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दत्तात्रेय अवतार: ब्रह्मा, विष्णु व महेश के एक रूप की कथा !

दत्तात्रेय अवतार: ब्रह्मा, विष्णु व महेश के एक रूप की कथा !
भगवान दत्तात्रेय
परिचय
दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं, जो त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के संयुक्त स्वरूप हैं। उनके नाम में 'दत्त' का अर्थ है 'दिया हुआ' (दत्त = प्रदत्त) और 'आत्रेय' का अर्थ है अत्रि ऋषि के पुत्र। दत्तात्रेय को एक ऐसे अवधूत (सर्वत्यागी योगी) के रूप में पूजा जाता है जिन्होंने सांसारिक बंधनों से परे रहते हुए आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश फैलाया। वे अद्वितीय हैं क्योंकि उनकी प्रतिमा में तीनों देवों के प्रतीक तीन मुख दर्शाए जाते हैं। उन्हें अक्सर चार कुत्तों (चार वेदों के प्रतीक) और एक गाय (पृथ्वी माता के प्रतीक) के साथ चित्रित किया जाता है। दत्तात्रेय भक्तों में अत्यंत लोकप्रिय हैं – विशेषकर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक आदि में उनकी उपासना की प्राचीन परंपरा है। उन्हें गुरु तत्व का साक्षात रूप माना जाता है, जिन्होंने विभिन्न रूपों में प्रकट होकर योग, तंत्र और ज्ञान की शिक्षा दी।
जन्म कथा
दत्तात्रेय का अवतरण सप्तर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया के यहाँ हुआ। पुराणों में वर्णित है कि महर्षि अत्रि ने कठिन तप करके त्रिमूर्ति को प्रसन्न किया और उनसे पुत्र रूप में जन्म लेने का वर माँगा। त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) ने प्रसन्न होकर कहा कि वे संयुक्त रूप से अत्रि-अनसूया के घर पुत्र रूप में आविर्भूत होंगे। फलस्वरूप अनुसूया ने तीन अद्भुत पुत्रों को जन्म दिया – चंद्रदेव (ब्रह्मा-अंश), दुर्वासा ऋषि (शिव-अंश) और दत्तात्रेय (विष्णु-अंश)। इन तीनों में दत्तात्रेय जी ने पूर्णावतार स्वरूप में दिव्य लीलाएँ कीं। उनके जन्म के समय देवताओं ने स्वर्ग से पुष्पवर्षा की और कहा कि "धर्म की धरा पर स्थापना हेतु यह त्रिमूर्तिधर अवतार प्रकट हुआ है।" अनुसूया और अत्रि के आश्रम में बालक दत्तात्रेय का लालन-पालन हुआ। बालक दत्तात्रेय जन्म से ही विशिष्ट गुणों से युक्त थे। कहते हैं कि शैशव में ही उनमें अनूठी आध्यात्मिक शक्ति दिखने लगी थी – वे कभी शेर आदि जंगली पशुओं के साथ खेलते दिखते, तो कभी ध्यानमग्न। किशोरावस्था आते-आते उन्होंने गृहत्याग कर जंगलों में स्वतंत्र भ्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। अत्रि-अनसूया जैसे ज्ञानवान माता-पिता के पुत्र होते हुए भी उन्होंने कोई औपचारिक आश्रम या विद्यालय नहीं चलाया, बल्कि स्वयं अवधूत की भाँति विचरण कर जीव-जंतुओं, प्रकृति और ब्रह्माण्ड से शिक्षा ग्रहण की और अप्रत्यक्ष रूप से अनेक शिष्यों को प्रभावित किया। दत्तात्रेय की एक विशेष उपाधि 'अवधूत' है – जिसका अर्थ है वह संन्यासी जो बाहरी आडंबर छोड़कर परमात्मा में लीन रहता है और सामाजिक बंधनों से मुक्त होता है।

