श्री विष्णु महापुराण: प्रथम अंश: पंचम अध्याय का विस्तृत एवं संस्कारित भाष्य
यह विवेचन परम ज्ञानी महर्षि पराशर तथा विनीत शिष्य मैत्रेय मुनि के मध्य हुए उस पवित्र संवाद का विस्तृत प्रस्तुतीकरण है, जिसके माध्यम से आदि-सृष्टि की प्रक्रिया, काल के गूढ़ गणित और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का सनातन सिद्धांत प्रकट होता है। यह भाष्य ऋषि-मुनियों की परम्परागत शुद्ध, संस्कारित और मर्यादित हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
मंगलारम्भ, पूर्वपीठिका एवं मैत्रेय का प्रश्न
. परम सत्ता का स्मरण एवं उपक्रम
यह पवित्र श्री विष्णु महापुराण परमेश्वर श्री विष्णु की अनन्त महिमा का गायन करता है, जो सृष्टि के मूल आधार, पालक और संहारक हैं। इस प्रथम अंश के आरम्भिक अध्यायों में महर्षि पराशर ने सृष्टि के आद्या स्वरूप—तत्त्वों और महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति का वर्णन किया है। अब, पंचम अध्याय में प्रवेश करते हुए, शिष्य मैत्रेय मुनि, जो परमार्थ के गूढ़ अन्वेषण में रत हैं, अपने गुरुदेव से सृष्टि के क्रियात्मक विधान को विस्तारपूर्वक जानने की जिज्ञासा प्रकट करते हैं।
मैत्रेय मुनि अपनी जिज्ञासा का आरम्भ करते हुए कहते हैं, "हे ब्रह्मन्, आपने पूर्व में प्रकृति और पुरुष के संयोग से होने वाली सूक्ष्म सृष्टि का वर्णन किया। अब कृपा करके यह विस्तारपूर्वक समझाइए कि वह परमेश्वर, जो समस्त लोकों के स्वामी हैं, उन्होंने देव, ऋषि, पितर, असुर, मनुष्य, पशु, वृक्ष और जलचरों की सृष्टि किस प्रकार की? वे प्राणी जो पृथ्वी पर, स्वर्ग में, अथवा जलों में निवास करते हैं; ब्रह्माजी ने सृष्टि के समय किस विधि से, किन गुणों, किन लक्षणों और किन रूपों के साथ इस सम्पूर्ण जगत को रचा?"
मैत्रेय मुनि की जिज्ञासा का शास्त्रीय विस्तार
मैत्रेय की जिज्ञासा केवल प्राणियों की उत्पत्ति तक सीमित नहीं है, अपितु यह पञ्चलक्षण (पुराण के पाँच अनिवार्य विषय—सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित) के समस्त महत्त्वपूर्ण अंगों को समाहित करती है। यह प्रश्न आगामी अध्यायों के लिए एक विस्तृत आधारशिला प्रदान करता है।
मैत्रेय मुनि अपनी श्रवण की इच्छा को विस्तृत करते हुए कहते हैं: "हे मुनिसत्तम! मैं समुद्र, पर्वत तथा देवता आदि की उत्पत्ति, पृथिवी का अधिष्ठान और सूर्य आदि ग्रहों के परिमाण तथा उनके आधार (संस्थान) को जानना चाहता हूँ। " यह कथन स्पष्ट करता है कि सृष्टि विज्ञान में खगोल विज्ञान (ज्योतिष) का ज्ञान अपरिहार्य है। किसी भी सृष्टि के वर्णन को पूर्णता तब तक नहीं मिलती, जब तक उसमें काल का निर्धारण करने वाले सूर्य, चंद्र और ग्रहों की स्थिति का सम्यक् विवरण न हो।
इसके अतिरिक्त, काल के गूढ़ चक्र को जानने की इच्छा प्रकट करते हुए वे पूछते हैं: "देवता आदि के वंश, मनु और मन्वन्तर, तथा बार-बार आने वाले चारों युगों (चातुर्युग) में विभक्त कल्प और कल्पों के विभाग, प्रलय का स्वरूप, और युगों के समस्त धर्मों को भी मैं पूर्ण रूप से श्रवण करने का इच्छुक हूँ, हे वसिष्ठनन्दन!" यह जिज्ञासा स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जगत का भौतिक सृजन (सर्ग) और काल का चक्रीय विधान (मन्वन्तर/कल्प) एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। सृष्टि को समझना काल चक्र को समझने पर निर्भर करता है, क्योंकि प्रत्येक सृष्टि काल के अधीन ही स्थित है।
