श्रीविष्णुपुराणम्—प्रथम अंशः—चतुर्दश अध्यायः
प्रजापति प्राचीनबर्हि के पुत्रों (प्रचेताओं) की तपस्या और सृष्टि-क्रम का विस्तृत वर्णन
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
यह प्रतिवेदन श्रीविष्णुपुराण के प्रथम अंश, चतुर्दश अध्याय में वर्णित प्रचेताओं की आख्यायिका का सम्पूर्ण, विशद एवं संस्कारित हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में प्रजापति प्राचीनबर्हि के दस पुत्रों, जिन्हें सामूहिक रूप से प्रचेता कहा जाता है, के तपस्या-मार्ग, भगवान् विष्णु के दर्शन, सृष्टि पर छाए संकट का निवारण, और दक्ष प्रजापति के पुनर्जन्म का गहन विवरण समाहित है। यह विवरण न केवल एक कथा मात्र है, अपितु सृष्टि के संचालन में तपस्या, धर्म, कर्तव्य और काल-चक्र की अनिवार्यता को सिद्ध करने वाला एक दार्शनिक भाष्य है।
खंड I: प्रास्ताविक आधार एवं प्रचेताओं का तपस्या-संकल्प
कथा का आरम्भ एवं प्राचीनबर्हि का चरित्र-सन्दर्भ
श्री पराशर मुनि मैत्रेय से कहते हैं कि हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हें उस कथा का वर्णन कर रहा हूँ, जिसके द्वारा परमपिता ब्रह्मा के मानस-पुत्रों की वंश-परंपरा का विस्तार हुआ। पूर्व अध्याय में हमने प्राचीनबर्हि नामक महान् प्रजापति के चरित्र का विस्तृत वर्णन सुना था, जो अपने अनवरत एवं विस्तृत यज्ञों के लिए विख्यात थे । उनका सम्पूर्ण ध्यान केवल यज्ञ-कर्म में ही लीन रहता था, जिसके कारण वे लोकहित और प्रजा-सृष्टि के अपने मूल दायित्व से किंचित् विमुख से हो गए थे।
शास्त्रों में यह स्पष्ट निर्देशित है कि प्रजापति का धर्म केवल यज्ञ अनुष्ठान तक सीमित नहीं होता, अपितु उन्हें परमपिता ब्रह्मा की आज्ञa का पालन करते हुए प्रजा का विस्तार करना (प्रजा विसृजत) और सृष्टि को कर्म करने योग्य बनाना भी होता है। इसी धर्म का पालन करने हेतु, राजा प्राचीनबर्हि ने अपने दस अत्यंत तेजस्वी पुत्रों को, जो सामूहिक रूप से प्रचेता नाम से प्रसिद्ध थे, प्रजा की वृद्धि करने के लिए कठोर तपस्या करने का आदेश दिया। पिता का यह आदेश प्राप्त कर, प्रचेतागण लोक-कल्याण और वंश-वृद्धि के महान् उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए कृत-संकल्प हुए।
प्रचेताओं ने यह भली-भाँति समझा कि केवल शारीरिक अथवा मानसिक प्रयास से ही सृष्टि का विस्तार संभव नहीं है। प्रजा की सृष्टि करना एक महान् आध्यात्मिक कर्म है, जिसके लिए स्वयं परमपुरुष भगवान् विष्णु की कृपा और उनके तेज की आवश्यकता होती है। अतः उन्होंने इस भौतिक कार्य (प्रजा-सृष्टि) की सिद्धि के लिए सर्वोच्च आत्मिक साधन—अर्थात् कठोर तपस्या—का वरण किया। यह निर्णय दर्शाता है कि महान् सृष्टि-कर्ता या प्रजापति बनने के लिए, पहले स्वयं को आत्मिक बल से पूर्ण करना आवश्यक होता है।
महासागर में प्रचेताओं का प्रवेश एवं दस सहस्र वर्षीय तप
पिता प्राचीनबर्हि की आज्ञा को शिरोधार्य करके, प्रचेतागण ने महान् तपस्या का संकल्प लिया। उन्होंने संसार के समस्त बाह्य व्यवहारों और कर्मों से स्वयं को विरक्त कर लिया। वे एक ऐसा स्थान चाहते थे, जहाँ उनका चित्त एकाग्र हो सके और परम तत्त्व में समाहित हो जाए।
