विस्तृत उत्तर
जातकर्म षोडश संस्कारों में चतुर्थ संस्कार है, जो शिशु के जन्म के तुरन्त बाद किया जाता है।
कब करें
- ▸शिशु के जन्म के तुरन्त बाद — नाभिनाल (गर्भनाल) काटने से पूर्व या तुरन्त बाद।
- ▸आदर्श: जन्म के दिन ही।
- ▸यदि सम्भव न हो तो 10 दिन के भीतर (सूतक काल पूर्ण होने तक)।
कैसे करें (विधि)
1मधु-घृत प्राशन (प्रमुख कर्म)
- ▸सोने की शलाका (या चम्मच) से शिशु को शहद और घी (गाय का) चटाएँ।
- ▸मंत्र: 'ॐ भूस्त्वयि दधामि, ॐ भुवस्त्वयि दधामि, ॐ स्वस्त्वयि दधामि।'
- ▸भावना: शिशु को मेधा (बुद्धि), आयु, और बल प्रदान।
2मेधा जनन
- ▸'मेधां ते देवः सविता, मेधां देवी सरस्वती, मेधां ते अश्विनावुभौ...' — मेधा सूक्त का पाठ।
- ▸शिशु के कान में वैदिक मंत्र पढ़ें।
3आयुष्य कर्म
- ▸शिशु की दीर्घायु हेतु प्रार्थना।
4स्तनपान
- ▸'ॐ सरस्वत्यै नमः' बोलकर माता शिशु को पहला स्तनपान कराए।
5पिता द्वारा
- ▸पिता शिशु का मुख देखे और मंत्र पढ़े।
- ▸नक्षत्र/जन्म कुण्डली बनवाएँ।
आधुनिक सन्दर्भ
आज अस्पताल में प्रसव होने के कारण यह संस्कार प्रायः सरल रूप में किया जाता है — पिता शिशु को देखकर मंत्र पढ़े, शहद-घी (चिकित्सक की अनुमति से) चटाएँ, और गुरुजनों का आशीर्वाद लें।
ध्यान दें: शहद शिशु को चिकित्सक की सलाह से ही दें — आधुनिक चिकित्सा में नवजात को शहद न देने की सलाह दी जाती है। परम्परा और चिकित्सा दोनों का सम्मान करें।





