श्री हनुमत् जन्मोत्सव (हनुमान जयंती): शास्त्रसम्मत व्रत-विधान, षोडशोपचार पूजा एवं आध्यात्मिक विवेचन
सनातन धर्म के विस्तृत और अगाध वाङ्मय में भगवान शिव के एकादश रुद्रावतार, अष्ट चिरंजीवियों में प्रमुख, ज्ञान और अतुलित बल के सागर तथा भगवान श्रीराम के परम नैष्ठिक भक्त श्री हनुमान जी की उपासना का सर्वाधिक और अद्वितीय महत्व है। संपूर्ण भारतवर्ष और विश्व के विभिन्न भागों में श्री हनुमान जी का प्राकट्य पर्व एक अत्यंत पवित्र, ऊर्जावान और आध्यात्मिक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। यह शोध-पत्र धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु, स्कंद पुराण, पराशर संहिता और पारंपरिक व्रत-ग्रंथों के गहन आलोक में हनुमान जयंती (यथार्थ रूप में हनुमत जन्मोत्सव) की पूर्णतः शास्त्रसम्मत पूजा-विधि, अनुष्ठानिक प्रक्रिया, व्रत-विधान, तथा सिंदूर एवं चमेली के तेल के तात्विक और वैज्ञानिक महत्व का अत्यंत सूक्ष्म और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उन सभी शास्त्रीय विधियों को एक सूत्र में पिरोना है जो एक साधक को भौतिक और आध्यात्मिक सिद्धियों की ओर अग्रसर करती हैं।
जयंती बनाम जन्मोत्सव: एक तात्विक और शास्त्रीय विमर्श
सामान्य जनमानस और लौकिक बोलचाल में इस महान पर्व को 'हनुमान जयंती' के नाम से जाना जाता है, परंतु यदि हम धर्मशास्त्रों और व्याकरण की सूक्ष्म दृष्टि से इसका मूल्यांकन करें, तो 'जन्मोत्सव' या 'प्राकट्योत्सव' शब्द ही अधिक सटीक, प्रामाणिक और तार्किक प्रतीत होता है।
हिंदू धर्मशास्त्रों और शाब्दिक व्युत्पत्ति के अनुसार 'जयंती' शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से उन महापुरुषों, ऐतिहासिक विभूतियों या सामान्य मनुष्यों के लिए किया जाता है जो इस नश्वर संसार में जन्म लेकर, अपने जीवन का लौकिक उद्देश्य पूर्ण कर अंततः मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं और जिनका भौतिक शरीर अब इस धरातल पर विद्यमान नहीं है। इसके सर्वथा विपरीत, भगवान हनुमान काल के चक्र से मुक्त हैं। रामायण और पुराणों के अनुसार, माता सीता और भगवान श्रीराम ने उनकी अगाध और निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें 'अजर-अमर' (चिरंजीवी) होने का अमूल्य वरदान प्रदान किया था。
शास्त्रों की यह स्पष्ट मान्यता है कि कलियुग के इस वर्तमान कालखंड में भी भगवान हनुमान गंधमादन पर्वत पर सशरीर विराजमान हैं और धर्म के रक्षक के रूप में निरंतर जाग्रत हैं। वे अष्ट चिरंजीवियों (अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय) में सर्वोपरि हैं। चूँकि उनका अस्तित्व कालातीत, शाश्वत और निरंतर गतिमान है, इसलिए उनके प्राकट्य दिवस को 'जयंती' की संज्ञा देना तात्विक दृष्टि से अपूर्ण है। इस महान दिन को 'हनुमान जन्मोत्सव' कहना ही शास्त्रीय, तार्किक और आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णतः उचित है, क्योंकि यह एक जीवंत और शाश्वत कॉस्मिक ऊर्जा (Cosmic Energy) का उत्सव है जो आज भी अपने भक्तों के मध्य उपस्थित है।
प्राकट्य तिथियों में क्षेत्रीय एवं पंचांगीय भिन्नता और उनका शास्त्रीय आधार
संपूर्ण भारतवर्ष भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विशाल है, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में पंचांगीय गणनाओं (अमान्त और पूर्णिमान्त प्रणालियों) के भेदों के कारण हनुमान जन्मोत्सव की तिथियों में व्यापक विविधता पाई जाती है। यद्यपि ये तिथियां भिन्न प्रतीत होती हैं, तथापि शास्त्र और क्षेत्रीय परंपराएं इन सभी को पूर्ण मान्यता और आदर प्रदान करती हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, इन तिथियों के पीछे गहरे सांस्कृतिक और पंचांगीय तर्क विद्यमान हैं।
| क्षेत्रीय परंपरा (Regional Tradition) | पंचांग के अनुसार तिथि (Tithi / Month) | शास्त्रीय संदर्भ एवं उत्सव का स्वरूप (Context) |
|---|---|---|
| उत्तर भारत एवं महाराष्ट्र | चैत्र माह, शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा | इसे भगवान हनुमान का वास्तविक और सर्वमान्य प्राकट्य दिवस माना जाता है। उत्तर भारत में पूर्णिमान्त पंचांग का पालन होता है। |
| कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश | मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी / वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी | इन क्षेत्रों में इसे 'हनुमान विजयम' या ४१ दिवसीय कठोर दीक्षा के समापन के रूप में मनाया जाता है, जो चैत्र पूर्णिमा से प्रारंभ होकर वैशाख में पूर्ण होती है। |
