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पढ़िए: रामचरितमानस – बाल कांड (षष्ठ संस्करण) प्रतापभानु की रहस्यमय कथा और राक्षस वंश का उदय!
क्या था रावण बनने की वजह और रामावतार का असली कारण ?
रामचरितमानस

रामचरितमानस – बाल कांड (षष्ठ संस्करण) प्रतापभानु

📿 पौराणिक•6 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 26 मार्च 2025
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रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (षष्ठ संस्करण) प्रतापभानु की कथा और राक्षस वंश का उदय! कैसे बना प्रतापभानु रावण

ज्ञान-सार

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बाल कांड – पोस्ट 6: प्रतापभानु की कथा और राक्षस वंश का उत्थान

बाल कांड – पोस्ट 6: प्रतापभानु की कथा और राक्षस वंश का उत्थान

प्रमुख घटनाक्रम

मनु-शतरूपा के वरदान से यह सुनिश्चित हो गया कि भगवान विष्णु अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र रूप में अवतरित होंगे। अब एक और श्रंखला जुड़नी बाकी थी – वह यह कि भगवान किन दुष्टों के संहार के लिए अवतार लेंगे।

इसके लिए तुलसीदास जी बालकांड में एक विस्तारपूर्वक कथा सुनाते हैं – राजा प्रतापभानु की कथा। यह कथा वाल्मीकि रामायण में नहीं है, पर रामचरितमानस में शामिल है।

प्रतापभानु एक पूर्वकाल का प्रतापी सम्राट था जिसने एक ऋषि के शाप के कारण राक्षस योनि में जन्म लिया और आगे चलकर वही रावण बना।

इस पोस्ट में हम प्रतापभानु, उसके शाप और राक्षस कुल (रावण, कुंभकर्ण, विभीषण आदि) के उत्पत्ति की कहानी समझेंगे।

प्रतापभानु कौन थे?

प्राचीन काल में एक कैकय देश था जिसके राजा सत्यकेतु धर्मनिष्ठ और पराक्रमी थे। उनके दो पुत्र थे – बड़ा पुत्र प्रतापभानु और छोटा पुत्र अरिमर्दन।

सत्यकेतु ने राज्य बड़े पुत्र प्रतापभानु को सौंप दिया और स्वयं वन को चले गए। प्रतापभानु अत्यंत शक्तिशाली, पुण्यात्मा और प्रजा का पालन करने वाले राजा बने।

उनके राज्य में कोई पाप नहीं था। उनके भाई अरिमर्दन और मंत्री धर्मरुचि बड़े ही वीर एवं बुद्धिमान सहयोगी थे।

प्रतापभानु की परीक्षा और दुर्भाग्य

प्रतापभानु की कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई।

एक बार राजा प्रतापभानु शिकार के लिए वन में गए और मार्ग भटककर बहुत दूर निकल गए। वहाँ उनकी भेंट एक तपस्वी ब्राह्मण से हुई जिसे वे पहचान न सके – दरअसल वह एक प्रतिद्वंद्वी राजा कल्पभृंगि था जो पहले प्रतापभानु से पराजित होकर बदले की आग में तप रहा था और अब मायावी राक्षस कालकेतु की सहायता से ब्राह्मण का रूप धरे हुए था।

प्रतापभानु अतिथि ब्राह्मण को बड़ी श्रद्धा से अपने साथ राजभोज के लिए ले आए।

उस कपट तपस्वी (कल्पभृंगि) ने अवसर पाकर प्रतापभानु को सुझाव दिया कि “यदि आप सभी ऋषि-मुनियों को कल आमंत्रित कर भोजन कराएँ तो आपका यश अमर हो जाएगा।”

प्रतापभानु को यह बात भा गई। उसने अज्ञान में उस तपस्वी को अपने रसोइए का नेतृत्व दे दिया कि वह भोजन की व्यवस्था करे।

कपटी तपस्वी (वेष में राजा कल्पभृंगि) ने रसोई में ब्राह्मणों का मांस मिला दिया और स्वयं गया उन सभी ब्राह्मणों को आमंत्रित करने।

ब्राह्मणों का क्रोध और प्रतापभानु का शाप

अगले दिन हजारों ब्राह्मण जब भोजन को उपस्थित हुए, तो ऐन पहले क्षण देवताओं ने उन्हें सूचना दे दी कि “यह भोजन विषाक्त है, मत खाओ।”

क्रोधित ऋषियों ने सोचा कि प्रतापभानु ने उन्हें मारने के लिए धोखा दिया है। वे प्रतापभानु को दोष देने लगे।

राजा प्रतापभानु को जब पता चला कि यह सब छल हुआ है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक महातपस्वी ऋषि ने क्रोध में आकर राजा को भयानक शाप दिया:

दोहा:

मूर्ख राजा! तू जा कर परिवार सहित राक्षस हो॥

भावार्थ:

(ऋषि बोले-) “अरे मूर्ख राजा! तू जा, अपने परिवार सहित राक्षस हो जा।”

इस भयंकर श्राप के साथ ही आकाशवाणी हुई कि “तुम्हें देवता बनने योग्य था, पर इस कपट ने तुम्हें राक्षस बना दिया” (इस प्रकार ब्राह्मणों सहित राजा का सत्य नाश हुआ)।

