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सर्वव्यापी से जुड़े सभी प्रश्न(8)

सर्वव्यापी पर शास्त्रीय व्याख्या, विधि, नियम, मंत्र और लाभ — सब एक ही स्थान पर। कुल 8 प्रश्न उपलब्ध हैं।

वैदिक स्वरूप

ऋग्वेद में विष्णु को 'त्रिविक्रम' क्यों कहते हैं?

त्रिविक्रम = तीन पगों से ब्रह्मांड नापने वाले। तीन पद = आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी में सर्वव्यापी प्रभाव। सूर्य की तीन अवस्थाएं (उदय, मध्य, अस्त) भी। आध्यात्मिक अर्थ: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति पार कर 'तुरीय' (परम चेतना) में प्रवेश।

#त्रिविक्रम#तीन पग#ऋग्वेद
विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति

नारायण सूक्त में विष्णु का क्या वर्णन है?

नारायण सूक्त (यजुर्वेद): 'नारायण परं ब्रह्म...अन्तरबहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।' अर्थ: नारायण ही परम ब्रह्म, परम ज्योति और परमात्मा हैं। जगत में जो कुछ भी देखा-सुना जाता है — उसके भीतर और बाहर नारायण ही व्याप्त हैं।

#नारायण सूक्त#यजुर्वेद#परब्रह्म
विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति

'विष्णु' शब्द का क्या अर्थ है?

'विष्णु' = 'विष्ऌ व्याप्तौ' धातु से — व्याप्त होना अथवा प्रवेश करना। 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णु:' — वह परम सत्ता जो सम्पूर्ण चराचर जगत, दृश्य-अदृश्य ब्रह्मांड और दिशाओं-कालों में अबाधित रूप से व्याप्त है, वही विष्णु है।

#विष्णु शब्द अर्थ#व्याप्त होना#निरुक्त
विष्णु शब्द की व्युत्पत्ति

भगवान विष्णु कौन हैं?

भगवान विष्णु परब्रह्म, सृष्टि के पालनकर्ता और अनंत कोटि ब्रह्मांडों के नियंता हैं। वे प्रत्येक जीव के हृदय में अंतर्यामी रूप में और सम्पूर्ण जगत के कण-कण में समाहित हैं। वे वह शाश्वत प्रकाश हैं जिससे समस्त विश्व प्रकाशमान होता है।

#भगवान विष्णु#परब्रह्म#पालनकर्ता
शिव तत्त्व परिचय

'शिव' शब्द का क्या अर्थ है?

'शि' = सर्वव्यापी (अनंत आकाश जैसा), 'व' = अनुग्रह/करुणा/दाता। महाभारत-शिव पुराण: 'शि' = मंगल/कल्याण, 'व' = दाता — जो संपूर्ण जगत को मंगल का दान करता है वही 'शिव' है।

#शिव शब्द अर्थ#मंगल कल्याण#सर्वव्यापी
साक्षी का तत्व दर्शन

श्वेताश्वतर उपनिषद में साक्षी के बारे में क्या कहा गया है?

श्वेताश्वतर उपनिषद (6.11): 'एको देवः सर्वभूतेषु गूढः... साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' — एक ही देव सभी प्राणियों में छिपा है, वह साक्षी, चैतन्य, विशुद्ध और गुणों से परे है।

#श्वेताश्वतर उपनिषद#एको देवः#सर्वव्यापी
वेद ज्ञान

वेदों में ब्रह्म का वर्णन कैसे किया गया है?

वेदों में ब्रह्म को 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (ऋग्वेद 1/164/46) — एक ही सत्य, अनेक नाम — के रूप में बताया गया है। हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121), नासदीय सूक्त (10/129) और यजुर्वेद (40/8) में ब्रह्म को सर्वव्यापी, निर्गुण और सृष्टि के आधार के रूप में वर्णित किया गया है।

#ब्रह्म#वेद#ऋग्वेद
सनातन सिद्धांत

परमात्मा क्या है?

परमात्मा वह सर्वोच्च, सर्वव्यापी और असीमित चेतना है जो तीनों लोकों में व्याप्त है। गीता (15/17) में उसे सबका धारण-पोषण करने वाला अविनाशी ईश्वर कहा गया है। वह सत्-चित्-आनंद स्वरूप है।

#परमात्मा#ईश्वर#सर्वव्यापी
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