ब्रह्मा की आद्या सृष्टि: अविद्या, तम एवं स्थावर जगत
मैत्रेय मुनि के परमार्थिक प्रश्नों का उत्तर देते हुए महर्षि पराशरजी अब सृष्टि की क्रियात्मक प्रक्रिया का वर्णन करते हैं, जिसका आरम्भ तमस (अंधकार) और अज्ञान से होता है।
ब्रह्मा का संकल्प और तमोमय आवरण
महर्षि पराशर कहते हैं, "हे मैत्रेय! सुनो, मैं तुम्हें सम्पूर्ण लोकों के स्वामी श्री ब्रह्माजी द्वारा देव आदि प्राणियों के सृजन की विधि समझाता हूँ। कल्पों के आरम्भ में, जब वे (ब्रह्मा) सृष्टि की रचना हेतु गहन ध्यान (अभिसंधि) में लीन थे, तब सर्वप्रथम एक ऐसी सृष्टि प्रकट हुई, जिसका आरम्भ ही अज्ञान से हुआ और जो तमस (घोर अंधकार) से युक्त थी।"
सृष्टि के इस प्रथम चरण में, ज्ञान के परम पुंज ब्रह्माजी के संकल्प से अज्ञान का प्रादुर्भाव होना, यह एक गहन दार्शनिक तथ्य है। इसका तात्पर्य यह है कि परम शुद्ध सत्य (विष्णु) के प्रकटीकरण की प्रक्रिया में, सर्वप्रथम उस जड़ता और चेतना के आवरण (अविद्या) का निर्माण आवश्यक है, जिसके भीतर चेतना धीरे-धीरे विकसित हो सके।
पञ्चधा अज्ञान और स्थावर जगत का प्राकट्य
उस महान सत्ता (ब्रह्माजी) से जो अज्ञान प्रकट हुआ, वह पाँच प्रकार का था, जिसे पञ्चपर्वा अविद्या कहा जाता है:
- अन्धकार
- मोह
- महामोह
- तामिस्र
- अन्धतामिस्र
इस अज्ञान से आवेष्टित होकर जो प्रथम सृष्टि उत्पन्न हुई, वह पाँच प्रकार की (पंचधा) थी, जिसे स्थावर जगत कहा जाता है, जिसमें वृक्ष, लता, गुल्म और अन्य जड़ पदार्थ सम्मिलित हैं।
यह स्थावर सृष्टि अत्यंत घन, तमोमय और अप्रकाशित स्वरूप वाली थी। इसके लक्षण इस प्रकार हैं:
- यह सृष्टि बुद्धिहीन थी।
- यह विचाररहित (विवेकशून्य) थी।
- यह संवेदनाहीन और अनुभूति-शून्य थी, अर्थात् इसमें सुख-दुःख की चेतना नहीं थी।
- यह गतिरहित (अचल) थी।
चूंकि यह जड़ जगत सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ, इसलिए इसे शास्त्रों में आद्या सृष्टि अथवा स्थावर सृष्टि कहा गया है। यह तथ्य यह स्थापित करता है कि ब्रह्माण्ड की भौतिक नींव स्वयं परम चेतना का न्यूनतम, सबसे घना और अप्रकाशित रूप है।
त्यागजन्य वैकृतिक सृष्टि: काल, देव, असुर, पितर एवं मनुष्य की उत्पत्ति
स्थावर जगत की रचना के उपरान्त, ब्रह्माजी ने चेतन जगत की रचना के लिए संकल्प किया। इस द्वितीय चरण की सृष्टि को वैकृतिक सृष्टि कहा जाता है, और यह ब्रह्माजी के अपने शरीर या मानसिक अवस्थाओं के त्याग के माध्यम से उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया में, केवल प्राणी समूहों का ही नहीं, अपितु कालखंडों (रात्रि, दिवस, संध्या) का भी जन्म होता है।
तमस-त्याग और असुरों का जन्म
स्थावर जगत की रचना से असंतुष्ट होकर, ब्रह्माजी ने पुनः सृष्टि का विचार किया। इस प्रक्रिया में, उन्होंने सर्वप्रथम तमोगुण से युक्त एक शरीर का त्याग किया। यह त्यागा हुआ शरीर तत्काल रात्रि (निशा) बन गया, जो अंधकार और निष्क्रियता का प्रतीक है।