उद्देश्य एवं अवतार का प्रयोजन

दत्तात्रेय अवतार का उद्देश्य मानवता को सहज योग, आत्मज्ञान और परम शांति का मार्ग दिखाना था। जहाँ कपिल मुनि ने ज्ञान और भक्ति का दर्शन दिया, वहीं भगवान दत्तात्रेय ने प्रत्यक्ष अपने जीवन द्वारा 'सर्वत्याग' (सब कुछ त्यागकर ईश्वर में लीन हो जाना) का आदर्श स्थापित किया। उन्हें त्रिमूर्ति का संयुक्त अवतार कहा जाता है, अर्थात वे सृष्टि, पालन और संहार – तीनों शक्तियों के प्रतीक थे, परंतु उन्होंने अपने को किसी एक संप्रदाय या विधि तक सीमित नहीं रखा। वे जिस युग में प्रकट हुए, उस समय कुछ स्थूल कर्मकांड और जड़ धार्मिक आडम्बरों का बोलबाला था। दत्तात्रेय जी ने इन बंधनों को तोड़ने के लिए अवधूत रूप धारण किया – वे नग्न या दिगम्बर रूप में घूमते थे, बाह्याचार की चिंता नहीं करते थे, और सीधे सत्य की अनुभूति पर जोर देते थे। उन्होंने बहुत लोगों को उपदेश नहीं दिए, बल्कि उनके जीवन से प्रेरणा लेकर शिष्यों ने ज्ञान प्राप्त किया। भागवत पुराण (स्कंध 1, अध्याय 3) में दत्तात्रेय को भगवान के छठे अवतार के रूप में उल्लेख किया गया है । वहाँ बताया गया है कि उन्होंने अलर्क, प्रह्लाद, यदु आदि महान व्यक्तियों को आत्मतत्त्व का उपदेश दिया। वास्तव में एक कथा में आता है कि अयोध्या के प्राचीन राजा यदु ने वन में दत्तात्रेय अवधूत को देखा और उनसे उनके आनंद एवं स्वतंत्रता का रहस्य पूछा। तब दत्तात्रेय ने कहा कि उन्होंने प्रकृति के चौबीस गुरुओं से शिक्षा ली है – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कपोत (पक्षी), अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, मृग, मछली, पिंगला नामक गणिका, कुरर पक्षी, बालक, कुंवारी कन्या, सर्प, बाण बनाने वाला, मकड़ी और भ्रंगी कीड़ा। इन 24 गुरुओं से उन्होंने अलग-अलग गुण सीखे (उदाहरणस्वरूप उन्होंने बताया: 'पृथ्वी से मैंने सहनशीलता और उदारता सीखी; वायु से असंग रहकर सबमें विचरण करना; आकाश से आत्मा की सर्वव्यापी स्वतंत्रता; जल से निर्मलता और शीतलता; अग्नि से अपने में किसी को जलाए बिना प्रकाश देना; चंद्रमा से कलाओं का क्षय-वृद्धि सहते हुए भी शीतल प्रकाश देना; सूर्य से निष्काम कर्म से सबका पोषण करना; कपोत (पक्षी) से आसक्ति त्यागना; अजगर से जो मिलता है उसी में संतुष्ट रहना; समुद्र से गाम्भीर्य; पतंगे से विषय-प्रेम का विनाशकारी परिणाम; मधुमक्खी से श्रमपूर्वक थोड़ा-थोड़ा संचय करना और पुष्परस (ज्ञान) को समेटना; हाथी से कामभाव पर नियंत्रण; हिरण से इंद्रियों के मोहजाल से बचना; मछली से जाल (वासना) का त्याग; पिंगला वेश्या से निराशा में भी ईश्वर पर भरोसा रखना; कुरर पक्षी से आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना; बालक से निष्कपट सरलता; कुंवारी कन्या से अल्प साधनों में भी संतुष्ट रहना; सर्प से अकेले विहार करना; शरकार (बाण बनाने वाले) से एकाग्रता; मकड़ी से सृजन और अपने में ही संहार करना; और भृंगी कीड़े से ध्यान द्वारा रूपांतरण की शक्ति।') यह दत्तात्रेय द्वारा प्रतिपादित एक अत्यंत प्रसिद्ध शिक्षाप्रद प्रसंग है , जो बताता है कि एक ज्ञानी किसी से भी शिक्षा ग्रहण कर सकता है और सतत सीखते रहना चाहिए। राजा यदु ने इन उपदेशों को आत्मसात् किया और दत्तात्रेय को प्रणाम करके वापस लौट गए। इस तरह भगवान दत्तात्रेय ने बिना औपचारिक गुरु या ग्रन्थों का आश्रय लिए प्राकृतिक उदाहरणों के माध्यम से आत्मज्ञान का संदेश दिया।