अतः उन दस प्रचेताओं ने महासागर के विशाल जल (अर्णव) में प्रवेश किया। उन्होंने जल के भीतर ही स्वयं को समाधिस्थ कर लिया और समस्त लौकिक चेष्टाओं को त्याग दिया। उन्होंने यह तपस्या अल्पकाल के लिए नहीं, अपितु दस सहस्र वर्षों (दस हज़ार वर्षों) की अतुलनीय अवधि के लिए आरम्भ की।
जल के भीतर निवास करना, वायु, अग्नि तथा अन्य भौतिक तत्त्वों के बीच रहते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहना, उनके कठोर वैराग्य का सर्वोच्च उदाहरण था। दस हज़ार वर्षों तक इस प्रकार महासागर के भीतर स्थिर रहना, यह दर्शाता है कि उनका संकल्प केवल तपस्या करना नहीं था, अपितु स्वयं को सृष्टि के चक्र से काटकर परमार्थ में लीन कर देना था। प्रजापति बनने की इच्छा रखने वाले इन पुत्रों का यह कठोर तप यह स्थापित करता है कि सात्त्विक सृष्टि को उत्पन्न करने हेतु, पहले तामसिक और राजसिक वृत्तियों को लम्बी अवधि की तपस्या द्वारा शुद्ध करना अनिवार्य होता है। यह लौकिक समय (दस हज़ार वर्ष) उनके लिए आत्मिक समय में परिवर्तित हो गया, जिसने उन्हें सृष्टि करने की दैवीय ऊर्जा से आपूरित किया।
यह तपस्या काल-परिमाण की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सृष्टि के प्रारम्भिक काल में, महान् कार्य सिद्ध करने के लिए ऐसे दीर्घकालीन तप की आवश्यकता होती थी, ताकि जीवात्मा का तेज इतना शुद्ध हो जाए कि वह दैवी कार्य का निर्वहन कर सके।
खंड II: श्रीहरि का दिव्य दर्शन एवं प्रचेताओं का अभीष्ट वरदान
परमपुरुष नारायण में समाधि एवं स्तुति का मर्म
प्रचेतागण जल के भीतर दस हज़ार वर्षों तक समाधिस्थ रहे। उनका ध्यान केवल परमपुरुष भगवान् विष्णु के परम पद में स्थिर था। यह वह परम पद है, जिसके विषय में ऋषि-मुनि वर्णन करते हैं कि वह 'पूर्वापर व्यवहार की गति से रहित' है। इसका अर्थ है कि वह स्थान, जहाँ भूत और भविष्य का भेद समाप्त हो जाता है। वह परम तत्त्व 'सर्व रूप' होने के साथ-साथ 'अनाधार' भी है, जिसका अर्थ है कि वह समस्त आधारों का मूल है, किन्तु स्वयं किसी आधार पर स्थित नहीं है।
यह परम पद इतना सूक्ष्म है कि वह सामान्य जिह्वा और दृष्टि का विषय नहीं हो सकता। प्रचेताओं ने अपने मन को उस निर्गुण और सगुण के मध्य स्थित परम तत्त्व में एकाग्र किया। जल के भीतर रहते हुए, उन्होंने स्थिर चित्त से भगवान् की स्तुति (आराधना) की।
प्रचेताओं द्वारा की गई स्तुति केवल शब्दों का उच्चारण मात्र नहीं थी। यह आंतरिक योग की पराकाष्ठा थी। जब भक्त दस हज़ार वर्षों तक अपने आराध्य में समाहित रहता है, तो उसका चित्त द्वैत भाव से मुक्त होकर परम तत्त्व से एकाकार होने लगता है। इस समाधि की अवस्था में, प्रचेतागण उस परम कल्याणमय रूप को नमस्कार करते हैं, जिसका शासन सम्पूर्ण ईश्वरों के ऊपर है।
भगवान् श्रीहरि का आविर्भाव और वर-प्रदान
जब प्रचेताओं की तपस्या पूर्ण हुई और उनका भक्ति भाव चरम सीमा पर पहुँचा, तब स्वयं भगवान् श्रीहरि, जो यज्ञपुरुष हैं, उन पर प्रसन्न हुए।
भगवान् विष्णु पक्षीराज गरुड़ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुए। उनका यह दिव्य स्वरूप जल के भीतर ही प्रकट हुआ, जहाँ प्रचेतागण तपस्यारत थे। भगवान् की छवि का वर्णन करते हुए शास्त्र कहते हैं कि उनका स्वरूप खिले हुए नील कमल की सी आभा (नील-कमल-आभा) से युक्त था।
