रामनवमी: मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव की शास्त्रसम्मत पूजा-विधि एवं व्रत-विधान
सनातन धर्म के विस्तृत, गहन और प्राचीन वाङ्मय में अवतारवाद का अत्यंत गूढ़, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विवेचन प्राप्त होता है। इसी गौरवशाली शृंखला में, वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में, अखिल ब्रह्माण्ड नायक, परब्रह्म स्वरूप भगवान श्रीहरि विष्णु ने धर्म की ग्लानि को मिटाने, आसुरी शक्तियों का विनाश करने और मानव मात्र के लिए मर्यादाओं की शाश्वत स्थापना हेतु अयोध्या के सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) में महाराज दशरथ और माता कौशल्या के पुत्र के रूप में अवतार ग्रहण किया। महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण', 'अगस्त्य संहिता', 'ब्रह्म पुराण', 'स्कन्द पुराण' (विशेषकर अयोध्या माहात्म्य), 'अग्नि पुराण' तथा धर्मशास्त्र के सर्वाधिक प्रामाणिक निबन्ध-ग्रंथों जैसे 'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु' एवं हेमाद्रि कृत 'चतुर्वर्ग चिन्तामणि' में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पावन जन्मोत्सव—'रामनवमी'—का अत्यंत सूक्ष्म, विस्तृत और शास्त्रसम्मत विधान प्राप्त होता है।
प्रस्तुत शोध-पत्र रामनवमी के व्रत-विधान, अनुष्ठान की बारीकियों, षोडशोपचार पूजन-पद्धति, मध्याह्न जन्मोत्सव के खगोलीय व आध्यात्मिक महत्त्व, शास्त्रोक्त मंत्रों के अर्थ एवं उनके तांत्रिक प्रयोग, नैवेद्य-समर्पण, दान-प्रक्रिया और फल-श्रुति का अत्यंत गहन, तार्किक और विशुद्ध शास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन विशुद्ध रूप से पारंपरिक विद्वानों, आगम-शास्त्रों और स्मृति-ग्रंथों के संदर्भों पर आधारित है, ताकि रामोपासना का कोई भी महत्त्वपूर्ण और गूढ़ पक्ष अछूता न रहे।
अवतार की खगोलीय एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीराम का अवतरण केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, अपितु यह खगोलीय और पारलौकिक शक्तियों के पूर्ण संतुलन का क्षण है। महर्षि वाल्मीकि ने 'बालकाण्ड' (1.18.8-10) में श्रीराम के जन्म का अत्यंत सटीक खगोलीय विवरण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, अदिति के देवता वाले पुनर्वसु नक्षत्र में, कर्क लग्न में, जब सूर्य सहित पाँच ग्रह (सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र, और शनि) अपनी उच्च अवस्था (Exaltation) में विद्यमान थे, तब साक्षात् परब्रह्म ने कौशल्या के गर्भ से स्वयं को प्रकट किया।
शास्त्रों में इस दिन को 'रामनवमी' के नाम से अभिहित किया गया है, जो 'वसंत नवरात्रि' (चैत्र नवरात्रि) का अंतिम दिन भी होता है। 'ब्रह्म पुराण' (अध्याय 223) श्रीराम को एक आदर्श राजा (मर्यादा पुरुषोत्तम) के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिनके राज्य (रामराज्य) में किसी भी प्रकार का अशुभ शब्द नहीं सुनाई देता था और न ही कोई प्रतिकूल वायु बहती थी । इस प्रकार, रामनवमी केवल एक जन्म-दिवस नहीं है, बल्कि यह धर्म, न्याय, सत्य और मर्यादा के भूतल पर अवतरण का महापर्व है。
रामनवमी व्रत की शास्त्रीय प्रकृति, प्रकार एवं अधिकार
सनातन धर्म में व्रतों का विधान केवल शारीरिक तपस्या नहीं है, अपितु यह चेतना के ऊर्ध्वारोहण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। रामनवमी का व्रत हिंदू धर्म के सबसे महत्त्वपूर्ण और फलदायी व्रतों में से एक माना गया है। पंडित कमलाकर भट्ट रचित 'निर्णयसिन्धु', हेमाद्रि के 'चतुर्वर्ग चिन्तामणि', माधवाचार्य के 'कालमाधव' तथा 'धर्मसिन्धु' में रामनवमी व्रत की प्रकृति और पात्रता का अत्यंत तार्किक और प्रमाण-पुष्ट विवेचन किया गया है।
व्रत की त्रिविध प्रकृति: नित्य, काम्य और नैमित्तिक
शास्त्रों और व्रत-ग्रंथों के अनुसार रामनवमी का व्रत त्रिविध प्रकृति का होता है, जिसे साधक अपनी भावना और संकल्प के अनुसार धारण करता है:
| व्रत की प्रकृति | शास्त्रीय व्याख्या एवं उद्देश्य |
|---|---|
| नित्य व्रत (Continual) | जो वैष्णव अथवा राम-भक्त हैं, उनके लिए यह व्रत जीवनपर्यंत (आजीवन) नित्य कर्म के रूप में अनिवार्य है। इसे बिना किसी सकाम इच्छा या स्वार्थ के, केवल भगवत्प्रीति और आत्म-शुद्धि के लिए किया जाता है। शास्त्रों का मत है कि नित्य व्रत का लोप करने से प्रत्यवाय (दोष) लगता है। |
| काम्य व्रत (Desirable) | जो लोग किसी विशिष्ट भौतिक या आध्यात्मिक मनोकामना—जैसे पुत्र-प्राप्ति, धन-समृद्धि, रोग-मुक्ति, शत्रु-नाश अथवा मोक्ष—की पूर्ति के उद्देश्य से यह व्रत करते हैं, उनके लिए यह काम्य व्रत कहलाता है। 'अगस्त्य संहिता' के अनुसार यह सर्वकामफलप्रद है। |
