विस्तृत उत्तर
पुनर्जन्म क्या है?
परिभाषा
सनातन धर्म के अनुसार आत्मा अमर है। शरीर की मृत्यु के पश्चात् आत्मा अपने कर्मों के अनुसार नया शरीर ग्रहण करती है — इसी को पुनर्जन्म (पुनः + जन्म) कहते हैं।
भगवद्गीता में प्रमाण
*'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।*
*तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।'* (2.22)
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है — वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर ग्रहण करती है।
आत्मा के लक्षण (गीता 2.20)
- ▸अजन्मा, नित्य, सनातन, पुरातन
- ▸शरीर के नष्ट होने पर नष्ट नहीं होती
- ▸न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है
पुनर्जन्म का कारण
- ▸संचित कर्म — अधूरी इच्छाएँ, आसक्तियाँ
- ▸जब तक कर्म-बंधन है, पुनर्जन्म अनिवार्य है
- ▸अच्छे कर्म = उच्च योनि; बुरे कर्म = निम्न योनि (84 लाख योनियाँ)
कठोपनिषद
*'न जायते म्रियते वा कदाचित्'* — आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है।
गरुड़ पुराण
मृत्यु के पश्चात् आत्मा की यात्रा, यमराज का न्याय, और अगले जन्म का निर्धारण — इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है।
मोक्ष और पुनर्जन्म
जब आत्मा सभी कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाती है और ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेती है — तब पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है। यही मोक्ष है।