कमल का यह प्रतीक अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रचेतागण जल (अर्थात् संसार के मूलाधार) में तपस्या कर रहे थे, और भगवान् उन्हें नील कमल की आभा से युक्त स्वरूप में दर्शन देते हैं। कमल जल में उत्पन्न होकर भी जल से निर्लिप्त रहता है (पद्मपत्रमिव अम्भसा)। यह संकेत देता है कि प्रचेताओं को सृष्टि का कार्य करते हुए भी, सांसारिक आसक्ति और मोह से सदा निर्लिप्त रहना है।
प्रचेताओं ने जब अपने परम आराध्य, गरुड़ पर चढ़े हुए श्री हरि को देखा, तो वे भक्ति भाव के भार से झुक गए। उन्होंने अपने मस्तक झुकाकर, पूर्ण श्रद्धा से उन्हें प्रणाम किया।
तब भगवान् ने उनसे कहा: "मैं तुम्हारी इस निष्ठा और कठोर तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ और तुम्हें वर देने के लिए यहाँ आया हूँ। तुम अपना अभीष्ट वर माँगो।"
प्रचेताओं ने वरदायक श्री हरि को पुनः प्रणाम किया। उन्होंने अपने लिए व्यक्तिगत मोक्ष या परम सिद्धि का वर नहीं माँगा, अपितु अपने पिता प्राचीनबर्हि द्वारा दी गई आज्ञा का स्मरण करते हुए, प्रजा वृद्धि के कार्य को सिद्ध करने के लिए वर निवेदन किया। उन्होंने भगवान् से निवेदन किया कि वे प्रजा को उत्पन्न करने की शक्ति और सामर्थ्य उन्हें प्रदान करें।
यह प्रसंग धार्मिक कर्तव्य-परायणता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है। भगवान् विष्णु उन पर इसलिए प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वे व्यक्तिगत मुक्ति की इच्छा के बजाय, अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व (पित्राज्ञा पालन) को प्राथमिकता देते हैं। यह सिद्ध करता है कि कर्तव्य-परायणता और धर्म-पालन ही भगवत्-प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन हो सकता है।
तदन्तर, भगवान् श्रीहरि ने उन्हें अभीष्ट वर (प्रजापति बनने का और प्रजा वृद्धि करने का आशीर्वाद) प्रदान किया। वरदान देने के उपरान्त, वे तत्काल अंतर्धान हो गए । इसके पश्चात, प्रचेतागण महासागर के जल से बाहर निकल आए।
खंड III: सृष्टि पर वनस्पति का आवरण एवं प्रचेताओं का रोष
पृथ्वी की विकृत दशा और प्रजा का अवरोध
दस हज़ार वर्षों तक प्रचेतागण जल के भीतर तपस्या में लीन रहे। उनकी अनुपस्थिति में, सृष्टि में एक भयंकर असंतुलन उत्पन्न हो गया। प्रचेताओं को सृष्टि के रक्षक और संचालक के रूप में कार्य करना था। उनकी अनुपस्थिति में, कृषि आदि द्वारा किसी प्रकार की रक्षा न होने के कारण, पृथ्वी को वृक्षों ने पूर्ण रूप से ढक लिया।
यह आवरण इतना सघन और व्याप्त था कि प्रजा (मनुष्य तथा अन्य प्राणी) का जीवन ही संकटग्रस्त हो गया। पृथ्वी का धरातल लगभग अदृश्य हो गया और वृक्षों ने आकाश तक को भर दिया था।
इस अत्यधिक वनस्पति के प्रभुत्व का परिणाम यह हुआ कि दस हज़ार वर्ष तक वायु का सामान्य संचार रुक गया। वायु (मरुत) के अवरुद्ध होने से प्रजा (जीवधारी) किसी प्रकार की चेष्टा (गति, कर्म, या प्रजनन) नहीं कर सकी। प्रजा की बहुत अधिक हानि हुई, क्योंकि उनका मार्ग, आवास और जीवन का आधार ही अवरुद्ध हो चुका था।
