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पढ़िए अरण्यकाण्ड भाग 6 – जब शरभंग ऋषि ने त्यागा स्वर्ग और श्रीराम से मांगा केवल भक्ति का वरदान !
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पढ़िए अरण्यकाण्ड भाग 6 – जब शरभंग ऋषि ने त्यागा स्वर्ग और श्रीराम से मांगा केवल भक्ति का वरदान !

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शरभंग ऋषि से भेंट एवं मोक्ष प्रदान – अरण्यकाण्ड भाग 6

शरभंग ऋषि से भेंट एवं मोक्ष प्रदान – अरण्यकाण्ड भाग 6

श्रीरामचन्द्र अपने अनुज लक्ष्मण व सीता सहित महर्षि शरभंग के आश्रम पहुँचे। भगवद्भक्त शरभंगजी ने जब दूर से श्रीराम के दर्शन किए तो उनके नेत्र हर्ष-भक्ति से भर आए। तुलसीदासजी इस दृश्य को एक सुंदर दोहे में चित्रित करते हैं:

देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग॥

भावार्थ: श्री रामचन्द्रजी के मुखकमल को देखकर मुनिश्रेष्ठ शरभंग के नेत्र रूपी भौंरे आदरपूर्वक उस कमल का रसपान कर रहे हैं। अर्थात ऋषि शरभंग अपने नेत्रों द्वारा श्रीराम के स्वरूप का आनंद पी रहे हैं और अपने को अत्यंत धन्य मान रहे हैं। वास्तव में शरभंग ऋषि का जन्म आज सफल हो गया – जिस प्रभु के दर्शन के लिए उन्होंने जीवनभर तपस्या की, वही रामसाक्षात उनके सम्मुख खड़े हैं।

श्रीराम को समक्ष पाकर मुनि शरभंग विनयपूर्वक उनकी स्तुति करते हैं और आगंतुक भगवान का स्वागत करते हैं:

कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥

व्याख्या: ऋषि विनम्र होकर कहते हैं – “हे कृपालु रघुवीर, हे शिवजी के मनरूपी मानसरोवर के राजहंस श्रीराम! मेरी सुनिए – मैं ब्रह्मलोक को जा रहा था, तभी कानों से सुन लिया कि राम वन में आ रहे हैं”।

शरभंगजी राम को “शंकर के मन रूपी मानस-सरोवर का हंस” कहते हैं, जिसका अर्थ है कि भगवान शंकर जिनका निरंतर मनन-ध्यान करते हैं, वे रामरूप हंसरूप में शिवजी के मन-सरोज का आनंद लेते हैं। इस सुंदर उपमा द्वारा वे रामभक्ति में लीन शिवजी की भावदशा को रेखांकित करते हैं, साथ ही प्रभु को आदरपूर्वक संबोधित भी करते हैं। आगे मुनि बताते हैं कि वे ब्रह्मलोक (सत्यलोक) जाने वाले थे – शरभंग ऋषि ने घोर तप द्वारा ब्रह्मलोक तक की प्राप्ति सुनिश्चित कर ली थी। ऐसा कहा जाता है कि स्वयं इंद्र ब्रह्माजी का विमान लेकर शरभंग को लेने आए थे।

किन्तु तभी उन्होंने सुना कि श्रीराम वन में पधार रहे हैं। यह सुनते ही महर्षि शरभंग ने स्वर्ग जाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया और निश्चय किया कि पहले श्रीराम के दर्शन करके ही अपने प्राण त्यागूँगा।

वे कहते हैं – "मैंने ये शुभ समाचार सुनकर ब्रह्मलोक गमन छोड़ दिया और दिन-रात आपकी राह देखता रहा। अब प्रभु को प्रत्यक्ष देख कर मेरी छाती ठंडी हो गई, हृदय की सभी आकांक्षाएँ पूर्ण हो गईं"।

शरभंग जैसे महान योगी के लिए रामदर्शन ही सर्वोच्च फल था, स्वर्ग का सुख तुच्छ था। वे प्रभु की कृपा की सराहना करते हुए कहते हैं – "नाथ! मैं तो समस्त साधनों से हीन था, आपने दीन जानकर मुझ पर अपार कृपा करी"।

यह कहकर मुनि एक और विनीत आग्रह करते हैं – "हे देव, आपने जो कृपा कर दर्शन दिया है, यह मुझपर कोई एहसान नहीं बल्कि यह तो आपके अपने प्रण का पालन है जो भक्तजन के हृदय को चुराने वाले कृपालु राम ने सदा से किया है। कृपया अब इतनी कृपा और करें कि आप थोड़ी देर यहीं ठहरें, जब तक मैं अपना शरीर त्यागकर आपसे एकाकार न हो जाऊँ"।

