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विष्णु पुराण अध्याय 6: वेदों की उत्पत्ति और वर्णाश्रम धर्म (हिंदी)!
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण अध्याय 6: वेदों की उत्पत्ति और वर्णाश्रम धर्म (हिंदी)!

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श्री विष्णु महापुराण: प्रथम अंश, षष्ठ अध्याय

श्री विष्णु महापुराण: प्रथम अंश, षष्ठ अध्याय का विशद अनुवाद एवं विस्तृत व्याख्या

ईश्वरानुस्मरण, मंगलाचरण एवं प्राक्कथन

परमेश्वर श्री हरि का वंदन और जगत का आधार

महर्षियों ने इस पवित्र आख्यान के आरम्भ में ही परम पुरुषोत्तम भगवान श्री विष्णु (हरि) का स्मरण किया है। यह संपूर्ण जगत उन्हीं विष्णु से उत्पन्न हुआ है, उन्हीं में स्थित है, और वे ही इस समस्त सृष्टि की स्थिति तथा लय के कर्ता हैं। वास्तव में, यह दृश्यमान तथा अदृश्यमान जगत भी वे स्वयं ही हैं। उनकी महिमा का वर्णन अत्यंत गूढ़ है, और वह ज्ञान परम पावन पुराणों के माध्यम से ही प्राप्त होता है।

परम धीर महर्षि पराशर जी, मैत्रेय मुनि के प्रति सम्बोधित होते हुए, उस परम ज्ञान को प्रकट करने के लिए उद्यत हुए, जिसका श्रवण मैत्रेय ने विनम्र जिज्ञासा से किया था। पराशर मुनि ने सर्वप्रथम अपने पितामह भगवान वशिष्ठ जी और पुलस्त्य मुनि के पूर्वकालिक संवाद को स्मरण किया, और कहा कि पुलस्त्य जी ने जो कुछ कहा था, वह सर्वथा सत्य है। इस प्रकार, उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा की अविच्छिन्न धारा को स्थापित करते हुए कहा कि हे मैत्रेय, तुम्हारे प्रश्नों के कारण मुझे वह संपूर्ण पुराण संहिता स्मरण हो आई है, अतः तुम उसे भली-भाँति ध्यानपूर्वक सुनो।

मैत्रेय मुनि की गहन जिज्ञासा

मैत्रेय मुनि ने महर्षि पराशर से अनेक विषयों पर विस्तारपूर्वक जानने की इच्छा व्यक्त की। उनकी जिज्ञासा केवल सृष्टि क्रम तक सीमित नहीं थी, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्यवस्था, काल गणना और धर्मशास्त्र के सिद्धांतों को जानने की थी।

मैत्रेय ने पूछा, "हे वासिष्ठनन्दन (वशिष्ठ के प्रिय पुत्र)! मैं आपसे समुद्रों, पर्वतों तथा देवताओं की उत्पत्ति, पृथ्वी का अधिष्ठान (आधार), तथा सूर्य आदि ग्रहों का परिमाण (माप) और उनके आधारभूत तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखता हूँ। साथ ही, देवगणों तथा पार्थिव (राजसी) वंशों का चरित्र, समस्त मनु, विभिन्न मन्वन्तरों का कालक्रम, चारों युगों में विभक्त कल्पों का विभाजन, और प्रलय का स्वरूप क्या है, तथा युगों के संपूर्ण धर्म क्या हैं, ये सब मैं सुनना चाहता हूँ।

इसके अतिरिक्त, मैत्रेय मुनि ने विशेष रूप से यह जानने की अभिलाषा प्रकट की कि महामुनि वेदव्यास जी ने किस प्रकार वेदों की शाखाओं का प्रणयन किया, तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णों एवं आश्रमवासियों के धर्म क्या हैं, ये सभी विषय मैं आपसे विस्तार सहित श्रवण करना चाहता हूँ। इसी क्रम में, षष्ठ अध्याय ब्रह्मा द्वारा की गई सृष्टि के उस भाग पर केंद्रित है, जहाँ ऋषियों, यज्ञों, वेदों, और वर्णों का प्रादुर्भाव होता है।

