जनक द्वारा स्वयंवर घोषणा और राजाओं का विफल प्रयास
अगले दिन जनकपुर में शिव धनुष यज्ञ (स्वयंवर) का बड़ा समारोह शुरू हुआ। महाराज जनक ने सभा में घोषणा की – “मेरी पुत्री सीता का विवाह उस वीर से होगा जो भगवान शिव के परम भारी धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा।”
यह सुनकर दूर-दूर से आए अनेक राजा एवं वीर युवराज उत्साह से आगे आए। लेकिन वह धनुष इतना विशाल और भारी था कि किसी से उठा तक नहीं।
तुलसीदास जी ने सुंदर उपमा देते हुए कहा है – “राजाओं की भुजाओं का बल चंद्रमा है और शिव का धनुष राहु के समान है, वह भारी व कठोर है; रावण, बाण जैसे महाबलियों ने भी उसे देखा और हार मानकर लौट गए।”
एक-एक कर असुर, दानव, क्षत्रिय जितने वीर आए थे, सब असफल रहे। परशुराम के गुरु शिव के धनुष को उठाना हँसी खेल न था। कुछ ने तो पास जाकर छूकर ही मुँह लटका लिया।
पूरा दिन बीत गया, कोई भी धनुष हिला न सका
राजा जनक को बड़ी निराशा हुई। उन्होंने उदास हो सभा में घोषणा की – “लगता है आज पृथ्वी वीरों से विहीन हो गई है। जिसे धनुष उठाना था वह वीर पैदा ही नहीं हुआ। अब मेरी सीता अविवाहित ही रह जाएगी।”
ऐसा कहते ही जनक की आँखों में आँसू आ गए। जनक की यह बात सुनकर लक्ष्मण क्रोधित हो उठे। वे राम को प्रिय छोटे भाई थे और किसी को उनके रहते “पृथ्वी में वीर ही नहीं” ऐसे शब्द कहने पर तिनक गए। लक्ष्मण खड़े होकर जनक से क्षमा मांगते हुए किंतु तीखे स्वर में बोले –
“जनकजी, हमारी धीरता को हमारी कायरता न समझें। यह क्या बात हुई कि धनुष न उठा पाने पर आप समस्त क्षत्रियों को निर्बल कहने लगे? मेरा बड़ा भाई श्रीराम यहाँ उपस्थित हैं। उनकी मौजूदगी में भला ये धनुष उठ न पाए ऐसा हो ही नहीं सकता। आपकी बेटी सीता के लिए योग्य वर हमारे राम ही हैं, यह मैं हृदय से जान चुका हूँ। आप आज्ञा दें तो राम इस धनुष को अभी खेल-ही-खेल में तोड़ सकते हैं।”
गुरु विश्वामित्र ने लक्ष्मण को शांत होने का संकेत दिया, फिर जनक को आश्वासन दिया कि “राजन, निराश न हों, वीरता अभी मरी नहीं है।” दुनिया की नजरों से बचते हुए वे श्रीराम की ओर मुड़े और कहा –
“राम, उठो और भगवान शिव का धनुष परिक्षा हेतु उठाओ।”
आज्ञा पाते ही श्रीराम उठ खड़े हुए। उन्होंने सब महारथियों को विनम्र दृष्टि से देखा – मानो संकेत किया कि “अब मेरी बारी है।”
राम ने सभा में रखे शिव धनुष के निकट जाकर पहले मन ही मन गुरु वशिष्ठ एवं शिवजी को प्रणाम किया। फिर हलके हाथों से धनुष को उठा लिया।
क्षण भर को सब सन्न रह गए – शिव का धनुष राम ने मानो सहज खेल में उठाकर तान लिया! तुलसीदास लिखते हैं:
चौपाई:
गुरहि प्रनामु मनहुँ मन कीन्हा, अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा।
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ, पुनि नभ धनु मंडल सम भयउ॥
