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वीरभद्र मंत्र: 7 मिनट में डर, बाधा व नकारात्मकता का नाश !
वीरभद्र

वीरभद्र मंत्र: 7 मिनट में डर, बाधा व नकारात्मकता का नाश

📿 पौराणिक•2 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 22 मई 2025
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हर दिन सिर्फ 7 मिनट वीरभद्र मंत्र का जाप, और जीवन से डर, बाधा और नकारात्मकता हो जाएगी दूर!

ज्ञान-सार

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वीरभद्र अवतार के मंत्र

वीरभद्र अवतार के मंत्र

परिचय:

वीरभद्र भगवान शिव के एक प्रमुख गण और उनके प्रचंड क्रोध से उत्पन्न अत्यंत शक्तिशाली अवतार हैं। उनका प्राकट्य मुख्य रूप से प्रजापति दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने और देवी सती के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए हुआ था। उनका स्वरूप भयंकर, मेघ के समान श्यामवर्ण, सूर्य के समान जलते हुए तीन नेत्रों वाला, विकराल दाढ़ों और अग्नि की ज्वालाओं सी लाल जटाओं वाला वर्णित है। वे एक हजार भुजाओं से युक्त हैं और विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं।

मूल मंत्र

ॐवीरभद्रायवैरिवंशविनाशायसर्वलोकभयंकरायभीमवेषायहुंफट्श्भ्रौंश्भ्रौंह्रींखंफट्रिपुन्फट्स्वाहा।

महत्व एवं लाभ:

यह मंत्र जीवन की समस्त कठिनाइयों से मुक्ति दिलाने वाला, शत्रुओं और विरोधी शक्तियों का विनाश करने वाला तथा समाज में सकारात्मक सुधार लाने में सहायक है।

साधना विधि:

इस मंत्र की साधना के लिए लाल वस्त्र धारण करके, लाल आसन पर बैठकर, उत्तर दिशा की ओर मुख करके जाप करना चाहिए।

सर्वेश्वरी साधना मंत्र (वीरभद्र उपासना तंत्र से)

ॐहंठठठसैंचांठंठठठह्र:ह्रौंह्रौंह्रैंक्षैंक्षोंक्षैंक्षंह्रौंह्रौंक्षैंह्रींस्मांध्मांस्त्रींसर्वेश्वरीहुंफट्स्वाहा!

महत्व एवं लाभ:

यह मंत्र "वीरभद्र उपासना तंत्र" से लिया गया है और इसे स्वयं सिद्ध, चमत्कारिक तथा तत्काल फल देने वाला माना जाता है। इसके स्मरण मात्र से भय का निवारण होता है और आकस्मिक बाधाएं दूर होती हैं। इस मंत्र के विधिवत जाप से स्मरण शक्ति में असाधारण वृद्धि, त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान, भविष्य का ज्ञान) की प्राप्ति, और यहां तक कि "खेचरत्व" (आकाश में विचरण की क्षमता) एवं "भूचरत्व" (पृथ्वी पर इच्छानुसार विचरण की क्षमता) जैसी सिद्धियां भी प्राप्त हो सकती हैं।

सावधानी:

यह मंत्र अत्यंत तीव्र और तेजस्वी है, अतः इसे किसी भी प्रकार से हंसी-ठिठोली या हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसका प्रयोग केवल अत्यंत आवश्यकता होने पर ही आत्मरक्षा या जनकल्याण के लिए करना चाहिए।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

शिव अवतार

वीरभद्र अवतार का कारण और कथा क्या है?

माता सती के दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह करने पर शिव के अत्यंत क्रोध से जटा के पूर्वभाग से वीरभद्र प्रकट हुए। उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया और दक्ष का सिर काट दिया। यह शिव के क्रोध का प्रलयंकारी अवतार था।

शिव-सती-पार्वती कथा

वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ में क्या किया

वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को पूरी तरह नष्ट कर दिया, अपमानकर्ता देवताओं को दंडित किया और अंत में दक्ष का सिर काट दिया। भगवान विष्णु भी वीरभद्र की शक्ति देख अंतर्धान हो गए।

शिव-सती-पार्वती कथा

वीरभद्र कौन है और उसकी उत्पत्ति कैसे हुई

वीरभद्र शिव के पहले उग्र रुद्रावतार और गण हैं। सती के आत्मदाह के समाचार पर क्रोधित शिव ने जटा उखाड़कर पर्वत पर फेंकी — उससे आठ भुजाओं वाले विकराल वीरभद्र प्रकट हुए।

शिव-सती-पार्वती कथा

सती की मृत्यु का समाचार पाकर शिव ने क्या किया

सती के आत्मदाह का समाचार पाकर शिव अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र और महाकाली को उत्पन्न किया और वीरभद्र को दक्ष यज्ञ का विध्वंस करने की आज्ञा दी।

काशी के शिवलिंग

काशी में शिवगणों द्वारा स्थापित शिवलिंगों की सूची

काशी खंड के अनुसार — दंडपाणि ने दंडीश्वर, घंटाकर्ण ने घंटाकर्णेश्वर, वीरभद्र ने वीरभद्रेश्वर, कुण्डोदर ने कुण्डोदरेश्वर, महाकाल ने महाकालेश्वर, क्षेमक ने क्षेमेश्वर, पंचशीर्ष ने पंचशिखेश्वर की स्थापना की।

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