विस्तृत उत्तर
## वेदों में आत्मा का वर्णन
दो पक्षी सूक्त — वेदों में आत्मा का सर्वश्रेष्ठ रूपक (ऋग्वेद 1/164/20)
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।।
— एक ही वृक्ष पर दो सुंदर पक्षी बैठे हैं। एक (जीवात्मा) फल (संसार-भोग) खाता है; दूसरा (परमात्मा) बिना खाए केवल देखता रहता है।
यह रूपक उपनिषदों और गीता में भी उद्धृत है — जीवात्मा और परमात्मा का सह-अस्तित्व।
आत्मा की विशेषताएं (वैदिक वर्णन)
(1) आत्मा अमर है (ऋग्वेद 10/16): मृत्यु-सूक्त में — 'सूर्यं ते चक्षुर्गच्छतु वातं प्राणः।' — आँख सूर्य में जाए, प्राण वायु में — पर आत्मा अमर रहती है।
(2) आत्मा और प्राण: आत्मा को प्राण (जीवनशक्ति) से अभिन्न बताया गया है।
(3) पितृयान और देवयान: कर्मानुसार आत्मा दो मार्गों से जाती है — पितृलोक या देवलोक।
(4) महावाक्यों की आधारभूमि: इस 'दो पक्षी' सूक्त से ही उपनिषदों के 'अयमात्मा ब्रह्म' और 'अहं ब्रह्मास्मि' का दर्शन विकसित हुआ।