| नैमित्तिक व्रत (Casual) | जो व्यक्ति आजीवन व्रत का संकल्प नहीं लेते, किंतु चैत्र शुक्ल नवमी के विशिष्ट पर्व (निमित्त) के उपस्थित होने पर श्रद्धावश व्रत करते हैं, वह नैमित्तिक व्रत की श्रेणी में आता है। |
'अगस्त्य संहिता' तथा 'निर्णयसिन्धु' इस बात का स्पष्ट रूप से उद्घोष करते हैं कि रामनवमी का व्रत नित्य और काम्य—दोनों ही रूपों में सभी मनुष्यों के लिए करणीय है। 'अगस्त्य संहिता' (अध्याय 16, श्लोक 15-16) इस व्रत की अनिवार्यता पर बल देते हुए कहती है कि जो व्यक्ति रामनवमी का व्रत नहीं करता, उसके वर्ष भर के अन्य सभी व्रत पूर्णतः निष्फल हो जाते हैं: अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वोत्तमोत्तम्... व्रतान्यन्यानि कुरुते न तेषां फलभाग् भवेत्। सर्वव्रतस्य प्रीत्यर्थमिदं श्रीरामव्रतं चरेत्। (अर्थात्: सर्वोत्तमोत्तम रामनवमी व्रत को न करके जो अन्य व्रत करता है, वह उन व्रतों का फलभागी नहीं होता। अतः संपूर्ण व्रतों की पूर्णता और भगवान की प्रीति के लिए यह व्रत अवश्य करना चाहिए।)
व्रत का अधिकार (Eligibility)
अनेक व्रतों में वर्ण या आश्रम का भेद होता है, किंतु 'अग्नि पुराण', 'स्कन्द पुराण' और 'अगस्त्य संहिता' के स्पष्ट निर्देशानुसार रामनवमी का व्रत सार्वभौमिक है। प्रत्येक मनुष्य—चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र; चाहे वह ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी; स्त्री हो या पुरुष—इस व्रत को करने का पूर्ण अधिकारी है। भगवान श्रीराम ने स्वयं शबरी, निषादराज और वानरों को अपनाकर यह सिद्ध किया था कि राम-भक्ति में केवल निर्मल प्रेम की आवश्यकता होती है, जाति या कुल की नहीं।
व्रत-पूर्व की शास्त्रीय तैयारी, नियम एवं निषेध
रामनवमी के व्रत की पूर्णता, शुचिता और पवित्रता के लिए धर्मशास्त्र व्रत से एक दिन पूर्व (अष्टमी तिथि की संध्या) से ही यम-नियमों के कड़ाई से पालन का निर्देश देते हैं। व्रत का अर्थ ही है 'संकल्पपूर्वक नियमों से बंधना'。
अष्टयाम (आठ प्रहर) का अखंड उपवास
रामनवमी के व्रत को 'अष्ट प्रहर' (Eight Prahar) का व्रत कहा गया है। हिंदू काल-गणना में एक दिन-रात में आठ प्रहर (लगभग 3-3 घंटे का एक प्रहर) होते हैं। इसका अर्थ यह है कि रामनवमी का उपवास नवमी तिथि के सूर्योदय से प्रारंभ होकर अगले दिन दशमी तिथि के सूर्योदय तक चलता है。
व्रत के प्रकार एवं सात्त्विक आहार के नियम
साधक के शारीरिक सामर्थ्य, आयु, और स्वास्थ्य के आधार पर व्रत के तीन मुख्य प्रकार शास्त्रों में स्वीकृत किए गए हैं:
| व्रत का स्वरूप | विवरण एवं आहार नियम |
|---|---|
| निर्जला उपवास (Nirjala Vrat) | यह व्रत का सबसे कठोर रूप है, जिसमें नवमी के सूर्योदय से लेकर दशमी के सूर्योदय तक अन्न और जल दोनों का पूर्णतः त्याग किया जाता है। इसे सर्वोच्च कोटि का तप माना गया है। |
| फलाहारी उपवास (Phalahari Vrat) | शारीरिक रूप से अक्षम, वृद्ध अथवा बालकों के लिए यह विधान है कि वे केवल फल, दूध, दही, और मेवों (Nuts) का सेवन करके इस व्रत को धारण करें। |
| एकभुक्त / सात्त्विक आहार (Sattvik Meal) | यदि उपर्युक्त दोनों विधियाँ संभव न हों, तो दिन में एक बार (सामान्यतः मध्याह्न पूजा या संध्या आरती के पश्चात्) सात्त्विक आहार ग्रहण करने का विधान है। इसमें कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, आलू और सेंधा नमक मान्य हैं। |
शास्त्रोक्त निषेध (Strict Prohibitions)
'अग्नि पुराण' (अध्याय 175.12) स्पष्ट निर्देश देता है कि व्रती को व्रत के दौरान कुछ विशिष्ट पदार्थों और आचरणों का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए:
- आहार निषेध: क्षार (खट्टे पदार्थ), लवण (समुद्री नमक), क्षौद्र (शहद), प्याज, लहसुन, तामसिक अन्न, तथा किसी भी प्रकार के मांस-मदिरा का सेवन सर्वथा वर्जित है।
- आचरण निषेध: व्रती को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, ईर्ष्या, और असत्य भाषण का त्याग करना अनिवार्य है। किसी की निंदा करना, व्यर्थ का प्रलाप करना, और दुर्जनों की संगति करना निषिद्ध है। व्रत के दिन दिन में शयन करना (सोना) वर्जित है; साधक को अपना संपूर्ण समय राम-नाम के जप और शास्त्रों के स्वाध्याय में व्यतीत करना चाहिए।
प्रातःकालीन स्नान, वैदिक संकल्प एवं देव-आवाहन
नवमी के पावन दिन व्रती को 'ब्रह्म मुहूर्त' (सूर्योदय से लगभग 1 घंटा 36 मिनट पूर्व का समय) में शय्या त्याग देनी चाहिए। यह समय सत्त्व गुण की प्रधानता का होता है, जिसमें देवी-देवता पृथ्वी पर सक्रिय रहते हैं。