चूंकि यह शरीर तमस (अंधकार और मोह) से व्याप्त था, इसलिए इससे उत्पन्न प्राणी असुर (दैत्य) कहलाए। ये प्राणी स्वभाव से तम प्रधान, हिंसक और क्रूर थे। इस प्रकार, असुरों की उत्पत्ति रात्रि के गुण (तमस) से जुड़ी हुई है।
सत्व-स्वीकार और देवताओं का प्राकट्य
असुरों की तामसिक सृष्टि के पश्चात, ब्रह्माजी ने उस तमोगुण को छोड़कर, सत्व प्रधान स्वरूप को स्वीकार किया। इस सत्वमय शरीर के त्याग से प्रभात (दिन) का जन्म हुआ। प्रभात (दिवस) तेज और प्रकाश का प्रतीक है, अतः इससे उत्पन्न प्राणी देवता (सुरगण) कहलाए। देवता स्वाभाविक रूप से तेजस्वी, सत्व गुण से युक्त और धर्मात्मा थे।
यहाँ यह सिद्धांत स्थापित होता है कि सृष्टि की प्रक्रिया में ब्रह्माण्डीय ध्रुवीकरण का सिद्धांत कार्य करता है। रात्रि (तमस) में जन्मे असुरों में स्वाभाविक रूप से तामसिकता आई, जबकि दिन (सत्व) में जन्मे देवताओं में सात्विकता। इस त्याग का कार्य केवल सृजन नहीं है, अपितु गुणों और समय (काल) के बीच एक अंतर्संबंध स्थापित करना है, जो जगत में अनिवार्य द्वंद्व (प्रकाश/अंधकार, धर्म/अधर्म) का आधार बनता है।
पितर (पूर्वज), संध्या और मनुष्यों की उत्पत्ति
इसके उपरान्त, ब्रह्माजी ने सृष्टि के विस्तार के लिए अन्य भावों और रूपों का त्याग किया:
- पितृगणों का जन्म: ब्रह्माजी ने एक अन्य शरीर धारण किया, जिसे उन्होंने पितृगणों के रूप में त्याग दिया। इससे पितर (पूर्वज) उत्पन्न हुए। यह त्यागा हुआ शरीर सायं संध्या (शाम) कहलाया, जो दिन और रात्रि के मध्य का संक्रमण काल (सत्व और तमस का मिश्रण) है।
- मनुष्यों का जन्म: अंत में, ब्रह्माजी ने रजोगुण की प्रधानता वाले शरीर को स्वीकार किया, जिससे मनुष्य (मानव) उत्पन्न हुए। इन्हें अर्वाक्स्रोतस (नीचे की ओर बहने वाली वृत्ति वाले) कहा गया, क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से कर्म और भोग की ओर प्रवृत्त होते हैं। रजोगुण के कारण मनुष्य कर्मशील और क्रियाशील होते हैं।
इस प्रकार, ब्रह्माजी की त्यागजन्य सृष्टि प्राणियों के गुण, उनके जन्म के समय (काल), और उनके स्वभाव के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करती है।
निम्न सारणी ब्रह्माजी द्वारा त्यागजन्य सृष्टि और काल के सहसंबंध को दर्शाती है:
| त्याग किया गया शरीर/भाव | उत्पन्न काल | उत्पन्न प्राणी समूह | उत्पत्ति में प्रधान गुण | मूल प्रकृति |
|---|---|---|---|---|
| तमस (अज्ञान) का त्याग | - | स्थावर जगत (वृक्ष, आदि) | तम प्रधान | जड़ (बुद्धिहीन) |
| तमोगुण से युक्त शरीर | निशा (रात्रि) | असुर (दैत्य) | तम प्रधान | हिंसक, क्रूर |
| तम त्यागने के बाद का शरीर | प्रभात (दिवस) | देव (देवता) | सत्व प्रधान | तेजस्वी, पुण्यात्मा |
| पितृरूप धारण | सायं संध्या | पितर (पूर्वज) | सत्व-तमस मिश्रित | पूर्वज, पूज्य |
| रजोगुण की अधिकता | मनुष्य (अर्वाक्स्रोत) | मानव | रज प्रधान | कर्मशील, भोगी |
वर्ण-व्यवस्था का वेदानुकूल विभाजन एवं कर्मों का निर्धारण
मनुष्य सृष्टि के उपरान्त, जगत में व्यवस्था और कर्म-विधान स्थापित करने हेतु, ब्रह्माजी ने गुणों के आधार पर वर्णों का विभाजन किया। यह विभाजन केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का एक मूलभूत अंग है, जिसका आधार वेद हैं।
ब्रह्मा के अंगों से चतुर्वर्ण का प्राकट्य
