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पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (द्वितीय संस्करण) कैकेयी के वरदान और राम का वनवास निर्णय! संक्षेप में, सरल और सटीक रूप में !
रामचरितमानस

रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (द्वितीय संस्करण)

📿 पौराणिक•3 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 19 मार्च 2025
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रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (द्वितीय संस्करण) कैकेयी के वरदान और राम का वनवास निर्णय! राम का वनवास: कैकेयी के वरदान और मर्यादा का व्रत राम का वनवास: कैकेयी के वरदान और मर्यादा का व्रत परिचय: राजा दशरथ के प्रिय पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक निश्चित हो चुका था। अयोध्या नगरी उत्सव में डूबी थी।...

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राम का वनवास: कैकेयी के वरदान और मर्यादा का व्रत

राम का वनवास: कैकेयी के वरदान और मर्यादा का व्रत

परिचय:

राजा दशरथ के प्रिय पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक निश्चित हो चुका था। अयोध्या नगरी उत्सव में डूबी थी। लेकिन एक ओर कोपभवन में बैठी कैकेयी के हृदय में मंथरा के कटु बीज फल देने लगे थे। वह मन ही मन एक योजना बना चुकी थीं, जिसे सुनते ही दशरथ के प्राण हिल उठे। यही है वह प्रसंग, जहाँ रामायण की दिशा ही बदल जाती है।

दशरथ और कैकेयी का टकराव:

राजा दशरथ प्रसन्नता से भरकर रानी कैकेयी को राज्याभिषेक का समाचार सुनाने कोपभवन पहुँचे। वहाँ कैकेयी को भूमि पर विकल अवस्था में देखकर वे घबरा गए। उन्होंने पूछा, “प्रिये! तुम्हारी यह दशा क्यों?”

कैकेयी ने कहा — “महाराज! आपने दो वर देने का वचन दिया था। मैं आज वह मांगने आई हूँ। पहला, राम को 14 वर्ष का वनवास दीजिए। दूसरा, भरत का राज्याभिषेक कीजिए।”

यह सुनते ही दशरथ का कंठ सूख गया। उन्होंने काँपते हुए कहा, “राम? वनवास? वह तो तुम्हारा पुत्र है! तुम यह कैसी माँग कर रही हो?”

कैकेयी ने निर्लज्ज होकर कहा, “यह समय भावनाओं का नहीं, वचन निभाने का है। रघुवंश में राजा अपनी बात से नहीं फिरते।”

राजा दशरथ गिरते-पड़ते विनती करते रहे, “मुझसे कुछ भी मांग लो, लेकिन राम को मत छीनो।” पर कैकेयी अपने हठ पर अडिग रहीं।

राम को वनवास का समाचार:

उधर राम को सुमंत्र द्वारा कैकेयी का बुलावा मिला। वे सहज भाव से माता के कक्ष में पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा — दशरथ मूर्छित अवस्था में पड़े हैं और माता कैकेयी का चेहरा कठोरता से भरा है।

राम ने पूछा, “माताजी, यह सब क्या हो रहा है?”

कैकेयी ने भावहीन स्वर में कहा — “राजा ने मुझे दो वर दिए थे, और मैंने माँगा है कि भरत राजा बने और तुम 14 वर्ष के लिए वन जाओ।”

राम ने एक क्षण के लिए भी ना विरोध किया, ना प्रश्न। उन्होंने कहा:

“माताजी, पिता का वचन मेरे लिए धर्म है। मुझे वनवास स्वीकार है। मैं प्रसन्नता से जाऊँगा।”

कैकेयी चकित रह गईं — उन्हें राम के इस सहज स्वभाव की अपेक्षा नहीं थी। उनके लिए यह उत्तर आत्मा को झकझोरने वाला था।

दशरथ की विवशता:

राम, पिता के पास पहुँचे और चरणों में गिर पड़े। दशरथ ने अश्रुपूरित नेत्रों से राम को देखा और बोले, “राम! मुझसे यह पाप मत करवाओ। मैं तुम्हें रोकता हूँ।”

राम ने पिता की हथेली को पकड़कर कहा — “पिताजी, आप धर्मसंकट में हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं आपके वचन की लाज रख सकूं।”

तब दशरथ ने उन्हें गले लगाने का प्रयत्न किया लेकिन दुर्बलता के कारण अशक्त पड़ गए। वे रोते-रोते बेहोश हो गए। राम ने उनका मस्तक सहलाया और आशीर्वाद लेकर बाहर निकल आए।

रानियाँ, गुरु वशिष्ठ और राजकुल के सदस्य इस पूरे दृश्य से स्तब्ध थे। पर राम शांत थे — क्योंकि वे जानते थे, यही मर्यादा का मार्ग है।

समापन:

अयोध्या में हर्ष का पर्व शोक में बदल गया। एक ओर कैकेयी अपने वरदानों को लेकर हठी बनी रहीं, तो दूसरी ओर राम ने न रोष दिखाया, न विरोध — बस चुपचाप धर्म का पालन किया। यही कारण है कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहे गए।

अगले भाग में देखेंगे — जब राम यह बात माता कौसल्या, सीता और लक्ष्मण को बताते हैं, तब परिवार में कैसी करुणा और बलिदान की भावना उठती है।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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