शुद्धि और स्नान-विधि
सर्वप्रथम घर और पूजा-स्थल की भली-भांति सफाई करनी चाहिए। जल में नमक और फिटकरी (Alum) मिलाकर पोंछा लगाना और संपूर्ण घर में गंगाजल छिड़कना वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करता है। इसके पश्चात् साधक को तीर्थ-जल (गंगा, यमुना, गोदावरी आदि) अथवा सामान्य जल में गंगाजल और कुछ गुलाब की पंखुड़ियाँ मिलाकर स्नान करना चाहिए। स्नान करते समय तीर्थों का मानसिक आवाहन करने से बाह्य शुद्धि के साथ-साथ आभ्यंतर (भीतरी) शुद्धि भी होती है। स्नान के पश्चात् साधक को शुद्ध, धुले हुए और पारंपरिक वस्त्र धारण करने चाहिए। पीले, केसरिया (Saffron) अथवा श्वेत रंग के वस्त्र भगवान विष्णु और श्रीराम को अत्यंत प्रिय हैं, अतः इन्हीं रंगों के वस्त्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए ।
वैदिक संकल्प-विधान
सनातन धर्म के कर्मकांड विज्ञान में किसी भी वैदिक अनुष्ठान, व्रत या पूजा का मूल उसका 'संकल्प' है। वेदों के अनुसार संपूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान नारायण के एक संकल्प मात्र से उत्पन्न हुआ है। व्यावहारिक दृष्टि से संकल्प एक दृढ़ मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रतिज्ञा है, जो साधक के मन, शरीर और आत्मा को एक विशिष्ट लक्ष्य की ओर केंद्रित करती है। संकल्प के बिना किया गया कर्म दिशाहीन माना जाता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता。
संकल्प की विधि: व्रती पूर्वाभिमुख (पूर्व की ओर मुख करके) या उत्तराभिमुख होकर आसन पर बैठे। पद्मासन या सुखासन में बैठकर, दाहिने हाथ की हथेली में थोड़ा सा जल, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), पुष्प, और एक द्रव्य (सिक्का) ले। इसके पश्चात् देश-काल का स्मरण करते हुए (अर्थात वर्तमान कल्प, मन्वन्तर, युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि और अपने गोत्र व नाम का उच्चारण करते हुए) व्रत का संकल्प लिया जाता है。
शास्त्रोक्त रामनवमी संकल्प वाक्य:
मम सकुटुम्बस्य क्षेमसिद्ध्यर्थं (अथवा श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फल-प्राप्त्यर्थं) श्रीसीतारामचन्द्र प्रीत्यर्थं रामनवमी व्रतमहं करिष्ये।
(अर्थ: मैं अपने सपरिवार के कल्याण हेतु, समस्त विघ्नों के नाश हेतु, और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचन्द्र की अहैतुकी प्रीति प्राप्त करने हेतु रामनवमी के इस पवित्र व्रत का संकल्प लेता हूँ।)
संकल्प वाक्य पढ़ने के उपरांत "ॐ श्री रामाय नमः" का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ के जल को पृथ्वी पर अथवा किसी ताम्र-पात्र में छोड़ देना चाहिए。
मंडप-सज्जा एवं 'राम दरबार' स्थापना
पूजन के लिए घर के ईशान कोण (North-East direction) का चयन करना सर्वोत्तम माना गया है, क्योंकि वास्तु शास्त्र के अनुसार यह दिशा देव-शक्तियों के अवतरण की दिशा है。
- वेदी निर्माण: एक शुद्ध लकड़ी की चौकी (पीठ) पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। उस पर चंदन या कुमकुम से अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाला कमल) बनाएं।
- कलश स्थापना: हिंदू धर्म में कलश संपूर्ण ब्रह्माण्ड और वरुण देव का प्रतीक है। चौकी के एक ओर कलश स्थापित करें, जिसमें शुद्ध जल, गंगाजल, सिक्का, सुपारी, और सर्वौषधि डालें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पल्लव (पत्ते) रखें और उसके ऊपर एक जटा-युक्त नारियल लाल कपड़े में लपेटकर स्थापित करें।
- प्रतिमा स्थापना: चौकी के मध्य में भगवान श्रीराम के 'राम दरबार' (जिसमें मध्य में श्रीराम, उनके वाम भाग में माता सीता, दक्षिण भाग में भ्राता लक्ष्मण, और चरणों में सेवक शिरोमणि हनुमान जी विराजमान हों) की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें। यदि घर में शालिग्राम शिला हो, तो उन्हें भी श्रीराम का साक्षात् स्वरूप मानकर स्थापित किया जा सकता है।
भगवान श्रीराम का विस्तृत षोडशोपचार पूजन-विधान
'रामार्चनचन्द्रिका' (परमहंस मुकुंदवन के शिष्य स्वामी आनंदवन द्वारा रचित) और 'अगस्त्य संहिता' (महर्षि अगस्त्य और सुतीक्ष्ण मुनि का संवाद) श्रीराम की वैधी उपासना के अत्यंत गूढ़ और प्रामाणिक आगम-ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों के अनुसार रामनवमी के दिन भगवान का पूजन 'षोडशोपचार' (सोलह प्रकार के राजोपचारों) विधि से किया जाना चाहिए।