शरभंगजी दरअसल चाहते थे कि प्रभु के सम्मुख अपने प्राण त्यागें ताकि जीवन का परम लक्ष्य सिद्ध हो जाए। दीन भक्त की ऐसी विनती सुनकर करुणासागर राम सादर वहाँ ठहर जाते हैं।

अब महर्षि शरभंग अपने जीवन भर के संचित पुण्यों और तप-त्यों को भगवान को समर्पित कर, बदले में एक अमूल्य वरदान मांगते हैं। तुलसीदास वर्णन करते हैं:

जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥

व्याख्या: महर्षि ने आजीवन जो भी योग, यज्ञ, जप, तप और व्रत आदि साधन किए थे, वह सब प्रभु को अर्पण कर दिए और बदले में भगवान से भक्ति का वरदान ले लिया।

उन्होंने श्रीराम के चरणों में अपने सारे आध्यात्मिक अर्जन समर्पित करके केवल निश्काम भक्ति की मांग की। इससे बढ़कर कोई वर नहीं – स्वयं परमात्मा की भक्ति मिल जाए तो बाकी सब तुच्छ है। प्रभु ने प्रसन्न होकर उन्हें अखंड भगवद्भक्ति का आश्वासन दिया। ये वरदान पाकर शरभंगजी परम तृप्त हो गए।

फिर उसी प्रकार, मुनि शरभंग ने एक चिता (अग्निकुंड) की रचना की और मन से समस्त आसक्तियाँ त्यागकर उस पर विराजमान हो गए। वह क्षण बड़ा ही परम शांतिमय और गूढ़ था – एक महान योगी अपने आत्मत्याग द्वारा परमात्मा में लीन होने को उद्यत था।

शरीर त्यागने से पूर्व शरभंग ऋषि ने प्रभु से एक मार्मिक प्रार्थना दोहे के रूप में की, जो उनकी भक्ति और श्रद्धा का परिपूर्ण प्रमाण है:

सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्री राम॥

भावार्थ: शरभंगजी ने विनम्र प्रार्थना की – "हे नील जलधर समान श्याम शरीर वाले सगुणरूप श्रीरामजी! आप सीताजी एवं अनुज लक्ष्मण सहित सदा सर्वदा के लिए मेरे हृदय में निवास करें"।

यह भक्त की अंतिम अभिलाषा है कि प्रभु अपने साकार स्वरूप में (सीता-लक्ष्मण सहित) उसके हृदय में बसें, अर्थात उनकी स्मृति हृदय में बनी रहे। शरभंग जैसे महान भक्त के लिए इससे बढ़कर कोई वर नहीं कि प्रभु उसकी अन्तःचेतना में सदा विराजमान रहें।

प्रभु श्रीराम "तथास्तु" कहते हुए मुस्कुराए। उस क्षण ऋषि शरभंग ध्यानमग्न होकर योगबल द्वारा अपने शरीर को त्यागने लगे:

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥

व्याख्या: ऐसा कहकर (प्रार्थना करके) मुनि शरभंगजी ने योग की अग्नि से अपने शरीर को जला डाला और श्रीराम की कृपा से बैकुंठ को प्रस्थान किया।

भगवान की कृपा से उन्होंने परम धाम को प्राप्त किया – यहाँ बैकुंठ का अर्थ प्रभु का निज लोक है जहां भक्त अपने इष्ट के साथ निवास करता है। तुलसीदास आगे कहते हैं कि मुनि शरभंग भगवान में लीन इसलिए नहीं हुए क्योंकि उन्होंने पहले ही भेदभाव सहित सगुण भक्ति का वर मांग लिया था।

अर्थात् उन्होंने निर्गुण ब्रह्म में विलीन होने (कैवल्य मोक्ष) के बजाय साकार प्रभु के धाम में उनकी सेवा पाने का वरदान चुना था, इसलिए उनका लोकप्राप्ति का मार्ग वैकुण्ठ धाम हुआ ना कि ब्रह्मलीनता। शास्त्रों में मोक्ष के विभिन्न स्वरूप बताए गए हैं – सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य। शरभंगजी ने सायुज्य (ब्रह्म में लय) न लेकर सालोक्य मुक्ति का वरण किया, जिससे वे प्रभु के परमधाम में प्रभु के समीप रहें। भगवान की कृपा से उनकी आत्मा दिव्य विमान द्वारा बैकुंठ को गयी।

शरभंग ऋषि का अद्भुत परमौद्धार देखकर वहाँ उपस्थित अनगिनत मुनि-गण हर्षित हुए। सभी ऋषिवरों ने रामचन्द्रजी की स्तुति की और भावविभोर होकर बोले – "जय हो शरणागतों के हितकारी करुणाकन्द (करुणा के मूल) प्रभु श्रीराम की!"

