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बाल कांड (प्रथम संस्करण) का मंगलाचरण और प्रस्तावना —
जानिए भगवान राम की महागाथा का आरंभ, सरल और सुंदर भाषा में!
रामचरितमानस

बाल कांड (प्रथम संस्करण) का मंगलाचरण और प्रस्तावना — जानिए भगवान राम की महागाथा का आरंभ, सरल और सुंदर भाषा में!

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बाल कांड – पोस्ट 1: प्रस्तावना और मंगलाचरण

बाल कांड – पोस्ट 1: प्रस्तावना और मंगलाचरण

परिचय:

रामचरितमानस के बाल कांड की शुरुआत गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा किए गए मंगलाचरण (शुभारंभ) से होती है। इसमें तुलसीदास विभिन्न देवताओं, गुरुजन, श्रीराम और उनकी कथा की वंदना करते हैं। वे विनम्र भाव से आशीर्वाद मांगते हैं कि वह रामचरितमानस की पवित्र कथा का सफलतापूर्वक वर्णन कर सकें। इस पोस्ट में हम बाल कांड के प्रारंभिक शुभ मंत्रों और घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में जानेंगे। तुलसीदास जी ने अपने गुरु के चरणों की महिमा गाकर, बुद्धि के देवता गणेश और माता सरस्वती का स्मरण करके कथा आरंभ की है। चलिए, इस मंगलाचरण के प्रमुख दोहों और चौपाइयों को देखते हैं और उनका सरल अर्थ समझते हैं।

गुरु वंदना और सरस्वती वंदना:

तुलसीदास जी सबसे पहले गुरु को नमन करते हैं और कहते हैं कि गुरु के चरणों की धूल से मन रूपी दर्पण को पवित्र करके वे भगवान रघुनाथ (राम) के निर्मल यश का वर्णन प्रारंभ कर रहे हैं। अपनी कम समझ को स्वीकार करते हुए, वे हनुमान जी का स्मरण करते हैं ताकि बल, बुद्धि और विद्या प्राप्त हो और कथा के दौरान आने वाले सभी विकार दूर हों। ये पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं:

दोहा:

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

भावार्थ:

श्री गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ कर मैं रघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – चारों फलों को देने वाला है।

दोहा:

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

भावार्थ:

मैं स्वयं को बुद्धिहीन (ज्ञानहीन) जानकर पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान जी! मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे दुःख-दोषों का नाश करें।

भगवान शिव-पार्वती और राम के रूप की वंदना

तुलसीदास जी कहते हैं कि वह शिव और पार्वती को प्रणाम करते हैं, जिन्हें श्रद्धा और विश्वास का स्वरूप माना गया है। इसी तरह वे वाल्मीकि, नारद आदि पूर्व ऋषियों तथा अयोध्या, जनकपुर आदि पावन स्थलों को भी नमन करते हैं। फिर वे श्रीराम के निजस्वरूप और उनके नाम की महिमा का वर्णन करते हैं।

एक प्रसिद्ध चौपाई में तुलसीदास लिखते हैं कि राम कथा चंद्रमा की किरणों के समान पवित्र है, जिसे संत रूपी चकोर पान करते हैं। रामचरितमानस की कथा कलियुग के पापों को हरने वाली और मंगल करने वाली है। याज्ञवल्क्य मुनि और भारद्वाज के बीच संवाद से कथा आरंभ होने का संकेत मिलता है (तुलसीदास जी राम कथा को याज्ञवल्क्य एवं भारद्वाज संवाद के माध्यम से कहते हैं)।

कथा प्रारंभ का प्रसंग

बाल कांड में सबसे पहले सती-शिव कथा आती है, लेकिन उससे पहले तुलसीदास जी एक संदर्भ स्थापित करते हैं कि यह रामकथा हिमालय पर ऋषि भारद्वाज को याज्ञवल्क्य जी सुनाते हैं। भारद्वाज मुनि रामराज्य के बारे में जानना चाहते हैं, तब याज्ञवल्क्य उन्हें समस्त कथा सुनाते हैं।

इसी प्रसंग में शिव-पार्वती संवाद, नारदजी की कथा और अन्य पूर्व कथाएं भी आती हैं, जो रामावतार के हेतु (कारण) को समझाने के लिए तुलसीदास जी ने शामिल की हैं।

इस प्रकार मंगलाचरण कर के और समस्त देवी-देवताओं का स्मरण करके तुलसीदास जी कथा के मूल घटनाक्रम की ओर बढ़ते हैं। आगे के पोस्टों में हम इन घटनाओं को विस्तार से जानेंगे। मंगलाचरण के इन प्रारंभिक श्लोकों से स्पष्ट होता है कि तुलसीदास जी रामचरितमानस को एक भक्तिपूर्ण विनम्रता के साथ शुरू करते हैं, जिससे यह ग्रंथ पढ़ने/सुनने वालों के हृदय में शुभ संस्कार स्थापित हो।

अगले पोस्ट में हम सती-शिव प्रसंग से कथा को आगे बढ़ाएंगे, जहां पार्वती जी (पूर्वजन्म में सती) भगवान राम की महिमा को न पहचानने की भूल करती हैं और इससे जुड़ी घटनाएं घटित होती हैं।

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