16 उपचार पूर्णता की 16 कलाओं के प्रतीक हैं। प्रत्येक उपचार का एक विशिष्ट वैदिक/पौराणिक मंत्र है और उसका एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यहाँ 'अगस्त्य संहिता' और 'धर्मसिन्धु' में वर्णित षोडशोपचार पूजन का क्रमिक विवरण प्रस्तुत है:
1. ध्यानम् (Meditation and Visualization)
पूजन का आरंभ भगवान के निर्गुण निराकार स्वरूप को सगुण साकार रूप में मन के भीतर स्थिर करने से होता है।
मंत्र: कोमलाक्षं विशालाक्षमिन्द्रनील समप्रभम्। दक्षिणांगे दशरथं पुत्रवेक्षणतत्परम्॥ पृष्ठतो लक्ष्मणं देवं सच्छत्रं कनकप्रभम्। पार्श्वे भरत शत्रुघ्नौ तालवृन्तकरवुभौ। अग्रेव्यग्रं हनुमन्तं रामानुग्रह कांक्षिणम्॥
अर्थ एवं भावना: जिनके नेत्र कोमल और विशाल हैं, जिनकी कांति इन्द्रनीलमणि (Sapphire) के समान नीली है। जिनके दाहिनी ओर महाराज दशरथ पुत्र को निहार रहे हैं, पीछे स्वर्ण के समान आभा वाले लक्ष्मण छत्र लिए खड़े हैं, पार्श्व में भरत और शत्रुघ्न चंवर (पंखा) डुला रहे हैं, और आगे भक्त हनुमान श्रीराम की कृपा की आकांक्षा लिए तत्पर बैठे हैं। ऐसे दिव्य 'राम दरबार' का मैं ध्यान करता हूँ।
2. आवाहनम् (Invocation)
मंत्र: आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं प्रभुम्... श्री सीता सहित श्री रामचन्द्रं सांगं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकं आवाहयामि॥
विधि: दोनों हाथों की अंजलि को जोड़कर, अंगूठों को भीतर की ओर मोड़कर 'आवाहन मुद्रा' (Aavahan Mudra) प्रदर्शित करते हुए भगवान को अपने निवास में पधारने के लिए आमंत्रित करें। इसका अर्थ है कि हे जानकीनाथ, आप अपने संपूर्ण परिवार, शक्ति और आयुधों सहित यहाँ पधारें।
3. आसनम् (Offering the Royal Seat)
मंत्र: राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते। रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो॥
विधि: भगवान श्रीराम त्रिलोकी के नाथ हैं, अतः उन्हें अंजलि में पाँच पुष्प लेकर मानसिक रूप से रत्नों से जटित स्वर्ण सिंहासन प्रस्तुत करें और वे पुष्प मूर्ति के समक्ष रख दें।
4. पाद्यम् (Washing the Feet)
मंत्र: त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक। पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन॥
विधि: यात्रा करके आए हुए अतिथि के चरण पखारने की भारतीय परंपरा है। आचमनी से थोड़ा जल भगवान के चरणों के निमित्त ताम्र-पात्र में अर्पित करें। यह अहंकार के त्याग का प्रतीक है।
5. अर्घ्यम् (Offering Water for the Head)
मंत्र: परिपूर्ण परानन्द नमो रामाय वेधसे। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन॥
विधि: अर्घ्य पात्र से शुद्ध जल, चंदन, और पुष्प मिश्रित जल भगवान के सिर (मस्तक) के अभिषेक हेतु अर्पित करें। यह सम्मान का सूचक है।
6. आचमनीयम् (Water for Sipping)
मंत्र: नमः सत्याय शुद्धाय नित्याय ज्ञानरूपिणे। गृहाणाचमनं राम सर्व लोकैक नायक॥
विधि: मुख शुद्धि के लिए भगवान के मुख के समीप आचमनी से जल अर्पित करें।
7. मधुपर्क (Offering the Divine Mixture)
मंत्र: ब्रह्माण्डोदर मध्यस्थैस्थितैश्च रघुनन्दन। स्नापयिष्याम्यहं भक्त्या त्वं प्रसीद जनार्दन॥
विधि: प्राचीन काल में विशिष्ट अतिथियों के सत्कार हेतु दूध और शहद का मिश्रण दिया जाता था। इसे मधुपर्क कहते हैं। इसे भगवान को अर्पित करें।
8. पञ्चामृत स्नान (The Sacred Bath)
विधि: यदि भगवान श्रीराम की धातु की मूर्ति या शालिग्राम शिला हो, तो उन्हें एक बड़े पात्र में रखकर पंचामृत (गाय का कच्चा दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, और शर्करा) से क्रमबद्ध अभिषेक करें। इसके पश्चात् 'गंगोदक' (गंगाजल) से शुद्धोदक स्नान कराकर मूर्ति को स्वच्छ वस्त्र से पोंछें।
9. वस्त्रम् (Offering Garments)
मंत्र: तप्त कांचन संकाशं पीताम्बरं इदं हरे। त्वं गृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते॥
विधि: भगवान को तपाए हुए स्वर्ण के समान आभा वाले पीले वस्त्र (पीताम्बर) अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें नूतन वस्त्र अथवा उसके प्रतीक रूप में कलावा (मौली / Moli) अर्पित करें।
10. यज्ञोपवीत (The Sacred Thread)
मंत्र: ॐ श्री रामचन्द्राय नमः। यज्ञोपवीतं समर्पयामि॥
विधि: भगवान को सूत का पवित्र जनेऊ (यज्ञोपवीत) पहनाएं । यह उनके ब्राह्मणत्व-रक्षक और धर्म-स्थापक स्वरूप का सम्मान है।
11. गन्ध एवं लेपन (Offering Sandalwood Paste)
मंत्र: कुंकुमागरु कस्तूरी कर्पूरन्मिश्रचन्दनम्। तुभ्यं दास्यामि राजेन्द्र श्री राम स्वीकुरु प्रभो॥
