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पढ़िए: रामचरितमानस बाल कांड (द्वितीय भाग) – सती का भ्रम और शिवजी का विराग,
एक मार्मिक प्रसंग, सरल और सुंदर भाषा में !
रामचरितमानस

रामचरितमानस बाल कांड (द्वितीय भाग) – सती का भ्रम

📿 पौराणिक7 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 26 मार्च 2025
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सती ने भगवान राम की परीक्षा लेकर उनके दिव्य स्वरूप पर संदेह किया, जिससे शिवजी विरक्त हो गए। इस प्रसंग में सती का भ्रम, शिवजी का मौन संकल्प और सती का योगाग्नि द्वारा शरीर त्याग का वर्णन किया गया है।

ज्ञान-सार

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बाल कांड – पोस्ट 2: सती का भ्रम और शिवजी का विराग

बाल कांड – पोस्ट 2: सती का भ्रम और शिवजी का विराग

प्रमुख घटनाक्रम:

शिव-पार्वती (सती) प्रसंग रामचरितमानस के प्रारंभ में आता है। देवी सती, जो शिवजी की पत्नी हैं, भगवान राम के विष्णु अवतार होने पर संदेह करती हैं। ये घटना उस समय की है जब भगवान राम धरती पर अवतरित होकर वनवास भोग रहे थे (सीता जी के वियोग में वन में भटक रहे थे)।

शिवजी और सती आकाशमार्ग से जाते हुए राम को खोज करते देखते हैं। शिव जी तो तुरंत राम को परम भगवान के रूप में पहचान लेते हैं और आदरपूर्वक हृदय से प्रणाम करते हैं, किंतु सती के मन में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। उन्हें लगता है कि “भगवान राम अपने ही मायाजाल में दुखी मानव की तरह विचरण कर रहे हैं, ये वास्तव में विष्णु भगवान कैसे हो सकते हैं?”

इसी संदेह के कारण सती भगवान राम की परीक्षा लेने का निश्चय करती हैं। इस प्रसंग में मुख्यतः सती द्वारा राम का परीक्षण, शिवजी का सती से विमुख होना और अंतत: सती का त्याग तथा उनका योगाग्नि द्वारा शरीर छोड़ना शामिल है।

सती को राम के प्रति भ्रम होना:

शिवजी ने राम के दर्शन कर हर्षित होकर मन ही मन जय बोली, जबकि सती यह दृश्य देखकर चकित रह गईं। उन्होंने देखा कि त्रिलोक के स्वामी शिव उनके सामने प्रेमाविभूत हैं और श्रीराम को देखकर अति आनंदित हो गए हैं।

सती को आश्चर्य हुआ कि जो राम वन-वन दुःखी भटक रहे हैं, वे सचमुच ईश्वर हैं या नहीं। तुलसीदास लिखते हैं:

चौपाई:

संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥

भावार्थ:

उसी अवसर पर शिवजी ने श्रीराम को देखा तो उनके हृदय में अत्यंत विशेष आनंद उत्पन्न हुआ। (वे पहचान गए कि यही भगवान हैं)।

चौपाई:

सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥

भावार्थ:

सतीजी ने शिवजी की वह प्रेममग्न दशा देखी तो उनके हृदय में बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया। (उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि यह वही श्रीहरि हैं जिनकी महिमा शिवजी गा रहे हैं।)

सती के मन में संशय

सती के मन में विचार आया कि “क्या राम सचमुच साक्षात परमेश्वर हैं , या केवल एक राजकुमार जो अपनी पत्नी के वियोग में रो रहे हैं?” अपने इस संशय को दूर करने के लिए सती एक साहसिक कदम उठाती हैं – वे भगवान राम की परीक्षा लेने का निर्णय करती हैं।

सती द्वारा राम की परीक्षा

जब शिवजी राम के दर्शन करके आगे बढ़ गए, तब सती ने उनसे अलग होकर अपनी मायाशक्ति से सीता का रूप धारण कर लिया। वे सोचती थीं कि यदि राम सचमुच सर्वज्ञ भगवान हैं तो वे मुझे भेष बदलने पर भी पहचान लेंगे।

सती सीता जी का रूप लेकर भगवान राम के सामने प्रकट हुईं। लक्ष्मण जी इस अपरिचित स्त्री (जो सीता के समान दिख रही थीं) को देखकर कुछ क्षण के लिए भ्रमित हुए, परंतु श्रीराम तो सर्वज्ञ हैं – वे तुरन्त समझ गए कि यह सती हैं जो परीक्षा ले रही हैं।

भगवान राम ने मुस्कुराकर बहुत कोमल शब्दों में उनका अभिवादन किया और उन्हें “माता” कहकर संबोधित किया, क्योंकि सती वस्तुतः जगतजननी शक्ति का ही रूप थीं (और भविष्य में पार्वती रूप में उनकी माता समान होंगी)।

राम का ऐसा संबोधन सुनकर सती लज्जित और व्याकुल हो गईं। उन्होंने जान लिया कि राम ने उनकी कपट लीला पहचान ली है। सती बिना कुछ कहे वहाँ से हट गईं और लौटकर शिवजी के पास पहुंच गईं।

शिवजी द्वारा सती का त्याग

इधर शिव जी पहले ही ध्यानमग्न थे। उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से सब देख लिया था कि सती ने उनकी आज्ञा के विपरीत जाकर राम की परीक्षा के लिए सीता का रूप धर लिया।