दत्तात्रेय से जुड़ी प्रमुख लीलाएँ एवं कथाएँ

दत्तात्रेय अवतार के साथ कई रोचक कथाएँ जुड़ी हैं। वे एक युग में नहीं, बल्कि युग-युगांतरों में प्रकट हुए ज्ञानी के रूप में माने जाते हैं। सतयुग में दत्तात्रेय ने अवधूत रूप में तपस्या की। त्रेतायुग में भगवान परशुराम को गुरु रूप में शिक्षा देने वाले दत्तात्रेय ही थे (मार्कण्डेय पुराण आदि में वर्णन है कि परशुराम ने शिवजी से दीक्षा पाने के बाद ज्ञानतृष्णा में दत्तात्रेय की शरण ली और तंत्र-ज्ञान तथा आत्मविद्या की दीक्षा ग्रहण की)। एक अन्य कथा में भगवान दत्तात्रेय के भक्त सहस्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) का प्रसंग आता है। कार्तवीर्य अर्जुन ने दत्तात्रेय की उपासना कर उनसे वरदान प्राप्त किया जिसके फलस्वरूप उसे सहस्र भुजाएँ, अजेय शक्ति और संपन्न राज्य मिला। बाद में जब वह अधर्म के मार्ग पर चला तो भगवान परशुराम ने उसका संहार किया, किंतु प्रारंभ में उसकी शक्ति का आधार दत्तात्रेय का आशीष ही था। इससे स्पष्ट होता है कि दत्तात्रेय प्रसन्न होकर किसी को भी दिव्य सिद्धियाँ दे सकते थे, पर उनके सदुपयोग करना उस भक्त पर निर्भर था। दत्तात्रेय मुनि के संबंध में एक और प्रसिद्ध घटना प्रजापति दक्ष के यज्ञ में उनका उपस्थित होना है। कथाओं में आता है कि दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने पर जब महादेव वीरभद्र रूप में दक्ष-यज्ञ को विध्वंस करने पहुँचे, तब दत्तात्रेय ने अपने योगबल से सभी क्रोधित देवों को शांत कराया और तत्पश्चात भगवान शिव व प्रजापति दक्ष में सुलह कराई। हालांकि यह कथा विभिन्न पुराणों में भिन्न रूपों में मिलती है, पर दत्तात्रेयजी को सार्वभौमिक स्नेह रखने वाले और समन्वय स्थापित करने वाले महात्मा के रूप में दिखाती है। दत्तात्रेयजी के किसी एक आश्रम या तीर्थ पर स्थायी रूप से रहने का उल्लेख नहीं मिलता। वे सर्वत्र विचरण करते रहे। मान्यता है कि वे आज भी युग-युगांतर तक सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं और ज्ञान की ज्योति जलाए रखते हैं। नाथ संप्रदाय समेत कई योग परंपराएँ दत्तात्रेय को आदिगुरु मानती हैं।

शास्त्रों में उल्लेख एवं पूजन परंपरा

श्रीमद्भागवत में दत्तात्रेय का संक्षिप्त परिचय देने के बाद उनके उपदेशों का संकेत भर है (विशेषकर राजा यदु को चौबीस गुरुओं की शिक्षा) । परन्तु अन्य ग्रंथों ने दत्तात्रेय के व्यक्तित्व को विस्तार से बताया है।

'दत्तात्रेय उपनिषद' में उन्हें ब्रह्मविद्या के अधिष्ठाता रूप में वंदना की गई है। महर्षि वेदव्यास रचित 'दत्तात्रेय पुराण' (या दत्त संहिता) नामक ग्रंथ भी बताया जाता है जिसमें उनकी लीलाओं का वर्णन है। गुरुगीता आदि ग्रंथों में भी दत्तात्रेय के नाम का आदरपूर्वक उल्लेख मिलता है।