प्रचेताओं का मूल लक्ष्य प्रजा-वृद्धि था। किन्तु जब वे वरदान प्राप्त कर जल से बाहर आए, तो उन्होंने देखा कि जिस प्रजा को उन्हें बढ़ाना है, उसका अस्तित्व ही प्रकृति के अनियंत्रित अतिरेक (राजसिक अति-वनस्पति) के कारण संकट में है। यह दिखाता है कि तपस्या द्वारा अर्जित आत्मिक बल को, भौतिक सृष्टि के संतुलन के साथ समन्वित करना आवश्यक होता है।
रोष का प्रकटीकरण एवं वृक्षों का संहार
प्रचेतागणों ने इस विकराल दृश्य को देखा। उन्होंने प्रजा के अवरोध और अपने धर्म (प्रजापति का कार्य) के मार्ग में उत्पन्न इस भयंकर संकट को देखकर, अपने तप और योग से प्राप्त तेज को क्रोध के रूप में प्रकट किया। वे अत्यंत क्रोधित हुए।
उन दस तपस्वी राजकुमारों ने रोषपूर्वक अपने मुख से प्रचंड वायु (मरुत) और अग्नि (अनल) का एक संयुक्त और भयंकर प्रवाह उत्सर्जित किया।
यह तेज इतना भयंकर था कि उसने प्रलय का दृश्य उत्पन्न कर दिया। वायु ने वृक्षों को उनकी जड़ों से उखाड़-उखाड़ कर सुखा दिया, और उसी क्षण, प्रचंड अग्नि ने उन सूखे हुए वृक्षों को तत्काल जलाना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार, उस समय वहाँ वृक्षों का भयंकर संहार होने लगा। प्रचेताओं ने अपने योगबल से अर्जित ऊर्जा का उपयोग सृष्टि के बाह्य अवरोधों को दूर करने और कर्म करने योग्य भूमि को पुनः स्थापित करने के लिए किया ।
खंड IV: वृक्षों के अधिपति सोम का हस्तक्षेप और उपदेश
सोम का आगमन और क्रोध-निवृत्ति हेतु आग्रह
जब प्रचेतागणों द्वारा उत्पन्न किया गया वह भयंकर वृक्ष-संहार अपनी चरम सीमा पर पहुँचा और केवल थोड़े-से ही वृक्ष शेष रह गए, तब वृक्षों के अधिपति सोम (चन्द्रमा) वहाँ प्रकट हुए।
सोम, जो स्वयं वनस्पतियों के पालक (औषधीनाम् अधिपतिः) हैं, उन्होंने देखा कि सृष्टि का पोषण-आधार ही नष्ट हो रहा है। उन्होंने तत्काल प्रजापति प्रचेताओं के पास जाकर उनसे अनुरोध किया।
सोम ने उनसे कहा: "हे नृपतिगण! आप तत्काल अपना तीव्र क्रोध शांत कीजिए और मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिए। मैं वृक्षों के साथ आप सभी की मैत्री (संधि) स्थापित करा दूँगा।"
सोम ने उन्हें यह समझाया कि सृष्टि में संहार करना प्रजापतियों का धर्म नहीं है, अपितु संतुलन स्थापित करना और मेल-मिलाप को बढ़ावा देना ही उनका वास्तविक कर्तव्य है। उनका हस्तक्षेप केवल वनस्पति की रक्षा के लिए नहीं था, अपितु सृष्टि के अनिवार्य पोषण तत्त्व (औषधियों, वृक्षों) को विनाश से बचाने के लिए था।
मारिषा कन्या का रहस्योद्घाटन
क्रोध शांत करने के लिए सोम ने प्रचेताओं के सम्मुख एक समाधान प्रस्तुत किया, जो उनके प्रजा-सृष्टि के उद्देश्य को पूर्ण करने वाला था।
सोम ने कहा कि हे नृपतिगण, मैंने भविष्य में होने वाले इस कार्य को पहले से ही जान लिया था। इसी कारण, मैंने वृक्षों से उत्पन्न हुई एक अत्यंत सुंदर, रत्नस्वरूपा कन्या का अपनी अमृतमयी किरणों के द्वारा पालन-पोषण किया है।
सोम ने उस कन्या का परिचय देते हुए बताया कि वह मारिषा नाम से प्रसिद्ध है। उस महाभागा कन्या को विशेष रूप से इसलिए उत्पन्न किया गया है कि वह निश्चित रूप से तुम्हारे वंश को आगे बढ़ाने वाली तुम्हारी धर्मपत्नी बने।
