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वेदों में योग का वर्णन कैसे है?

वेदों में योग के मूल तत्त्व — मन की एकाग्रता, प्राण-नियंत्रण और ब्रह्मचर्य — स्पष्टतः मिलते हैं।

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में योग के मूल तत्त्व — मन की एकाग्रता, प्राण-नियंत्रण और ब्रह्मचर्य — स्पष्टतः मिलते हैं। केशी सूक्त (ऋग्वेद 10/136) में सिद्ध योगी का विशद चित्र है। वैदिक यम, ब्रह्मचर्य और ध्यान-परंपरा ही पतंजलि के योगसूत्र का मूल आधार है।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में योग का वर्णन

वेदों में 'योग' शब्द: ऋग्वेद में 'योग' मुख्यतः 'जोड़ना, एकत्र करना, साधन' अर्थ में है। किंतु योग के मूलभूत तत्त्व — मन की एकाग्रता, प्राण-नियंत्रण, इंद्रिय-संयम — वेदों में स्पष्टतः मिलते हैं।

ऋग्वेद में योगिक संदर्भ

(1) सूर्य-उपासना और प्राणायाम (5/81/1): 'युञ्जन्ति ब्रह्म विचरन्ति साधवः।' — ज्ञानी साधु प्राण को एकाग्र (युञ्ज = योग) करते हैं।

(2) केशी सूक्त (10/136): जटाधारी मुनि ('केशी') का वर्णन — जो वायु के साथ विचरता है, सोम पीता है और देवों के साथ रहता है। 'वायोरश्वो देवानां सखा मुनिः' — यह स्पष्टतः एक सिद्ध योगी का चित्र है।

ब्रह्मचर्य — योग का आधार: अथर्ववेद (11/5) में ब्रह्मचर्य को योग-साधना का सर्वश्रेष्ठ आधार बताया गया है।

वैदिक-योग के तत्त्व: यम (नैतिक अनुशासन — अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य), प्राण-साधना, ध्यान, तप।

योगसूत्र की वैदिक जड़ें: पतंजलि का योगसूत्र वेदों की योगिक परंपरा का ही व्यवस्थित रूप है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

वेदों में योग का वर्णन कैसे है को संदर्भ सहित समझें

वेदों में योग का वर्णन कैसे है का सबसे सीधा सार यह है: वेदों में योग के मूल तत्त्व — मन की एकाग्रता, प्राण-नियंत्रण और ब्रह्मचर्य — स्पष्टतः मिलते हैं। केशी सूक्त (ऋग्वेद 10/136) में सिद्ध योगी का विशद चित्र है।...

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