जगत रचना की इच्छा से युक्त सत्य संकल्प श्री ब्रह्मा जी ने विभिन्न गुणों से युक्त चार प्रकार की प्रजा उत्पन्न की, जो चारों वर्णों के रूप में जानी जाती है:
- मुख से ब्राह्मण: ब्रह्मा जी के मुख (सबसे पवित्र और ज्ञानवान अंग) से पहले सत्व प्रधान प्रजा उत्पन्न हुई। ये ही ब्राह्मण कहलाए, जिनमें ज्ञानार्जन, अध्यापन, यज्ञ और तप की प्रवृत्ति थी।
- वक्ष स्थल से क्षत्रिय: तत्पश्चात उनके वक्ष स्थल (शौर्य और शक्ति का केंद्र) से रज प्रधान प्रजा उत्पन्न हुई। ये ही क्षत्रिय कहलाए, जिनका कर्म रक्षा, शौर्य, और धर्मानुसार शासन करना था।
- जंघा से वैश्य: उनकी जंघा (जो गति और भरण-पोषण का प्रतीक है) से रज और तम विशिष्ट सृष्टि हुई। ये ही वैश्य कहलाए, जिनका कर्म कृषि, व्यापार, पशुपालन और धन का संचय करना था।
- चरणों से शूद्र: अंत में, ब्रह्मा जी ने चरणों (जो सेवा और आधार का प्रतीक है) से एक और प्रकार की प्रजा उत्पन्न की, जो तम प्रधान थी। ये ही शूद्र कहलाए, जिनका मुख्य कर्म सेवा भाव और श्रम था।
इस प्रकार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चारों वर्ण क्रमशः ब्रह्मा जी के मुख, वक्ष स्थल, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए।
वेदानुसार नाम, रूप और कार्य का विभाग
यह ध्यान देने योग्य है कि ब्रह्माजी ने केवल प्राणियों की उत्पत्ति ही नहीं की, अपितु उनके लिए नियम भी निर्धारित किए। यह सृजन प्रक्रिया मनमानी नहीं है, बल्कि सनातन ज्ञान (वेद) पर आधारित है।
ब्रह्माजी ने कल्प के आरम्भ में देवता आदि समस्त प्राणियों के वेदानुसार नाम, रूप तथा कार्य विभाग को निश्चित किया। इसी प्रकार, ऋषियों तथा अन्य प्राणियों के भी वेदानुकूल नाम और यथा योग्य कर्मों को उन्होंने निर्दिष्ट किया ।
यह स्पष्ट व्याख्या यह सिद्ध करती है कि वेद (सनातन ज्ञान) सृष्टि से भी पूर्व विद्यमान एक शाश्वत, अपरिवर्तनीय खाका है, जिसे 'ऋत' कहा जाता है। ब्रह्मा, यद्यपि परम स्रष्टा हैं, वे स्वयं इस दैवीय विधान को मूर्त रूप देने वाले कार्यकारी मात्र हैं। वे सृष्टि में जो कुछ भी उत्पन्न करते हैं, उसका नाम, रूप और कार्य का विधान वेदों में निहित मूलभूत, अपरिवर्तनीय दैवीय व्यवस्था पर आधारित होता है। यह स्थापित करता है कि लौकिक व्यवस्था, जैसे वर्ण धर्म, किसी मनमाने नियम पर नहीं, बल्कि मूलभूत शास्त्रीय विधान पर प्रतिष्ठित है।
सृष्टि की चक्रीयता और कर्मानुसार प्रवृत्ति का सिद्धान्त
विष्णु पुराण में वर्णित सृष्टि प्रक्रिया का सबसे गहन दार्शनिक पहलू यह है कि यह एक रैखिक घटना नहीं, बल्कि एक शाश्वत चक्रीय प्रक्रिया है। यह चक्रीयता कर्म के सिद्धांत से संचालित होती है।
. पूर्व कल्पों के कर्मों की अनिवार्यता
महर्षि पराशर यह बताते हैं कि सृष्टि की पुनरावृत्ति के दौरान, प्राणियों के स्वभाव और प्रवृत्ति (कार्य करने की इच्छा) का निर्धारण किस प्रकार होता है:
"जब पुनः-पुनः सृष्टि होती है, तो प्राणियों की प्रवृत्ति (कार्य करने की इच्छा और स्वभाव) उनके पूर्व कल्पों के कर्मों (पूर्व भावना) के अनुसार ही होती है। इस प्रकार, प्रभु विधाता ने ही स्वयं इंद्रियों के विषयभूत शरीर आदि में विभिन्नता और व्यवहार को उत्पन्न किया है।