सभी ने स्वीकार किया कि श्रीराम ने भक्त का कल्याण करके अनन्य दयालु होने का प्रमाण दिया है।

शरभंग ऋषि को मोक्ष प्रदान कर अब श्रीराम ने दंडकारण्य के तपस्वियों को रक्षा का आश्वासन दिया। आगे बढ़ने पर मार्ग में प्रभु ने जगह-जगह ऋषियों के आश्रम देखे। अनेक ऋषि-महात्मा उनके साथ हो लिए। मार्ग में जगह-जगह हड्डियों के ढेर देखकर दया से भरकर श्रीराम ने प्रश्न किया कि ये किसके अवशेष हैं।

ऋषियों ने व्यथा बताई कि जंगल में राक्षसों के झुंड पनप गए हैं जिन्होंने अनेकों निर्दोष मुनियों को मारकर भक्षण कर लिया – ये उन्हीं की अस्थियां हैं।

यह सुनकर करुणालय राम के नेत्रों में आँसू भर आए और हृदय पीड़ा से भर गया। भगवान ने उसी क्षण मन ही मन पृथ्वी को राक्षस-हीन करने का दृढ़ संकल्प लिया। वे वन के प्रत्येक आश्रम में गए और मुनियों को आश्वासन दिया कि अब कोई दैत्य उन्हें कष्ट नहीं देगा।

आगामी भाग में हम देखेंगे कि श्रीराम अपने प्रण को कैसे व्यक्त करते हैं और दंडक वन को निषिचर-हीन करने हेतु प्रतिज्ञा करते हैं। साथ ही, सुतीक्ष्ण मुनि से मिलन तथा आगे अगस्त्य ऋषि के आश्रम में प्राप्त दिव्यास्त्रों की कथा भी अगले भागों में आएगी।

निष्कर्ष

इस भाग में हमने देखा कि प्रभु राम ने विराध राक्षस का वध करके जंगल के भय को दूर किया और भक्त शरभंग को परम मोक्ष देकर अपने करुणामय स्वरूप को प्रकट किया। रामचरितमानस की ये घटनाएँ हमें सिखाती हैं कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा एवं उद्धार के लिए सदा प्रस्तुत रहते हैं।

शरभंग ऋषि द्वारा स्वर्ग का त्याग करके रामभक्ति को चुनना यह दर्शाता है कि भगवद्भक्ति का आनंद स्वर्ग सहित सभी भौतिक सुखों से श्रेष्ठ है। प्रभु श्रीराम भी अपने भक्त को निराश नहीं करते – वे स्वयं चलकर शरभंग को दर्शन देते हैं और अंत समय में उसे अपना धाम प्रदान करते हैं।

दूसरी ओर, विराध जैसे पापी का संहार करते समय भी प्रभु उसकी आत्मा का कल्याण करना नहीं भूलते, उसे भी उद्धार मिलता है। इस प्रकार रामचरितमानस हमें दुष्टता पर धर्म की विजय और प्रभु की अनुकम्पा, दोनों का संदेश देता है।

भक्तजन इन प्रसंगों से प्रेरणा लें कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी भगवान पर विश्वास रखेँ – वे अपने भक्त के लिए अद्भुत विधान रचते हैं।

आगामी भागों में हम देखेंगे कि किस प्रकार श्रीराम दंडकारण्य को राक्षसों से मुक्त करने का प्रण निभाते हैं और अन्य ऋषियों (सुतीक्ष्ण, अगस्त्य आदि) को दर्शन देकर उनके जीवन कृतार्थ करते हैं।

अगले भाग 7 में हम पढ़ेंगे कि किस प्रकार प्रभु श्रीराम की भेंट सुतीक्ष्ण मुनि से हुई, उनकी भावपूर्ण भक्ति कैसी थी, और फिर महर्षि अगस्त्य के आश्रम में आगमन पर श्रीराम ने कौन-कौन से दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए। चलिए, अरण्य काण्ड की इस पवित्र कथा को अगले भाग में आगे बढ़ाते हैं।

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