लक्ष्मण का साथ और वनवास की तैयारी
लक्ष्मण का अटल निर्णय:
जब लक्ष्मण को यह ज्ञात हुआ कि उनके प्रिय भ्राता राम को वनवास भेजा गया है, तो वे क्रोध, पीड़ा और भावुकता से भर उठे। वे सीधे राम के पास पहुँचे और बोले, “भैया, मैं आपके बिना एक क्षण भी अयोध्या में नहीं रह सकता। मैं भी आपके साथ वन चलूँगा।”
राम ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया — “लक्ष्मण, मुझे तुम्हारा स्नेह ज्ञात है। पर अयोध्या में रहकर माता-पिता की सेवा भी तुम्हारा कर्तव्य है।”
तब लक्ष्मण ने दृढ़ता से कहा, “भैया, जहाँ राम और जानकी हैं, वहीं अयोध्या है। मेरे लिए आपकी सेवा ही धर्म है। कृपया मुझे साथ चलने दें।”
राम उनके निश्चय और प्रेम को देखकर अभिभूत हो उठे। उन्होंने लक्ष्मण को सस्नेह गले लगाया और साथ चलने की अनुमति दी।
माता सुमित्रा का आशीर्वाद:
लक्ष्मण अपनी माता सुमित्रा के पास पहुँचे। उन्होंने सारी बात बताई और साथ चलने की अनुमति मांगी। सुमित्रा ने अपने पुत्र को गले लगाया और कहा:
“बेटा, श्रीराम के बिना जीवन अधूरा है। वे जहाँ जाएँ, वहाँ तुम्हारा कर्तव्य है कि उनकी सेवा करो। उनके लिए तुम रक्षक बनो, भाई नहीं।”
माता का यह वचन लक्ष्मण के हृदय में अंकित हो गया। उन्होंने प्रण किया कि वे राम और सीता की सेवा, सुरक्षा और सहयोग में कभी कमी नहीं होने देंगे।
वनवास की तैयारी:
अब राम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन की तैयारी प्रारंभ हुई। महल में मातम छा गया। राम ने अपने राजसी वस्त्र त्यागकर वल्कल वस्त्र (छाल से बने वस्त्र) धारण किए। सीता ने भी तपस्विनी का वेष पहन लिया। लक्ष्मण ने अपना धनुष, तरकस और तलवार संभाली।
यह दृश्य देखकर राजमहल की दासियाँ, सेवक और नागरिक रोने लगे। राम, जो कभी राज्य के गौरव थे, अब एक वनवासी के रूप में सामने खड़े थे — शांत, निश्चल, और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित।
परिजनों से विदाई:
विदा लेने से पहले राम गुरु वशिष्ठ के पास पहुँचे और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। फिर वे पिता दशरथ के पास गए। दशरथ शय्या पर थे, आँखों से अश्रु बह रहे थे। राम ने उनके चरणों को स्पर्श किया।
दशरथ बोले, “राम, मुझे छोड़कर मत जाओ। मैं तुम्हें वन जाने का आदेश कभी नहीं दे सकता!”
राम ने करुण स्वर में उत्तर दिया, “पिताश्री, मैंने आपका वचन निभाने का संकल्प लिया है। यह मेरा धर्म है। आप आशीर्वाद दें कि मैं इस मार्ग पर अडिग रहूँ।”
कौसल्या और सुमित्रा ने भी तीनों को गले लगाकर विदा दी। उनके आँसू थम नहीं रहे थे, पर वे जानती थीं कि ये त्याग ही राम की मर्यादा हैं।
अयोध्या का त्याग:
रात्रि के अंतिम प्रहर में, जब समस्त नगर निद्रा में था, राम, सीता और लक्ष्मण सुमंत्र के रथ पर सवार होकर निकल पड़े। राम ने पीछे मुड़कर एक बार अयोध्या की ओर देखा और मन ही मन प्रजा को प्रणाम किया।
सुमंत्र ने रथ को तेजी से एक भिन्न मार्ग की ओर मोड़ दिया ताकि कोई पीछा न कर सके। यह पल था त्याग का, शांति का और धर्म की ओर आगे बढ़ने का।
प्रातःकाल का विलाप:
सुबह जब अयोध्यावासी जागे, तो वे राम का रथ खोजने लगे। कहीं कोई चिह्न नहीं मिला। वे भागते हुए नगर द्वार तक आए — पर राम तो दूर निकल चुके थे। नागरिक रोने लगे, स्त्रियाँ मूर्च्छित होने लगीं, बच्चे राम का नाम पुकारते रहे।
राज्य में शोक की लहर फैल गई। सबको यही आभास हुआ कि जैसे सूर्य अस्त हो गया हो।
प्रकृति भी शोक में:
तुलसीदास जी कहते हैं कि उस दिन तमसा नदी के तट पर पशु-पक्षी भी उदास थे। सूर्य की किरणें म्लान थीं। राम के बिना प्रकृति भी शोक संतप्त हो गई थी।
“विहग बिकल, मृग मूक विलोकें,
पल्लव तृण न जलन चलोके।”
राम ने भी देखा कि उनका त्याग केवल मानव समाज ही नहीं, बल्कि प्रकृति ने भी समझा और स्वीकारा।
समापन:
इस प्रकार, श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या को त्यागकर धर्मपथ पर आगे बढ़ चले। यह त्याग केवल परिवार का नहीं था — यह त्याग था सत्ता का, सुख का, और व्यक्तिगत हित का। आगे गंगा तट पर उन्हें मिलेगा निषादराज गुह का स्नेह और भक्त केवट की अद्वितीय भक्ति। अगले भाग में हम देखेंगे वह अद्वितीय प्रसंग जो भक्ति और सेवा की पराकाष्ठा को दर्शाता है।




