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सनातन सिद्धांत📜 भगवद्गीता अध्याय 2, कठोपनिषद, गरुड़ पुराण2 मिनट पठन

पुनर्जन्म क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

पुनर्जन्म = कर्म-बंधन के कारण आत्मा का नए शरीर में प्रवेश। गीता 2.22 — पुराना वस्त्र त्याग, नया वस्त्र — आत्मा का रूपक। आत्मा अजन्मा, अमर (कठोपनिषद)। कर्म अनुसार 84 लाख योनियाँ। गरुड़ पुराण में मृत्युपश्चात् यात्रा का वर्णन। मोक्ष = पुनर्जन्म चक्र से मुक्ति।

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विस्तृत उत्तर

पुनर्जन्म क्या है?

परिभाषा

सनातन धर्म के अनुसार आत्मा अमर है। शरीर की मृत्यु के पश्चात् आत्मा अपने कर्मों के अनुसार नया शरीर ग्रहण करती है — इसी को पुनर्जन्म (पुनः + जन्म) कहते हैं।

भगवद्गीता में प्रमाण

*'वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।*

*तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।'* (2.22)

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है — वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर ग्रहण करती है।

आत्मा के लक्षण (गीता 2.20)

  • अजन्मा, नित्य, सनातन, पुरातन
  • शरीर के नष्ट होने पर नष्ट नहीं होती
  • न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है

पुनर्जन्म का कारण

  • संचित कर्म — अधूरी इच्छाएँ, आसक्तियाँ
  • जब तक कर्म-बंधन है, पुनर्जन्म अनिवार्य है
  • अच्छे कर्म = उच्च योनि; बुरे कर्म = निम्न योनि (84 लाख योनियाँ)

कठोपनिषद

*'न जायते म्रियते वा कदाचित्'* — आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है।

गरुड़ पुराण

मृत्यु के पश्चात् आत्मा की यात्रा, यमराज का न्याय, और अगले जन्म का निर्धारण — इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है।

मोक्ष और पुनर्जन्म

जब आत्मा सभी कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाती है और ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेती है — तब पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है। यही मोक्ष है।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता अध्याय 2, कठोपनिषद, गरुड़ पुराण
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