वंश वृद्धि के इस महान् उद्देश्य की सिद्धि के लिए, सोम ने दक्ष प्रजापति के जन्म का सूत्र प्रकट किया। उन्होंने कहा: "मेरे तेज के आधे अंश और तुम्हारे (प्रचेताओं के) पुरुष-तेज के सहयोग से, मारिषा के गर्भ से दक्ष नामक परम विद्वान प्रजापति उत्पन्न होगा ।"
सोम ने यह भी स्पष्ट किया कि यह पुत्र अपने तेजस्वी स्वभाव के कारण अग्नि के समान होगा और वह आगे चलकर प्रजा की महान् वृद्धि करेगा । इस प्रकार, सोम ने यह बताया कि प्रचेताओं को अपना संहार रोकना चाहिए और इस दिव्य कन्या को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि उनका और सोम का संयुक्त सहयोग ही सृष्टि के अगले महान् सृजनकर्ता को जन्म देगा। यह सिद्धांत दैवी सृष्टि में सहयोग और प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों के समन्वय को दर्शाता है।
खंड V: मारिषा के जन्म का विस्तृत पौराणिंक आख्यान (कंडू ऋषि और प्रम्लोचा)
प्रचेताओं को यह समझाने के लिए कि मारिषा का जन्म किस प्रकार अत्यंत विशिष्ट और दैवी सहयोग का परिणाम है, सोम उन्हें पूर्वकाल में हुई एक घटना का वर्णन करते हैं, जिसमें कंडू ऋषि और अप्सरा प्रम्लोचा सम्मिलित थे। यह उप-आख्यान प्रचेताओं की कथा का अनिवार्य भाग है, जो मारिषा की शुद्ध उत्पत्ति को सिद्ध करता है।
कंडू मुनि की तपस्या और इंद्र का हस्तक्षेप
सोम ने बताया कि पूर्वकाल में, वेदों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ कंडू नामक एक मुनीश्वर थे। वे गोमती नदी के अत्यंत मनोहारी और रमणीय तट पर घोर तपस्या में लीन थे।
उनकी इस घोर तपस्या से देवराज इंद्र को भय उत्पन्न हो गया। जैसे कि देवराज की परम्परा रही है, उन्होंने कंडू मुनि के तप को भंग करने के उद्देश्य से प्रम्लोचा नाम की एक अनुपम और उत्तम अप्सरा को नियुक्त किया। वह अप्सरा मृदुहासिनि (मधुर हँसी वाली) थी और उसने अपनी माया और सौंदर्य से उन ऋषिश्रेष्ठ के चित्त को विचलित कर दिया ।
काल-क्षेप और अप्सरा का प्रस्थान
प्रम्लोचा के मोह-पाश में बँधकर, कंडू मुनि का चित्त विषयासक्त हो गया। वे तपस्या से भ्रष्ट होकर, सौ से भी अधिक वर्षों तक मन्दराचल की कन्दराओं में उस अप्सरा के साथ वास करते रहे। यह वासनाजन्य आसक्ति मुनि के काल-ज्ञान और कर्तव्य-ज्ञान को समाप्त कर चुकी थी।
एक दिन, जब अत्यधिक काल व्यतीत हो चुका, उस अप्सरा प्रम्लोचा को अन्ततः स्वर्गलोक के नियत काल का स्मरण हुआ। उसने ऋषि कंडू से कहा: "हे ब्रह्मन! अब मैं अपने निवास स्थान (स्वर्गलोक) को जाना चाहती हूँ, आप कृपा करके मुझे प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा प्रदान कीजिए।"
किन्तु मुनि कंडू उस अप्सरा में इतने आसक्त थे कि वे उसे जाने की आज्ञा नहीं दे पाए। उन्होंने मोहवश बार-बार यही कहा: "भद्रे! अभी कुछ दिन और यहीं ठहरो।"
मुनि के पुनः आग्रह करने पर, उस सुन्दरी ने उनके साथ अगले सौ वर्ष तक और निवास किया। इस दौरान उन्होंने नाना प्रकार के भोगों का उपभोग किया। कुल मिलाकर, कंडू मुनि उस अप्सरा के मोह में सैकड़ों वर्ष तक फँसे रहे। इतने लम्बे काल के बाद भी, जब अप्सरा ने पुनः स्वर्ग जाने की आज्ञा माँगी, तो ऋषि ने यही कहा, "अभी और ठहरो।"
