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पढ़िए: कैसे प्रभु राम ने रावण जितने ही पराक्रमी खर और दूषण को उनकी 14,000 सेना सहित वध कर दिया ?
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पढ़िए: कैसे प्रभु राम ने रावण जितने ही पराक्रमी खर और दूषण को उनकी 14,000 सेना सहित वध कर दिया ?

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खर-दूषण और प्रभु श्रीराम

खर-दूषण और उनकी सेना पर प्रभु श्रीराम की विजय

खर-दूषण ने शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए अपनी सेना को संगठित किया। उनके साथ असंख्य राक्षस थे, जो अपनी विकरालता और ताकत से भरे हुए थे। युद्धभूमि की ओर उनकी चढ़ाई इतनी भयावह थी कि ऐसा लगता था मानो आकाश में काजल से ढके विशाल पहाड़ उड़ रहे हों।

राक्षस सेना विविध रूपों और विकराल आकृतियों में सजी हुई थी। वे विभिन्न प्रकार की सवारियों पर चढ़े हुए थे और उनके हाथों में भयानक और डरावने हथियार थे। सेना के आगे उन्होंने शूर्पणखा को खड़ा कर दिया, जिसकी नाक-कान कटे होने के कारण वह अपमानित और क्रोधित थी।

युद्ध के दौरान राक्षसों के झुंड ने शोर मचाते हुए आपस में कहा कि श्रीराम और लक्ष्मण को पकड़कर जीवित ही लाना चाहिए, फिर उन्हें मारकर उनकी स्त्री (माता सीता) को छीन लेना चाहिए। युद्ध की तीव्रता के कारण वातावरण में धूल छा गई, जिससे चारों ओर अंधकार हो गया। तब श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाकर उन्हें आगे की रणनीति के लिए निर्देश दिया।

"राक्षसों की भयानक सेना आ गई है। जानकीजी को लेकर तुम पर्वत के अंदर चले जाओ। सावधान रहना।"

प्रभु श्रीरामचंद्रजी के वचन सुनकर लक्ष्मणजी ने धनुष-बाण हाथ में लिया और सीताजी के साथ चले गए।

'पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए राक्षस अपने स्थानों से भागते हुए बड़ी तेजी से दौड़े और उन्होंने श्रीरामजी को चारों ओर से घेर लिया।

भयानक राक्षस बाण, धनुष, तोमर, शंख, शूल (बरछी), कृपाण (कटार), परिघ और फरसा धारण किए हुए दौड़ पड़े। प्रभु श्रीरामजी ने पहले धनुष का बड़ा कठोर, घोर और भयानक टंकार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गए। उस समय उन्हें कुछ भी होश नहीं रहा।

राक्षस योद्धाओं ने अपने बल और संख्या पर भरोसा करते हुए आत्मविश्वास से भरकर श्रीराम की ओर हमला किया। उन्होंने सावधानी से युद्ध का रुख अपनाते हुए अपने भयानक और विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र श्रीराम पर बरसाने शुरू कर दिए।

श्रीरघुवीरजी ने उनके हथियारों को तिनके के समान (टुकड़े-टुकड़े) करके काट डाला। फिर धनुष को कान तक तानकर अपने बाण छोड़े। फिर प्रभु ने धनुष पर बाण चढ़ाकर एक के बाद एक कई बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे।

उनकी छाती, सिर, भुजाएं, हाथ और पैर जहां-तहां पृथ्वी पर गिरने लगे। बाण लगते ही वे हाथी की तरह चिंघाड़ने लगे। उनके पहाड़ के समान धड़ कट-कटकर गिर रहे थे।

क्रोधित राक्षस योद्धाओं ने अपने सभी भयानक हथियारों को एकसाथ श्रीराम पर बरसाना शुरू कर दिया। लेकिन श्रीराम ने अपनी तीव्र गति और पराक्रम से पलभर में उन सभी हथियारों को काट दिया। इसके बाद उन्होंने जोर से ललकारा और अपनी धनुष विद्या का प्रदर्शन करते हुए अपने बाणों से राक्षस सेनापतियों के हृदय को भेद डाला।

राक्षस अपनी माया के कारण बार-बार गिरने के बाद भी उठकर युद्ध करने की शक्ति रखते थे। वे मरते नहीं थे और अपनी माया से भ्रम उत्पन्न करते थे। देवता और मुनि भयभीत थे कि खर-दूषण और उनके राक्षस चौदह हजार हैं, जबकि अयोध्यानाथ श्रीराम अकेले हैं।

यह देखकर प्रभु श्रीराम, जो स्वयं मायाओं के स्वामी हैं, ने अपनी दिव्य लीला रची। उन्होंने ऐसा भ्रम उत्पन्न कर दिया कि राक्षस एक-दूसरे में श्रीराम को देखने लगे। खर और दूषण को यह वरदान था कि वे केवल एक-दूसरे को ही मार सकते थे। प्रभु श्रीराम की माया के कारण, उन्होंने एक-दूसरे को राम के रूप में देखा और आपस में ही लड़ते हुए कट-मर गए।

इस प्रकार अंततः सभी राक्षस समाप्त हो गए। प्रभु श्रीराम ने खर-दूषण की विशाल सेना का संहार कर दिया। देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे, और आकाश में नगाड़े बजने लगे। फिर वे सभी स्तुति करते हुए, अनेक विमानों पर सुशोभित होकर अपने-अपने स्थान को चले गए।

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