दत्तात्रेय की पूजा एक निरंकार अवधूत के रूप में की जाती है। महाराष्ट्र में श्री दत्तात्रेय जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा को धूमधाम से मनाई जाती है। उस दिन भक्त उपवास रखकर दत्तात्रेय भगवान के मंदिरों में तीन मुख वाली मूर्ति या चित्र की पूजा करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि कलियुग में भी जो सत्य की खोज में निकलते हैं, उन्हें सूक्ष्म रूप से दत्तात्रेय का मार्गदर्शन मिलता है। कई संतों (जैसे श्रीनरसिंह सरस्वती, स्वामी समर्थ) को दत्तात्रेय का अंशावतार माना गया है जिन्होंने मध्यकाल में भक्तों का मार्गदर्शन किया। भारत में पवित्र गिरनार पर्वत (गुजरात) और माहूर (महाराष्ट्र) को दत्तात्रेय का सिद्धपीठ कहा जाता है, जहाँ उनकी चरण पादुकाएँ स्थापित हैं।

भक्ति भाव एवं सीख

भगवान दत्तात्रेय का अवतार हमें सिखाता है कि ईश्वर सर्वत्र हैं और सच्चा साधक हर स्थिति, हर जीव और हर घटना से कुछ न कुछ शिक्षा लेकर परमात्मा को पहचान सकता है। दत्तात्रेयजी ने अपने चौबीस गुरु प्रसंग से यही दिखाया कि प्रकृति के कण-कण में अध्यात्म की पाठशाला छिपी है। भक्तजन दत्तात्रेय को गुरु रूप में मानकर उनकी शरण जाते हैं ताकि उन्हें भी आत्मज्ञान प्राप्त हो। उनकी प्रार्थना की जाती है: "दिगम्बरं त्रिनयनं जय दत्तात्रेयमूर्तये" – हे दिगम्बर, त्रिनयन दत्तात्रेय मूर्ति, आपको जय हो। ऐसी मान्यता है कि जो सच्चे हृदय से दत्तात्रेय का स्मरण करता है, उसे सही गुरु, सही मार्ग और अंततः ईश्वर की प्राप्ति अवश्य होती है। दत्तात्रेय अवतार भक्ति, योग और ज्ञान का अभिनव संगम है। वे योगियों के आराध्य, तांत्रिकों के सिद्धगुरु और भक्तों के परम देव हैं। उनके चरणों में प्रणाम कर भक्तगण प्रार्थना करते हैं कि "हे दत्तात्रेय प्रभो, हमें भी संसार के आकर्षण से ऊपर उठकर आपके जैसी मुक्त अवस्था का अनुभव करने का आशीर्वाद दीजिए।" दत्तात्रेय भगवान की जय!

आधुनिक प्रभाव और अवतार-परंपरा

माना जाता है कि कलियुग में भी भगवान दत्तात्रेय अपने भक्तों का मार्गदर्शन करने के लिए संतों के रूप में अवतरित हुए। आंध्र प्रदेश में पिठापुरम के श्रीपाद श्रीवल्लभ (14वीं शताब्दी) और महाराष्ट्र में श्रीनृसिंह सरस्वती (15वीं शताब्दी) को दत्तात्रेय के पूर्ण अवतार माना गया, जिन्होंने दत्त संप्रदाय की नींव मज़बूत की। इसके पश्चात अनगिनत संत (जैसे अक्कलकोट के स्वामी समर्थ, मणिक प्रभु, वासुदानंद सरस्वती आदि) इस परंपरा में प्रकट हुए और समाज को आध्यात्मिक प्रकाश दिया। इन संतों की लीलाओं में कई बार स्वयं दत्तात्रेय के दर्शन की कथाएँ आती हैं, जिससे भक्तों का विश्वास दृढ़ होता है कि गुरु दत्तात्रेय आज भी सशरीर या सूक्ष्म रूप से कल्याण कर रहे हैं। महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक में आज 'दत्त जयंती' बड़े उत्साह से मनाई जाती है। भक्त तीन दिन का उपवास रखकर दत्तमहात्म्य ग्रंथ का पाठ करते हैं और रात को जागरण कर दत्तनाम का कीर्तन करते हैं। उनका एक लोकप्रिय मंत्र है: "श्री गुरुदत्तात्रेयाय नमः", जिसे जपने से गुरु-कृपा शीघ्र प्राप्त होती है, ऐसा माना जाता है। इस तरह दत्तात्रेय अवतार युगों को जोड़ने वाली कड़ी बनकर सनातन धर्म में गुरु-भक्ति और ज्ञान का अजस्र स्रोत बना हुआ है।

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