विस्तृत उत्तर
लोक व्युत्पत्ति और संस्कृत व्याकरण के आधारभूत नियमों के अनुसार 'शिव' शब्द की मूल धातु 'शि' है। इस एक शब्द में संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन समाहित है।
शि (व्यापकता का प्रतीक): इसका अर्थ है वह परमतत्त्व जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है, या जो सर्वव्यापी है। यह उस अनंत आकाश के समान है जिसमें सभी आकाशगंगाएं विचरण करती हैं।
वा (अनुग्रह का प्रतीक): इसका अर्थ अनुग्रह, करुणा या कृपा का साक्षात अवतार है। अतः, शिव वह परम चेतना हैं जो सर्वव्यापी होने के साथ-साथ अत्यंत अनुग्रहशील और जीवों पर कृपा करने वाले हैं।
महाभारत, शिव पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण (अध्याय १६) में दिए गए निरुक्त के अनुसार श्लोक 'श्री शब्दों मंगलार्थ वकारो दात्र त्रिवाचक मंगलाना प्रदाता सशिवाता' के अनुसार, 'शि' (शिकार) ध्वनि का अर्थ 'मंगल' या 'कल्याण' है और 'व' (वकार) का अर्थ 'दाता' या 'प्रदाता' है। जो संपूर्ण जगत को मंगल का दान करता है, जो कल्याण का प्रदाता है, वही 'शिव' है।
ऋग्वेद में 'शिव' शब्द का प्रयोग प्रारंभ में एक विशेषण के रूप में किया गया था, जो बाद में वैदिक 'रुद्र' से विकसित होकर पुराणों में एक स्वतंत्र और सर्वोच्च कल्याणकारी देवता के रूप में स्थापित हुआ।