सृष्टि की आदिम अवस्था, पूर्णता का लोप और काल का प्रभाव

ब्रह्मा द्वारा प्रारंभिक सृष्टि का दिव्य स्वरूप

सृष्टि के आरंभ में, जब ब्रह्मा जी ने जीवों की रचना की, तो उनकी प्रकृति अत्यंत शुद्ध थी। वे जीव स्वभावतः धर्मपरायण थे और उनमें परमेश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा विद्यमान थी। उनके हृदय में किसी प्रकार का छल या कपट नहीं था; वे निर्मल थे और पवित्र धार्मिक अनुष्ठानों के पालन से उनके मन में हरि (विष्णु) का वास था। वे जीव सृष्टि के प्रारंभिक समय में समस्त बंधनों से मुक्त थे और अपनी इच्छा अनुसार, बिना किसी बाधा के, किसी भी स्थान पर विचरण करने में सक्षम थे। वे सभी प्राणी पूर्ण ज्ञान से युक्त थे, जिससे वे भगवान विष्णु की महिमा का निरंतर ध्यान कर पाते थे।

इस आदिम अवस्था में मनुष्यों को किसी प्रकार के भौतिक श्रम की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वे आठ प्रकार की आंतरिक सिद्धियों (पूर्णताओं) से युक्त थे। इन सिद्धियों में 'रसोलल्लासा' आदि शामिल थीं, जो उन्हें समस्त भौतिक सुख-सुविधाओं से संतुष्ट रखती थीं। यह वह काल था जब मनुष्य अपनी सहज, आंतरिक पूर्णता के कारण, कर्म और क्लेश के चक्र से बंधे नहीं थे।

काल (समय) का प्रवेश और आंतरिक पूर्णता का क्षय

परंतु यह पूर्णता अधिक काल तक बनी न रह सकी। काल (समय) — जो साक्षात् भगवान विष्णु का ही एक अंश है — उसने उस नवसृजित सृष्टि में पाप, वासना और अन्य विकारों का संचार किया। यह काल का प्रभाव ही था, जिसने जीवों में रजोगुण और तमोगुण का उत्तरोत्तर विकास किया, जो अंततः आत्मा की मुक्ति के मार्ग में बाधा सिद्ध हुआ ।

काल के प्रभाव से, मनुष्य की सहज, आंतरिक पूर्णता का स्वरूप क्षीण होने लगा। उनके भीतर निहित आठ प्रकार की सिद्धियाँ धीरे-धीरे विलुप्त हो गईं। इस आंतरिक पतन के परिणामस्वरूप, जीवों को द्वंद्वों का अनुभव होने लगा। अब उन्हें शीत (ठंड) और उष्ण (गर्मी) जैसे प्राकृतिक विपरीतताओं से पीड़ा होने लगी। सुख और दुःख, मान और अपमान जैसे द्वंद्वों के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ गई, जिसने उनके जीवन को संघर्षमय बना दिया।

श्रम, सुरक्षा, और सामाजिक संगठन का उदय

द्वंद्वों से उत्पन्न इस पीड़ा से बचने हेतु मनुष्यों ने सर्वप्रथम प्राकृतिक संसाधनों का आश्रय लेना आरम्भ किया। उन्होंने वृक्षों के समूह, ऊँचे पर्वतों, और जल स्रोतों के पास शरण ली।

किन्तु जब प्राकृतिक आश्रय भी पर्याप्त नहीं रहा, तब काल प्रेरित आवश्यकता ने उन्हें संगठित होने पर विवश किया। अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, मनुष्यों ने सर्वप्रथम खाईयों (खंदकों) और दीवारों से घिरे नगरों और ग्रामों का निर्माण किया। इसके उपरांत, उन्होंने सूर्य की उष्णता और शीत की पीड़ा से रक्षा हेतु उपयुक्त आवासों (गृहों) का निर्माण किया। इस प्रकार, ब्रह्मा की सृष्टि में अब भौतिक श्रम और सामाजिक संगठन की आवश्यकता उत्पन्न हो गई।

