बाल कांड – पोस्ट 5: मनु-शतरूपा की तपस्या और भगवान का वरदान
प्रमुख घटनाक्रम
नारदजी की कथा के पश्चात भगवान शंकर पार्वती को बताते हैं कि त्रेतायुग में भगवान विष्णु के रामरूप में अवतार लेने का एक बड़ा कारण सतयुग के आदि मानव स्वायंभुव मनु और शतरूपा की तपस्या भी है।
मनु और शतरूपा ने भगवान से ऐसा वरदान माँगा था कि “आप हमारे पुत्र रूप में हमें प्राप्त हों”। उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें यह वर दिया, जो त्रेतायुग में रामावतार के रूप में फलीभूत हुआ।
इस पोस्ट में हम मनु-शतरूपा की तप साधना और वरदान तथा राजा दशरथ के रूप में उनके पुनर्जन्म की कथा जानेंगे।
स्वायंभुव मनु और शतरूपा का परिचय
स्वायंभुव मनु प्रथम मानव (प्रथम पुरुष) माने जाते हैं और शतरूपा प्रथम स्त्री। इन्हीं से मानवजाति की उत्पत्ति हुई। मनु-शतरूपा परम धर्मपरायण दंपति थे, उनके दो प्रसिद्ध पुत्र थे – उत्तानपाद (ध्रुव के पिता) और प्रियव्रत।
लंबे समय तक राज्य करने के बाद जब वे वृद्ध हो गए, तब उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्हें चिंता हुई कि “हमारा यह जन्म भगवान की भक्ति किए बिना ही बीत रहा है”। तब मनु ने अपना राजपाट अपने पुत्रों को सौंप दिया और पत्नी शतरूपा सहित वन को प्रस्थान कर दिया तपस्या करने के लिए। उन्होंने नैमिषारण्य जैसे पवित्र तीर्थ में घोर तप करने का निश्चय किया।
हजारों वर्ष की घोर तपस्या
मनु और शतरूपा ने कल्पों तक कठोर तपस्या की। प्रारंभ में वे केवल जल पर रहे, फिर केवल वायु पर और अंत में निराहार खड़े रहकर तप करने लगे।
उनकी तपस्या का काल हजारों वर्षों का था – छह हजार वर्ष जल-आहार, फिर सात हजार वर्ष वायु-आहार और दस हजार वर्ष एक पैर पर खड़े रहकर ध्यान! उनकी त्वचा मात्र हड्डियों से लगकर रह गई, पर मन में भगवान के दर्शन की लगन कम न हुई।
उनकी परीक्षा लेने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश कई बार प्रकट हुए और “कोई वर माँगो ” कहा, लेकिन मनु-शतरूपा ने हर बार यह कहकर टाल दिया कि “हमें वरदान नहीं, प्रभु का साक्षात दर्शन चाहिए।”
अंततः उनकी तल्लीनता और अनन्य भक्ति देख स्वयं विष्णु भगवान प्रसन्न होकर प्रकट हुए। आकाशवाणी के रूप में श्रीहरि ने कहा:
चौपाई:
मागु मागु बरु भै नभ बानी, परम गभीर कृपामृत सानी॥
भावार्थ:
अंतर्यामी प्रभु ने अनन्य आश्रय वाले उन तपस्वी राजा-रानी को अपना दास जानकर परम गूढ़, कृपा रूपी अमृत से सनी हुई आकाशवाणी की – “मनचाहा वर माँगो!”