प्रतापभानु, उसका भाई और मंत्री – तीनों को यह शाप लगा।

राक्षस वंश की उत्पत्ति (रावण, कुंभकर्ण, विभीषण)

कालांतर में वही प्रतापभानु राक्षस कुल में उत्पन्न हुआ। तुलसीदास जी कहते हैं:

चौपाई:

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा, भयउ निसाचर सहित समाजा।
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा, रावन नाम बीर बरुंडा॥

भावार्थ:

हे मुनि, समय आने पर वही राजा अपने समाज (परिवार) सहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचंड शूरवीर था।

यानि प्रतापभानु ही रावण बन गया। उसका छोटा भाई अरिमर्दन, राक्षस रूप में कुंभकर्ण बना।

और मंत्री धर्मरुचि रावण का सौतेला भाई विभीषण बनकर पैदा हुआ – जो विष्णुभक्त और धर्मात्मा हुआ।

इसके अलावा प्रतापभानु के राज्य के सभी अनुचर, सैनिक आदि विभिन्न भयानक राक्षस बने। वे सभी महाबली, रूप बदलने में समर्थ, दुष्ट और अत्याचारी थे।

राक्षसों की तपस्या

रावण, कुंभकर्ण और विभीषण ने युवा होने पर घोर तपस्या की और ब्रह्माजी को प्रसन्न किया।

रावण का वरदान और रामावतार का उद्देश्य

रावण, कुंभकर्ण और विभीषण के वरदान

ब्रह्माजी से वरदान मांगते समय रावण ने प्रार्थना की – “हे प्रभु, मेरी मृत्यु किसी देवता, नाग, यक्ष, राक्षस आदि से न हो – मनुष्य और वानर को छोड़कर और किसी के हाथों मैं न मरूँ।”

ब्रह्माजी “एवमस्तु” कहकर वरदान दे देते हैं। इस वरदान से रावण को लगभग अमरता मिल गई, सिवाय मनुष्य और वानर के।

कुंभकर्ण ने भी महान आकार और भूख का वर पाया (और देवताओं के छल से निद्राभाव भी मिला)।

विभीषण ने भगवान की निरंतर भक्ति का वरदान माँगा।

रावण के अत्याचार और पृथ्वी की पुकार

वरदान पाकर रावण त्रिलोक विजय को निकल पड़ा। उसने देवता, यक्ष, गंधर्व सबको जीत लिया और आतंक फैलाया।

“जप, योग, यज्ञ कुछ भी जहाँ होता, रावण उसे बलपूर्वक तितर-बितर कर देता।”

सभी देवता डरकर स्वर्ग छोड़ देने की सोचने लगे।

पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ गए – “रावण के भय से धर्म काँप गया, न कोई वेदाचार रहा, न श्रद्धा।”

तब सारे देवता देवी पृथ्वी को साथ लेकर ब्रह्माजी की अगुवाई में क्षीरसागर पहुँचे और श्रीहरि से करुण प्रार्थना की –

“हे प्रभु, हमें इन राक्षसों के आतंक से मुक्ति दिलाइए!”

पृथ्वी ने गोहार लगाई कि “अब भगवन, आप अवतार लिए बिना उद्धार नहीं होगा।”

श्रीहरि का आश्वासन और रामावतार का संकल्प

श्री विष्णु ने आश्वासन दिया कि उचित समय पर वे स्वयं मानव रूप में अवतार लेंगे और राक्षसों का संहार करेंगे।

(देवताओं को यह भी बताया गया कि चारों भाइयों – रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा के पति विद्युत्जिह्व आदि – के जन्म का मूल कारण शाप और पूर्वजन्म हैं, इसलिए समय आने पर इनका विनाश भी निश्चित है।)

देवताओं की याचना के पश्चात् भगवान विष्णु राम रूप में अवतार लेने के लिए तैयार हो गए।

रामावतार के दो प्रमुख उद्देश्य

इस प्रकार प्रतापभानु की कथा हमें यह समझाती है कि रामावतार के दो प्रमुख उद्देश्य थे:

  1. भक्तों को सुख देना (मनु-शतरूपा के वरदान को पूर्ण करना)।
  2. राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थापना करना।

अगले पोस्ट की झलक – दशरथ का यज्ञ और राम जन्म

अब आगे बालकांड की कथा अयोध्या में लौटती है, जहाँ राजा दशरथ (जो पिछले जन्म के मनु हैं) यज्ञ करके पुत्र प्राप्ति का वर पाते हैं।

इस पोस्ट को यहीं समाप्त करते हैं – अब तक हमने राम जन्म के आध्यात्मिक कारण देख लिए:

  • नारद का श्राप,
  • मनु-शतरूपा का वरदान,
  • रावण आदि के अत्याचार।

अगले पोस्ट में हम अयोध्या में दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ, राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न के जन्म तथा राम के बाल्यकाल की घटनाओं को जानेंगे।

पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (सप्तम संस्करण) | अयोध्या में राम जन्म और उनकी बाल लीलाएँ!

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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