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पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ–अयोध्या कांड(10वां संस्करण)प्राण जाए पर वचन न जाए!राम ने वनवास क्यों नहीं छोड़ा ?
रामचरितमानस

रामचरितमानस का पाठ–अयोध्या कांड(10वां संस्करण)प्राण जाए

📿 पौराणिक•4 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 28 अप्रैल 2026
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जब भरत ने सिंहासन ठुकराया और राम ने वचन निभाने के लिए वनवास को चुना, तब रचा गया त्याग, धर्म और मर्यादा का इतिहास!

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राम का वचनपालन और पादुका राज्याभिषेक

पोस्ट 10: राम का वचनपालन और पादुका राज्याभिषेक

परिचय:

अयोध्याकांड के इस अत्यंत मार्मिक प्रसंग में हम पाते हैं कि श्रीराम केवल एक राजा नहीं, बल्कि धर्म और वचन के आदर्श प्रतीक हैं। चित्रकूट के पर्वतीय अंचल में जब भरत श्रीराम से मिलने पहुँचे, तो वह दृश्य केवल दो भाइयों का मिलन नहीं, बल्कि कर्तव्य, प्रेम, त्याग और मर्यादा का अमर संवाद था। इस घटना में राम का वचनपालन, भरत का त्याग, और खड़ाऊं को प्रतीकात्मक राज्यसिंहासन पर विराजमान करना — सब कुछ एक आदर्श समाज की स्थापना का संकेत है।

भरत की भावपूर्ण विनती:

श्राद्ध कर्म पूर्ण हो चुका था। भरत ने अपने नेत्रों में अश्रु भरकर श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया और करुण स्वर में कहा, “भैया, अयोध्या आपके बिना जैसे प्राणहीन हो गई है। आपकी अनुपस्थिति में राज्य, महल और वैभव सब व्यर्थ हैं। मैं आपसे करबद्ध प्रार्थना करता हूँ कि कृपया लौट आइए और पिताजी के उत्तराधिकारी के रूप में राजगद्दी सँभालिए।”

भरत की पुकार केवल एक भाई की याचना नहीं थी, बल्कि यह धर्म, समाज और माताओं की पीड़ा की समवेत आह थी। माता कौशल्या, सुमित्रा और यहाँ तक कि कैकेयी भी भरत के स्वर में स्वर मिलाकर राम से वापसी का आग्रह करती हैं।

गुरु वशिष्ठ ने भी राम को समझाते हुए कहा, “हे राम, अब राजा दशरथ इस लोक में नहीं हैं। राजकाज की मर्यादा को बनाए रखने हेतु तुम्हारा लौटना आवश्यक है।”

राम का दृढ़ उत्तर:

श्रीराम ने सबका निवेदन शांत मन से सुना। उन्होंने भूमि की थोड़ी-सी धूल उठाकर मस्तक से लगाई और गहन विनम्रता से कहा, “मैं जानता हूँ कि आप सबका प्रेम मेरे प्रति असीम है, और मैं उससे अभिभूत हूँ। किंतु रघुकुल की मर्यादा हमारे लिए जीवन से भी अधिक मूल्यवान है। पिताजी की आज्ञा का पालन करना ही मेरा सर्वोच्च धर्म है। जब तक चौदह वर्ष पूरे नहीं होते, मैं अयोध्या नहीं लौट सकता।”

“रघुकुल रीत सदा चलि आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।”

यह दोहा केवल शब्द नहीं, बल्कि राम का जीवन-सिद्धांत है। मर्यादा पुरुषोत्तम ने दिखा दिया कि धर्मपालन केवल बातों का विषय नहीं, बल्कि तप, त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा है।

भरत का अनुपम त्याग:

राम की दृढ़ता देख भरत की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, “यदि आप वन में रहेंगे, तो मैं भी महलों को त्याग दूँगा। मैं राजसिंहासन पर बैठने की कल्पना भी नहीं कर सकता।”

यह दृश्य अनुपम था — एक भाई राजा बनने को बाध्य किया जा रहा था और दूसरा वन में रहने को अडिग था। प्रेम और धर्म का यह संगम कालजयी हो गया। अंततः राम ने समझा-बुझाकर भरत को राज्य संचालन के लिए सहमत किया, किंतु भरत ने एक शर्त रखी।

“भैया,” भरत ने कहा, “यदि आप मुझे अपनी चरण-पादुकाएं प्रदान करें, तो मैं उन्हें अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान कर आपके नाम से राज्य चलाऊँगा। मैं स्वयं महल में नहीं रहूँगा, तपस्वी का जीवन बिताऊँगा।”

पादुका का राज्याभिषेक:

राम ने भरत के भावों को समझा और अपनी चरण-पादुकाएं उन्हें भेंट कीं। भरत ने उन्हें श्रद्धा से मस्तक पर धारण किया। चित्रकूट में ही उन पादुकाओं का प्रतीकात्मक राज्याभिषेक किया गया — गंगाजल से पवित्र कर, फूलों से सुसज्जित कर उन्हें अयोध्या की गद्दी पर विराजमान मान लिया गया।

गुरु वशिष्ठ ने घोषणा की, “अब अयोध्या पर शासन श्रीराम की पादुकाएं करेंगी, और भरत केवल प्रतिनिधि होंगे।” भरत ने वचन दिया कि यदि चौदह वर्षों के अंत में राम नहीं लौटे, तो वे प्राण त्याग देंगे। यह केवल प्रण नहीं, भरत का तप बन गया।

भरत का नंदिग्राम वास:

भरत अयोध्या लौटे, पर राजमहल में नहीं गए। उन्होंने नंदिग्राम नामक स्थान पर एक कुटी बनाई और वहीं तपस्वी वेश में रहने लगे। पादुकाओं को गद्दी पर विराजमान कर, राजकाज राम के नाम से चलाया जाने लगा। भरत जटाजूट धारण कर, भूमि पर सोते, फलाहार करते और न्याय करते, पर निर्णय “राम पादुका-राज” के नाम से सुनाए जाते।

अयोध्या की प्रजा भरत के इस त्याग से अभिभूत थी। सबकी आँखों में यही प्रार्थना थी — “प्रभु श्रीराम शीघ्र लौटें।” इधर चित्रकूट में राम ने महसूस किया कि उनका वहाँ होना वनवासियों के लिए असुविधा का कारण बन रहा है, अतः उन्होंने आगे दंडकारण्य की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया।

समापन:

राम और भरत के इस प्रसंग में केवल भाईचारा नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति के आदर्श छिपे हैं — धर्म, त्याग, वचनपालन और विनय। यह खंड दर्शाता है कि सत्ता प्राप्त करना महान नहीं, बल्कि उसे त्याग कर धर्म निभाना ही सच्ची महानता है। राम का वचन और भरत का त्याग – दोनों मिलकर उस भारत की नींव रखते हैं जो केवल भूमि का नाम नहीं, बल्कि मर्यादा का प्रतीक है।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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