सुरक्षा और आवास सुनिश्चित होने के पश्चात्, मनुष्यों ने अपने जीवन यापन के लिए शारीरिक श्रम को अपनाया। उन्होंने दो प्रकार के अन्नों (धान्यों) की खेती आरम्भ की। पहला, घरेलू उपयोग और उपभोग के लिए सत्रह प्रकार के उपयोगी धान्य; और दूसरा, चौदह प्रकार के विशेष धान्य जिन्हें केवल यज्ञों में आहुति देने के लिए उत्पन्न किया जाता था 3। इस प्रकार, सामाजिक जीवन के साथ ही यज्ञीय कर्म का विधान भी अनिवार्य हो गया।

चतुर्वर्णों का प्रादुर्भाव: गुण-भेद और यज्ञ का मूल हेतु

जब सृष्टि में गुणों का मिश्रण हो गया और कर्म की आवश्यकता उत्पन्न हुई, तब ब्रह्मा जी ने कर्मकाण्डों के संपादन हेतु विशिष्ट मनुष्यों के समूहों की रचना की, जिन्हें वर्ण कहा गया। पुराण स्पष्ट करता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णों की रचना यज्ञों के समुचित संपादन के लिए ही की गई थी, क्योंकि ये चारों वर्ण ही कर्मकाण्ड के योग्य पात्र समझे गए।

वर्णों की उत्पत्ति का दैहिक एवं गुणगत आधार

ब्रह्मा जी ने अपने शरीर के विभिन्न अंगों से इन वर्णों की सृष्टि की, जिसका सीधा संबंध उनके भीतर निहित गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) और उनके निर्धारित कार्यों से था।

  • क. ब्राह्मण (विद्वान् एवं पुरोहित वर्ग)

    उत्पत्ति स्थान: ब्राह्मणों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के मुख से हुई। मुख, ज्ञान और तेज का प्रतीक है, जो सबसे ऊपर स्थित है।

    प्रधान गुण: वे विशेष रूप से सत्त्व गुण (पवित्रता, ज्ञान, प्रकाश) से संपन्न थे।

    कर्तव्य: उनका धर्म अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना और कराना तथा दान लेना निर्धारित किया गया, क्योंकि वे समाज के ज्ञान और नैतिकता के संरक्षक थे।

  • ख. क्षत्रिय (शासक एवं योद्धा वर्ग)

    उत्पत्ति स्थान: क्षत्रियों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के वक्षस्थल (बाहु या भुजाएँ) से हुई। बाहुएँ शक्ति और पराक्रम का प्रतीक हैं, जो समाज की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।

    प्रधान गुण: इनमें रजोगुण (शौर्य, वासना, क्रियाशीलता) की प्रधानता थी।

    कर्तव्य: इनका मुख्य धर्म प्रजा की रक्षा करना, शासन करना और युद्धभूमि से कभी विमुख न होना (वीरता) निर्धारित किया गया।

  • ग. वैश्य (व्यापारी एवं कृषक वर्ग)

    उत्पत्ति स्थान: वैश्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के ऊरु (जंघाओं) से हुई। जंघाएँ गति, यात्रा और भरण-पोषण का प्रतीक हैं, क्योंकि वे व्यापार और कृषि हेतु दूर-दूर तक भ्रमण करते हैं।

    प्रधान गुण: इनमें रजोगुण और तमोगुण का मिश्रण प्रधान था।

    कर्तव्य: इनका धर्म कृषि, पशुपालन, वाणिज्य (व्यापार), और समाज के आर्थिक भरण-पोषण के कार्यों में संलग्न रहना निर्धारित किया गया।

  • घ. शूद्र (सेवक एवं सहयोगी वर्ग)

    उत्पत्ति स्थान: शूद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के चरणों से हुई। चरण सम्पूर्ण शरीर का आधार हैं और उसकी सेवा करते हैं।

