दुर्गाष्टमी पर शास्त्रसम्मत कन्या पूजन: अनुष्ठानिक विधि, विधान, मंत्र एवं दार्शनिक विवेचन
सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय और विशाल पौराणिक वाङ्मय में आदिशक्ति माँ भवानी की उपासना का सर्वोत्कृष्ट और सर्वाधिक फलदायी पर्व 'नवरात्रि' माना गया है। शारदीय अथवा वासंतिक (चैत्र) नवरात्रि के नौ दिनों में महामाया के नवदुर्गा स्वरूपों (शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक) की घोर तपस्या और आराधना के उपरांत, इस महान अनुष्ठान की पूर्णता, फलावाप्ति और दैवीय ऊर्जा के साक्षात् प्रकटीकरण के निमित्त दुर्गाष्टमी (तथा महानवमी) के दिन कन्या पूजन (जिसे कुमारी पूजन भी कहा जाता है) का विधान शास्त्रों में सर्वोपरि बताया गया है। 'स्त्रीयाः समस्तास्तव देवि भेदाः' अर्थात् संसार की समस्त स्त्रियाँ और कन्याएं साक्षात् महामाया देवी का ही अंश और स्वरूप हैं, इसी अद्वैत और विशुद्ध दार्शनिक सिद्धांत पर आधारित यह अनुष्ठान मात्र एक सामान्य कर्मकांड या परंपरा नहीं है। यह विशुद्ध प्रकृति, आदि-शक्ति और सृजनात्मक ऊर्जा के उस मूल स्वरूप का वंदन है, जहाँ विकारशून्य चेतना अपने सबसे पवित्र रूप में निवास करती है।
विभिन्न आगम और तंत्र-ग्रंथों, विशेषकर 'रुद्रयामल तंत्र', 'वाराही तंत्र', तथा महापुराणों जैसे 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण', 'मार्कंडेय पुराण' के साथ-साथ 'निर्णयसिंधु' और 'धर्मसिंधु' जैसे काल-निर्णायक धर्मशास्त्रों में कन्या पूजन की अत्यंत सूक्ष्म, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और तार्किक विधि वर्णित है। इस अनुष्ठान का उद्देश्य साधक के भीतर छिपी आध्यात्मिक चेतना (कुण्डलिनी) को जाग्रत करना और इहलौकिक तथा पारलौकिक सिद्धियों को प्राप्त करना है। प्रस्तुत शोध-प्रबंध में दुर्गाष्टमी के पावन अवसर पर नौ कन्याओं के शास्त्रीय पूजन की संपूर्ण अनुष्ठानिक प्रक्रिया, उनके चयन के कड़े नियम, निषिद्ध कर्म, चरणबद्ध पूजन-विधि, मंत्र-विज्ञान का गहन अर्थ, दान-दक्षिणा के नियम एवं व्रत के पारणा-सिद्धांतों का अत्यंत गहन एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
कुमारी पूजन का दार्शनिक, ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय आधार
शाक्त दर्शन और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय का एकमात्र कारण 'आद्या शक्ति' है। यौवनारंभ से पूर्व की कन्याओं (मुख्यतः 2 से 10 वर्ष की आयु वर्ग) को सांसारिक विकारों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—से पूर्णतः मुक्त माना जाता है। उनका अंतःकरण दर्पण के समान अत्यंत निर्मल और पवित्र होता है, जिसके कारण उनमें ईश्वरीय सत्ता (महामाया) का अवतरण, आवाहन और प्रकटीकरण सर्वाधिक शीघ्र और प्रत्यक्ष रूप से होता है। 'रुद्रयामल तंत्र' के उत्तर खंड में कुमारी पूजन को कुण्डलिनी जागरण और चक्र-भेदन से जोड़कर देखा गया है। तंत्र के अनुसार, कुमारी कन्या साक्षात् उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा का भौतिक प्रतिरूप है, जो दरिद्रता, रोग और समस्त भौतिक संतापों का तत्काल नाश कर साधक को सिद्धियां प्रदान करती है।
