विस्तृत उत्तर
## वेदों में गुरु का महत्व
गुरु की परिभाषा: 'गु' = अंधकार, 'रु' = दूर करने वाला — गुरु अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का प्रकाश देता है।
वेदों में गुरु — मूल संदर्भ
(1) मुण्डकोपनिषद (1/2/12) — गुरु अनिवार्य है: 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।' — वेद-ज्ञान के लिए श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाएं। बिना गुरु के ब्रह्मज्ञान संभव नहीं।
(2) तैत्तिरीय उपनिषद (1/11) — आचार्य की महिमा: 'आचार्यो ब्रह्म भवति' — आचार्य (गुरु) स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।
(3) छान्दोग्य उपनिषद (6/14/2): 'आचार्यवान् पुरुषो वेद।' — जिसके पास गुरु है, वही ब्रह्म को जानता है।
(4) उपनयन संस्कार (अथर्ववेद 11/5/3): गुरु शिष्य को दीक्षा के समय अपने हृदय में धारण करता है — यह शिष्य का नया जन्म है।
वैदिक गुरु-शिष्य परंपरा: गुरु-आश्रम में निवास, सेवा, श्रवण → मनन → निदिध्यासन, गुरु-अनुमति से ज्ञान का प्रसार।
गुरु का सर्वोच्च स्थान: 'माता, पिता, गुरु, दैवम्' — वैदिक जीवन-क्रम में गुरु माता-पिता और देव तीनों का संगम है।