| तमिलनाडु एवं केरल | मार्गशीर्ष (धनु/मार्घली माह) की अमावस्या | दक्षिण भारतीय (अमान्त) पंचांग के अनुसार मूल नक्षत्र में हनुमान जी का जन्म माना जाता है, जो मार्घली माह में आता है। |
| ओडिशा | वैशाख माह (पणा संक्रांति / महाविषुव संक्रांति) | यह ओड़िया नववर्ष का प्रथम दिन है, जिसे भगवान हनुमान के प्राकट्य के साथ जोड़कर एक महान सांस्कृतिक पर्व के रूप में मनाया जाता है। |
उत्तर भारत में तुलसीदास जी के रचित ग्रंथों (जैसे रामचरितमानस) और नागरा वास्तुकला का अधिक प्रभाव है, जबकि दक्षिण भारत में पराशर संहिता, वाल्मीकि रामायण के स्थानीय भाष्य और द्रविड़ वास्तुकला (विशाल गोपुरम) के अंतर्गत भगवान हनुमान की आराधना की जाती है। कर्नाटक के हम्पी क्षेत्र को प्राचीन किष्किंधा माना जाता है, जहाँ अंजन्याद्री पहाड़ी पर हनुमान जी का जन्म स्थान विश्वविख्यात है। यह विविधता हिंदू धर्म की उस विशालता को दर्शाती है जहाँ आराध्य एक हैं, परंतु आराधना के मार्ग अनेक हैं।
व्रत-पूर्व तैयारी, नियम एवं कठोर ब्रह्मचर्य विधान
हनुमत जन्मोत्सव का व्रत कोई साधारण शारीरिक उपवास मात्र नहीं है, अपितु यह एक अत्यंत कठोर आध्यात्मिक अनुशासन और तपस्या है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल अन्न का त्याग कर शारीरिक शुद्धि प्राप्त करना नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक चेतना को सर्वोच्च स्तर पर ले जाकर ईश्वरीय ऊर्जा के साथ एकाकार होना है।
इस व्रत को धारण करने वाले साधक को व्रत के एक दिन पूर्व से ही अपनी दिनचर्या और आहार में व्यापक परिवर्तन करने होते हैं। शास्त्रों में इस व्रत के विभिन्न स्वरूप वर्णित हैं, जिन्हें साधक अपनी शारीरिक क्षमता और आध्यात्मिक संकल्प के अनुसार चुन सकता है:
- १. निर्जला व्रत: यह व्रत का सर्वाधिक उग्र और कठोर स्वरूप है। इसमें साधक सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय अथवा पारण के निश्चित मुहूर्त तक अन्न और जल दोनों का पूर्णतः त्याग करता है। यह व्रत केवल उन्हीं साधकों को करने का विधान है जिनका शरीर पूर्णतः स्वस्थ हो और जिनकी संकल्प शक्ति अत्यंत दृढ़ हो।
- २. फलाहारी व्रत: इस व्रत में अन्न का निषेध होता है, परंतु साधक अपने शरीर की ऊर्जा बनाए रखने के लिए ताजे फल, दूध, दही, और सात्विक मेवे (जैसे साबूदाना, मखाना, बादाम, अखरोट) का सेवन कर सकता है।
- ३. एक भुक्त व्रत / अन्नकल्प व्रत: इस विधि में साधक दिन भर निराहार रहता है और दिन में केवल एक बार (प्रायः सूर्यास्त के पश्चात) शुद्ध, सात्त्विक भोजन ग्रहण करता है।
कठोर निषेध और आहार नियम: हनुमान जयंती के व्रत के एक दिन पूर्व (दशमी या चतुर्दशी की रात्रि) से ही साधक को 'नमक' (लवण) का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि नमक इन्द्रियों में उत्तेजना और शरीर में जल तत्व का असंतुलन उत्पन्न करता है, जिससे ध्यान में बाधा आती है। इसके अतिरिक्त तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा, और अत्यंत खट्टे तथा तले-भुने मसालेदार पदार्थों का सेवन सर्वथा निषिद्ध है。
ब्रह्मचर्य एवं आचरण नियम: भगवान हनुमान 'बाल ब्रह्मचारी' और नैष्ठिक तपस्वी हैं, अतः उनके उपासक के लिए शारीरिक, वाचिक और मानसिक, तीनों स्तरों पर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यंत अनिवार्य माना गया है। व्रत के एक दिन पूर्व और व्रत की रात्रि में साधक को आरामदायक शय्या का त्याग कर भूमि पर शयन करना चाहिए, जो कि ईश्वर के प्रति विनम्रता और समर्पण का प्रतीक है। असत्य भाषण, क्रोध, किसी की निंदा करना, और कामुक विचारों का त्याग इस व्रत की प्रथम शर्त है। वस्त्रों के चयन में भी विशेष ध्यान रखना चाहिए; हनुमान जी की पूजा में काले और सफेद रंग के वस्त्र धारण करना पूर्णतः निषिद्ध है। इसके स्थान पर लाल, केसरिया, पीत (पीले) या नारंगी वस्त्र धारण करने चाहिए, जो ऊर्जा, शौर्य और वैराग्य के प्रतीक हैं。
सूतक-पातक (अशौच) एवं महिलाओं की पात्रता का शास्त्रीय दृष्टिकोण
धार्मिक अनुष्ठानों में पवित्रता का अत्यधिक महत्व है। इसी संदर्भ में समाज में सूतक-पातक और महिलाओं की पूजा के अधिकार को लेकर अनेक भ्रांतियां व्याप्त हैं, जिनका निवारण धर्मशास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से ही संभव है。
सूतक और पातक के नियम
धर्मशास्त्रों (जैसे गरुड़ पुराण और धर्मसिंधु) के अनुसार परिवार या गोत्र में किसी शिशु के जन्म होने पर 'सूतक' (जननाशौच) और किसी परिजन की मृत्यु होने पर 'पातक' (मरणाशौच) लगता है। यह अशौच काल पीढ़ियों की दूरी के अनुसार १० से १३ दिनों तक का हो सकता है。
