विस्तृत उत्तर
## परमात्मा का स्वरूप
परमात्मा = परम + आत्मा — अर्थात् सर्वोच्च, सर्वव्यापी, असीमित चेतना।
वेद में ईश्वर को 'ब्रह्म' कहा गया है। उसी को परमात्मा, ईश्वर, परमेश्वर, परब्रह्म भी कहते हैं।
### भगवद्गीता में परमात्मा (15/17)
> 'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
> यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥'
अर्थात् — जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है और अविनाशी है, वही परमात्मा है।
### ऋग्वेद में परमात्मा
> 'यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्' — वह परमात्मा ही इस सृष्टि का अध्यक्ष है जो परम आकाश में है।
### परमात्मा के लक्षण
| लक्षण | विवरण |
|-------|--------|
| सर्वज्ञ | सब कुछ जानने वाला |
| सर्वशक्तिमान | सब कुछ करने में समर्थ |
| सर्वव्यापी | सर्वत्र विद्यमान |
| निराकार | रूप-रंग से परे (निर्गुण रूप) |
| साकार | भक्तों के लिए सगुण रूप |
| नित्य | सदा स्थायी |
| सच्चिदानंद | सत्+चित्+आनंद स्वरूप |
### आत्मा और परमात्मा का अंतर
| आत्मा | परमात्मा |
|-------|----------|
| व्यक्तिगत चेतना | सार्वभौमिक चेतना |
| सीमित | असीमित |
| देहबद्ध | सर्वव्यापी |
| कर्म-बंधन में | नित्यमुक्त |
### भागवत के अनुसार
> परमात्मा ही सभी आत्माओं के अंदर निवास करते हैं तथा कर्मों का फल देते हैं। परमात्मा ब्रह्माण्ड का पालन करता है।
नोट: विभिन्न दार्शनिक मतों में परमात्मा और जीवात्मा का संबंध भिन्न बताया गया है — अद्वैत में अभिन्नता, द्वैत में भिन्नता।





