विस्तृत उत्तर
## वेदों में योग का वर्णन
वेदों में 'योग' शब्द: ऋग्वेद में 'योग' मुख्यतः 'जोड़ना, एकत्र करना, साधन' अर्थ में है। किंतु योग के मूलभूत तत्त्व — मन की एकाग्रता, प्राण-नियंत्रण, इंद्रिय-संयम — वेदों में स्पष्टतः मिलते हैं।
ऋग्वेद में योगिक संदर्भ
(1) सूर्य-उपासना और प्राणायाम (5/81/1): 'युञ्जन्ति ब्रह्म विचरन्ति साधवः।' — ज्ञानी साधु प्राण को एकाग्र (युञ्ज = योग) करते हैं।
(2) केशी सूक्त (10/136): जटाधारी मुनि ('केशी') का वर्णन — जो वायु के साथ विचरता है, सोम पीता है और देवों के साथ रहता है। 'वायोरश्वो देवानां सखा मुनिः' — यह स्पष्टतः एक सिद्ध योगी का चित्र है।
ब्रह्मचर्य — योग का आधार: अथर्ववेद (11/5) में ब्रह्मचर्य को योग-साधना का सर्वश्रेष्ठ आधार बताया गया है।
वैदिक-योग के तत्त्व: यम (नैतिक अनुशासन — अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य), प्राण-साधना, ध्यान, तप।
योगसूत्र की वैदिक जड़ें: पतंजलि का योगसूत्र वेदों की योगिक परंपरा का ही व्यवस्थित रूप है।