विधि: कुमकुम, अगरु, कस्तूरी, और कपूर मिश्रित अष्टगंध या मलयगिरि चंदन का लेप भगवान के मस्तक पर तिलक के रूप में लगाएं ।
12. अङ्गपूजा एवं पुष्प (Worshipping Body Parts with Flowers)
मंत्र एवं विधि: बाएँ हाथ में पुष्प, चंदन और अक्षत लेकर, दाहिने हाथ से भगवान के विभिन्न अंगों का मानसिक चिंतन करते हुए उन्हें अर्पित करें। शास्त्र इसके लिए विशिष्ट मंत्र देते हैं:
- ॐ रामचन्द्राय नमः (कहकर चरणों में पुष्प दें)
- ॐ राजीवलोचनाय नमः (कहकर नेत्रों का ध्यान करें)
इस प्रकार गुल्फ (टखने), जानु (घुटने), कटि, नाभि, हृदय, कंठ, और बाहुओं की पूजा की जाती है । भगवान को कमल के पुष्प और तुलसी दल अत्यंत प्रिय हैं।
13. धूपम् (Offering Incense)
मंत्र: वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः। रामचन्द्र महीपालो धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
विधि: वनस्पतियों के उत्तम रस से बनी सुगंधित धूप (Incense) प्रज्वलित कर भगवान के समक्ष दिखाएं। धूप हमारी वासनाओं के भस्म होने और जीवन के सुवासित होने का प्रतीक है。
14. दीपम् (Offering the Lamp)
मंत्र: साज्यं त्रिवर्ति संयुक्तं वह्निना योजितं मया। गृहाण मंगलं दीपं त्रैलोक्य तिमिरापहम्॥
विधि: शुद्ध गाय के घी में रुई की बत्ती लगाकर प्रज्वलित करें और भगवान को आरती के रूप में दिखाएं। दीप अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने का प्रतीक है。
15. नैवेद्यम् (Offering Food / Bhog)
मंत्र: इदं दिव्यान्नममृतं रसैः षड्भिः समन्वितम्। रामचन्द्रेश नैवेद्यं सीतेश प्रतिगृह्यताम्॥
विधि: षडरस युक्त, सात्त्विक दिव्य अन्न, मिष्ठान्न एवं फल भगवान को भोग स्वरूप अर्पण करें। नैवेद्य के साथ आचमन के लिए जल अवश्य दें। (नैवेद्य के विशिष्ट पदार्थों का वर्णन आगे किया गया है)।
16. ताम्बूल एवं नीराजन / आरती (Betel Leaf & Final Aarti)
मंत्र: मंगलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे। संगृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते॥
विधि: अंत में मुख-वास के लिए पान का पत्ता (जिसमें लौंग, इलायची और सुपारी हो) अर्पित करें और दक्षिणा (सुवर्ण पुष्प) चढ़ाएं। इसके पश्चात् कर्पूर या दीपकों से भगवान की भव्य आरती (नीराजन) उतारें।
परिक्रमा और पुष्पांजलि: आरती के पश्चात खड़े होकर अपने ही स्थान पर गोल घूमकर प्रदक्षिणा (Circumambulation) करें (यानि कानि च पापानि... मंत्र के साथ) और अंजलि में फूल लेकर 'मंत्र पुष्पांजलि' अर्पित करें।
मध्याह्न काल: श्रीराम जन्मोत्सव का विशेष और गुह्य विधान
रामनवमी का सबसे महत्त्वपूर्ण, जाग्रत और भावपूर्ण समय 'मध्याह्न काल' (Midday) होता है। धर्मशास्त्रों, 'ब्रह्म पुराण' और 'अगस्त्य संहिता' के अनुसार, भगवान श्रीराम का अवतरण चैत्र शुक्ल नवमी को दिन के ठीक मध्य भाग में हुआ था。
खगोलीय मुहूर्त का गणितीय विश्लेषण
हिंदू काल-गणना के अनुसार, सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के समय (दिनमान) के ठीक मध्य भाग को 'मध्याह्न' कहा जाता है। यह काल लगभग 6 घटी (Ghatis) अर्थात् 2 घंटे 24 मिनट तक व्याप्त रहता है। इसी मध्याह्न के ठीक मध्य-बिंदु (Mid-point) को 'अभिजित मुहूर्त' कहा जाता है, जिसमें भगवान का अवतरण हुआ। चूँकि विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर सूर्योदय का समय भिन्न होता है, इसलिए यह समय 12:00 बजे न होकर, स्थानीय समयानुसार पूर्वाह्न 11:00 बजे से अपराह्न 01:30 बजे के मध्य आता है。
इस समय खगोलीय स्थिति अत्यंत विशिष्ट होती है। जन्म के समय मेष राशि का सूर्य अपने उच्चतम बिंदु पर (Midheaven) होता है, जो सूर्यवंश की कीर्ति के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है。
जन्म के समय किए जाने वाले विशिष्ट अनुष्ठान
ठीक मध्याह्न काल में जब जन्मोत्सव का क्षण आता है, तब मंदिरों और गृह-मण्डपों में अतीव उल्लास के साथ निम्नलिखित अनुष्ठान किए जाते हैं:
- शंख और वाद्य यंत्रों का निनाद: अज्ञान रुपी निद्रा को भंग करने और देव-शक्तियों को जाग्रत करने के लिए शंख, घंटी, घड़ियाल और नगाड़े बजाए जाते हैं।
- पालना (Cradle) झूलाना: भगवान के बाल स्वरूप (रामलला) की धातु या मिट्टी की प्रतिमा को एक सुसज्जित पालने में विराजमान कर श्रद्धापूर्वक झुलाया जाता है। यह वात्सल्य भाव की चरम परिणति है।
- 'भए प्रगट कृपाला' का गान: गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'श्री रामचरितमानस' के बालकांड की प्रसिद्ध और भावपूर्ण स्तुति का सस्वर गायन किया जाता है:
भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
