वीरभद्र अवतार के मंत्र
परिचय:
वीरभद्र भगवान शिव के एक प्रमुख गण और उनके प्रचंड क्रोध से उत्पन्न अत्यंत शक्तिशाली अवतार हैं। उनका प्राकट्य मुख्य रूप से प्रजापति दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने और देवी सती के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए हुआ था। उनका स्वरूप भयंकर, मेघ के समान श्यामवर्ण, सूर्य के समान जलते हुए तीन नेत्रों वाला, विकराल दाढ़ों और अग्नि की ज्वालाओं सी लाल जटाओं वाला वर्णित है। वे एक हजार भुजाओं से युक्त हैं और विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं।
मूल मंत्र
महत्व एवं लाभ:
यह मंत्र जीवन की समस्त कठिनाइयों से मुक्ति दिलाने वाला, शत्रुओं और विरोधी शक्तियों का विनाश करने वाला तथा समाज में सकारात्मक सुधार लाने में सहायक है।
साधना विधि:
इस मंत्र की साधना के लिए लाल वस्त्र धारण करके, लाल आसन पर बैठकर, उत्तर दिशा की ओर मुख करके जाप करना चाहिए।
सर्वेश्वरी साधना मंत्र (वीरभद्र उपासना तंत्र से)
महत्व एवं लाभ:
यह मंत्र "वीरभद्र उपासना तंत्र" से लिया गया है और इसे स्वयं सिद्ध, चमत्कारिक तथा तत्काल फल देने वाला माना जाता है। इसके स्मरण मात्र से भय का निवारण होता है और आकस्मिक बाधाएं दूर होती हैं। इस मंत्र के विधिवत जाप से स्मरण शक्ति में असाधारण वृद्धि, त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान, भविष्य का ज्ञान) की प्राप्ति, और यहां तक कि "खेचरत्व" (आकाश में विचरण की क्षमता) एवं "भूचरत्व" (पृथ्वी पर इच्छानुसार विचरण की क्षमता) जैसी सिद्धियां भी प्राप्त हो सकती हैं।
सावधानी:
यह मंत्र अत्यंत तीव्र और तेजस्वी है, अतः इसे किसी भी प्रकार से हंसी-ठिठोली या हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसका प्रयोग केवल अत्यंत आवश्यकता होने पर ही आत्मरक्षा या जनकल्याण के लिए करना चाहिए।
