विस्तृत उत्तर
संस्कृत व्याकरण और महर्षि यास्क के निरुक्त शास्त्र के अनुसार, 'विष्णु' शब्द का निर्माण मूलतः 'विष्ऌ व्याप्तौ' धातु से हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ है — व्याप्त होना अथवा प्रवेश करना। यह व्युत्पत्ति केवल एक भौतिक उपस्थिति का संकेत नहीं देती, अपितु यह एक ब्रह्मांडीय चेतना की ओर इंगित करती है जो चराचर जगत के अणु-परमाणु में अंतर्निहित है।
उपनिषदों और पुराणों के परिप्रेक्ष्य में इस शब्द की व्याख्या अत्यंत विस्तृत है: 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णु:' — अर्थात् वह परम सत्ता जो सम्पूर्ण चराचर जगत, दृश्य-अदृश्य ब्रह्मांड, और दिशाओं तथा कालों में अबाधित रूप से व्याप्त है, वही विष्णु है।