पूर्व भावना के अनुसार ही प्राणियों को हिंसा, अहिंसा, मृदुता, कठोरता, धर्म, अधर्म, सत्य, मिथ्या जैसे गुण प्राप्त होते हैं। इन गुणों को पाकर ही वे उन्हें अच्छे लगने लगते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि प्राणी जिस कर्म के फल स्वरूप जन्म लेता है, वह उसी प्रकार के स्वभाव और परिवेश में सुख मानता है। यदि कोई प्राणी पूर्व जन्मों में हिंसक रहा है, तो पुनर्जन्म में वह हिंसक प्रवृत्ति और वातावरण में ही सहजता महसूस करता है।"
यह सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि जगत में जो विविधता (विभिन्नता) दिखाई देती है, वह सृष्टिकर्ता की मनमानी नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक प्राणी के न्यायसंगत कर्म-बंधन का परिणाम है। ब्रह्माजी कर्मों के फलों को नहीं बदलते, अपितु वे केवल उन बीजों (संस्कारों) को उगाते हैं, जो पूर्व कल्पों में बोए गए थे।
सृष्टि में नित्यत्व का दर्शन: ऋतुओं का दृष्टांत
सृष्टि की पुनरावृत्ति की अनिवार्यता को समझाने के लिए, शास्त्रकार एक अद्भुत और सरल दृष्टांत देते हैं, जो लौकिक और पारलौकिक व्यवस्था की समानता दर्शाता है।
महर्षि पराशर कहते हैं: "जिस प्रकार भिन्न-भिन्न ऋतुओं के बारम्बार आने पर उनके चिन्ह, नाम और रूप पूर्ववत (पहले जैसे) रहते हैं। जैसे शीत ऋतु के बाद ग्रीष्म और फिर वर्षा ऋतु ठीक उसी क्रम और लक्षणों के साथ आती है।"
"उसी प्रकार, युगों के आरम्भ (युगादि) में भी उनके पूर्व भाव (पूर्व कल्पों के संस्कार और व्यवस्थाएँ) ही देखे जाते हैं । यानी, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि का चक्र हमेशा एक समान धार्मिक और सामाजिक पैटर्न के साथ पुनः आरंभ होता है।"
यह चक्रीय अस्तित्व (संसार) का सिद्धांत स्थापित करता है, जिसके अंतर्गत सृजन, संरक्षण और संहार का चक्र अनवरत चलता रहता है। ब्रह्माण्ड का प्रत्येक काल, प्रत्येक वस्तु, और प्रत्येक जीव अनित्य (नश्वर) है, लेकिन ब्रह्माण्डीय चक्र का पैटर्न (चक्र ही) नित्य और शाश्वत है।
स्रष्टा की शक्ति और चक्रीय प्रेरणा
इस सम्पूर्ण सृष्टि चक्र का संचालन स्वयं ब्रह्माजी करते हैं, जो भगवान विष्णु की सर्वोच्च सत्ता से प्रेरित होते हैं।
वे ब्रह्माजी, जो शीश रक्षा शक्ति (पालन-पोषण/संरक्षण की शक्ति) से युक्त हैं, सृष्टि रचना की इच्छा रूपी शक्ति (सृज शक्ति) की प्रेरणा से, कल्पों के आरम्भ में बारम्बार इसी प्रकार सृष्टि की रचना किया करते हैं।
इसका निहितार्थ यह है कि ब्रह्मा, यद्यपि स्रष्टा हैं, वे विष्णु के परमार्थिक विधान (ऋत और कर्म) से बंधे हुए हैं। उनकी शक्ति, जिसे सृज शक्ति कहा जाता है, केवल रचना करने की इच्छा है, लेकिन उस रचना का स्वरूप, विधि और फलितार्थ पूर्व-स्थापित कर्मों और वेदों के अनुसार ही होना अनिवार्य है।
सूर्य और चंद्रमा की उत्पत्ति एवं ग्रहादि का संस्थान
मैत्रेय मुनि ने अपनी जिज्ञासा में सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और उनके संस्थान (स्थापन) के विषय में जानने की विशेष इच्छा प्रकट की थी। यद्यपि इन विषयों का विस्तृत खगोलीय विवरण पुराण के द्वितीय अंश में निहित है, इस प्रथम अंश के पंचम अध्याय में उनकी वंशावली और स्थिति का मूलभूत ढाँचा प्रस्तुत किया गया है।
सूर्य (विवस्वान) का वंश परिचय
