकी पूर्ण क्षमता का ज्ञान सभी को नहीं होता।