तत्पश्चात, सौ वर्षों से कुछ अधिक समय और बीत जाने पर, मुनि कंडू को अन्ततः अपने कर्तव्य का और अपने भ्रष्ट हुए तप का स्मरण हुआ। उन्हें अपनी गलती का बोध हुआ और उन्होंने अप्सरा को वहाँ से जाने की आज्ञा दी।
मारिषा की अयोनिजा उत्पत्ति
अप्सरा प्रम्लोचा स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान करते हुए आकाश मार्ग में जा रही थी। मुनि के साथ इतने वर्षों तक वास करने, और उनके तेज को धारण करने के कारण, उसका शरीर पसीने (श्वेत) से लथपथ हो गया था। इस तीव्र श्रम के कारण, उसने अपने शरीर के श्रम-जल को वृक्षों के पत्तों से पोंछना चाहा।
यह श्रम-जल वास्तव में कंडू ऋषि के तेज (वीर्य) का निष्कासन था, जो अप्सरा के शरीर से श्वेत के रूप में बाहर निकला।
यह निष्कासित गर्भ-तत्त्व (श्वेत) तत्काल दैवी शक्तियों द्वारा संगृहीत हुआ। वायु (मरुत) ने उस श्रम-जल को एकत्र किया । इसके पश्चात, चन्द्रमा (सोम) ने स्वयं अपनी अमृतमयी किरणों द्वारा इस गर्भ का पालन-पोषण करना आरम्भ कर दिया।
ऋषि के तेज, अप्सरा के दोष, वायु की क्रिया-शक्ति और सोम के पोषण-तत्त्व से संयुक्त होकर, यह गर्भ पूर्ण विकसित हुआ। यह कन्या वृक्षों से उत्पन्न होने के कारण 'रत्नस्वरूपा' और 'अयोनिजा' (बिना माता की योनि से उत्पन्न) कहलाई। इस कन्या का नाम मारिषा पड़ा। सोम ने इस कन्या को विकसित किया और अब प्रचेताओं को सौंपने के लिए लाए थे।
यह उप-कथा सृष्टि में 'दोष मार्जन' के सिद्धांत को स्पष्ट करती है। कंडू ऋषि के तप के भ्रष्ट होने से उत्पन्न हुई अशुद्धि (श्रम-जल) को, प्रकृति के शुद्ध तत्त्वों (वायु और सोम) ने मिलकर धोया और उसे एक शुद्ध, दैवी, सृष्टि-उत्पादक तत्त्व (मारिषा) में परिवर्तित कर दिया। मारिषा का जन्म प्रकृति का शुद्धिकरण था, जिसके द्वारा दक्ष प्रजापति के रूप में नया सृष्टि-चक्र आरम्भ होना था।
मारिषा का पूर्व वृत्तान्त और प्रचेताओं से विवाह
सोम ने मारिषा के अयोनिजा जन्म के रहस्य को बताने के बाद, प्रचेताओं को उसके पूर्व जन्म का वृत्तान्त सुनाया, जिससे उसका महत्त्व और दैवी नियति स्पष्ट हो सके।
मारिषा का पूर्व जन्म एवं विष्णु का वरदान
सोम ने बताया कि यह दिव्य शक्तिमय मारिषा कन्या, जिसे तुमने अब देखा है, यह केवल श्रम-जल से उत्पन्न हुई साधारण स्त्री नहीं है। यह साध्वी पूर्व जन्म में एक राज्य की महारानी थी। किन्तु देवों के प्रकोप के कारण, वह पति और पुत्र दोनों से हीन होकर, अत्यंत व्यथित और विधवा हो गई थी।
अपने इस दुख और वियोग से व्यथित होकर, उस साध्वी ने गहन भक्ति भाव के साथ भगवान् विष्णु की पूजा-अर्चना की और कठोर तपस्या द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। अपनी भक्ति से संतुष्ट होकर, भगवान् विष्णु ने उसे आशीर्वाद प्रदान किया।
भगवान् विष्णु ने उस पति-पुत्र विहीन नारी के मन को प्रसन्न करने के लिए, उसे मनोवांछित वर माँगने का अनुग्रह किया। मारिषा ने तब अपनी आत्मा की deepest इच्छा को प्रकट किया।
मारिषा द्वारा माँगे गए वर इस प्रकार थे:
- उसे जन्म-जन्मान्तर तक सदैव एक परम प्रशंसनीय और सुखकारी पति प्राप्त हो। (यह वर प्रचेताओं के रूप में पूर्ण हुआ।)
- उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो प्रजापति के समान तेजों में और सुयोग्य हो। (यह वर दक्ष प्रजापति के रूप में पूर्ण हुआ।)