(अर्थ: माता कौशल्या का हित करने वाले, दीनों पर दया करने वाले कृपालु भगवान प्रकट हुए। उनके अद्भुत रूप (नीले मेघ के समान शरीर, चार भुजाओं में आयुध, वनमाला) को देखकर माता हर्षित हो उठीं।)
- जन्मोत्सव की महा-आरती: मध्याह्न काल में भगवान की एक विशिष्ट महा-आरती उतारी जाती है, जो इस बात की उद्घोषणा करती है कि अंधकार का नाश करने वाले प्रकाश (राम) का आगमन हो चुका है।
विशिष्ट मंत्र-विधान: अर्थ, तांत्रिक प्रयोग एवं शास्त्रीय महत्त्व
रामनवमी के दिन मंत्र-जप का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा अनंत गुना अधिक होता है। 'राम' (रा + म) शब्द कोई सामान्य शब्द नहीं है; 'राम रहस्य उपनिषद' और 'रामार्चनचन्द्रिका' के अनुसार, 'रा' का अर्थ है संपूर्ण ब्रह्माण्ड और 'म' का अर्थ है स्वामी (Master)। 'राम' नाम में भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र (ॐ नमः शिवाय) के 'म' और भगवान विष्णु के अष्टाक्षरी मंत्र (ॐ नमो नारायणाय) के 'रा'—दोनों का सार (बीज) समाहित है। इसलिए शिव स्वयं काशी में मुमूर्षु जीवों को तारक मंत्र के रूप में 'राम' नाम का ही उपदेश देते हैं。
शास्त्रों में रामनवमी पर जपने योग्य सिद्ध मंत्र और उनके प्रयोग इस प्रकार हैं:
| मंत्र का नाम | संस्कृत श्लोक / मंत्र | अर्थ एवं शास्त्रीय प्रयोग |
|---|---|---|
| श्री राम अष्टाक्षरी मंत्र | ॥ ॐ श्री रामाय नमः ॥ | अर्थ: मैं धर्म के सर्वोच्च स्वरूप भगवान श्रीराम को नमन करता हूँ。 प्रयोग: तुलसी या रुद्राक्ष की माला से 108 बार जप। इसका प्रयोग षोडशोपचार पूजा के प्रारंभिक आवाहन और चित्त की एकाग्रता के लिए किया जाता है। |
| श्री राम तारक मंत्र | ॥ श्री राम जय राम जय जय राम ॥ | अर्थ: भगवान श्रीराम की जय हो! यह 'तारक मंत्र' है जो जन्म-मरण के चक्र (भवसागर) से पार उतारने की क्षमता रखता है。 प्रयोग: मूर्तियों के अभिषेक (स्नान) के समय और अखंड कीर्तन के रूप में इसका सस्वर गान किया जाता है। |
| शरण श्लोक (शरणागति मंत्र) | लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ | अर्थ: जो संपूर्ण लोकों को आनंद देने वाले हैं, युद्धभूमि में धैर्यवान हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं... उन श्रीराम की मैं शरण लेता हूँ。 प्रयोग: पूर्ण आत्म-समर्पण (Surrender) और भगवान की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने हेतु पूजा के अंत में इसका पाठ किया जाता है। |
| श्री राम रक्षा स्तोत्र मंत्र | ॥ श्री रामचन्द्राय शरणं मम ॥ | अर्थ: मैं स्वयं को भगवान श्रीरामचन्द्र के रक्षक चरणों में समर्पित करता हूँ。 प्रयोग: विपत्ति-नाश, भय-मुक्ति और आध्यात्मिक रक्षा के लिए बुध कौशिक मुनि रचित रामरक्षा स्तोत्र के साथ इसका जप किया जाता है। |
एकश्लोकी रामायण का अद्भुत विधान
जिन भक्तों के पास आधुनिक जीवन-शैली के कारण संपूर्ण रामायण पढ़ने का समय नहीं है, उनके लिए धर्मशास्त्रों में 'एकश्लोकी रामायण' का विधान है। रामनवमी के दिन इस एक श्लोक का पाठ करने से संपूर्ण वाल्मीकि रामायण पढ़ने के समान पुण्य प्राप्त होता है:
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनम्। वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥ बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्॥
(भावार्थ: आरंभ में श्रीराम का तपोवन जाना, स्वर्ण मृग का वध, माता सीता का हरण, जटायु का वीरगति प्राप्त करना, सुग्रीव से मित्रता, बालि का वध, समुद्र पार कर लंका दहन करना, और अंत में रावण व कुम्भकर्ण का वध करना—यही संपूर्ण रामायण का सार है।)
रामायण पाठ, कीर्तन एवं रात्रि-जागरण का शास्त्रीय महत्त्व
रामनवमी का अनुष्ठान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। 'गरुड़ पुराण', 'स्कन्द पुराण' (एकादशी माहात्म्य) और 'कालमाधव' में स्पष्ट उल्लेख है कि जो व्यक्ति भगवान के अवतार-लीलाओं का श्रवण करता है, उसके अंतःकरण के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं。
- रामायण का अखंड पाठ: रामनवमी के अवसर पर 'वाल्मीकि रामायण' अथवा 'रामचरितमानस' के 'बालकांड' (जन्म की कथा) और 'सुंदरकांड' (हनुमान जी के पराक्रम और भक्ति की कथा) का सस्वर पाठ अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। जो भक्त अपने घर या मंदिर में अखंड रामायण का पाठ आयोजित करते हैं, उनके घर से नकारात्मक ऊर्जा (वास्तु दोष) पूर्णतः समाप्त हो जाती है।