सूतक-पातक की इस अवधि में किसी भी प्रकार के नवीन देव-पूजन, वैदिक मंत्रों के उच्चारण, देव-मूर्ति के भौतिक स्पर्श, यज्ञ-हवन, और मंदिर परिसर में प्रवेश का पूर्ण निषेध किया गया है। इस काल में पकाया गया भोजन भी देव-नैवेद्य के लिए अशुद्ध माना जाता है। तथापि, ईश्वर की उपासना कभी पूर्णतः बाधित नहीं होती। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि बाह्य और कर्मकांडीय (षोडशोपचार) पूजा वर्जित है, परंतु मानसिक जप पर कोई अंकुश नहीं है। साधक सूतक काल में भी 'मानसिक रूप से' और मौन रहकर राम-नाम का जप या हनुमान चालीसा का स्मरण कर सकता है। इसके अतिरिक्त, घर में यदि स्थायी रूप से स्थापित (सचल) ठाकुर जी या देव मूर्तियां हैं, तो परिवार का कोई शुद्ध व्यक्ति या मानसिक भाव से दूर से ही उन्हें प्रणाम किया जा सकता है। अशौच काल समाप्त होने पर घर को गंगाजल से पवित्र कर, पंचगव्य ग्रहण कर पुनः विधिवत पूजा आरंभ करनी चाहिए。
महिलाओं की पात्रता एवं भ्रांतियों का निवारण
समाज में एक अत्यंत सामान्य और रूढ़िवादी भ्रांति यह है कि महिलाएं हनुमान जी की पूजा, व्रत या दर्शन नहीं कर सकतीं, क्योंकि वे बाल ब्रह्मचारी हैं। धर्मशास्त्रों, पुराणों और स्वयं वाल्मीकि रामायण में ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो महिलाओं को रामभक्त हनुमान की उपासना से वंचित करता हो। माता अंजना ने स्वयं हनुमान जी को जन्म दिया और उनकी आरती उतारी थी। जब माता ही उनकी प्रथम गुरु और पूजनीया हैं, तो विश्व की कोई भी स्त्री मातृ-भाव, ভগिनी-भाव (बहन) या शुद्ध भक्ति-भाव से उनकी उपासना पूर्णतः कर सकती है。
निषेध केवल भौतिक स्पर्श का है: हनुमान जी अत्यंत उच्च कोटि के नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं और उनकी ऊर्जा का ऊर्ध्वमुखी प्रवाह अत्यंत तीव्र होता है। इस ब्रह्मचर्य के सम्मान में और ऊर्जा के परस्पर असंतुलन से बचने के लिए, पारंपरिक रूप से महिलाओं को उनकी मूर्ति का भौतिक स्पर्श करने, उन्हें अपने हाथों से सिंदूर का चोला चढ़ाने, या यज्ञोपवीत (जनेऊ) पहनाने से रोका गया है। किंतु महिलाएं व्रत रख सकती हैं, दूर से लाल पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित कर सकती हैं, दीप जला सकती हैं, और हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या हनुमान अष्टक का पूर्ण पाठ कर सकती हैं। केवल 'बजरंग बाण' के पाठ से महिलाओं को प्रायः बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसमें तांत्रिक तत्व और उग्र शपथ (आण) का प्रयोग होता है, जो अत्यंत कठोर ऊर्जा उत्पन्न करता है。
स्नान-विधि एवं शास्त्रोक्त संकल्प विधान
स्नान-विधि
व्रत वाले दिन साधक को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व, लगभग ४:३० से ५:३० के मध्य) शय्या का त्याग कर देना चाहिए। दैनिक नित्यकर्मों से निवृत्त होकर पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, नर्मदा आदि) में स्नान करना सर्वोत्तम है। यदि ऐसा संभव न हो, तो घर पर ही स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करना चाहिए। यह बाह्य शुद्धि के साथ-साथ आंतरिक और मानसिक शुद्धि का भी प्रतीक है। स्नान करते समय 'गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥' मंत्र का उच्चारण जल को तीर्थ के समान पवित्र कर देता है। स्नान के उपरांत स्वच्छ लाल, केसरिया या पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।
संकल्प (Sankalpa)
वैदिक कर्मकांड और हिंदू धर्मशास्त्रों में 'संकल्प' का अर्थ है—दृढ़ निश्चय और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक विशेष लक्ष्य की ओर निर्देशित करना। बिना संकल्प के की गई पूजा, व्रत या दान का फल दिशाहीन हो जाता है और शास्त्र कहते हैं कि उसका पुण्य इंद्र या अन्य देवता ग्रहण कर लेते हैं। संकल्प वह माध्यम है जिससे हम परमात्मा को अपने उद्देश्य और इच्छा की सूचना देते हैं。
पूजा आरंभ करने से पूर्व साधक को पद्मासन या सुखासन में बैठना चाहिए। दाएं हाथ की हथेली में थोड़ा सा शुद्ध जल, अक्षत (साबुत चावल), लाल पुष्प, और कुछ द्रव्य (सिक्का) लेकर निम्नलिखित शास्त्रोक्त मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लेना चाहिए:
विस्तृत संकल्प मंत्र:
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः... पूर्वोक्त एवं गुण विशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ मम संकल्पित मनोवांछाफल सिद्ध्यर्थं इष्टकाम्यार्थ सिद्ध्यर्थं श्रीमदाञ्जनेय स्वामि देवता प्रीत्यर्थं यथाशक्ति षोडशोपचार पूजां करिष्ये॥”
तात्पर्य: "हे परमेश्वर! मैं (अपना नाम, गोत्र और कुल का उच्चारण करें), इस शुभ तिथि, वार, और मुहूर्त में, अपने शरीर, मन और आत्मा के समस्त पापों के क्षय, अभीष्ट कार्यों की सिद्धि, परिवार के कल्याण, और श्री हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्ति हेतु, आज यह पवित्र व्रत धारण कर रहा/रही हूँ और अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार उनकी षोडशोपचार पूजा का संकल्प लेता/लेती हूँ"。
मंत्र का उच्चारण पूर्ण होने के पश्चात हाथ में लिया हुआ जल, अक्षत और पुष्प भूमि पर या एक ताम्र पात्र में विनयपूर्वक छोड़ देना चाहिए。
शास्त्रसम्मत विस्तृत षोडशोपचार पूजा-विधि एवं अंगपूजा विधान
षोडशोपचार (षोडश = १६, उपचार = सेवा या भेंट) हिंदू धर्म में किसी भी देवता के प्रति सर्वांगपूर्ण और सर्वोच्च सम्मान प्रदर्शित करने की एक व्यवस्थित और क्रमबद्ध विधि है। इसमें भगवान को ब्रह्मांड के सर्वोच्च अतिथि के रूप में आमंत्रित कर उनका राजसी सत्कार किया जाता है。
पूजा आरंभ करने से पूर्व घर के ईशान कोण (North-East) या पूजा-कक्ष को भली-भांति स्वच्छ करें। एक लकड़ी की चौकी पर लाल या केसरिया वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम, माता सीता और श्री हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान के बाईं ओर एक घी का दीपक प्रज्वलित करें और दाहिनी ओर जल से भरा कलश स्थापित करें। श्री हनुमान जी की पूजा कभी भी भगवान राम के बिना पूर्ण नहीं होती, अतः राम-दरबार का स्मरण अनिवार्य है。
निम्नलिखित १६ चरणों में वैदिक और पौराणिक मंत्रों के साथ यह पूजा संपन्न की जाती है:
- १. ध्यान (Dhyana): सर्वप्रथम नेत्र बंद कर अपने हृदय कमल में इष्टदेव का मानसिक चित्र उकेरें। यह मानसिक एकाग्रता का चरण है। मंत्र: "अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ॐ श्री हनुमते नमः ध्यायामि।" भाव: हे अतुलित बल के धाम, स्वर्ण पर्वत के समान दैदीप्यमान कांति वाले, राक्षसों रूपी सघन वन को भस्म करने वाले अग्नि के समान, और ज्ञानियों में अग्रगण्य श्री हनुमान जी का मैं ध्यान करता हूँ।
- २. आवाहन (Avahana): अब भगवान को उस मूर्ति या चित्र में सूक्ष्म रूप से विराजमान होने के लिए आमंत्रित करें। दोनों हाथों को जोड़कर आवाहन मुद्रा बनाएं। मंत्र: "रामचन्द्रपदाम्भोजयुगल स्थिरमासनम्। आवाहयामि वरदं हनूमन्तमभीष्टदम्॥ ॐ श्री हनुमते नमः आवाहयामि।"
- ३. आसन (Asana): आवाहित किए गए विशिष्ट अतिथि (भगवान) को बैठने हेतु प्रतीकात्मक रूप से स्वर्ण आसन या लाल पुष्प अर्पित करें। मंत्र: "नवरत्ननिबद्धाश्रं चतुरश्रं सुशोभनम्। सौवर्णमासनं तुभ्यं दास्यामि कपिनायक॥ ॐ श्री हनुमते नमः सिंहासनं समर्पयामि।"
- ४. पाद्य (Padya): यात्रा कर के आए अतिथि के चरण धोने की प्राचीन परंपरा है। भगवान के प्रतीकात्मक चरण प्रक्षालन हेतु जल अर्पित करें। मंत्र: "सुवर्णकलशानीतं गङ्गादि सलिलैर्युतम्। पादयोः पाद्यमनघं प्रतिगृह्य प्रसीद मे॥ ॐ श्री हनुमते नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि।"
- ५. अर्घ्य (Arghya): भगवान को अपने हाथ धोने के लिए सुगंधित जल (जिसमें चंदन, पुष्प और अक्षत मिले हों) अर्पित करें। मंत्र: "लक्ष्मणप्राणसंरक्ष सीताशोकविनाशन। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं अञ्जनाप्रियनन्दन॥ ॐ श्री हनुमते नमः हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि।"
- ६. आचमन (Achamaniya): मुख शुद्धि और प्यास बुझाने हेतु शुद्ध जल अर्पित करें। मंत्र: "वालग्रसेतुबन्धाय शताननवधाय च। तुभ्यमाचमनं दत्तं प्रतिगृह्णीष्व मारुते॥ ॐ श्री हनुमते नमः मुखे आचमनीयं समर्पयामि।"
- ७. मधुपर्क (Madhuparka): यह अतिथि सत्कार का एक विशिष्ट अंग है जिसमें शहद, दही और शुद्ध घी का मीठा मिश्रण भगवान को अर्पित किया जाता है, जो जीवन की मधुरता का प्रतीक है। मंत्र: "अर्जुनध्वजसंवास दशाननमदापह। मधुपर्कं प्रदास्यामि हनुमान प्रतिगृह्यताम्॥ ॐ श्री हनुमते नमः मधुपर्कं समर्पयामि।"
- ८. स्नान (Snana): भगवान की प्रतिमा को पहले पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर का मिश्रण) और तदुपरांत शुद्ध तीर्थ जल (गंगाजल) से स्नान कराएं। मंत्र: "गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्यः समानीतैर्नवोदकैः। भवन्तं स्नपयिष्यामि कपिनायक गृह्यताम्॥ ॐ श्री हनुमते नमः पञ्चामृत स्नानं शुद्धोदक स्नानं च समर्पयामि।"