- स्वयं के लिए उसने अयोनिजा (योनि से न उत्पन्न होने वाली), अनित्य सौंदर्य की प्रतिमा, कुलीना, तथा असीम गुणवती होने का वर प्राप्त किया।
मारिषा का वर्तमान अयोनिजा जन्म, जो ऋषि के तेज और सोम के पोषण से हुआ था, सीधे-सीधे भगवान् विष्णु द्वारा दिए गए इस वरदान की अचूक पूर्ति थी। यह दिखाता है कि मारिषा का आगमन केवल संयोग नहीं, अपितु सृष्टि-क्रम को आगे बढ़ाने वाली दैवी नियति का परिणाम था। उसका जन्म कर्म, इच्छा और दैवी संकल्प के जटिल समन्वय को दर्शाता है।
सोम का निर्देश, क्रोध की समाप्ति और विवाह
पूर्व जन्म का वृत्तान्त और मारिषा की दैवी प्रकृति का ज्ञान देने के उपरान्त, सोम ने प्रचेताओं को स्पष्ट निर्देश दिया।
सोम ने कहा: "अतः हे प्रचेतागण! यह दिव्य शक्ति संपन्न मारिषा, जो रूप-सुषमा की साक्षात् आकर है, तुम इसका विधिवत वरण करो। तुम इससे विवाह करके, तेजस्वी एवं सुयोग्य संतान (दक्ष) प्राप्त करोगे और इस प्रकार अपनी प्रजा-वृद्धि की मनोकामना को पूर्ण करोगे।"
सोम के इस युक्तिपूर्ण और कल्याणकारी उपदेश से प्रचेतागण पूर्णतः संतुष्ट हो गए। उन्हें अपने क्रोध की निरर्थकता और आगे के कर्तव्य का स्पष्ट ज्ञान हो गया।
प्रचेताओं ने तत्काल अपने मुख से उत्सर्जित होने वाले वायु एवं अग्नि का निश्वसन (उत्सर्जन) रोक दिया। उन्होंने अपना प्रचंड क्रोध शांत किया और वृक्षों के राजा सोम के साथ अपनी मैत्री स्थापित की। इस प्रकार, उन्होंने पुनः वृक्षों के साथ संधि स्थापित कर ली।
क्रोध शांत होने और सोम के मार्गदर्शन से प्रसन्न होकर, प्रचेतागणों ने उस दिव्य कन्या मारिषा के साथ विधिवत विवाह किया।
खंड VII: दक्ष प्रजापति का आविर्भाव और वंश की स्थापना
मारिषा के गर्भ से दक्ष का जन्म
विवाह संस्कार पूर्ण होने के उपरान्त, प्रचेताओं ने अपनी प्रजापति की भूमिका का निर्वहन किया। उन्होंने मारिषा के साथ संयोग किया, और उनके संयुक्त तेज से एक अत्यन्त तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ।
यह पुत्र सोम के कथनानुसार, परम विद्वान और तेजस्वी था, और दक्ष प्रजापति के नाम से विख्यात हुआ। दक्ष अपने तेज के कारण अग्नि के समान था, क्योंकि वह न केवल प्रचेताओं के तप के अंश से उत्पन्न हुआ था, अपितु इसमें सोम (चन्द्रमा) का पोषण-अंश भी विद्यमान था।
दक्ष प्रजापति का आविर्भाव सृष्टि के उस चरण के लिए अत्यंत आवश्यक था, क्योंकि उसने आगे चलकर प्रजा की महान् वृद्धि की और सृष्टि-चक्र को सुचारु रूप से आगे बढ़ाया। प्रचेताओं ने इस प्रकार अपने पिता प्राचीनबर्हि की आज्ञा और भगवान् विष्णु से प्राप्त वरदान को मारिषा के माध्यम से पूर्ण किया।
दक्ष के जन्म का चक्रीय सिद्धांत (पौराणिंक प्रवाहरूपता)
इस बिन्दु पर, श्रोता मैत्रेय मुनि के हृदय में एक महान् दार्शनिक संदेह उत्पन्न होता है, जिसका निवारण करना सृष्टि-चक्र को समझने के लिए अनिवार्य है।
मैत्रेय मुनि ने पराशर जी से पूछा: "हे ब्रह्मन! मैंने शास्त्रों में यह सुना था कि दक्ष प्रजापति का जन्म तो परमपिता ब्रह्माजी के दायें अंगूठे से हुआ था। फिर वे (दक्ष) प्रचेताओं के पुत्र किस प्रकार हो सकते हैं?"
