माया और योगमाया: स्वरूप, अंतर और गूढ़ रहस्य !

भगवान की दिव्य शक्तियाँ: माया और योगमाया।
1. भगवान की तीन मुख्य शक्तियाँ।
श्लोक: “विष्णु: शक्तित्रीणि च प्रोक्ता परा, अपरा च जीवशक्ति।” (विष्णु पुराण)
भगवान की तीन शक्तियाँ हैं:
- पराशक्ति: सर्वोच्च दिव्य शक्ति, जिससे भगवान असंभव को संभव करते हैं।
- मायाशक्ति: यह शक्ति संसार की भौतिक वास्तविकता और भ्रम को प्रकट करती है।
- जीवशक्ति: यह शक्ति भगवान के अंश जीवों में विद्यमान रहती है, जो उन्हें जीवित रखती है।
2. मायाशक्ति: जीवों का बंधन।
मायाशक्ति भगवान की वह शक्ति है जो जीवों को उनके कर्मों और इच्छाओं के अधीन कर देती है। यह जीवों को संसार में फंसा कर उनके लिए माया के जाल का निर्माण करती है।
शास्त्रों का उल्लेख:
“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥” (श्रीमद्भगवद्गीता 7.14)
अर्थ: मेरी यह मायाशक्ति त्रिगुणमयी (सत्व, रज, तम) है, जिसे पार करना कठिन है। लेकिन जो मेरे शरणागत हो जाते हैं, वे इसे पार कर सकते हैं।
मायाशक्ति के प्रभाव:
- त्रिगुणों का प्रभाव: सत्व, रजस और तमस के रूप में माया हमें हमारे कर्मों में उलझाती है।
- भ्रम का निर्माण: माया जीव को आत्मा के सत्य स्वरूप से दूर रखती है।
- संसार के सुख-दुख का अनुभव: माया के कारण जीव भौतिक सुखों की ओर आकर्षित होता है और दुखों से भयभीत रहता है।
3. योगमाया: भगवान की दिव्य चमत्कारी शक्ति।
योगमाया भगवान की व्यक्तिगत शक्ति है, जो उनकी चमत्कारी लीलाओं और असंभव कार्यों को संभव बनाती है।
श्लोक:
“योगमाया समाविष्टो यः सत्यव्रत मनुव्रज। आविर्बभूव भगवान् सृष्टि हेतु: सनातन:॥” (भागवत पुराण 10.1.22)
अर्थ: योगमाया की शक्ति से भगवान स्वयं प्रकट होते हैं और सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार का कार्य करते हैं।
योगमाया के कार्य:
-
असंभव को संभव बनाना: भगवान बिना किसी
भौतिक साधन के कर्म कर सकते हैं।
“बिनु पग चलइ, सुनइ बिनु काना। कर बिनु कर्म करइ विधि नाना॥” (रामचरितमानस)
अर्थ: भगवान बिना पैरों के चल सकते हैं, बिना कानों के सुन सकते हैं और बिना हाथों के कर्म कर सकते हैं।
- दिव्य लीलाएँ:
- भगवान श्रीकृष्ण का गोपियों संग रासलीला करना।
- 16,108 रानियों के साथ विवाह और प्रत्येक के साथ हर समय उपस्थित रहना।
- राक्षसों का विनाश करते समय आनंदित और शांति पूर्ण बने रहना।
- सृष्टि की रचना और संचालन: योगमाया भगवान को अनगिनत रूप धारण करने और सभी जीवों के हृदय में निवास करने में सक्षम बनाती है।
4. भगवान का करुणामय स्वभाव।
भगवान की शक्तियाँ उनके ममतामयी और करुणामय स्वरूप की परिचायक हैं। वे हर समय जीव के साथ रहते हैं और उन्हें सही मार्ग पर ले जाने का प्रयास करते हैं।
श्लोक:
“सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो। मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च॥” (श्रीमद्भगवद्गीता 15.15)
अर्थ: मैं हर जीव के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मरण, ज्ञान और विस्मरण उत्पन्न होता है।
भगवान के कार्य:
- गर्भ में जीव की सुरक्षा: भगवान जीव को गर्भ में नौ महीने तक सुरक्षित रखते हैं।
- संसार के हर जीव की रक्षा: भगवान हर जीव के कर्मों का फल देते हैं।
- भौतिक सुखों का प्रबंध: भगवान ने अनाज, फल, जल, वायु, और प्रकाश का निर्माण किया है ताकि जीव अपने जीवन का निर्वाह कर सके।
5. मायाशक्ति से मुक्ति का उपाय।
मायाशक्ति से मुक्त होना सरल नहीं है, लेकिन भगवान की कृपा से यह संभव है।
श्लोक:
“मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गताः॥” (श्रीमद्भगवद्गीता 8.15)
अर्थ: जो महात्मा मेरी शरण में आते हैं, वे पुनर्जन्म से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं।
मुक्ति के साधन:
- अनन्य भक्ति: भगवान को अपने जीवन का केंद्र बनाना।
- संसारिक बंधनों का त्याग: माता-पिता, पुत्र, धन आदि से मोह छोड़कर भगवान को अपना सबकुछ मानना।
- सद्गुरु का मार्गदर्शन: सच्चे गुरु के माध्यम से भगवान की भक्ति करना।
6. भगवान की कृपा और प्रेम का महत्व।
भगवान की शक्तियाँ उनकी कृपा और प्रेम का प्रतीक हैं। जो व्यक्ति भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण करता है, वह मायाशक्ति के बंधन से मुक्त होकर सच्चे आनंद का अनुभव करता है।
मंत्र:
“ओम् नमो भगवते वासुदेवाय।।”
इस मंत्र का निरंतर जाप करने से माया के बंधन कमजोर होते हैं और व्यक्ति भगवान की शरण में जाता है।
निष्कर्ष।
भगवान की शक्तियाँ - पराशक्ति, मायाशक्ति, और योगमाया - सृष्टि की दिव्यता और अद्भुतता को दर्शाती हैं। भगवान की माया हमें भटकाती है, लेकिन योगमाया के माध्यम से वे हमें सत्य का मार्ग दिखाते हैं।
भगवान की कृपा से हमें अपनी आत्मा का सत्य स्वरूप पहचानने का अवसर मिलता है और मायाशक्ति के बंधनों से मुक्ति मिलती है। हमें भगवान की शक्तियों का आदर और उनकी भक्ति करते