- रात्रि-जागरण (Night Vigil): 'स्कन्द पुराण' के अनुसार, व्रत वाले दिन रात्रि में सोना (शयन) नहीं चाहिए। 'जागरण' के 26 लक्षण बताए गए हैं, जिनमें मुख्य हैं—वाद्य यंत्रों के साथ संगीत, नृत्य, पुराणों का पठन, धूप-दीप प्रज्वलन, इंद्रिय निग्रह और भगवान की कथाओं का श्रवण। रात्रि भर 'श्रीराम जय राम' का कीर्तन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है।
नैवेद्य (भोग) एवं दान-विधान की शास्त्रीय मीमांसा
नैवेद्य का वैज्ञानिक एवं पारंपरिक विधान
शास्त्रों में भगवान को अर्पित किए जाने वाले नैवेद्य (भोग) में सात्त्विकता, शुचिता और ऋतु-अनुकूलता का अत्यंत ध्यान रखा जाता है। रामनवमी के विशिष्ट भोग में भगवान श्रीराम की वनवास लीलाओं की स्मृतियाँ और चैत्र मास (वसंत-ग्रीष्म ऋतु का संधिकाल) का आयुर्वेद-विज्ञान भी जुड़ा हुआ है:
- पानकम (Panakam) और नीर मोर (Neer Mor): दक्षिण भारतीय और पारंपरिक वैदिक आगम पूजाओं में 'पानकम' (गुड़, शुद्ध जल, कुटी हुई काली मिर्च, सोंठ और इलायची का मिश्रण) तथा 'नीर मोर' (मसालेदार छाछ) भगवान को विशेष रूप से अर्पित किया जाता है। ग्रंथों (जैसे अगस्त्य संहिता के सूत्रों) में यह माना जाता है कि महर्षि विश्वामित्र के साथ घोर ग्रीष्म ऋतु में वन गमन के समय बाल-राम और लक्ष्मण ने अपनी प्यास बुझाने के लिए इन्हीं प्राकृतिक द्रव्यों का सेवन किया था। आयुर्वेद की दृष्टि से यह चैत्र मास में शरीर के तापमान को संतुलित करता है।
- खीर, पंजीरी और कोसुमल्ली: उत्तर भारतीय परंपरा में धनिया की पंजीरी, हलवा, और गाय के शुद्ध दूध से बनी खीर का भोग लगाया जाता है।
- तुलसी दल की अनिवार्यता: भगवान को जो भी नैवेद्य अर्पित किया जाए, उसमें 'तुलसी दल' (तुलसी का पत्ता) अवश्य रखा जाना चाहिए। 'स्कन्द पुराण' का उद्घोष है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु अथवा उनके अवतार किसी भी प्रकार का भोग स्वीकार नहीं करते।
दान-विधान (Rules of Charity)
'अग्नि पुराण' (अध्याय 175) एवं 'चतुर्वर्ग चिन्तामणि' जैसे धर्मशास्त्रों के अनुसार, कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक कि उसके अंत में सुपात्र को दान न दिया जाए। नवमी के दिन अथवा दशमी को व्रत के पारण से पूर्व दान का विशेष महत्त्व है:
- प्रतिमा दान: व्रत की समाप्ति पर जिस 'राम दरबार' या भगवान राम की सुवर्ण/धातु की प्रतिमा की पूजा की गई है, उसे किसी सुयोग्य, वेदपाठी आचार्य (ब्राह्मण) को वस्त्राभूषण और दक्षिणा सहित दान कर देने का शास्त्रीय विधान है। यह लौकिक मोह के त्याग का प्रतीक है।
- गौ, सुवर्ण और छत्र दान: सामर्थ्य के अनुसार गोदान (दूध देने वाली गाय का दान), स्वर्ण, शुद्ध वस्त्र, जूते और छतरी (छत्र) का दान करना चाहिए। चैत्र मास की धूप से बचाव हेतु छत्र और जूते का दान पितरों को भी तृप्त करता है।
- कन्या एवं ब्राह्मण भोजन: नौ कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर भोजन कराना और सुयोग्य ब्राह्मणों तथा दरिद्रों (नारायण मानकर) को अन्न खिलाना व्रत को परिपूर्ण करता है।
क्षमा-प्रार्थना एवं शास्त्रोक्त पारण-विधि
पूजन और अनुष्ठान के अंत में, अज्ञानतावश, मंत्र-हीनता अथवा सामग्री की कमी के कारण हुई किसी भी त्रुटि के लिए भगवान से 'क्षमा-प्रार्थना' (Kshamapana) करना अनिवार्य है:
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
(भावार्थ: हे पुरुषोत्तम श्रीराम! मेरे द्वारा दिन-रात अनजाने में हजारों अपराध होते रहते हैं। मुझे अपना दीन दास समझकर क्षमा करें। हे जनार्दन! मेरी यह पूजा मंत्र, क्रिया और भक्ति से हीन हो सकती है, परंतु आपकी अहैतुकी कृपा से यह परिपूर्ण हो।)
व्रत का पारण (Breaking the Fast)
उपवास के पश्चात् विधिपूर्वक अन्न ग्रहण करने की प्रक्रिया को 'पारण' कहते हैं। 'अगस्त्य संहिता' (18.13) के श्लोक के अनुसार, श्रीराम के भक्तों को 'अष्टमी-विद्धा नवमी' (वह नवमी जो अष्टमी से युक्त हो) का सर्वथा त्याग कर 'शुद्ध नवमी' को ही उपवास करना चाहिए और पारण अगले दिन 'दशमी' तिथि की प्रातः काल में करना चाहिए:
नवमी चाष्टमी विद्धा त्याज्या रामपरायणैः। उपोषणं नवम्यां वै दशम्यामेव पारणं॥
यद्यपि कुछ आधुनिक साधक सूर्यास्त के पश्चात् या मध्याह्न की मुख्य पूजा और आरती के बाद सात्त्विक प्रसाद (खीर, फल, चरणामृत) ग्रहण करके भी व्रत खोल लेते हैं, परंतु शास्त्रीय और उत्तम कोटि का विधान दशमी के दिन ही पारण करने का है। पारण सदैव भगवान को अर्पित किए गए 'प्रसाद' (चरणामृत और तुलसी दल) को ग्रहण करके ही करना चाहिए。
फल-श्रुति: व्रत का लौकिक एवं अलौकिक माहात्म्य
सनातन ग्रंथों में 'फल-श्रुति' का अर्थ है किसी विशिष्ट व्रत, उपवास या पाठ के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर प्राप्त होने वाले पुण्यों का प्रामाणिक विवरण। रामनवमी के व्रत की फल-श्रुति अत्यंत विशद, कल्याणकारी और चमत्कारी है。