    प्रधान गुण: इनमें तमोगुण (आलस्य, जड़ता, निष्क्रियता) की प्रधानता बताई गई।

    कर्तव्य: इनका धर्म सेवा और सहयोग प्रदान करना निर्धारित किया गया। शूद्रों का कार्य अन्य तीनों वर्णों के कार्यों में सहयोग देकर सामाजिक व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करना था।

वर्ण-धर्म की दार्शनिक अनिवार्यता और यज्ञ की महत्ता

यह सृष्टि क्रम इस तथ्य को स्थापित करता है कि वर्णों की उत्पत्ति किसी श्रेष्ठता या हीनता के आधार पर नहीं थी, अपितु कार्यों के विभाजन और योग्यतानुसार गुणों के निर्धारण पर आधारित थी। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग—मुख, बाहु, जंघा और चरण—अलग-अलग कार्य करते हुए भी सम्पूर्ण देह को स्वस्थ रखते हैं, उसी प्रकार चारों वर्णों का अस्तित्व सामाजिक देह को सुचारु रूप से चलाने के लिए आवश्यक था।

यह व्यवस्था इस सिद्धांत को मजबूत करती है कि समस्त सामाजिक क्रियाकलापों का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक सुख नहीं, अपितु यज्ञों का निर्वहन है। यज्ञ ही वह धार्मिक सूत्र है, जो देवों, मनुष्यों और संपूर्ण ब्रह्मांड को एक पारस्परिक संबंध में बांधता है, जिससे कॉस्मिक संतुलन बना रहता है।

वेद, यज्ञ विधान की स्थापना एवं सृष्टि का पोषण

वर्णों की स्थापना के साथ ही, ब्रह्मा जी ने सृष्टि के संचालन हेतु आवश्यक ज्ञान—अर्थात् वेदों—को प्रकट किया।

वेदों का प्रादुर्भाव

पुराणों के अनुसार, जब भगवान नारायण की नाभि कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने तपस्या की, तब भगवान नारायण ने उन्हें चतुःश्लोकी भागवत (अपने भगवत् तत्व का उपदेश) प्रदान किया। इसके पश्चात्, भगवान ने अपने संकल्प मात्र से ही ब्रह्मा जी के हृदय में संपूर्ण वेद ज्ञान का प्रकाश कर दिया।

ब्रह्मा जी, जो स्वयं वेद मूर्ति हैं, उन्होंने सृष्टि निर्माण के समय अपने चार मुखों के माध्यम से इस वेद ज्ञान को कंठस्थ किया। इन चार वेदों में ज्ञान, कर्म, और उपासना के मूलभूत सिद्धांत समाहित हैं :

  • ऋग्वेद: इसमें ज्ञान के स्वरूप का वर्णन है।
  • यजुर्वेद: इसमें कर्म (विशेषकर यज्ञ कर्म) के स्वरूप का वर्णन है।
  • सामवेद: इसमें उपासना (स्तुति और गान) का विषय वर्णित है।
  • अथर्ववेद: इसमें ज्ञान, कर्म और उपासना—तीनों का ही विषय समाहित है।

वेदों में निहित ये ज्ञान, यज्ञों के विधान को स्थापित करते हैं, जिनके बिना सृष्टि का पोषण संभव नहीं है।

यज्ञ और सृष्टि का पोषण चक्र

सृष्टि के आरंभिक पुरुषों ने अपने जीवनयापन के लिए सत्रह प्रकार के धान्य और यज्ञों में आहुति देने के लिए चौदह प्रकार के धान्य उत्पन्न किए। इन यज्ञीय धान्यों (ओषधियों) की उत्पत्ति का कारण और मूल स्वयं यज्ञ ही है।

यज्ञों का निष्पादन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि वे मनुष्य जाति की निरंतरता और पापों के क्षय के लिए अनिवार्य हैं। यह एक शाश्वत चक्र है:

  • मनुष्य (धार्मिक) भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए यज्ञ करते हैं।
  • यज्ञों से देवगण तृप्त होते हैं और पुष्ट होते हैं।
  • देवगण प्रसन्न होकर मनुष्यों को जीवन-आधार देने वाली वर्षा (वृष्टि) प्रदान करते हैं।
  • वर्षा से अन्न और ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे मानव जाति का पोषण होता है।

इस प्रकार, यज्ञ संसार की स्थिरता, सुख, और मनुष्य मात्र के लिए अत्यंत आवश्यक सेवा का स्रोत है। धार्मिक पुरुष, जो अपने कर्तव्यों का ध्यान रखते हैं, वे यज्ञों के माध्यम से न केवल स्वर्गीय फल प्राप्त करते हैं, अपितु परम फल (मोक्ष) की ओर भी अग्रसर हो सकते हैं।

यज्ञ की परमार्थिक सत्ता

शास्त्रों में यज्ञ की परम सत्ता का वर्णन करते हुए विष्णु को ही यज्ञ का अधिपति (स्वामी) या स्वयं यज्ञ स्वरूप माना गया है। इसलिए, यज्ञ का अनुष्ठान करना साक्षात् भगवान श्री विष्णु को प्रसन्न करने और उनकी पूजा करने के समतुल्य है। यज्ञ, कर्मकाण्ड का हिस्सा होते हुए भी, मनुष्य को उसकी कर्म भूमि से उठाकर स्वर्गीय सुखों की ओर ले जाता है, और अंततः निर्मल भाव से किए गए कर्मों से मोक्ष का मार्ग भी खोलता है।

आश्रम धर्मों का निर्धारण और कर्त्तव्यनिष्ठ फल (लोकों की गति)

ब्रह्मा जी ने सृष्टि में वर्णों के साथ ही मनुष्यों के जीवन की अवस्थाओं—अर्थात् आश्रमों—के अनुसार भी नियम और कर्तव्यों का विधान किया। इन कर्तव्यों का पालन करने वाले धर्मात्मा पुरुषों को मृत्यु के पश्चात् उनकी भक्ति और कर्मनिष्ठा के अनुरूप लोक (परलोक) प्राप्त होता है।

ब्रह्मा जी ने अपने-अपने धर्म का भले प्रकार पालन करने वाले समस्त वर्णों और आश्रमों के लोक आदि की स्थापना की।

वर्णों के अनुसार प्राप्त लोक (गति)

वर्ण व्यवस्था के अनुसार कर्तव्यनिष्ठ पुरुषों को प्राप्त होने वाले लोकों का विवरण इस प्रकार है:

  • ब्राह्मण: जो ब्राह्मण कर्मनिष्ठ होकर अपने धर्मों (अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ) का पालन करते हैं, उन्हें पितृलोक प्राप्त होता है। इसी प्रकार, सम्माननीय गृहस्थों (आश्रम में रहने वाले) का स्थान भी पितृलोक है।
  • क्षत्रिय: वे क्षत्रिय वीर, जो युद्ध क्षेत्र से कभी विमुख नहीं होते और अपने शौर्य का धर्म निभाते हैं, वे इन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं।
  • वैश्य: वे वैश्य जो अपने व्यवसाय (कृषि, वाणिज्य) में परिश्रमी, उद्यमी, और विनम्र भाव से अपने धर्म का पालन करते हैं, उन्हें वायु लोक (वायु का क्षेत्र) प्राप्त होता है।
  • शूद्र: जो शूद्र सेवा धर्म परायण रहते हैं और अन्य वर्णों के कार्यों में सहयोग देते हैं, उनका स्थान गंधर्व लोक है ।

आश्रमों के अनुसार प्राप्त लोक (गति)

मानव जीवन के चार आश्रमों में रहने वाले कर्त्तव्यनिष्ठ पुरुषों के लिए भी विशिष्ट लोक निर्धारित किए गए हैं:

