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रामचरितमानस

रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (पंचम

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अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2025
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श्रृंगवेरपुर में गुह का स्नेह और केवट प्रसंग

पोस्ट 5: श्रृंगवेरपुर में गुह का स्नेह और केवट प्रसंग

परिचय:

तमसा नदी पार कर जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण आगे बढ़े, तब उनका गंतव्य गंगा तट पर स्थित एक छोटा लेकिन हृदयस्पर्शी नगर था — श्रृंगवेरपुर। वहाँ के राजा निषादराज गुह श्रीराम के परम भक्त थे। यह प्रसंग केवल गंगा पार करने का नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा, विनम्रता और त्याग का अमर उदाहरण है। इस भाग में हम गुह के प्रेम से लेकर केवट के अद्वितीय समर्पण तक, श्रीराम की पहली वनवासीनिशा के अनुभव को आत्मसात करेंगे।

गुह का आत्मीय स्वागत:

श्रृंगवेरपुर पहुँचने की सूचना जब गुह को मिली, तो उनका हृदय उत्साह और चिंता से भर गया। उन्होंने राम के स्वागत की सारी तैयारी स्वयं की और दौड़ते हुए तट पर पहुँचे। राम को वनवास वस्त्रों में देखकर उनका कंठ भर आया। उन्होंने श्रीराम के चरणों में गिरकर कहा, “प्रभु! यह मैं क्या देख रहा हूँ? आप राजसिंहासन छोड़ वनगमन पर क्यों?”

श्रीराम ने उन्हें उठाकर स्नेह से गले लगाया और धैर्यपूर्वक समझाया — “हे मित्र, यह पिता की आज्ञा है, जो मेरे लिए सर्वोपरि है।” गुह ने श्रद्धापूर्वक कहा, “मेरा जीवन, मेरा नगर — सब आपके हैं। आप यहाँ रुकें, मैं आपके लिए वन को स्वर्ग बना दूँगा।” लेकिन श्रीराम ने विनम्रता से मना किया और यहीं एक रात विश्राम करने का अनुरोध किया।

गुह ने कुटिया जैसी शरण बनाई, घास बिछाई, फलाहार का प्रबंध किया और राम, सीता, लक्ष्मण के विश्राम का सारा भार स्वयं उठाया। वह रात श्रीराम के जीवन की पहली वनवासीनिशा थी, जब उन्होंने पृथ्वी को शैया बनाया।

लक्ष्मण ने सोने से मना कर दिया और पूरी रात धनुष-बाण लेकर पहरा देते रहे। गुह भी लक्ष्मण के साथ जागते रहे — दो सेवक, एक राजा की सेवा में, जिनका ध्येय केवल भक्ति था, अधिकार नहीं।

केवट प्रसंग: भक्ति का विनोदी स्वरूप

प्रभात होते ही राम ने गंगा माता को नमस्कार किया और पार उतरने की तैयारी की। गुह ने नाव का प्रबंध कर दिया। तभी एक विनम्र और मुस्कुराता हुआ नाविक सामने आया — यह था भक्त केवट। उसने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, मेरी एक विनती है। मैं आपको बिना चरण धोए नाव पर नहीं चढ़ने दूँगा।”

लक्ष्मण को यह आग्रह अस्वाभाविक लगा। वे थोड़े क्रोधित हुए, पर श्रीराम ने स्नेह से पूछा, “भाई, ऐसा क्यों?”

केवट ने बड़ी मासूमियत से उत्तर दिया, “प्रभु, आपने तो अपने चरण से अहिल्या को पाषाण से स्त्री बना दिया। मेरी नाव तो लकड़ी की है। यदि वह भी स्त्री बन गई, तो मेरा जीवन ही संकट में पड़ जाएगा। कृपा कर पहले अपने चरण मुझे धोने दें।”

राम, सीता और लक्ष्मण मुस्कुरा उठे। राम ने अनुमति दी और केवट ने गंगा जल में उनका चरण धोया। वह जल उसने अपने परिवार सहित ग्रहण किया और स्वयं को धन्य माना।

पार उतारने का पुण्य:

जब तीनों को नाव में बैठाया, तो केवट का चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा था। गंगा पार उतरने पर श्रीराम ने उसे गले लगाया और कहा, “भाई, तेरी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ, पर इस समय देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं।”

केवट ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, जब आप भवसागर से मुझे पार लगाएंगे, वही मेरा पुरस्कार होगा। आज तो मैंने केवल सेवा की है, सौभाग्य मेरा है।”

माता सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर भेंट देनी चाही, पर केवट ने वह भी लेने से इंकार कर दिया। यह दृश्य देखने वाले निषाद, नागरिक और देवगण तक अभिभूत हो उठे। यह था सेवा का वह रूप, जो न लाभ चाहता था, न पहचान — केवल प्रेम।

सुमंत्र की विदाई:

अब समय था सुमंत्र के लौटने का। श्रीराम ने उन्हें आदेश दिया, “सुमंत्र, अब तुम रथ लेकर अयोध्या लौटो और पिताजी को बताओ कि मैं सकुशल आगे बढ़ गया हूँ।”

सुमंत्र रो पड़े — “प्रभु, मैं कैसे लौट जाऊँ, जब आप वनवास में हैं?” राम ने उन्हें स्नेह से समझाया, “तुम्हारा लौटना आवश्यक है ताकि माता-पिता को संतोष हो।” सुमंत्र ने राम के चरणों में प्रणाम किया और भारी मन से विदा लिए।

समापन:

गंगा पार करके राम, लक्ष्मण और सीता ने कोसल राज्य की सीमा छोड़ दी। निषादराज गुह से विदा लेते हुए राम ने वचन दिया कि वनवास के बाद फिर मिलेंगे। गुह दूर तक हाथ जोड़कर राम को निहारते रहे, जैसे कोई भक्त अपनी आंखों से अपने ईश्वर को विदा करता है।

अब श्रीराम प्रयाग की ओर बढ़ चले, जहाँ महर्षि भरद्वाज उनका स्वागत करने वाले थे। अगले भाग में हम देखेंगे — प्रयाग में ऋषि का सत्कार और चित्रकूट में श्रीराम का निवास।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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