पोस्ट 8: भरत का राम को मनाने चित्रकूट प्रस्थान
परिचय:
राजा दशरथ के निधन के बाद अयोध्या शोक में डूबी थी। चारों ओर उदासी का वातावरण था, पर सबसे अधिक विकल थे भरत, जिन्हें यह पता ही नहीं था कि पिता नहीं रहे और राम वन चले गए। जब सब कुछ ज्ञात हुआ, तो भरत का हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने निश्चय किया कि वे राज्य स्वीकार नहीं करेंगे, अपितु स्वयं वन जाकर राम को वापस लाएँगे। यह प्रसंग भरत के त्याग, धर्मनिष्ठा और राम के प्रति उनकी गहन भक्ति का जीवन्त चित्रण है।
भरत का दृढ़ संकल्प:
गुरु वशिष्ठ ने जब भरत को समझाया कि उन्हें अयोध्या का शासन सँभालना चाहिए, तो भरत ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया — “राज्य पर केवल मेरे भैया राम का अधिकार है। मैं उसे छू भी नहीं सकता जब तक वे स्वयं मुझे यह दायित्व न दें।”
भरत ने यह भी घोषणा की कि यदि राम वापस नहीं आए तो वे भी उनका साथ देने वन चले जाएँगे। यह केवल एक वचन नहीं था, बल्कि एक यज्ञ की तरह भरत का तप था — जहां राजसिंहासन की आहुति देकर धर्म की पुनर्स्थापना करनी थी।
चित्रकूट की यात्रा की तैयारी:
अयोध्या में एक बड़ा काफिला तैयार किया गया। माताएँ – कौसल्या, सुमित्रा और पश्चाताप से व्याकुल कैकेयी – सभी चलने को तैयार थीं। गुरुजन, मंत्री, नागरिक, सैनिक – सभी ने भरत के साथ वन यात्रा की इच्छा जताई। रथों की पंक्तियाँ, हाथियों की गूंज और भरत का भक्ति से भरा हृदय – इस यात्रा का स्वरूप एक राजकीय याचना न होकर एक भक्त का अनुनय था।
भरत ने राम की प्रिय वस्तुएँ, पूजा सामग्री और वस्त्र भी साथ रख लिए, ताकि वे उन्हें भेंट कर सकें। शत्रुघ्न भी हर क्षण भरत के साथ थे। यह यात्रा एक आत्मीय मिलन की आशा में अग्रसर थी।
श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह से भेंट:
श्रृंगवेरपुर पहुँचने पर निषादराज गुह ने दूर से अयोध्या के दल को देखा। पहले उन्हें भ्रम हुआ कि कहीं भरत राम को हानि पहुँचाने तो नहीं आए, पर जब उन्हें भरत के संकल्प का ज्ञान हुआ, तो वे गद्गद हो गए। उन्होंने भरत को हृदय से लगाया और कहा, “राजकुमार, आपका हृदय जानकर मुझे गर्व हो रहा है।”
भरत ने विनम्रता से पूछा, “गुह भाई, मेरे राम भैया जब यहाँ से गए थे तब कैसे थे? उन्होंने कोई कष्ट तो नहीं उठाया?”
गुह ने केवट प्रसंग, राम की उदासी, गंगा पार करने और दशरथ के विलाप की कथा भरत को सुनाई। भरत और शत्रुघ्न यह सब सुनकर अपने अश्रु रोक न सके।
गंगा तट पर पूजा और प्रार्थना:
गुह ने भरत सहित समस्त दल की सेवा की और अगले दिन गंगा पार करने की व्यवस्था की। गंगा तट पर भरत ने बालू की वेदी बनाकर राम, लक्ष्मण और सीता की प्रतीक रूप में पूजा की। उन्होंने गंगा माँ से प्रार्थना की, “मुझे मेरे प्रभु राम का दर्शन कराओ।” यह केवल एक मिलन की याचना नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार थी।
प्रयाग में भरद्वाज मुनि का सत्कार:
गंगा पार कर भरत प्रयाग पहुंचे, जहाँ भरद्वाज मुनि का आश्रम था। इतने बड़े दल को देखकर मुनि को संदेह हुआ कि कहीं भरत किसी और उद्देश्य से तो नहीं आए।
पर जब भरत ने दूर से ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “हे महर्षि, मैं अपने भ्राता राम को अयोध्या लौटाने की प्रार्थना लेकर आया हूँ,” तो मुनि का हृदय खिल उठा। उन्होंने भरत की नम्रता और सच्ची भक्ति को देखकर उन्हें गले लगाया और कहा, “तुम्हारा चरित्र समस्त संसार के लिए आदर्श है।”
मुनि भरद्वाज ने उस रात आश्रम में सभी के रहने और भोजन की उत्तम व्यवस्था की। ऐसा कहा जाता है कि ऋषि की तपोशक्ति से सबको अयोध्या जैसा सुख मिला। अगले दिन उन्होंने चित्रकूट तक का मार्ग बताया और सलाह दी कि सेना वहीं रुके और केवल आवश्यक लोग आगे जाएं, ताकि वन के जीवों को कष्ट न हो।
चित्रकूट की ओर अग्रसर:
भरत का हृदय अब और अधीर हो उठा था। चित्रकूट समीप था, राम मिलन की घड़ी निकट आ रही थी। देवताओं ने मार्ग में कुछ भ्रम उत्पन्न किया क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि राम अभी लौटें — रावण-वध की योजना जो शेष थी। पर भरत की निष्ठा और मुनि के निर्देशों ने उन्हें भटकने नहीं दिया। दोपहर होते-होते वे चित्रकूट की भूमि पर पहुँच ही गए।
समापन:
भरत की यह धर्मयात्रा केवल राम को मनाने की यात्रा नहीं थी, यह स्वयं को अर्पित करने की प्रक्रिया थी। अयोध्या का प्रतिनिधि चित्रकूट में श्रीराम के सामने विनती लेकर उपस्थित हुआ था। आगे हम देखेंगे – जब ये दोनों भ्राता मिलते हैं, तब धर्म, प्रेम और मर्यादा कैसे चरम पर पहुँच जाते हैं।