  • ब्रह्मचारी: वे ब्रह्मचारी जो गुरुकुलवासी होते हैं और ऊर्ध्वरेता मुनियों के समान (वीर्य की रक्षा करने वाले) धार्मिक जीवन व्यतीत करते हैं, उनका स्थान अठासी हज़ार मुनियों के लोक के समान बताया गया है।
  • वानप्रस्थ: वे वनवासी जो वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश कर संयम और तपस्या का जीवन जीते हैं, उन्हें सप्तर्षि लोक (सात ऋषियों का स्थान) प्राप्त होता है।
  • संन्यासी: वे धार्मिक भिक्षु (त्यागी और विरक्त) जो मोक्ष के लिए एकांत में चिंतन करते हैं, उन्हें ब्रह्म लोक का आश्रय प्राप्त होता है।

इस प्रकार, ब्रह्मा द्वारा स्थापित यह विधान स्पष्ट करता है कि मनुष्य का कर्म और उसकी अवस्था (वर्ण तथा आश्रम) ही मृत्यु के पश्चात् उसकी गति निर्धारित करती है।

धर्माचरण से प्राप्त गतियाँ (लोक)

आश्रम / अवस्था आचरण प्राप्त लोक
गृहस्थ ब्राह्मण कर्मनिष्ठ धर्म का पालन पितृलोक
क्षत्रिय युद्धभूमि से पलायन न करना (शौर्य) इन्द्रलोक
वैश्य अपने कर्मों में निष्ठा और आज्ञाकारिता वायु लोक
शूद्र सेवा धर्म में परायणता गन्धर्व लोक
ब्रह्मचारी गुरुकुलवासी (ऊर्ध्वरेता मुनि समान) अठासी हजार मुनियों का स्थान
वानप्रस्थ वनवासी तपस्वी (संयम) सप्तर्षि लोक
संन्यासी भिक्षु जीवन, आत्म-चिंतन ब्रह्म लोक
योगी (आत्म-अनुभव से तृप्त) निरंतर ब्रह्म चिंतन/विष्णु ध्यान अमर पद/विष्णु लोक

मोक्ष का परम मार्ग: योगियों का अमर पद

यज्ञ और आश्रम धर्म का पालन कर मनुष्य जिन लोकों को प्राप्त करता है, वे सभी क्षणिक और परिवर्तनशील हैं। पुराण आगे उस परम गति का वर्णन करता है, जो शाश्वत है और जहाँ से आत्मा की पुनरावृत्ति नहीं होती।

क्षणिक लोक और अविनाशी मोक्ष पद में भेद

कर्मकांड और सीमित पुण्य के बल पर प्राप्त होने वाले स्वर्ग या अन्य लोक, जैसे चंद्र और सूर्य आदि के ग्रह, सभी पुनरावृत्ति के अधीन हैं। अर्थ यह है कि इन लोकों में जाकर जीव जब अपने पुण्य कर्मों का फल भोग लेता है, तब उसे पुनः इस मृत्युलोक में लौट आना पड़ता है।

किन्तु जो मनुष्य उस परम पद को प्राप्त करते हैं, वे इस संसार के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं। यह परम पद केवल उन्हीं योगियों को प्राप्त होता है, जो निरंतर उस परम सत्ता का ध्यान करते हैं।

योगियों का लक्षण, चिंतन, और अमर गति

अमर पद उन योगियों के लिए निर्दिष्ट है, जो अपनी आत्मा के अनुभव से पूर्ण रूप से तृप्त हैं। ये योगी जन निम्नलिखित गुणों से युक्त होते हैं:

  • एकांत सेवन: वे निरंतर एकांत स्थानों में निवास करते हैं।
  • ब्रह्म चिंतन: वे ब्रह्म के चिंतन में सर्वदा मग्न रहते हैं।
  • आत्मज्ञान की तृप्ति: वे भौतिक कामनाओं से रहित होकर आत्मज्ञान से संतुष्ट होते हैं।

इन योगियों का जो परम स्थान है, वह अमर पद कहलाता है, और उसे केवल पंडित जन (तत्त्वज्ञानी) ही देख पाते हैं । इस अमर पद को ही विष्णु का सर्वोच्च धाम कहा गया है।