- ९. वस्त्र एवं उत्तरीय (Vastra): स्नान के पश्चात भगवान को लाल, केसरिया या पीले रंग का नवीन वस्त्र और उत्तरीय (दुपट्टा या अंगवस्त्र) अर्पित करें। मंत्र: "पीताम्बरमिदं तुभ्यं तप्तहाटकसन्निभम्। दास्यामि वानरश्रेष्ठ सङ्गृहाण नमोऽस्तु ते॥ ॐ श्री हनुमते नमः वस्त्रयुग्मं समर्पयामि।"
- १०. यज्ञोपवीत (Yajnopavita): भगवान को नौ तंतुओं वाला पवित्र जनेऊ (यज्ञोपवीत) अर्पित करें। मंत्र: "नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्। उपवीतं चोत्तरीयं गृहाण रामकिङ्कर॥ ॐ श्री हनुमते नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि।"
- ११. गंध / चंदन (Gandha): मस्तिष्क और शरीर की शीतलता के लिए भगवान को कस्तूरी, कुमकुम और अष्टगंध चंदन का लेप लगाएं। मंत्र: "कस्तूरीकुङ्कुमामिश्रं कर्पूरागरुवासितुम। श्रीचन्दनं तु दास्यामि गृह्यतां हनुमत्प्रभो॥ ॐ श्री हनुमते नमः दिव्य श्रीचन्दनं समर्पयामि।"
- १२. आभूषण एवं अक्षत (Abharana & Akshata): भगवान को आभूषण (स्वर्ण या पुष्पों के) और अखंडित (बिना टूटे हुए) चावल अर्पित करें। अक्षत पूर्णता का प्रतीक है। मंत्र: "शालीयानक्षतान् रम्यान् पद्মরাगसमप्रभान्... ॐ श्री हनुमते नमः अक्षतान् समर्पयामि।"
- १३. पुष्प, अंगपूजा एवं अष्टोत्तर शतनामावली (Pushpa & Angapuja): हनुमान जी को लाल पुष्प (गुलाब, गुड़हल, लाल गेंदा, कनेर) अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें जूही, चम्पा और बेला का फूल चढ़ाने का पूर्ण निषेध है। मंत्र: "सुगन्धीनि सुरूपाणि वन्यानि विविधानि च। चम्पकादीनि पुष्पाणि... ॐ श्री हनुमते नमः नानाविध परिमल पत्र पुष्पाणि समर्पयामि।"
अंगपूजा (Anatomical Worship): वैदिक पूजा में भगवान के प्रत्येक अंग में देवत्व का आह्वान किया जाता है। पुष्प चढ़ाते हुए अंगों की पूजा करें:- ॐ मारुतये नमः कहकर भगवान के चरणों (पादौ) पर पुष्प चढ़ाएं।
- ॐ सुग्रीवसखाय नमः कहकर घुटनों (गुल्फौ) पर।
- ॐ रामदासाय नमः कहकर जांघों (ऊरू) पर।
- ॐ अक्षघ्नाय नमः कहकर कमर (कटिं) पर।
- ॐ लङ्कादहनाय नमः कहकर पूंछ (वालं) पर।
- ॐ सौमित्रिप्राणदात्रे नमः कहकर वक्षस्थल (छाती) पर।
- ॐ रामभिषेककारिणे नमः कहकर हाथों (हस्तौ) पर।
- ॐ मणिकण्ठमालिकाय नमः कहकर सिर (शिरः) पर पुष्प चढ़ाएं।
- १४. धूप (Dhoopa): वातावरण को शुद्ध करने के लिए दशांग, गुग्गुल या चंदन युक्त सुगन्धित धूप दिखाएं। मंत्र: "दिव्यं सगग्गुलं रम्यं दशाङ्गेन समन्वितम्। गृहाण मारुते धूपं... ॐ श्री हनुमते नमः धूपं आघ्रापयामि।"
- १५. दीप (Deepa): अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने के लिए गाय के शुद्ध घी या चमेली के तेल का त्रिवर्ती (तीन बत्ती वाला) प्रज्वलित दीपक दिखाएं। मंत्र: "साज्यं त्रिवर्ति संयुक्तं वह्निना योजितं मया। गृहाण मङ्गलं दीपं त्रैलोक्य तिमिरापहम्॥ ॐ श्री हनुमते नमः दीपं दर्शयामि।"
- १६. नैवेद्य, ताम्बूल एवं नीराजन (Naivedya, Tamboola, Neerajana): नैवेद्य: भगवान को बूंदी, बेसन के लड्डू, मालपुआ, केला, या गुड़-चने का सात्त्विक भोग लगाएं। भोग की सामग्री में तुलसी पत्र अवश्य रखें। मंत्र: "मणिपात्र सहस्राढ्यं दिव्यान्नं घृतपायसं आपूपलड्डूकोपेतं मधुराम्रफलैर्युतम्... ॐ श्री हनुमते नमः नैवेद्यं समर्पयामि।" भोग लगाते समय बायां हाथ हृदय पर रखें और दाएं हाथ से ग्रास मुद्रा (प्राणमुद्रा) बनाते हुए पञ्च प्राणों का आहुति मंत्र पढ़ें: ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा।
ताम्बूल: भोजन के उपरांत मुख शुद्धि हेतु इलायची, लौंग और कपूर युक्त मीठा पान (ताम्बूल) अर्पित करें। मंत्र: "नागवल्लीदलोपेतं क्रमुकैर्मधुरैर्युतम्... ॐ श्री हनुमते नमः ताम्बूलं समर्पयामि।"
नीराजन (आरती) एवं क्षमा-प्रार्थना: अंत में कपूर और शुद्ध घी के दीपक से शंख और घंटी बजाते हुए "आरती कीजै हनुमान लला की" का गान करें। तदुपरांत मंत्रपुष्पांजलि अर्पित कर स्वयं के स्थान पर खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें: "पापोऽहं पापकर्मोहं पापात्मा पापसम्भवः"। अंततः, अज्ञानतावश हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें: मंत्र: "मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं कपीश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु ते॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व वानरोत्तम॥"
सिंदूर एवं चमेली तेल का तात्विक, पौराणिक एवं ऊर्जा-विज्ञान रहस्य