भावार्थ: (राम ने) मन ही मन गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे हाथ में लिया, तब वह धनुष बिजली की तरह दमक उठा और फिर आकाश में मंडल के समान (वक्राकार) दिखाई देने लगा।
श्रीराम ने धनुष उठाकर तुरन्त ही उसकी डोरी (प्रत्यंचा) चढ़ाने के लिए खींचा। उसी खिंचाव में अगले ही क्षण धनुष बीच से टूट गया। भारी “टन्न” की कठोर गर्जना हुई जिससे धरती-आसमान गूंज उठे:
चौपाई:
लेट चढ़ावत खैंचत गाढ़ें, काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा, भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥
भावार्थ: कब राम ने धनुष उठाया, कब चढ़ाया और कब जोर से खींच दिया – किसी को कुछ दिखाई ही नहीं पड़ा; सबने बस यह देखा कि राम धनुष खींचे खड़े हैं। तभी उसी क्षण राम ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भयंकर कठोर ध्वनि से समस्त लोक भर गए।
धनुष टूटने की भीषण गर्जना सुनकर क्षण भर को तो पृथ्वी कांप उठी। उपस्थित जनसमूह कुछ पल के लिए बहरे से हो गए। फिर जब चेतना लौटी तो एकदम जयघोष उठ पड़ा – “बोलो दशरथनन्दन रामचंद्र की जय!” देवताओं ने फूलों की वर्षा आरंभ कर दी।
राजा जनक की प्रसन्नता का पार न रहा। सीता जी की मनोकामना पूर्ण होने को थी – वे मन ही मन परमपिता का धन्यवाद करने लगीं और श्रीराम को निहार कर लजा रही थीं।
लक्ष्मण हर्ष से उछलकर भरत-शत्रुघ्न का नाम ले-लेकर नाचने लगे। विश्वामित्र जी ने संतोषपूर्वक राम को गले से लगाया। जनकपुर में आनन्द-ही-आनन्द छा गया।
परशुराम का आगमन और शांत होना
इतने में एक नया घटनाक्रम हुआ – भयानक रूपधर एक ऋषि-कुमार सभा में प्रकट हुए जिनके हाथ में फरसा (परशु) था। यह देख जनक सहित सभी अचरज में पड़ गए और विचलित भी हुए, क्योंकि पहचान गए कि ये खुद महर्षि परशुराम हैं – शिव के परम भक्त और क्रोध के लिए प्रसिद्ध।
परशुराम ने शिव धनुष टूटने की आवाज सुनी थी और क्रोध से तमतमाते वहाँ आए। उन्होंने ललकार कर पूछा, “बताओ, मेरे प्रभु शिव का धनुष किसने तोड़ा?” सभा में कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
लक्ष्मण जी तो तीखे उत्तर देने को तत्पर थे, पर राम ने आँखों के इशारे से उन्हें शांत रखा। राजा जनक आगे बढ़े, बोले – “भगवन्, यह मेरे यहाँ सीता स्वयंवर में उठा-परीक्षा के दौरान टूट गया; तोड़ने वाले यही अयोध्या नरेश के पुत्र राम हैं। कृपया क्रोध त्यागें – राम ने अनजाने में धनुष खींचा, उनका कोई अनादर का भाव नहीं था।”
परशुराम क्रोध में कुछ सुनने को तैयार न थे। उन्होंने राम को कठोर शब्द कहे। इस पर लक्ष्मण जी और परशुराम जी में काफी वाद-विवाद हुआ। राम जी ने लक्ष्मण जी को शांत किया, फिर हाथ जोड़कर बोले –
“मुनिवर, आपका यह शिष्य (राम) अज्ञानतावश अपराधी हुआ है। कृपा कर क्षमा करें।”
लक्ष्मण का खून खौल रहा था कि भला उनके राम को कोई ऐसा वैसा बोले, पर राम ने उन्हें चुप रखा।
