विस्तृत उत्तर
यह बहुत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण प्रश्न है जो हर माता-पिता को विचारना चाहिए। सीधा उत्तर है — भगवान का 'डर' दिखाना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति 'प्रेम और श्रद्धा' सिखाना सही है।
हिंदू परंपरा में धर्म को डर से नहीं, बल्कि ज्ञान और प्रेम से सिखाने पर जोर दिया गया है। जब बच्चे को कहा जाता है 'झूठ मत बोलो, नहीं तो भगवान सजा देंगे' — यह भय-आधारित संस्कार है जो आगे चलकर धर्म से विमुखता पैदा कर सकता है। बच्चा बड़ा होने पर सोचेगा 'अगर भगवान ही सजा देते हैं तो मैं उनकी पूजा क्यों करूँ?'
इसके स्थान पर बच्चे को भगवान को एक प्रेमपूर्ण मित्र, रक्षक और मार्गदर्शक के रूप में परिचित कराएँ। रामायण में श्रीराम का बालरूप, भागवत में कृष्ण की बाललीला — ये सब बच्चों को भगवान से प्रेम करना सिखाती हैं, डराती नहीं।
व्यावहारिक रूप से, जब बच्चा गलत काम करे तो उसे यह बताएँ कि 'भगवान देख रहे हैं और वे चाहते हैं कि तुम अच्छे काम करो' — यह सकारात्मक प्रेरणा है। डर की जगह जिम्मेदारी की भावना जागृत करें।
हिंदू परंपरा में कहा गया है कि भगवान वात्सल्यमय हैं — माता-पिता से भी अधिक प्रेम करने वाले। यही भाव बच्चे में बचपन से भरा जाए तो धर्म जीवनभर उसके साथ रहेगा।





