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पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (तृतीय संस्करण) राम की विदाई: कौसल्या, सीता और लक्ष्मण से संवाद! संक्षेप में, सरल और सटीक रूप में
रामचरितमानस

रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (तृतीय संस्करण) राम

📿 पौराणिक•4 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2025
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रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (तृतीय संस्करण) राम की विदाई: कौसल्या, सीता और लक्ष्मण से संवाद! राम की विदाई: कौसल्या और सीता से संवाद राम की विदाई: कौसल्या और सीता से संवाद परिचय: राज्याभिषेक की तैयारी के बीच राम को अचानक यह ज्ञात होता है कि माता कैकेयी ने दो वरदानों के माध्यम से...

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राम की विदाई: कौसल्या और सीता से संवाद

राम की विदाई: कौसल्या और सीता से संवाद

परिचय:

राज्याभिषेक की तैयारी के बीच राम को अचानक यह ज्ञात होता है कि माता कैकेयी ने दो वरदानों के माध्यम से उन्हें 14 वर्षों के लिए वन भेजने की माँग की है। पिता दशरथ विवश हैं। अब राम को यह बात अपनी माता कौसल्या, पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण को बतानी है। यह प्रसंग त्याग, धर्म और भावनाओं का चरम रूप है।

राम और माता कौसल्या का संवाद:

राम जब अपनी माता कौसल्या के कक्ष में पहुँचे, तो वे देवी पूजा में लीन थीं। राम को देखकर वे प्रसन्न होकर उठीं, आशीर्वाद दिया और बोलीं, “बेटा, आज तो तुम्हारा राज्याभिषेक होना है, सब मंगल हो।”

राम ने शांत स्वर में उनके चरणों में प्रणाम किया और धीरे से बोले, “मां, मुझे एक कठिन बात कहनी है। कैकेयी माता ने पिताजी से दो वर माँगे हैं — भरत को राज्य और मुझे वनवास।”

यह सुनकर कौसल्या पर जैसे वज्रपात हुआ। वे भूमि पर गिर पड़ीं और रोने लगीं — “राम! यह कैसा अन्याय है? मैं तो तुम्हारे राज्याभिषेक के लिए व्रत कर रही थी और तुम वन जाने की बात कर रहे हो?”

राम ने उन्हें उठाया, आँसू पोंछे और अत्यंत कोमलता से समझाया, “मां, यह समय भावनाओं का नहीं, धर्म का है। पिताजी ने जो वचन दिया है, उसे निभाना ही मेरा धर्म है।”

राम के संयम को देखकर कौसल्या ने उन्हें गले लगा लिया और भारी हृदय से आशीर्वाद दिया, “जाओ बेटा, तुम्हारा कल्याण हो। पर मेरी आत्मा तब तक अयोध्या में नहीं बसेगी जब तक तुम लौट नहीं आते।”

सीता का दृढ़ निर्णय:

राम के वनगमन की बात जैसे ही सीता को ज्ञात हुई, वे तुरंत उनके पास पहुँचीं। उन्होंने सीधे कहा, “नाथ, मैं आपके साथ वन चलना चाहती हूँ।”

राम ने उन्हें समझाया — “जनकनंदिनी, वन का जीवन कठिन होता है। वहाँ न सुख है, न सुविधा, न सुरक्षा। वहाँ काँटे हैं, कष्ट हैं, भूख-प्यास और हिंसक पशु हैं।”

सीता ने दृढ़ता से कहा, “स्वामी, मेरे लिए सुख-दुख का कोई अर्थ नहीं, जब आप साथ न हों। एक पत्नी का धर्म है कि वह अपने पति के साथ हर परिस्थिति में रहे।”

“जहाँ राम, तहाँ सुख समाना,
वन हो या महल, मुझे सब भाना।”

राम ने उसकी आँखों में प्रेम और निष्ठा की अग्नि देखी। वे मौन हो गए और मन ही मन सीता के धैर्य और समर्पण की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “तुम्हारा साथ ही मुझे शक्ति देगा।”

लक्ष्मण का साथ:

उधर लक्ष्मण को जैसे ही यह पता चला कि राम वन जाएंगे, वे क्रोधित हो उठे। वे सीधे राम के पास पहुँचे और बोले, “भैया, मैं भी आपके साथ वन जाऊँगा। मेरे बिना आप अकेले नहीं जाएंगे।”

राम ने उन्हें समझाया कि घर में रहकर माता-पिता की सेवा करना भी धर्म है, पर लक्ष्मण का उत्तर था — “राम के बिना मेरे लिए अयोध्या भी सूनी है। जहाँ राम हैं, वहीं मेरा जीवन है।”

राम ने उन्हें अनुमति दी, लेकिन कहा — “पहले अपनी माता से अनुमति लो।”

लक्ष्मण माता सुमित्रा के पास पहुँचे और सारी बात बताई। सुमित्रा ने पुत्र को हृदय से लगाते हुए कहा — “बेटा, राम की सेवा करना ही तुम्हारा धर्म है। वे जहाँ हों, तुम उनकी छाया बनकर रहो।”

इस प्रकार लक्ष्मण को भी वनगमन की अनुमति मिल गई। तीनों भाई-भाभी अब इस कठिन यात्रा की तैयारी में लग गए।

वनवास की तैयारी और विदाई:

राजमहल में अब शोक की लहर फैल गई थी। राम ने राजसी वस्त्र त्यागकर वल्कल धारण किए। सीता और लक्ष्मण ने भी तपस्वियों का वेश अपनाया। महल की दासियाँ, नगर की स्त्रियाँ और सेवकगण फूट-फूटकर रोने लगे।

राम, सीता और लक्ष्मण सबसे विदा लेकर पहले गुरु वशिष्ठ के पास गए और आशीर्वाद प्राप्त किया। फिर वे राजा दशरथ के कक्ष में पहुँचे। दशरथ शय्या पर बेसुध पड़े थे। राम ने चरण स्पर्श किया।

दशरथ बोले, “राम, मत जाओ! मैं तुम्हें नहीं भेज सकता।”

राम ने हाथ जोड़कर कहा, “पिताश्री, आपका वचन मेरा धर्म है। कृपया मुझे आशीर्वाद दें।”

कौसल्या और सुमित्रा ने आँसुओं के साथ विदा दी। पूरा अयोध्या विलाप करने लगा।

समापन:

त्याग, मर्यादा और धर्म की यह परीक्षा श्रीराम ने बड़ी निष्ठा से निभाई। कौसल्या का करूण विलाप, सीता की साहसी निष्ठा, लक्ष्मण का अडिग प्रेम — सबने रामकथा को अमर बना दिया। अगले भाग में हम देखेंगे — निशा के अंतिम पहर में राम का अयोध्या त्याग और तमसा तट का मार्मिक प्रसंग।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना कहाँ शुरू हुई?

अयोध्या में — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' कुछ भाग काशी में भी लिखा। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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