धीरे-धीरे राम ने अपनी प्रभुता परशुराम को दिखाई – उन्होंने परशुराम को उनके पूज्य विष्णु धनुष (कोडंड, जो जनक के पास एक और धनुष था) का दृश्य दिखाया और उनका सारा क्रोध हर लिया।
जब परशुराम जी को समझ में आया कि श्रीराम कोई साधारण राजकुमार नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं, तब वे सकुचा गए। उनका रोष प्रेम में बदल गया। उन्होंने तुरंत राम को हृदय से लगाया और आशीर्वाद देते हुए कहा –
“हे राम, तुमने जगत का कल्याण करने हेतु अवतार लिया है। अब मैं आश्वस्त हुआ। लो, मैं अपना धनुष-बाण भी तुम्हें अर्पित करता हूँ।”
(परशुराम का दिव्य धनुष-बाण उन्होंने राम को समर्पित किया।)
उन्होंने राम को आशीर्वाद दिया – “तुम्हारा कल्याण हो!” इस तरह परशुराम जी का रौद्र अवतार शांत हुआ और वे महेंद्र पर्वत को लौट गए। सबने चैन की सांस ली।
परशुराम प्रकरण के बाद विधिवत् राम-सीता के विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। जनक ने अयोध्या संदेश भेजा। अयोध्या में भरत और शत्रुघ्न थे, तुरंत राजा दशरथ सारा काफिला लेकर बारात जनकपुर पहुंचे।
जनकपुर ने भव्य बारात का स्वागत किया। नियत मुहूर्त पर जनक नंदिनी सीता और दशरथ नंदन राम का मंगलमय विवाह जनकपुरी में संपन्न हुआ।
जनक की दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से, तथा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्रियाँ – मांडवी का भरत से और श्रुतिकीर्ति का शत्रुघ्न से हुआ।
इस प्रकार चारों भाइयों का चार राजकुमारियों से विवाह एक साथ हुआ – पूरा जनकपुर आनंद और हर्ष में डूब गया।
जनक ने प्रेमवश अपनी पुत्री सीता को स्वयं विदा करते समय कहा –
“बेटी, अयोध्या जाकर वहाँ के सभी बड़ों की सेवा-सम्मान करना; अपने पति राम को अपने प्राणों से प्रिय मानना; हमेशा मर्यादा का पालन करना।”
सुनयना माँ ने आशीष दिया और स्त्रियाँ मंगलगीत गाकर विदा करने लगीं।
दशरथ अपने चारों नवविवाहित पुत्रों और बहुओं के साथ अयोध्या को लौट चले। अयोध्या में उनका भव्य स्वागत हुआ, नगरवासियों ने दीपमाला जलाकर घर-घर उत्सव मनाया। गुरु वशिष्ठ ने सभी दंपतियों को शुभाशीष दिया।
यहीं पर बालकांड कथा का समापन होता है – तुलसीदास जी अंत में बालकांड की महिमा गाते हैं कि
“जो कोई इस पवित्र कथा को पढ़े-सुनेगा, उसके मन के विकार दूर होंगे और उसे संसार के दुखों से मुक्ति मिलेगी।”
बालकांड के साथ ही हमने भगवान राम के जन्म से लेकर विवाह तक के सभी प्रमुख घटनाक्रम देखे।
रामचरितमानस का अगला भाग अयोध्याकांड है, जिसमें –
- राम के राज्याभिषेक की तैयारी
- कैकेयी द्वारा वरदान मांगना
- राम का वनवास
- दशरथ-मरण
- भरत का राम के चरणों के लिए प्राण त्याग जैसा प्रेम
- तथा अंत में चित्रकूट में राम-भरत मिलाप
जैसे मार्मिक प्रसंग हैं। अगले कांड (अयोध्याकांड) के पोस्टों में हम इन्हें विस्तार से अध्ययन करेंगे।






