नवधा भक्ति का वर्णन
शबरी, भगवान श्रीराम की परम भक्त थीं, जिनकी भक्ति और समर्पण की कथा रामायण में विशेष स्थान रखती है
शबरी ने अपने गुरु मतंग ऋषि की आज्ञा से वर्षों तक भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा की। उनकी भक्ति इतनी निष्कपट और प्रेमपूर्ण थी कि जब भगवान श्रीराम उनके आश्रम में पधारे, तो उन्होंने झूठे बेर अर्पित किए,जिन्हें प्रभु ने सहर्ष स्वीकार किया।
जब भगवान श्रीराम वहां से जाने लगे,तो शबरी ने उनसे भक्ति के मार्ग के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की।वह हाथ जोड़कर प्रभु के सामने खड़ी हो गई। प्रभु को देखकर उसका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। उसने कहा, "मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूं? मैं तो एक नीच जाति की और अत्यंत मूढ़बुद्धि हूं।
जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियों में भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूं।"
श्रीरघुनाथजी ने कहा— "हे ब्राह्मणी! मेरी बात सुनो। मैं तो केवल एक भक्ति को ही संबंध मानता हूं।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
प्रभु श्रीराम ने नवधा भक्ति का वर्णन करते हुए कहा कि भक्ति के नौ प्रकार हैं, जिन्हें सुनकर और मन में धारण करके साधक अपने जीवन को पवित्र बना सकता है। पहली भक्ति है संतों के संग से प्राप्त प्रेरणा और सत्संग, और दूसरी है प्रभु की कथा के प्रति प्रेम और श्रद्धा। ये भक्ति के आधार स्तंभ हैं, जो साधक को ईश्वर की ओर ले जाते हैं।
गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।
श्रीराम ने तीसरी और चौथी भक्ति का वर्णन करते हुए कहा कि सच्चे भक्ति मार्ग पर चलने के लिए सबसे पहले अहंकार का त्याग करना जरूरी है। अहंकार रहित होकर गुरु की चरण सेवा करना ही तीसरी भक्ति है। चौथी भक्ति में कपट, छल और दिखावा छोड़कर, पूरी निष्ठा और प्रेम के साथ प्रभु के दिव्य गुणों का गान करना शामिल है। यह आत्मा की पवित्रता और प्रभु से सच्चा संबंध स्थापित करने का मार्ग है।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
षष्ठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।
श्रीराम ने पाँचवीं और छठी भक्ति का वर्णन करते हुए कहा कि प्रभु के नाम का जाप और उन पर अटूट विश्वास, भक्ति का मुख्य आधार है। इसे ही वेदों में मान्यता प्राप्त है। छठी भक्ति में इंद्रियों पर संयम रखना, स्वभाव में शील और सरलता लाना, सांसारिक कार्यों में वैराग्य रखना, और हमेशा संतों के धर्म और आचरण को अपनाने में रुचि रखना, यह सब शामिल है। यह आत्मा को प्रभु की ओर उन्मुख करने और जीवन में शांति और संतोष लाने का मार्ग है।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।
आठवँ यथालाभ संतोषा। सपनेहुँ न देखइ परदोषा।।
सातवीं भक्ति है जगत भर को समभाव से मुझमें ओत-प्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ भी प्राप्त हो, उसमें संतोष करना और अपने मन से भी परायों के दोषों को न देखना।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।
प्रभु श्रीराम ने नवम भक्ति का वर्णन करते हुए कहा कि एक सच्चे भक्त को सरलता और ईमानदारी से जीवन जीना चाहिए, बिना किसी छल-कपट के। उसका हृदय हमेशा भगवान पर अटूट विश्वास से भरा होना चाहिए। चाहे कोई भी परिस्थिति हो, उसे न अत्यधिक प्रसन्नता में बहना चाहिए और न ही दुख से व्याकुल होना चाहिए।
यह नवधा भक्ति इतनी सरल और सार्वभौमिक है कि इसका अनुसरण करने वाला कोई भी हो—स्त्री, पुरुष, या किसी भी अवस्था में, जड़ या चेतन, वह भगवान के प्रेम और कृपा का अधिकारी बन सकता है।

