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वेद ज्ञान📜 ऋग्वेद 1/164/46, 10/121, नासदीय सूक्त 10/129, अथर्ववेद 10/8/1, शुक्ल यजुर्वेद 40/81 मिनट पठन

वेदों में ब्रह्म का वर्णन कैसे किया गया है?

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में ब्रह्म को 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (ऋग्वेद 1/164/46) — एक ही सत्य, अनेक नाम — के रूप में बताया गया है। हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121), नासदीय सूक्त (10/129) और यजुर्वेद (40/8) में ब्रह्म को सर्वव्यापी, निर्गुण और सृष्टि के आधार के रूप में वर्णित किया गया है।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में ब्रह्म का वर्णन

ऋग्वेद का महावाक्य (1/164/46)

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।' — सत्य एक ही है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। यह वैदिक एकेश्वरवाद का मूल सूत्र है।

हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121): 'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे।' — आदि में हिरण्यगर्भ था — समस्त अस्तित्व का स्वामी। यह ब्रह्म का सगुण-सृष्टिकर्ता रूप है।

नासदीय सूक्त (10/129): 'नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्।' — उस समय न सत् था, न असत्। ब्रह्म सत्-असत् से परे — अनिर्वचनीय।

यजुर्वेद (40/8): 'स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्।' — ब्रह्म सर्वव्यापी, शुद्ध, शरीर-रहित और सर्वज्ञ है।

अथर्ववेद (10/8/1): ब्रह्म को 'स्कम्भ' — विश्व का धारण करने वाला आधार-स्तंभ — कहा गया है।

ब्रह्म के वैदिक रूप: हिरण्यगर्भ (सगुण सृष्टिकर्ता), प्रजापति (प्रजाओं का स्वामी), परमात्मन् (सर्वोच्च आत्मा), तद् एकम् (वह एक अव्यक्त सत्ता)।

वेदों में ब्रह्म का वर्णन बहुस्तरीय है — सगुण, निर्गुण और एकात्म — यही वैदिक दर्शन की महानता है।

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद 1/164/46, 10/121, नासदीय सूक्त 10/129, अथर्ववेद 10/8/1, शुक्ल यजुर्वेद 40/8
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