शिवजी मन ही मन बड़े व्यथित हुए कि सती ने इतनी बड़ी गलती कर दी। तुलसीदास इस मनोभाव को यूँ व्यक्त करते हैं:

शिवजी का निर्णय और सती का आत्मदाह

शिवजी का निर्णय

दोहा:

परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥

भावार्थ:

(शिवजी सोचने लगे) सती तो परम पवित्र हैं, इन्हें त्यागना भी उचित नहीं और (अब पूर्ववत) पति-पत्नी का प्रेम निभाना भी महान पाप होगा। महादेव जी प्रकट में कुछ भी नहीं कहते, किंतु उनके हृदय में बहुत संताप (दुख) हो रहा है।

शिवजी ने निश्चय किया कि अब वे सती को इस वर्तमान शरीर के साथ पत्नी रूप में स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि सती ने अन्य पुरुष (राम, जिन्हें सती ने मानव रूप में समझा) का रूप धरकर उनके प्रति अनाचार किया है। उन्होंने मन में संकल्प कर लिया – “इस शरीर से अब सती मेरी पत्नी नहीं रह सकती।”

शिवजी तुरंत मन ही मन श्रीराम का स्मरण कर के प्रणाम करते हैं और सती से बातचीत बंद कर देते हैं। मार्ग में जब वे कैलाश की ओर लौट रहे थे, तब आकाशवाणी हुई जिसने शिवजी के कठोर धर्मनिष्ठ निर्णय की प्रशंसा की।

कैलाश पहुंचकर शिवजी ध्यानमग्न हो गए और सती से बिल्कुल विरक्त (दूर) हो गए। अब सती को भलीभांति एहसास हो गया कि उन्होंने भारी गलती कर दी है और शिवजी उनके इस वर्तमान स्वरूप को पत्नी रूप में त्याग चुके हैं। इस विषम परिस्थिति में सती बहुत दु:खी रहने लगीं।

सती का दक्ष यज्ञ में जाना और आत्मदाह

आगे चलकर सती के पिता प्रजापति दक्ष एक महान यज्ञ का आयोजन करते हैं और सभी देवताओं को आमंत्रित करते हैं, लेकिन शिवजी को आमंत्रित नहीं किया जाता (दक्ष पूर्व से शिव से द्वेष रखते थे)।

सती को जब आकाश में देवताओं के विमानों को दक्ष के यज्ञ में जाते देखा, तो उनके मन में भी पिता के घर जाने की इच्छा जागी। शिवजी से अनुमति मांगी – शिवजी ने स्पष्ट मना तो नहीं किया लेकिन याद दिलाया कि बिना बुलाए जाने पर आदर नहीं मिलेगा।

सती पिता के यज्ञ में पहुँच जाती हैं, जहाँ उनके पिता दक्ष उनके तथा शिवजी के प्रति अपमानजनक व्यवहार करते हैं। दक्ष के यज्ञ में शिवजी की निंदा सुनकर सती का हृदय क्रोध और दुःख से भर जाता है।

उन्होंने सभा में सभी को कठोर शब्दों में डाँटा और घोषणा की कि शिवनिंदा का फल सबको अभी मिल जाएगा। सती अपने पिता को भी तीखे शब्दों में धिक्कारती हैं कि उन्होंने महादेव जैसे कल्याणकारी देवता का अपमान किया।

अंततः सती यह निश्चय करती हैं कि अब वे इस अपवित्र देह को त्याग देंगी।

सती का शरीर त्याग

चौपाई:

तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू, उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा, भयउ सकल मख हाहाकारा॥

भावार्थ:

(सती ने क्रोधित होकर कहा-) “मैं उस चंद्रमौलि, वृषकेतु शिव को हृदय में धरकर इस शरीर को तुरंत त्याग दूँगी।” ऐसा कहकर सती ने योग की अग्नि से अपने शरीर को जला डाला। (उधर) पूरी यज्ञवेदी में हाहाकार मच गया।

सती के शरीर त्यागते ही शिवजी के गण प्रचंड क्रोध में यज्ञ को विध्वंस कर देते हैं। बाद में शिवजी को जब यह समाचार मिलता है कि सती ने देह त्याग दी, तो उनका शोक प्रकट होता है और वे सती के शरीर को लेकर तांडव करते हैं (संक्षेप में तुलसीदास जी ने इस प्रसंग को संकेत में लिया है)।

सती का पुनर्जन्म और पार्वती रूप में आगमन

इस प्रकार सती ने अपने भ्रम के कारण अपना शरीर त्याग दिया। यही सती अगले जन्म में हिमालयराज की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेंगी, जो भगवान शंकर की पुनः पत्नी बनेंगी।

सती-शिव प्रसंग हमें यह सीख देता है कि भगवान की महिमा में संशय नहीं करना चाहिए। शिवजी परम वैष्णव हैं जिन्होंने राम की महिमा को समझा, जबकि शक्तिस्वरूपा सती भी क्षण भर को मोह में पड़ गईं और परिणामस्वरूप उन्हें अपना शरीर छोड़ना पड़ा।

अगले ब्लॉग पोस्ट में हम पार्वती जी के जन्म व शिव-पार्वती विवाह की कथा पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो सती प्रसंग के आगे की कड़ी है।

पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – बाल कांड (तृतीय संस्करण) पार्वती जन्म, कामदेव भस्म और शिव-पार्वती विवाह की कथा

इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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