हनुमत उपासना में 'सिंदूर का चोला' और 'चमेली के तेल' का अभिषेक एक अत्यंत गुह्य, रहस्यमयी तांत्रिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। यह मात्र एक लौकिक कर्मकांड नहीं है, अपितु इसके पीछे ठोस पौराणिक प्रमाण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा-विज्ञान (Science of Cosmic Energy) के गूढ़ सिद्धांत छिपे हुए हैं。
पौराणिक प्रमाण: स्कंद पुराण एवं वाल्मीकि रामायण का संदर्भ
लोककथा और पारंपरिक ग्रंथों में एक अत्यंत भावपूर्ण कथा प्राप्त होती है। एक बार माता सीता अपने कक्ष में अपनी मांग में सिंदूर सजा रही थीं। हनुमान जी ने अत्यंत कौतूहलवश इसका कारण पूछा। माता सीता ने वात्सल्य भाव से उत्तर दिया कि यह सिंदूर उनके स्वामी भगवान श्रीराम की आयु वृद्धि करता है और उन्हें अत्यंत प्रिय है। यह सुनकर राम-भक्ति में आकंठ डूबे हनुमान जी ने विचार किया कि यदि चुटकी भर सिंदूर से प्रभु की आयु बढ़ती है और वे इतने प्रसन्न होते हैं, तो मैं अपने संपूर्ण शरीर पर इसे धारण करूंगा। उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर का गाढ़ा लेप कर लिया और उसी स्वरूप में राम-दरबार में पहुँच गए। उनकी इस निश्छल, अबोध और अनन्य भक्ति को देखकर भगवान श्रीराम भावविभोर हो गए और उन्होंने यह वरदान दिया कि जो भी भक्त मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती के दिन हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करेगा, उसके समस्त सांसारिक संकट तत्काल दूर होंगे और उसे मेरी (श्रीराम की) अहैतुकी कृपा प्राप्त होगी。
इसके अतिरिक्त, स्कंद पुराण के अवंत्य खण्ड (रेवा खंड - अध्याय 83) में एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमयी प्रसंग प्राप्त होता है। जब रामायण युद्ध के दौरान हनुमान जी ने रावण की सेना के 'ब्रह्म-राक्षसों' (जो ब्राह्मण कुल के थे परंतु कर्म से राक्षस थे) का वध किया, तो उन पर ब्रह्महत्या का सूक्ष्म दोष लगा था। इस दोष से मुक्त होने के लिए उन्होंने नर्मदा (रेवा) नदी के तट पर घोर तपस्या की और भगवान शिव की आराधना कर 'हनुमंतेश्वर लिंग' की स्थापना की। इन उग्र तपस्याओं, महायुद्धों और स्वयं सूर्य देव को निगलने के प्रयास के कारण उनके शरीर में अत्यधिक उष्णता (गर्मी) और ताप उत्पन्न हो गया था। इस भयंकर शारीरिक गर्माहट को शांत करने के लिए भगवान श्रीराम ने वानरों को निर्देश दिया कि सिंदूर अत्यंत शीतल प्रकृति का होता है और यदि उसमें चमेली का तेल मिला दिया जाए, तो उसकी शीतलता दोगुनी हो जाती है। अतः उनके शरीर के ताप को हरने के लिए ही सिंदूर और चमेली के तेल का लेप किया गया था。
आध्यात्मिक एवं ऊर्जा-विज्ञान (Science of Spiritual Energy) का दृष्टिकोण
शास्त्रीय ऊर्जा-सिद्धांत के अनुसार, देवताओं की पाषाण या धातु की मूर्तियों में देवत्व (चैतन्य या Chaitanya) जाग्रत करने के लिए विशिष्ट प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। हिंदू आध्यात्म विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड में श्री हनुमान जी में प्रकट ऊर्जा (Manifest Energy) का स्तर लगभग ७२% (72%) होता है, जबकि अन्य देवताओं में यह ऊर्जा औसतन मात्र १०% तक ही प्रकट होती है。
चमेली का तेल, सिंदूर, और रुई (मदार) के पत्ते ऐसे विशिष्ट प्राकृतिक तत्व हैं जिनमें ब्रह्मांड के महर्लोक से हनुमान जी के 'पवित्रकों' (Subtlemost pure particles) को आकर्षित करने की सर्वाधिक और अद्वितीय क्षमता होती है。
सिंदूर (मंगल का द्योतक): वैदिक ज्योतिष में सिंदूर को सीधे मंगल ग्रह (Mars) का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है। मंगल साहस, पराक्रम, और रक्त का कारक है। सिंदूर चढ़ाने से व्यक्ति के शरीर और मन में शौर्य, शक्ति और निर्भयता का संचार होता है。
चमेली का तेल: चमेली का तेल अत्यंत सुगंधित, औषधीय गुणों से युक्त और मानसिक एकाग्रता को बढ़ाने वाला होता है। तिल का तेल जहां शनि के लिए और सरसों का तेल दृष्टि दोष के लिए होता है, वहीं चमेली का तेल हनुमान जी की विशिष्ट कॉस्मिक ऊर्जा को सक्रिय करता है。
जब सिंदूर को चमेली के तेल में मिलाकर (चोला रूप में) भगवान को अर्पित किया जाता है, तो यह शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, राहु के अशुभ प्रभावों और नकारात्मक शक्तियों को तत्काल प्रभाव से नष्ट कर देता है। यह भक्त के चारों ओर एक सूक्ष्म 'सुरक्षा कवच' (Divine Aura) का निर्माण करता है। शास्त्र यह भी कहते हैं कि हनुमान जी के समक्ष चमेली के तेल का दीपक जलाने से व्यक्ति की आंखों की ज्योति बढ़ती है, गुप्त शत्रुओं का शमन होता है, और पुराने से पुराने ऋण (कर्ज) से स्थायी मुक्ति मिलती है。
