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षोडश संस्कार📜 पारस्कर गृह्यसूत्र, आश्वलायन गृह्यसूत्र, मनुस्मृति2 मिनट पठन

निष्क्रमण संस्कार कब करना चाहिए

संक्षिप्त उत्तर

निष्क्रमण = शिशु को पहली बार बाहर ले जाने का संस्कार। कब: जन्म के चौथे मास में, शुभ तिथि। विधि: स्नान-नए वस्त्र → सूर्य दर्शन ('तच्चक्षुर्देवहितम्') → मन्दिर दर्शन → गुरुजनों से आशीर्वाद। चौथा मास = शिशु कुछ सबल। तेज और शीतलता प्राप्ति हेतु।

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विस्तृत उत्तर

निष्क्रमण संस्कार षोडश संस्कारों में एक है। 'निष्क्रमण' = बाहर निकलना। यह शिशु को पहली बार घर से बाहर ले जाने का संस्कार है।

कब करें

  • जन्म के चौथे मास (4 महीने) में।
  • कुछ गृह्यसूत्रों में तीसरे मास का भी विधान है।
  • शुभ नक्षत्र और तिथि में।
  • शुक्ल पक्ष श्रेष्ठ।

क्यों चौथा मास

जन्म के बाद पहले तीन-चार मास शिशु अत्यन्त कोमल होता है। इस अवधि में उसे बाहरी वातावरण (धूप, हवा, धूल) से बचाया जाता है। चौथे मास में शिशु कुछ सबल हो जाता है, तब उसे सूर्य और चन्द्र का दर्शन कराया जाता है।

विधि

  1. 1शुभ दिन शिशु को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाएँ।
  2. 2गणपति पूजन और शिशु की रक्षा हेतु प्रार्थना।
  3. 3पिता या परिवार का मुखिया शिशु को गोद में लेकर घर से बाहर ले जाए।
  4. 4सूर्य दर्शन: शिशु को सूर्य के दर्शन कराएँ — 'तच्चक्षुर्देवहितम्...' (सूर्य मंत्र)।
  5. 5चन्द्र दर्शन: रात्रि में चन्द्रमा दिखाएँ (कुछ परम्पराओं में)।
  6. 6मन्दिर दर्शन: शिशु को मन्दिर ले जाकर इष्टदेव के दर्शन कराएँ।
  7. 7गुरुजनों, सम्बन्धियों से आशीर्वाद।

भावना

शिशु का बाहरी जगत से प्रथम परिचय। सूर्य (तेज, स्वास्थ्य) और चन्द्र (शीतलता, मन) के दर्शन — शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास हेतु।

आधुनिक सन्दर्भ

आज भी कई परिवारों में शिशु को 3-4 मास तक बाहर न ले जाने और फिर मन्दिर दर्शन कराने की प्रथा प्रचलित है — यही निष्क्रमण की भावना है।

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शास्त्रीय स्रोत
पारस्कर गृह्यसूत्र, आश्वलायन गृह्यसूत्र, मनुस्मृति
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