भगवान विष्णु का प्रकट होना
भगवान के प्रकट होने पर मनु-शतरूपा ने देखा कि श्रीहरि चतुर्भुज विष्णु रूप में सामने हैं – पीतांबर पहने, श्रीवत्स अंकित वक्षस्थल, कर-कमलों में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए तेजोमय स्वरूप।
दोनों दंपति की आँखों से अश्रु बहने लगे। अब भगवान उन्हें वरदान देने को कह रहे थे, पर मनु-शतरूपा जैसे धर्मात्माओं ने कोई सांसारिक वर नहीं माँगा।
उनके मन में एक अतिशय पवित्र इच्छा थी – कि साक्षात भगवान उनके घर पुत्र रूप में जन्म लें।
मनु की विनम्र प्रार्थना
दोहा:
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु, सन कवन दुराउ।
भावार्थ:
(मनु ने कहा-) “हे प्रभु! मैं अपने मन का सच्चा भाव कहता हूँ – मैं आपके ही समान (आप जैसे) पुत्र चाहता हूँ। भला आपसे क्या छिपाकर कहूँ।”
मनु के वचन सुनकर भगवान मधुर मुस्कान के साथ बोले – “तथास्तु, ऐसा ही होगा।”
किन्तु समस्या यह थी कि “मुझ विष्णु के समान दूसरा कौन है? इसलिए मैं स्वयं ही तुम्हारे यहाँ पुत्र रूप में आऊँगा।”
तुलसीदास जी अगली चौपाई में इस आशय को यूँ लिखते हैं – प्रभु ने शतरूपा की ओर देखकर कहा:
चौपाई:
देवि मागु बरु जो रुचि तोरें... सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥
भावार्थ:
(प्रभु ने कहा – हे देवी, तुम जो चाहो वर माँगो... राजा (मनु) ने जो वर माँगा वह मुझे अत्यंत प्रिय लगा है।)
भगवान का वरदान
दोहा:
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥
भावार्थ:
(भगवान ने कहा-) “हे मनु! बहुत से स्वर्गीय सुख भोगकर कुछ काल के बाद तुम अयोध्या के राजा होओगे। तब मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र बनूँगा।”
इस प्रकार भगवान ने मनु और शतरूपा को ये आशीर्वाद देकर अंतर्धान किया। मनु-शतरूपा ने प्रसन्नतापूर्वक प्रभु की स्तुति की और स्वर्गलोक को प्रस्थान किया।
मनु और शतरूपा का पुनर्जन्म
समय बीतने पर यही मनु-शतरूपा त्रेतायुग में राजा दशरथ और रानी कौसल्या के रूप में अयोध्या में अवतरित हुए।
शेष दो रानियाँ सुमित्रा व कैकेयी भी उच्च आत्माएँ थीं (संभवतः वे भी पिछले जन्मों में देवी-अप्सरा रही होंगी जिनका वर्णन अलग कथाओं में आता है)।
इस प्रकार रामावतार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
संक्षेप में इस प्रसंग का सार
भगवान विष्णु ने अपने भक्तों के वचन को निभाने के लिए ही राम रूप में जन्म लेना स्वीकार किया।
तुलसीदास इस प्रसंग के अंत में कहते हैं – “हे भरद्वाज मुनि! इस प्रकार हरि की इच्छा बलवती होती है, और वही घटित होता है”।
मनु-शतरूपा की निष्काम भक्ति और तपस्या हमें यह संदेश देती है कि यदि भक्त सच्चे हृदय से प्रभु को चाहते हैं, तो प्रभु स्वयं भक्त के समीप (यहाँ तक कि संतान रूप में) आने को तैयार हो जाते हैं।
आगे की कथा – प्रतापभानु और राक्षसों का उदय
अब आगे के घटनाक्रम में हम उसी वरदान के परिणाम को मूर्तरूप लेते देखेंगे – दशरथ-कौसल्या के यहाँ राम का जन्म।
उससे पहले बालकांड की एक और महत्वपूर्ण कथा है राक्षसों के उत्थान की – राजा प्रतापभानु की कथा, जिसका संबंध रावण के जन्म और उसके अत्याचारों से है।
अगले पोस्ट में हम प्रतापभानु की कहानी और रावण आदि राक्षसों के उदय को समझेंगे, जो रामायण में खलनायकों की भूमिका में हैं।
यह प्रसंग भी रामावतार के कारणों में एक है, क्योंकि राक्षसों के अत्याचार बढ़ने पर ही भगवान को अवतार लेना पड़ता है।
पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (षष्ठ संस्करण) प्रतापभानु की कथा और राक्षस वंश का उदय!