हनुमान चालीसा, बजरंग बाण एवं विशिष्ट मंत्र अनुष्ठान विधान
हनुमान जयंती के व्रत के दिन केवल स्थूल (शारीरिक) पूजा ही पर्याप्त नहीं है, अपितु वाचन (पाठ) और मानसिक जप का भी विशेष विधान है जो नाद-ब्रह्म (Sound Energy) के माध्यम से चेतना को जाग्रत करता है。
मंत्र-विधान और उनका प्रयोग
व्रत के दिन पूर्ण पवित्रता के साथ लाल ऊनी आसन पर बैठकर, लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से निम्नलिखित मंत्रों का जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। मंत्रों का उच्चारण नाभि से होना चाहिए:
| मंत्र (Mantra) | अर्थ (Meaning) | प्रयोग एवं लाभ (Application & Benefits) |
|---|---|---|
| मूल मंत्र: ॐ हनुमते नमः | ॐ, मैं शक्ति और भक्ति के पुंज भगवान हनुमान को नमन करता हूँ। | सामान्य प्रार्थना, अनजाने भय से मुक्ति, और दैनिक रक्षा हेतु। |
| हनुमान गायत्री मंत्र: ॐ अञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् | हम अंजनीपुत्र को भली-भांति जानते हैं, वायुपुत्र का हम ध्यान करते हैं; वे परमवीर हनुमान हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रवृत्त करें। | मानसिक अशांति दूर करने, विद्या प्राप्ति, और बौद्धिक एकाग्रता वृद्धि हेतु विद्यार्थियों के लिए सर्वोत्तम। |
| बीज मंत्र: ॐ ऐं भ्रीम हनुमते श्री राम दूताय नमः | नाद-ब्रह्म के बीज अक्षरों के साथ श्रीराम के दूत को नमन। | कार्यसिद्धि, अदम्य साहस और जीवन में अजेय शक्ति प्राप्त करने हेतु। |
| रोग निवारक चौपाई: नासे रोग हरे सब पीरा। जो सुमिरे हनुमंत बलबीरा।। | जो भी भक्त बलवान वीर हनुमान जी का निरंतर स्मरण करता है, उसके सारे शारीरिक रोग और मानसिक पीड़ाएं नष्ट हो जाती हैं। | किसी गंभीर बीमारी या स्वास्थ्य संकट के निवारण हेतु इसका निरंतर 108 बार मानसिक जप किया जाना चाहिए। |
बजरंग बाण और हनुमान चालीसा के विशिष्ट नियम
हनुमान जी की किसी भी प्रकार की उपासना या पाठ सदैव 'श्रीराम स्तुति' (जैसे 'श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन') या 'राम नाम जप' के साथ ही प्रारंभ और समाप्त करनी चाहिए। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि जिस पूजा में श्रीराम का नाम नहीं होता, उसे हनुमान जी कभी स्वीकार नहीं करते。
बजरंग बाण का अनुष्ठान: समाज में यह भ्रांति है कि बजरंग बाण का पाठ नित्य किया जा सकता है। परंतु शास्त्रों के अनुसार, यदि जीवन में कोई अत्यंत गंभीर संकट, मारण-मोहन-उच्चाटन जैसी तांत्रिक बाधा, भयंकर शत्रु बाधा, या प्राणों पर संकट हो, तभी इसका ४० दिनों का विशेष 'अनुष्ठान' किया जाता है। इसकी विधि यह है कि: एक अखंड दीप (चमेली या सरसों के तेल का) जलाकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके (क्योंकि हनुमान जी दक्षिण दिशा की ओर ही लंका में सीता माता की खोज में गए थे), पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए संकल्प लेकर इसका पाठ किया जाता है। चूँकि बजरंग बाण के पाठ में हनुमान जी को सीधे भगवान श्रीराम की सौगंध (आण) दी गई है, अतः इसका पाठ सामान्य परिस्थितियों या छोटी-मोटी समस्याओं के लिए नहीं, बल्कि केवल घोर संकट में ही करना शास्त्रसम्मत है。
हनुमान चालीसा का पाठ: हनुमान चालीसा को नित्य पढ़ा जा सकता है। इसे पढ़ने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए; प्रत्येक शब्द का स्पष्ट और ऊंचे स्वर में उच्चारण होना चाहिए। पाठ करते समय समीप में एक जल से भरा पात्र अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि पाठ से उत्पन्न सूक्ष्म तरंगें (Vibrations) उस जल में समाहित हो जाती हैं। पाठ के उपरांत वह जल अभिमंत्रित हो जाता है, जिसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने से आंतरिक रोग दूर होते हैं。
नैवेद्य, दान-विधान एवं व्रत पारण (Fasting Conclusion)
नैवेद्य (भोग) विधान
भगवान हनुमान को सात्त्विक, शुद्ध और विशेषकर लाल एवं पीले रंग के मिष्ठान्न अत्यंत प्रिय हैं। षोडशोपचार पूजा के पूर्ण होने पर उन्हें तुलसी दल अवश्य रखकर निम्नलिखित वस्तुओं का भोग लगाना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के वे भोग ग्रहण नहीं करते:
- लाल रंग की बूंदी या शुद्ध देसी घी में बने बेसन के लड्डू।
- पके हुए केले। मान्यता है कि बंदरों को केले खिलाने से हनुमान जी की विशेष और प्रत्यक्ष कृपा प्राप्त होती है।