वैष्णव शरणागति की सर्वोच्चता

पुराण यह स्पष्ट करता है कि जो योगी साक्षर मंत्र (ओम् या भगवान विष्णु के मंत्र) का चिंतन करते हैं, वे उस मोक्ष पद से कभी नहीं लौटते (न क्षय को प्राप्त होते हैं)। यह मोक्ष पद सभी स्वर्गीय भोगों से श्रेष्ठ है, क्योंकि यह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त कर देता है।

इसके समर्थन में, यमराज के दूतों को दिए गए यमराज के आदेश का दृष्टांत भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यमराज स्वयं कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने उन्हें सभी प्राणियों के पाप-पुण्य का नियमन करने और कर्मफल प्रदान करने का अधिकार सौंपा है, इसलिए उनका नाम 'यम' (नियमनकर्ता) है।

परन्तु यमराज यह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे दूत, उन पुरुषों को मेरे पास मत लेकर आना, जिनकी भगवान नारायण (मधुसूदन) के प्रति शरणागति सिद्ध है। यमराज स्वीकार करते हैं कि जो व्यक्ति भगवान नारायण के प्रति अपना सर्वस्व समर्पित कर चुका है, ऐसे वैष्णव भक्तों पर उनका (यमराज का) शासन नहीं चलता। यह सिद्धांत स्थापित करता है कि भक्ति और शरणागति का मार्ग कर्म और यज्ञ के फल से प्राप्त होने वाले क्षणिक स्वर्ग से कहीं अधिक ऊँचा है, क्योंकि यह सीधे अविनाशी विष्णु लोक की प्राप्ति कराता है।

अधर्म का घोर फल एवं नरकों का भयानक विवरण

जहाँ धर्माचरण करने वालों को लोकों और परम पद की प्राप्ति होती है, वहीं जो पुरुष अपने स्वधर्म का त्याग करते हैं, वेदों की निंदा करते हैं, और यज्ञों को बाधित करते हैं, उन्हें अत्यंत भयानक गति प्राप्त होती है।

ब्रह्मा जी ने ऐसे अधर्मी और पापी पुरुषों के लिए मृत्यु के पश्चात् भयंकर और घोर यातना के क्षेत्र भी निर्धारित किए हैं। वेदों की निंदा करने वाले, धार्मिक कृत्यों का उच्छेद करने वाले, और दुष्ट स्वभाव वाले पुरुषों के स्थान, भयानक नरक लोक कहे गए हैं।

अधर्मी पुरुषों के लिए निर्दिष्ट नरक

वे नरक, जो स्वधर्म विमुख पुरुषों के लिए निर्धारित हैं, उनकी प्रकृति अत्यंत भयावह है। प्रमुख नरकों का विवरण इस प्रकार है:

  • तामिश्र: यह अत्यंत गहन अंधकार का लोक है, जहाँ कोई प्रकाश नहीं है और जीव भयंकर त्रास भोगता है।
  • अंधतामिश्र : यह घोर अंधकार से भी अधिक तिमिरमय क्षेत्र है, जहाँ जीव की दृष्टि का भी लोप हो जाता है।
  • महारौरव : यह वह यातना स्थल है, जहाँ जीव भयंकर पीड़ा से महान चीत्कारें करते हैं।
  • असिपत्र: यह तीक्ष्ण धार वाली तलवारों या तेज धार वाले पत्तों के नरक के रूप में वर्णित है, जहाँ जीवों को उनके पापों के कारण काटा जाता है।
  • घोर कालसूत्र : यह समय (काल) के समान कठोर और भयंकर दण्ड देने वाला स्थान है, जहाँ यातना अनंत प्रतीत होती है।
  • अभीचक : यह महाभय और त्रास से भरा हुआ स्थान है, जो दुष्ट पुरुषों के लिए निर्दिष्ट है।

इन नरकों को भयानक अंधकार, गहरे अंधेरे, भय और महाभय के क्षेत्र कहा गया है। इसके अतिरिक्त, वेदों की निंदा करने वालों के लिए चाबुक के नरक और लहर रहित समुद्र का नरक भी वर्णित है, जहाँ उन्हें उनके कुकर्मों का फल प्राप्त होता है।