सूर्यदेव, जिन्हें विवस्वान भी कहा जाता है, न केवल प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत हैं, बल्कि वे वर्तमान मन्वन्तर के मनु (वैवस्वत मनु) के पिता होने के कारण मानव वंशावली के मूल पुरुष भी हैं।
सूर्य की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है, जो कश्यप और अदिति के वंश से जुड़ा है:
- परम पुरुष विष्णु से ब्रह्मा उत्पन्न हुए।
- ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए।
- दक्ष की तेरह कन्याओं में से एक अदिति थीं, जिनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ।
- अदिति ने बारह आदित्यों को जन्म दिया, जिनमें से एक विवस्वान (सूर्य) हैं।
- विवस्वान के पुत्र श्राद्धदेव मनु (या वैवस्वत मनु) हैं, जिनसे पृथ्वी पर सम्पूर्ण मानव जाति का विस्तार हुआ और जिन्होंने सूर्यवंश की नींव रखी।
इस प्रकार, सूर्य की उत्पत्ति सीधे तौर पर कालचक्र (मन्वन्तर) और वंशावली (मानव वंश) से जुड़ी हुई है, जो पुराणों के पञ्चलक्षणों को पूर्ण करती है।
ग्रहों, नक्षत्रों और संस्थान (स्थिति) का आधार
पौराणिक ब्रह्माण्ड विज्ञान में, खगोलीय पिंडों (ग्रहों, नक्षत्रों) की स्थिति (संस्थान) का वर्णन महत्वपूर्ण है। मैत्रेय ने सूर्य आदि के परिमाण (माप) और आधार को जानने की इच्छा प्रकट की थी।
शास्त्रों के अनुसार, पृथ्वी और स्वर्गलोक से ऊपर स्थित अनेक लोकों में विशिष्ट खगोलीय पिंड स्थापित हैं। स्वर्गलोक के ऊपर क्रम से सात स्थान स्थित हैं, जहाँ मेघ, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, सप्तर्षि और ध्रुव निवास करते हैं।
ये समस्त खगोलीय पिण्ड, जो आकाश में गतिशील प्रतीत होते हैं, विशिष्ट वायु प्रवाहों द्वारा अपने-अपने स्थानों पर स्थिर रखे जाते हैं। इन सात वायु प्रवाहों को सप्त नेमयः कहा गया है। ये वायु प्रवाह हैं:
- आवह (Aavaha)
- प्रवह (Pravaha)
- अनुवह (Anuvaha)
- संवह (Samvaha)
- विवह (Vivaha)
- परावह (Paraavaha)
- परिवह (Parivaha)
ये वायु प्रवाह ही सूर्य, चंद्रमा और समस्त तारागणों को उनकी निर्धारित कक्षाओं (मंडलों) में भ्रमण करने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे काल चक्र का नियमित संचालन संभव होता है। सूर्यदेव अपनी तेजोमय शक्ति से चार प्रकार के जल का आकर्षण करते हैं—नदी में स्थित जल, समुद्र में स्थित जल, पृथ्वी में स्थित जल (भूगर्भ जल), और समस्त प्राणियों में स्थित जल तत्व । यह अवशोषण और वर्षा का चक्र सृष्टि के पालन (स्थिति) के लिए आवश्यक है।
८. प्रचेताओं का वंश विस्तार: मारिषा और दक्ष प्रजापति की कथा
अध्याय के अंतिम चरण में, सृष्टि के वंशावली (वंशानुचरित) को आगे बढ़ाने के लिए, उन महान चरित्रों का वर्णन किया गया है, जिनसे प्रजा का भौतिक विस्तार हुआ। यहाँ प्रचेता नामक ऋषियों के वंश और मारिषा नामक अद्भुत कन्या की उत्पत्ति का विवरण है, जो दक्ष प्रजापति के द्वितीय जन्म का आधार बनी।
अप्सरा प्रमलोचा और मारिषा का अद्भुत प्रादुर्भाव
दक्ष प्रजापति की सृष्टि प्रक्रिया में मारिषा का जन्म अत्यंत विलक्षण है। इसकी कथा इस प्रकार है:
एक समय अप्सरा प्रमलोचा, जो स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य आकाश मार्ग से जा रही थीं, उन्होंने वृक्षों के पत्तों से अपने परिश्रमजन्य स्वेद (पसीने) को पोंछना चाहा। उसी क्षण, उसका पूर्व में धारण किया हुआ गर्भ (जो गर्भस्थ अवधि पूर्ण कर चुका था) शरीर से बाहर आ गया।