- गुड़ और भुने हुए चने का प्रसाद, जो ऊर्जा और शक्ति का द्योतक है।
- मालपुआ, रोट (आटे, गुड़ और घी से बनी मोटी मीठी रोटी), और केसर-युक्त दूध।
दान-विधान (Rules of Charity)
शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि दान के बिना कोई भी व्रत, उपवास या अनुष्ठान पूर्ण फलदायी नहीं होता। हनुमान जयंती के पावन अवसर पर बंदरों को चने, गुड़ और केले खिलाना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि वानरों को हनुमान जी का ही लौकिक स्वरूप माना गया है। इसके अतिरिक्त, किसी दरिद्र नारायण या योग्य ब्राह्मण को लाल रंग के वस्त्र, लाल मसूर की दाल, गुड़, तांबे का बर्तन, और चमेली के तेल का दान करना ऋण-मुक्ति, कोर्ट-कचहरी के विवादों को सुलझाने और जन्मकुंडली में स्थित मंगल-दोष (Mangal Dosh) के निवारण के लिए अचूक अस्त्र माना गया है。
व्रत पारण (Breaking the Fast)
व्रत का पारण (खोलना) सूर्योदय या सूर्यास्त के काल-मान पर निर्भर करता है。
- यदि साधक ने २४ घंटे का निर्जला व्रत रखा है, तो उसे अगले दिन सूर्योदय के पश्चात ही व्रत खोलना चाहिए। यदि एक-भुक्त व्रत है, तो सूर्यास्त के बाद संध्या काल की पूजा के पश्चात भोजन ग्रहण किया जा सकता है।
- पारण से पूर्व भगवान की सायं कालीन आरती और क्षमा-याचना अवश्य करनी चाहिए।
- पारण सदैव सात्त्विक भोजन से ही किया जाता है। इसमें गेहूं के आटे का शुद्ध हलवा, पूड़ी, मीठा पराठा या दूध-फलाहार का उपयोग किया जा सकता है।
- सर्वाधिक महत्वपूर्ण नियम: पारण के समय और पूरे व्रत के दौरान 'नमक' (Salt) का सेवन सर्वथा वर्जित है। हनुमान जी के व्रत को केवल मीठे भोजन (जैसे गुड़, हलवा या फलाहार) से ही खोलना शास्त्रसम्मत परंपरा है।
फल-श्रुति: आध्यात्मिक एवं लौकिक सिद्धियों की प्राप्ति
'फल-श्रुति' का अर्थ है किसी व्रत या अनुष्ठान को पूर्ण करने के पश्चात प्राप्त होने वाले पुण्यों का श्रवण करना। वेद-पुराणों, वाल्मीकि रामायण और विशेषकर पराशर संहिता के अनुसार, हनुमान जी की इस पूर्णतः शास्त्रसम्मत षोडशोपचार विधि और कठोर व्रत का पालन करने से साधक को लौकिक (भौतिक) और अलौकिक (आध्यात्मिक) दोनों प्रकार की सर्वोच्च सिद्धियां प्राप्त होती हैं:
- १. ग्रह दोष, संकट निवारण और सुरक्षा: चमेली के तेल और सिंदूर के तात्विक प्रयोग से जन्मपत्रिका में उपस्थित मंगल के अमंगलकारी प्रभाव और क्रूर शनि (साढ़ेसाती, ढैय्या) के सभी कुप्रभाव तत्क्षण शांत हो जाते हैं। यह भक्त के इर्द-गिर्द नकारात्मक ऊर्जा और काले जादू (Black magic) को भेदने वाला एक अभेद्य कवच बना देता है।
- २. शारीरिक एवं मानसिक बल की चरम वृद्धि: निर्जला या फलाहारी व्रत तथा कठोर ब्रह्मचर्य के पालन से शरीर के विषैले तत्वों (Toxins) का नाश होता है। यह व्रत मानसिक भयों, अवसादों और हीन-भावनाओं (Fear-based psychological conditioning) को नष्ट कर हृदय में अपार साहस और आत्मविश्वास की स्थापना करता है।
- ३. महापापों से मुक्ति: पराशर संहिता की फल-श्रुति के अनुसार, जो भी साधक हनुमान जयंती के दिन हनुमान जी के 108 सिद्ध नामों का ध्यान और षोडशोपचार पूजा करता है, उसके ज्ञात-अज्ञात, इस जन्म और पूर्व जन्मों के समस्त महापाप नष्ट हो जाते हैं और जीव अंततः जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।
- ४. परम वैराग्य और श्रीराम भक्ति की प्राप्ति: निष्काम भाव से की गई यह पूजा साधक के मिथ्या अहंकार को भस्म कर देती है। जिस प्रकार हनुमान जी ने अपना सर्वस्व प्रभु श्रीराम को अर्पण कर दिया, उसी प्रकार यह व्रत साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की 'शुद्ध और निष्काम भक्ति' प्रदान करता है।
अंतिम निष्कर्ष:
श्री हनुमत् जन्मोत्सव का यह पवित्र व्रत मात्र कोई बाह्य कर्मकांड या रूढ़िवादी परंपरा नहीं है, अपितु यह जीव के भीतर सोई हुई असीमित ब्रह्मांडीय ऊर्जा (कुंडलिनी शक्ति), अदम्य साहस, और निष्काम सेवा-भाव को जाग्रत करने का एक महान मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान है। प्रामाणिक ग्रंथों—धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु, पराशर संहिता, और स्कंद पुराण—में वर्णित इन गूढ़ विधियों का निष्ठापूर्वक पालन करने से एक सामान्य साधक भी हनुमान जी की ईश्वरीय ऊर्जा के 'पवित्रकों' को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इसके फलस्वरूप उसके जीवन से दैहिक, दैविक और भौतिक—तीनों प्रकार के संतापों का समूल नाश हो जाता है और उसे अष्ट-सिद्धि, नव-निधि तथा ईश्वर के सामीप्य का परम कल्याणकारी मार्ग प्राप्त होता है।






