विस्तृत उत्तर
कर्म सिद्धांत
परिभाषा
कर्म' संस्कृत 'कृ' धातु से — अर्थात् करना। सनातन दर्शन में कर्म = विचार + वाणी + शरीर से किए गए समस्त कार्य। *'जो जैसा बोता है, वैसा काटता है'* — यही कर्म सिद्धांत का सार है।
मूल नियम
- 1हर कर्म का फल अवश्य मिलता है — कोई कर्म नष्ट नहीं होता।
- 2फल तत्काल भी मिल सकता है, या अगले जन्म में भी।
- 3ईश्वर न्यायकारी है — कर्मफल में किसी का पक्षपात नहीं।
कर्म के तीन प्रकार
1संचित कर्म
जन्म-जन्मांतर के अनगिनत कर्मों का संचित भंडार। इस भंडार में से इस जन्म का भोग निश्चित होता है।
2प्रारब्ध कर्म
संचित कर्मों में से जो इस जन्म में भोगने के लिए 'प्रारंभ' हो चुके हैं। इन्हें पूरी तरह टाला नहीं जा सकता — धैर्य और विवेक से भोगे जाते हैं। यही 'भाग्य' है।
3आगामी (क्रियमाण) कर्म
वर्तमान जन्म में किए जा रहे कर्म जो भविष्य में (इसी जन्म में या अगले में) फल देंगे। यही हमारे भविष्य को बदलने की शक्ति रखते हैं।
गीता में कर्म सिद्धांत
- ▸निष्काम कर्म = बंधन-मुक्ति
- ▸सकाम कर्म = संसार-बंधन
- ▸ज्ञान से कर्म का भस्म होना — *'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते।'* (4.37)
महत्व
कर्म सिद्धांत नैतिकता का वैज्ञानिक आधार है — यह बताता है कि हम अपने जीवन के निर्माता स्वयं हैं। निष्काम कर्म ही अंतिम मोक्ष का मार्ग है।