मैत्रेय का संदेह यहीं समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने एक और जटिल प्रश्न किया: "हे मुनिवर! यदि मारिषा सोमदेव की पुत्री (अर्थात् सोम द्वारा पोषित) है, और दक्ष मारिषा का पुत्र है, तो दक्ष सोमदेव का दौहित्र (नाती/धेवता) हुआ। फिर वह दक्ष, सोमदेव का श्वसुर (ससुर) कैसे हुआ? यह एक बड़ा संदेह है।"
श्री पराशर मुनि द्वारा समाधान: श्री पराशरजी ने मैत्रेय के इस संदेह का निवारण किया। उन्होंने समझाया कि हे मैत्रेय! प्राणियों के उत्पत्ति और नाश (सृष्टि की प्रक्रियाएँ) निरंतर प्रवाहरूप से (एक अटूट चक्र के रूप में) हुआ करते हैं। यह सृष्टि चक्रीय है, और काल के विभिन्न विभागों (मन्वन्तरों और कल्पों) में एक ही पद पर स्थित आत्माएँ, भिन्न-भिन्न रूपों में पुनः प्रकट होती हैं।
पराशर मुनि ने कहा कि इस विषय में ऋषियों तथा अन्य दिव्य-दृष्टि (दिव्य-चक्षु) पुरुषों को किसी प्रकार का मोह नहीं होता। ये दक्ष आदि प्रजापति, जो सृष्टि-कर्ता देवता हैं, वे कल्पांतरों में भिन्न-भिन्न रूपों से उत्पन्न होते रहते हैं।
दार्शनिक रूप से, यहाँ यह स्थापित होता है कि दक्ष कोई एक स्थायी व्यक्ति नहीं है, अपितु यह सृष्टि-कर्ता का एक पद है।
| दक्ष प्रजापति | उत्पत्ति (वंश-स्रोत) | सृष्टि काल (मन्वन्तर/कल्प) | निहितार्थ (पौराणिक सिद्धांत) |
|---|---|---|---|
| प्रथम जन्म (आद्य) | ब्रह्माजी के दक्षिण अंगूठे से | स्वायंभुव मन्वन्तर | पद की स्थापना; सृष्टि के प्रथम चरण का प्रतिनिधित्व। |
| द्वितीय जन्म | प्रचेता (पिता) और मारिषा (माता) | वर्तमान कल्प/मन्वन्तर (चाक्षुष मन्वन्तर) | पद की निरंतरता; सृष्टि के पुनर्संयोजन का प्रतीक। |
अतः, स्वायंभुव मन्वन्तर में वे (दक्ष) ब्रह्मा के अंगूठे से जन्मे थे, और वर्तमान काल में वे प्रचेताओं के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। चूँकि सोम सृष्टि के आरंभ से ही विद्यमान हैं, और उनके द्वारा पोषित मारिषा के पुत्र दक्ष ने आगे चलकर सृष्टि का विस्तार किया, जिससे दक्ष को सोम का श्वसुर बनने का अवसर मिला। यह सब काल की अनन्त प्रवाहरूपता के कारण ही संभव हो पाता है। इस सिद्धांत द्वारा, पौराणिक कथाओं में प्रतीत होने वाले विरोधाभास का समाधान किया जाता है।
खंड VIII: निष्कर्ष एवं कथा-माहात्म्य
प्रजापतियों के कर्तव्य की पूर्णता
इस प्रकार, प्रचेताओं की सम्पूर्ण कथा सिद्ध करती है कि धर्म का पालन किस प्रकार परमेश्वर की प्रसन्नता का कारण बनता है। प्रचेतागणों ने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर दस हज़ार वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे उन्होंने भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया। भगवान् ने उन्हें प्रजा-सृष्टि का वरदान दिया।
वरदान प्राप्त करने के बाद, उन्होंने अपने तप से अर्जित बल का उपयोग सृष्टि के असंतुलन (अति-वनस्पति) को दूर करने में किया। सोम के हस्तक्षेप ने उन्हें यह शिक्षा दी कि प्रजापति का कार्य केवल तप या संहार नहीं है, अपितु संतुलन (संधि) और पोषण को बनाए रखना भी है। मारिषा के साथ विवाह करके, उन्होंने न केवल अपने पिता की आज्ञा पूर्ण की, अपितु दक्ष प्रजापति जैसे महान् सृष्टि-कर्ता को जन्म देकर, अगले युग के लिए सृष्टि-प्रवाह को सुनिश्चित किया।
यह कथा स्थापित करती है कि सृष्टि के प्रारम्भिक काल में, भौतिक और आध्यात्मिक सफलता के लिए कर्तव्यपरायणता, तप, और दैवी सहयोग का समन्वय अनिवार्य है।
श्रीविष्णुपुराण चतुर्दश अध्याय की पूर्णता
श्री पराशर मुनि कहते हैं कि हे मैत्रेय! इस प्रकार प्रचेताओं की यह कथा, जिसमें प्राचीनबर्हि की आज्ञा, प्रचेताओं का महान् तप, श्रीहरि का दिव्य दर्शन, वृक्षों का संहार, सोम का युक्तिपूर्ण उपदेश, मारिषा की रहस्यमय उत्पत्ति, और अंततः दक्ष प्रजापति का जन्म समाहित है, यहीं पर पूर्ण होती है।
यह अध्याय भक्तियोग, कर्मयोग और सृष्टि-विज्ञान के महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है, जिसके श्रवण और मनन से साधक को परम ज्ञान की प्राप्ति होती है। जो भी धर्मात्मा पुरुष इस दिव्य आख्यान को श्रद्धापूर्वक सुनता या सुनाता है, वह सृष्टि के जटिल चक्रों और भगवत्-लीला के मर्म को समझकर, समस्त कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है।
यह विवरण श्रीविष्णुपुराण के प्रथम अंश में चतुर्दश अध्याय की कथा को पूर्ण रूप से प्रकाशित करता है।
॥ इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे चतुर्दशोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥






