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वेद ज्ञान📜 ऋग्वेद 1/1, निरुक्त 2/11, बृहदारण्यक उपनिषद 2/2/6, मनुस्मृति 1/35, भागवत पुराण2 मिनट पठन

वेदों में ऋषियों का क्या स्थान है?

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में ऋषि मंत्रों के द्रष्टा (मंत्रद्रष्टा) हैं — रचयिता नहीं। निरुक्त (2/11) कहता है — 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः।' विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि, भरद्वाज आदि सप्तर्षि वैदिक ज्ञान को मनुष्य-लोक तक ले आए।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में ऋषियों का स्थान

ऋषि कौन हैं? निरुक्त (2/11) के अनुसार — 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः' — ऋषि वे हैं जिन्होंने मंत्रों को देखा (द्रष्टा हैं), न कि रचे। वे समाधि में ब्रह्म-सत्य के साक्षात्कारी हैं।

ऋषि और वेद का सम्बन्ध: प्रत्येक वेद-सूक्त के साथ उसके ऋषि, देवता और छंद का उल्लेख होता है। ऋषि = मंत्र का द्रष्टा, देवता = मंत्र का विषय, छंद = मंत्र का वृत्त।

प्रमुख वैदिक ऋषि

  • विश्वामित्र — गायत्री मंत्र के द्रष्टा (ऋग्वेद मण्डल 3)
  • वशिष्ठ — मण्डल 7 के ऋषि
  • अत्रि — मण्डल 5
  • भरद्वाज — मण्डल 6
  • कण्व — मण्डल 8
  • अगस्त्य — मण्डल 1 के महर्षि

सप्तर्षि परंपरा: बृहदारण्यक उपनिषद में सात महाऋषि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा से वेद-ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य-लोक तक ले आए।

स्त्री-ऋषिकाएं: लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, अपाला, विश्ववारा आदि के मंत्र ऋग्वेद में सुरक्षित हैं।

ऋषि का स्थान: वे धार्मिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक और शिक्षक थे। उनके आश्रम ज्ञान के केन्द्र थे।

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद 1/1, निरुक्त 2/11, बृहदारण्यक उपनिषद 2/2/6, मनुस्मृति 1/35, भागवत पुराण
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