पार्वती का जन्म और शिव-पार्वती विवाह की तैयारी
प्रमुख घटनाक्रम
पिछले प्रसंग में सती द्वारा योगाग्नि से देह त्याग की घटना हुई। उसी क्षण सती ने भगवान विष्णु से यह वर मांगा था कि मेरा शिवजी के चरणों में प्रेम बना रहे। यही वरदान उनके अगले जन्म का आधार बना।
इस पोस्ट में हम देखेंगे कि सती ने अगले जन्म में पार्वती के रूप में हिमाचल (पर्वतराज हिमवान) के घर जन्म लिया। पार्वती बाल्यकाल से ही शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करती हैं।
दूसरी ओर, तारकासुर नामक असुर के वध के लिए शिव-पार्वती का विवाह देवताओं के लिए भी आवश्यक था, क्योंकि उनके पुत्र कार्तिकेय द्वारा ही उस असुर का अंत संभव था। घटनाक्रम में कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने भेजा जाना, कामदेव का भस्म होना, पार्वती की कठिन तपस्या, तथा अंततः शिवजी का पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार करना और उनका दिव्य विवाह – ये सब शामिल हैं।
सती का पार्वती के रूप में पुनर्जन्म
सती के आत्मदाह के बाद उनकी आत्मा को भगवान विष्णु से वरदान प्राप्त था कि उनका शिवजी के चरणों में अनुराग बना रहे। इस वरदान के फलस्वरूप उन्होंने हिमवान (हिमालय पर्वत) के राजा के घर जन्म लिया। उनकी माता का नाम मैना (मेना) था। नवजात कन्या का नाम पार्वती (उमा) रखा गया। तुलसीदास जी लिखते हैं:
चौपाई:
सतीं मरत हरि सन बरु माँगा, जनम जनम सिव पद अनुरागा।
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई, जनमीं पारबती तनु पाई॥
भावार्थ:
सती ने मरते समय भगवान श्रीहरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्मांतर में शिवजी के चरणों में प्रेम बना रहे। इसी कारण वे (पुनर्जन्म लेकर) हिमाचल के घर में पार्वती के शरीर से प्रकट हुईं।
पार्वती के जन्म से हिमालय का घर अत्यंत पवित्र और समृद्ध हो गया। चारों ओर खुशहाली छा गई, ऋषि-मुनि वहाँ आश्रम बनाने लगे, पर्वतराज का घर उत्सव का केन्द्र बन गया।
पार्वती बचपन से ही अद्भुत थीं – वे शिवजी को मन ही मन पति रूप में मानकर उनकी उपासना करती थीं। उधर देवताओं को चिंता थी कि शिवजी समाधि में लीन हैं, विवाह नहीं कर रहे, जबकि तारकासुर का वध उनके पुत्र द्वारा ही होना संभव है। इसीलिए देवताओं ने उपाय सोचा कि किसी तरह शिवजी का ध्यान भंग कर पार्वती से उनका विवाह संपन्न कराया जाए।
नारद मुनि की भविष्यवाणी
नारद मुनि एक बार हिमवान के घर आए और उन्होंने पार्वती का भविष्य बताते हुए कहा कि “यह कन्या आगामी समय में भगवान शिव की पत्नी बनेगी, लेकिन इसके लिए इसे कठोर तप करना होगा।”
नारद जी के वचन सुनकर पार्वती के माता-पिता को पहली बार दुख और सुख मिला – दुख इसलिए कि कन्या को घोर तपस्या करनी होगी, सुख इसलिए कि वह स्वयं महादेव की अर्धांगिनी बनेगी।
अंततः माता मैना और पिता हिमवान ने पार्वती को तप करने की अनुमति दे दी। पार्वती जी वसंत पर्वत पर शिवजी को पति रूप में पाने हेतु घोर तपस्या करने चली गईं:
चौपाई:
मातु पितहि बहुबिधि समझाई, चलीं उमा तप हित हरषाई।
उर धरि उमा प्रानपति चरना, जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥
भावार्थ:
माता-पिता को बहुत तरह से समझाकर, पार्वती हर्षित मन से तप करने चलीं। हृदय में अपने प्राणपति शिव के चरणों को धारण करके वे वन में तपस्या में लीन हो गईं।
पार्वती की कठोर तपस्या
पार्वती जी की तपस्या अति कठोर थी – उन्होंने वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर, फिर पत्ते त्यागकर और अंततः निराहार रहकर तप किया।
इधर देवता चिंतित थे कि कब शिवजी का विवाह पार्वती से हो। उन्होंने कामदेव (मदन) को नियुक्त किया कि जाकर शिवजी की समाधि भंग करें, जिससे शिवजी पार्वती की ओर आकर्षित हों।
कामदेव द्वारा शिवजी की तपस्या भंग करने का प्रयास
मदन (कामदेव) बसंत ऋतु और अपनी पत्नी रति को साथ लेकर शिव के ध्यानस्थ स्थान पर पहुँचा। चारों ओर बसंत की सुंदर छटा बिखेरी गई, कामदेव ने प्रेम के बाण चलाए और माहौल को उमंग से भर दिया।
जैसे ही कामदेव ने अपना पूर्ण प्रभाव डाला, शिवजी की तपस्या टूट गई। क्रोधित होकर त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर ने अपना तीसरा नेत्र खोला और कामदेव पर दृष्टि पड़ते ही उसे भस्म कर डाला:
चौपाई:
तब सिवँ तीसर नयन उघारा।
चितवन कामु भयउ जरि छारा॥
भावार्थ:
तब शिवजी ने अपना तीसरा नेत्र खोला, (उसकी ज्वाला की) चितवन पड़ते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया।
कामदेव का भस्म होना और रति को वरदान
कामदेव के भस्म होते ही देवतागण घबरा गए। कामदेव की पत्नी रति विलाप करने लगी। शिवजी दोबारा समाधि में लीन हो गए। रति को शिव ने वरदान दिया कि उसका पति कामदेव द्वारका में कृष्णावतार के समय प्रद्युम्न के रूप में पुनर्जन्म लेगा, इस प्रकार उसे पुनः मिलेगा। इस बीच पार्वती जी निरंतर कठोर तप में लगी रहीं।
देवताओं द्वारा शिव से प्रार्थना और सप्तर्षियों की परीक्षा
कामदेव की घटना के बाद सभी देवताओं ने मिलकर शिवजी से विनती की कि वे पार्वती जी का तप स्वीकार करें और उनसे विवाह करें, जिससे संसार का हित हो। ब्रह्माजी ने स्वयं विनम्र प्रार्थना की।
शीघ्र ही सप्तर्षियों को शिवजी पार्वती की परीक्षा के लिए भेजते हैं। सप्तऋषि पार्वती के पास भिक्षु के वेश में जाते हैं और मीठे पर छलपूर्ण वचनों से पार्वती के मनोबल को आज़माते हैं।
वे पार्वती से कहते हैं कि – “तुम इतनी सुंदरी होकर जंगली अवधूत (शंकर) को वर क्यों बनाना चाहती हो? कहीं और विवाह कर लो।” पार्वती जी दृढ़ रहकर उत्तर देती हैं कि “मैंने हृदय से शिव को ही पति रूप में वरण किया है, आप मुझे ऐसी बातों से डिगा नहीं सकते।”
पार्वती की अटल भक्ति देखकर सप्तर्षियों ने प्रसन्न होकर उनका अनुमोदन किया और प्रकट कर दिया कि महादेव स्वयं उन्हें स्वीकार करने को राजी हैं।
शिव-पार्वती विवाह और शिव की विचित्र बारात
तब शिवजी स्वयं प्रकट होकर पार्वती को वरदान देते हैं कि तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा। पार्वती के तप से प्रसन्न होकर शिव उनका हाथ थाम लेते हैं (यह दृश्य पार्वती के माता-पिता को दिव्य दृष्टि से दिखाया जाता है)।
फिर औपचारिक तौर पर शिव-पार्वती के विवाह की तैयारी शुरू होती है। पार्वती जी के पिता हिमवान को यह शुभ समाचार मिलता है तो वे हर्षित होकर तैयारी करते हैं। उधर कैलाश पर शिवजी अपनी बारात सजाने लगते हैं।
