विस्तृत उत्तर
## वेदों में तपस्या का महत्व
तपस्या — सृष्टि का आदि-कारण
नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10/129/3): 'तपसस्तन्महिनाजायतैकम्।' — तप की महिमा से वह एक (ब्रह्म) प्रकट हुआ। तप ब्रह्म की सृष्टि-शक्ति का मूल है।
ऋग्वेद में तपस्या के संदर्भ
- ▸वैदिक ऋषियों ने तप द्वारा ब्रह्म-साक्षात्कार किया। विश्वामित्र ने असाधारण तप से गायत्री मंत्र का दर्शन किया।
- ▸तप = आंतरिक ऊष्मा (अग्नि) जो साधक के भीतर अज्ञान को जलाती है।
ब्रह्मचर्य और तप (अथर्ववेद 11/5/1): 'ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।' — ब्रह्मचर्य और तप से देवताओं ने मृत्यु को जीता। ब्रह्मचर्य वैदिक तपस्या का सर्वश्रेष्ठ रूप है।
यज्ञ = बाह्य तप: अग्नि की उष्णता में हविष्य देकर आंतरिक शुद्धि — यह बाह्य तपस्या का रूप है।
तप के फल: देव-साक्षात्कार, असाधारण शक्ति (सिद्धि), पाप-नाश, चित्त-शुद्धि, मृत्यु पर विजय।
तैत्तिरीय उपनिषद (3/1): 'तपो ब्रह्म' — तप ही ब्रह्म है। तपस्या ब्रह्म-प्राप्ति का केवल मार्ग नहीं — वह स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।