यह वर्णन स्पष्ट करता है कि धार्मिक जीवन का त्याग करना, विशेष रूप से वेदों के ज्ञान और यज्ञों के अनुष्ठान का निरादर करना, अत्यंत घोर पाप है, जिसका फल अति दुखदायी होता है।

अधर्मी पुरुषों के लिए निर्दिष्ट नरक

नरक का नाम प्रकृति/स्वरूप पापी का कर्म
तामिश्र घोर अंधकार और त्रास धर्म एवं कर्तव्यों की उपेक्षा
अंधतामिश्र गहनतम तिमिर यज्ञों का उच्छेद करना
महारौरव महाभयानक पीड़ा और ध्वनि स्वधर्म विमुखता
असिपत्र तीक्ष्ण धार वाली तलवारों का नरक धार्मिक कृत्यों में बाधा डालना
घोर कालसूत्र भयंकर दण्ड और यातना वेदों की निंदा करना
अभीचक महाभय और त्रस्तकारी स्थान सामान्य पाप और दुष्टता

उपसंहार और फलश्रुति

महर्षि पराशर द्वारा मैत्रेय मुनि को सुनाया गया श्री विष्णु पुराण के प्रथम अंश का यह षष्ठ अध्याय, सृष्टि विज्ञान, सामाजिक संरचना और जीव की अंतिम गति के सिद्धांतों को पूर्णतः उद्घाटित करता है।

कर्म, धर्म, और भारत भूमि की महिमा

यह आख्यान दृढ़ता से स्थापित करता है कि मानव का अस्तित्व कर्म (विशेषकर यज्ञ) पर आधारित है। सृष्टि की आदिम पूर्णता के लोप होने के पश्चात्, ब्रह्मा ने चतुर्वर्ण और आश्रम व्यवस्था की रचना की, जिसका मूल उद्देश्य सामाजिक और कॉस्मिक संतुलन बनाए रखने के लिए यज्ञों का निर्वहन करना था। प्रत्येक वर्ण और आश्रम के लिए उसके गुणों के अनुरूप कर्तव्य (स्वधर्म) निर्धारित किए गए, और उन कर्तव्यों का पालन ही व्यक्ति को क्रमशः उत्तम लोकों की ओर ले जाता है।

इस संदर्भ में, भारत भूमि (कर्म भूमि) की महिमा का वर्णन अत्यंत पूजनीय है। देवगण भी निरंतर यह गान करते हैं कि वे पुरुष धन्य और बड़भागी हैं, जिन्होंने स्वर्ग और मोक्ष (अपवर्ग) के मार्गभूत इस भारत भूमि में जन्म लिया है।

जो लोग इस पुण्य भूमि में जन्म लेकर, अपनी किसी भी सांसारिक इच्छा (कलाकांक्षा) से रहित कर्मों को, परमात्म स्वरूप श्री विष्णु भगवान को श्रद्धापूर्वक अर्पित कर देते हैं, वे पापों से निर्मल होकर अंत में उस अनंत अविनाशी पद में लीन हो जाते हैं। यह सिद्धांत दर्शाता है कि कर्मसंन्यास और विष्णु के प्रति समर्पण, सभी लौकिक और स्वर्गीय प्राप्तियों से श्रेष्ठ है, और यहीं अंतिम मोक्ष का द्वार खुलता है।

यह अध्याय इस महान शिक्षा के साथ पूर्ण होता है कि धार्मिक कृत्यों में निष्ठा और परमेश्वर का ध्यान ही संसार चक्र से मुक्ति दिलाने का एकमात्र मार्ग है, और जो इस मार्ग का तिरस्कार करते हैं, वे घोर अंधकारमय नरकों को प्राप्त होते हैं। इति श्री विष्णु पुराण एक प्रथम शेष संस्थाओं अध्याय ।

इति श्री विष्णुपुराणे प्रथमोंऽशे षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णः

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