'स्कन्द पुराण' (अयोध्या माहात्म्य) और 'अग्नि पुराण' के अनुसार:
- पाप-विनाश और कर्म-बंधन से मुक्ति: जो व्यक्ति पूर्ण निष्ठा, ब्रह्मचर्य और विधि-विधान से रामनवमी का अष्टयाम उपवास रखता है, उसके ब्रह्महत्या जैसे घोर से घोर पाप भी उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं जैसे अग्नि में सूखी रुई। 'स्कन्द पुराण' के 'अयोध्या माहात्म्य' में वर्णन है कि जो व्यक्ति नवमी के दिन राम जन्मभूमि का दर्शन करता है या सरयू नदी में मानसिक गोता लगाता है, वह कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाता है।
- साकेत धाम (मोक्ष) की प्राप्ति: अयोध्या माहात्म्य (श्लोक 32-36) स्पष्ट उद्घोष करता है कि कलियुग में भगवान राम की जन्मस्थली का (अथवा उनके स्वरूप का) मात्र आधा क्षण ध्यान करने से 60,000 वर्षों तक गंगा में स्नान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है। व्रत करने वाला जीव अंततः भगवान के परम धाम (साकेत लोक / वैकुंठ) को प्राप्त होता है और उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता (सारूप्य मुक्ति)।
- सूर्य ग्रहण के पुण्यों के समतुल्य: रामनवमी के दिन किया गया निष्काम पूजन, मंत्र-जप और दान हजारों सूर्य ग्रहणों के दौरान कुरुक्षेत्र या काशी में किए गए जप-तप के समान फलदायी बताया गया है।
- पितृ-उद्धार: इस दिन भगवान राम का स्मरण करने और विधिपूर्वक व्रत रखने से व्रती की पिछली कई पीढ़ियों के पितरों का उद्धार हो जाता है और वे नरक से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त होते हैं।
आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (The Inner Ayodhya)
रामनवमी का यह व्रत केवल एक बाह्य शारीरिक उपवास या कर्मकांड नहीं है, अपितु यह व्यक्ति के भीतर 'राम-तत्त्व' को जाग्रत करने की मनोवैज्ञानिक और योगिक प्रक्रिया है। भगवान श्रीराम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, जो सत्य, करुणा, कर्तव्य-परायणता, अदम्य साहस और समभाव के सर्वोच्च आदर्श हैं。
आध्यात्मिक दृष्टि से हमारा मन ही 'दशरथ' (दसों इंद्रियों को वश में रखने वाला) है, हमारी विशुद्ध भक्ति ही 'कौशल्या' है, और हमारा हृदय ही 'अयोध्या' (जिसे कोई युद्ध में जीत न सके) है। जब साधक उपवास के माध्यम से अपनी इंद्रियों को संयमित करता है और वासनाओं से दूर होता है, तब उसके अंतःकरण की अयोध्या में विशुद्ध चेतना रूपी 'राम' का जन्म होता है। इस व्रत का मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह है कि इससे साधक के भीतर का 'रावण' (अहंकार, काम, क्रोध, मोह) परास्त होता है। समाज में इस दिन किए जाने वाले कीर्तन, भंडारे और दान से जातिगत भेद मिटते हैं और समरसता तथा बंधुत्व की भावना प्रगाढ़ होती है。
निष्कर्ष
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव 'रामनवमी' सनातन धर्म के इतिहास में केवल एक कथा या पौराणिक घटना का स्मरण मात्र नहीं है, अपितु यह जीवात्मा का परमात्मा से तादात्म्य स्थापित कराने वाला एक परम वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान है。
'अगस्त्य संहिता', 'रामार्चनचन्द्रिका', 'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु' और 'स्कन्द पुराण' जैसे अत्यंत प्रामाणिक और गूढ़ ग्रंथों के सूक्ष्म विश्लेषण से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि रामनवमी का षोडशोपचार पूजन और अष्टयाम व्रत मानव जीवन को लौकिक तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) से मुक्त कर परमानंद (मोक्ष) की ओर ले जाने का अचूक और राजपथ है。
व्रत-पूर्व के कठोर यम-नियम, ब्रह्म मुहूर्त का पावन स्नान, विशिष्ट वैदिक मंत्रों के साथ लिया गया संकल्प, मध्याह्न काल के अभिजित मुहूर्त में रामलला की जन्म-स्तुति, अष्टाक्षरी व तारक मंत्र का गुह्य जप, और अंत में नि:स्वार्थ भाव से किया गया सुवर्ण, गो और अन्न का दान—यह संपूर्ण प्रक्रिया साधक की भौतिक चेतना को ईश्वरीय चेतना में रूपांतरित कर देती है。
अतः जो भी साधक, चाहे वह किसी भी वर्ण या आश्रम का हो, शास्त्रसम्मत विधि से इस नित्य व काम्य व्रत को संपन्न करता है, वह निश्चित ही भगवान श्रीराम की अहैतुकी कृपा का पात्र बनता है। उसके जीवन से अज्ञान का अंधकार उसी प्रकार छंट जाता है जैसे सूर्य के उदय होने पर रात्रि, और वह अंततः भवसागर को पार कर शाश्वत साकेत धाम को प्राप्त होता है。
॥ ॐ श्री जानकी-वल्लभाय रामचन्द्राय परब्रह्मणे नमः ॥