शिव की बारात सभी बारातों से अनूठी थी – दूल्हे शिव जी खुद भस्म रमाये, गले में सर्पों की माला, जटाओं में गंगा और चंद्रमा धारण किए हुए थे। उनके गण-भूत प्रेत अनोखे ठाठ से बाराती बनकर चले। देवताओं ने भी सुन्दर रूप धारण कर बारात में सहभाग लिया। तुलसीदास जी इस बारात का बड़ा मनोरंजक वर्णन करते हैं:
चौपाई:
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥
भावार्थ:
शिवजी के गण उनका श्रृंगार कर रहे हैं – जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर सर्पों का मौर (कलगी) सजाया गया। शिवजी ने साँपों के कुंडल-कड़े पहने, शरीर पर भस्म रमाई और वस्त्र की जगह व्याघ्र-चर्म (बाघ की खाल) धारण की।
शिवजी की अनूठी बारात
चौपाई:
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥
देखि सिवहि सुरतरि मुसुकाहीं – बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥
भावार्थ:
एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी अपने बैल (नंदी) पर सवार होकर चले, आगे-आगे बाजे बज रहे हैं। शिवजी को इस रूप में देखकर देवताओं की पत्नियाँ मुस्कुरा रही हैं (मानो कह रही हैं कि) इस वर के योग्य दुल्हन तो संसार में कोई नहीं मिलेगी!
जनकपुरी की महिलाएँ, हिमवान की पत्नी मैना आदि जब इस बारात को देखती हैं तो चौंक जाती हैं – दूल्हा तो भूतों की बारात लेकर आया है! माता मैना पार्वती को समझाने की कोशिश करती हैं कि “बेटी, तूने किससे विवाह करने की ठान ली, ये वर तो औघड़ हैं”, किन्तु पार्वती माँ को अपने पूर्व जन्म का संयम और शिवभक्ति का आश्वासन देकर शांत करती हैं।
शिव-पार्वती विवाह
अंततः विधिपूर्वक शिव-पार्वती विवाह संपन्न होता है। भगवान विष्णु, ब्रह्मा आदि देवताओं की उपस्थिति में पार्वती शिव को वरमाला पहनाती हैं और सात फेरे होते हैं। पूरे संसार में आनंद छा जाता है।
शिव-पार्वती विवाह प्रसंग का बालकांड में विशेष महत्व है। पार्वतीजी को वह वरदान मिलता है जो उन्होंने पिछले जन्म में चाहा था – शिव जी फिर से उनके पति बने।
शिव-पार्वती संवाद और राम कथा का प्रारंभ
इस प्रसंग के बाद शिव-पार्वती का एक महत्वपूर्ण संवाद होता है, जिसमें पार्वती जी शिव से प्रश्न करती हैं कि “राम कौन हैं, जिनके रूप के दर्शन मात्र से मेरे पूर्व जन्म (सती रूप) में मुझसे ऐसी गलती हुई?”
शिवजी पार्वती को राम कथा का माहात्म्य बताते हैं और यहीं से राम कथा के आधार कारणों का वर्णन शुरू होता है। इस पोस्ट में हमने देखा कि किस प्रकार पार्वती ने कठिन तपस्या, लगन और भक्ति से भगवान शंकर को प्राप्त किया। इसके साथ ही शिवजी ने भी पार्वती की निष्ठा को परखकर उन्हें ग्रहण किया।
इसी सुखद विवाह के फलस्वरूप आगे चलकर कार्तिकेय जन्म लेंगे और तारकासुर का वध होगा (यह प्रसंग मानस में संक्षेप में आया है)।
अगले पोस्ट की झलक – नारद मुनि की कथा
अगले पोस्ट में हम नारद मुनि की कथा पर चर्चा करेंगे, जिसमें देवर्षि नारद को भगवान की माया का अनुभव होता है और वे भगवान विष्णु को एक रोचक श्राप देते हैं, जो रामावतार में घटनाओं का एक कारण बनता है।
पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (चतुर्थ संस्करण) नारद मोह प्रसंग और भगवान विष्णु की लीला