इस त्यागे हुए गर्भ को साधारण न मानते हुए, वायु देवता ने अपने सामर्थ्य से उसे एकत्रित किया और चन्द्रमा (सोम) ने इसका पालन-पोषण किया। वायु और चन्द्रमा के दिव्य पोषण के कारण, यह गर्भ पूर्ण विकसित होकर मारिषा नाम की कन्या बनी, जो दिव्य शक्ति और रूप सुषमा से युक्त थी। चन्द्रमा (सोमजी) ने इस कन्या को उन प्रचेता ऋषियों को सौंप दिया, जिनका वर्णन पूर्व अध्याय में किया गया था।
चन्द्रमा द्वारा मारिषा का पालन करना, इस वंश (दक्ष/प्रजा) को दिव्य अमृतमय पोषण प्रदान करने का प्रतीक है।
मारिषा के पूर्व जन्म और विष्णु का वरदान
यह मारिषा कोई सामान्य कन्या नहीं थीं, अपितु वे पूर्व जन्म में एक राज्य की महारानी थीं। पुत्र की प्राप्ति न कर पाने के कारण वे दुःखी थीं, और किसी देव प्रकोप का भाजन बनकर विधवा हो गई थीं। पति और पुत्र विहीन होने के कारण अत्यंत व्यथित उस साध्वी ने घोर भक्ति और पूजा अर्चना द्वारा भगवान विष्णु (हृषीकेश) को प्रसन्न किया।
भगवान, जो भक्तों पर कृपा करने वाले हैं, उन्होंने उस व्यथित नारी के मन को प्रसन्न करने के लिए उन्हें मनोवांछित वर मांगने का अनुग्रह किया। महारानी ने वर मांगा कि:
- उन्हें जन्म-जन्मांतर तक सदैव परम प्रशंसनीय, सुखकारी और धर्मात्मा पति प्राप्त हों।
- उन्हें प्रजापति के समान तेजों में पुत्र प्राप्त हो।
- वे स्वयं अयोनिजा (सामान्य योनि मार्ग से उत्पन्न न होने वाली), अनित्य सौंदर्य की प्रतिमा, कुलीना तथा असीम गुणवती हों।
देवताओं के देव, भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया कि, "दूसरे जीवन में तुम्हें दस पराक्रमी और यशस्वी पति प्राप्त होंगे। और तुम्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो अत्यंत महान, पराक्रमी और प्रजापति के पद से सुशोभित होगा, जिससे विविध मानव जातियों का विस्तार होगा।"
इस प्रकार वरदान प्राप्त कर, वही साध्वी आत्मा इस जन्म में मारिषा के रूप में अद्भुत रीति से (वायु और चंद्र द्वारा पोषित, अयोनिजा) प्रकट हुईं।
प्रचेताओं द्वारा मारिषा का वरण एवं दक्ष का प्राकट्य
पूर्व काल में, दस प्रचेता नामक ऋषि (जो क्रोधाग्नि से वृक्षों का नाश कर रहे थे) भगवान विष्णु के आदेश से क्रोध शांत कर चुके थे। अब, चन्द्रमा (सोम) ने उन प्रचेताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि, "हे प्रचेता, इस दिव्य शक्ति संपन्न, रूप सुषमा की आकर कन्या का वरण करके तुम तेजस्वी एवं सुयोग्य संतान प्राप्त कर अपनी मनोकामना पूर्ण करो।"
सोम के इस आदेश से संतुष्ट होकर, प्रचेताओं ने वायु एवं अग्नि का निश्वसन रोक दिया, अपना क्रोध शांत किया, और मारिषा को धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने पुनः वृक्षों के साथ अपनी मैत्री स्थापित कर ली।
इस प्रकार, प्रचेताओं और मारिषा के संयोग से परम तेजस्वी दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ। यह वही दक्ष थे, जो पूर्व कल्प में ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए थे। इस द्वितीय जन्म का उद्देश्य वंशानुचरित को आगे बढ़ाना था। मानस पुत्रों की सृष्टि प्रायः ज्ञान और तप की प्रधानता वाले युगों के लिए होती है, परन्तु भौतिक सृष्टि के विस्तार, वंशावली की स्थापना, तथा मानवीय राजवंशों (जैसे सूर्यवंश और चन्द्रवंश) को आगे बढ़ाने के लिए, दक्ष को एक अधिक भौतिक और वंशागत जन्म लेना आवश्यक था। मारिषा से उत्पन्न यह दक्ष प्रजापति ही आगे चलकर क्षत्रिय और अन्य मानवीय वंशों के विस्तार का आधार बने।
उपसंहार एवं शास्त्रीय निष्कर्ष
श्री विष्णु महापुराण का प्रथम अंश, पंचम अध्याय, केवल सृष्टि की कथा मात्र नहीं है, अपितु यह ब्रह्माण्डीय व्यवस्था, सनातन न्याय और काल के गूढ़ सिद्धांतों का घोषणापत्र है। महर्षि पराशर ने मैत्रेय मुनि के प्रश्नों का उत्तर देते हुए निम्नलिखित मूलभूत सिद्धांतों को दृढ़ता से स्थापित किया है:
सृष्टि का आधारभूत नियम: चक्रीयता और कर्म
यह अध्याय स्पष्ट करता है कि जगत की सृष्टि एक चक्रीय प्रक्रिया है। ब्रह्माजी, स्वयं परम पुरुष विष्णु की शक्ति (सृज शक्ति) से प्रेरित होते हुए भी, अपने सृजन कार्य में स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें सृष्टि को ठीक उसी रूप में दोहराना पड़ता है, जैसा वह पूर्व कल्पों में थी। देवता, मनुष्य, असुर आदि के नाम, रूप और कार्य वेदों के अनुसार पूर्वनिश्चित हैं, और प्राणियों का स्वभाव (हिंसा, धर्म, सत्य) उनके पूर्व कल्पों के कर्मों (पूर्व भावना) के अनुरूप ही होता है।
यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि जगत में दिखाई देने वाली विशाल विविधता दैवीय मनमानी नहीं, बल्कि कर्म सिद्धांत पर आधारित एक न्यायसंगत व्यवस्था है। सृष्टि की चक्रीयता (ऋतुओं के आगमन के समान) यह दर्शाती है कि ब्रह्माण्ड का पैटर्न शाश्वत है, भले ही उसमें स्थित वस्तुएँ नश्वर हों।
गुणों, काल और प्राणी का सहसंबंध
ब्रह्माजी द्वारा शरीर और भावों का त्याग करके सृष्टि करने का विधान यह स्थापित करता है कि प्रत्येक प्राणी और प्रत्येक कालखंड का एक विशिष्ट गुण (सत्व, रज, तम) होता है। रात्रि (तमस) असुरों को जन्म देती है, जबकि दिवस (सत्व) देवताओं को। इस प्रकार, काल केवल मापने की इकाई नहीं है, अपितु यह प्राणी के मूलभूत स्वभाव को निर्धारित करने वाला एक सक्रिय घटक है।
वंशानुचरित का महत्त्व
दक्ष प्रजापति का दो बार जन्म—पहले मानस पुत्र के रूप में, और फिर मारिषा के पुत्र के रूप में—प्रजा के विस्तार के चरणों को दर्शाता है। मानस सृष्टि जहां ज्ञान प्रधान और संकल्प आधारित होती है, वहीं मारिषा (अयोनिजा) से दक्ष का जन्म वंशावली के भौतिक विस्तार के लिए आवश्यक था, जिससे सूर्यवंश और अन्य मानवीय राजवंश आगे बढ़ सकें। चंद्र (सोम) और वायु द्वारा मारिषा का पालन, वंशों को दिव्य और अमृतमय पोषण प्रदान करने का प्रतीक है, जो राजसी वंशों की दिव्यता का आधार बना।
आगामी विवेचन की प्रस्तावना
मैत्रेय मुनि की जिज्ञासा में पूछे गए शेष विषयों, जैसे सूर्य, चंद्रमा और ग्रहादि का विस्तृत परिमाण और संस्थान, चौदह मन्वन्तरों का सम्पूर्ण विवरण, तथा युगों के विशिष्ट धर्मों का विवेचन अब आगामी अध्यायों में विस्तारपूर्वक किया जाएगा, जिससे सृष्टि के सम्पूर्ण विज्ञान का ज्ञान परिपूर्ण हो सके। इस प्रकार, पंचम अध्याय सृष्टि विज्ञान की दार्शनिक और मौलिक नींव को सुदृढ़ता प्रदान करता है।