ऐतिहासिक और पौराणिक परिप्रेक्ष्य में, 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' के तृतीय स्कंध के 26वें और 27वें अध्याय में महर्षि वेदव्यास ने राजा जनमेजय को कन्या पूजन का विशद माहात्म्य और इसके ऐतिहासिक प्रमाण बताए हैं। महर्षि व्यास वर्णन करते हैं कि प्राचीन काल में जब एक सुशील नामक वैश्य ने ब्राह्मण से अपने संकटों के निवारण का उपाय पूछा, तो ब्राह्मण ने उसे शारदीय नवरात्रि के व्रत और कुमारी पूजन का उपदेश दिया। इसी व्रत के महात्म्य का वर्णन करते हुए यह भी बताया गया है कि त्रेता युग में स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने किष्किंधा पर्वत पर लंकापति रावण पर विजय प्राप्त करने और माता सीता की खोज में सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से अत्यंत व्याकुल अवस्था में नवरात्रि व्रत के साथ शास्त्रसम्मत कुमारी पूजन संपन्न किया था। इसी अनुष्ठान के प्रताप से भगवान राम ने समुद्र पर सेतु बांधने, कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे अजेय राक्षसों का वध करने और रावण का संहार कर सीता को पुनः प्राप्त करने में सफलता अर्जित की थी。
एक अन्य पौराणिक आख्यान के अनुसार, देवताओं के अनुरोध पर महिषासुर और कालसुर जैसे भयंकर असुरों का वध करने के लिए आदि शक्ति ने महानवमी के दिन एक छोटी कन्या का रूप धारण किया था। यही कारण है कि शाक्त परंपरा में कन्या पूजन को शक्ति के उस आदि-स्वरूप का स्मरण माना जाता है, जिसने ब्रह्मांड को दानवी शक्तियों से मुक्त कराया था।
कन्या चयन के शास्त्रीय नियम: पात्रता एवं निषेध (Patrata & Nishedha)
शास्त्रीय अनुष्ठान में पूर्णता हेतु मात्र आयु का होना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु कन्या के शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक लक्षणों पर भी अत्यंत सूक्ष्मता से ध्यान देने का कड़ा निर्देश 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' के तृतीय स्कंध के सत्ताईसवें अध्याय में महर्षि व्यास द्वारा दिया गया है। अनुष्ठान की पवित्रता और ऊर्जा के सही प्रवाह के लिए एक सुपात्र कन्या का चयन अत्यंत अनिवार्य है।
शास्त्रों में उन लक्षणों का स्पष्ट वर्णन है जिनके होने पर कन्याओं को कुमारी पूजन के अनुष्ठान में सम्मिलित करने का निषेध (वर्जना) किया गया है। महर्षि व्यास के अनुसार, जो कन्या शारीरिक रूप से किसी भी अंग से हीन (विकलांग) हो, जिसके शरीर पर कोढ़ (कुष्ठ रोग) या कोई गहरा घाव हो, उसे पूजा में कदापि नहीं बैठाना चाहिए। इसके पीछे का आध्यात्मिक तर्क यह है कि जिस पात्र में ईश्वरीय शक्ति का आवाहन किया जा रहा है, वह भौतिक और ऊर्जात्मक रूप से पूर्ण होना चाहिए। इसी प्रकार, जन्म से अंधी, तिरछी दृष्टि (भेंगी या कानी) वाली, या कुरूप कन्या का पूजन भी वर्जित बताया गया है।
शारीरिक अशुद्धता के दृष्टिकोण से, जिस कन्या के शरीर से जन्मजात या किसी रोगवश तीव्र दुर्गंध आती हो, जिसके शरीर पर अत्यधिक रोम (बाल) हों, या जो किसी भयंकर व असाध्य रोग से ग्रस्त हो, वह कुमारी पूजन के लिए सर्वथा अपात्र मानी गई है। पारिवारिक और जन्म संबंधी दोषों का भी शास्त्रों में सूक्ष्म विचार किया गया है। समय से पूर्व गर्भ से उत्पन्न होने वाली कन्या (Premature birth), विधवा स्त्री के गर्भ से उत्पन्न कन्या, या ऐसी कन्या जिसका कुल अत्यंत विशाल या अज्ञात हो (जिसके मूल गोत्र या माता-पिता का प्रामाणिक संज्ञान न हो), उसका अनुष्ठान में पूर्णतः त्याग करना अनिवार्य बताया गया है।
एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि 10 वर्ष या उससे कम आयु में भी यदि किसी कन्या का ऋतुस्राव (रजस्वला अवस्था) आरंभ हो गया हो, तो अनुष्ठानिक पवित्रता और तांत्रिक नियमों के दृष्टिकोण से उसका पूजन तुरंत वर्जित हो जाता है। रजस्वला होने पर कन्या मातृत्व की शारीरिक ऊर्जा में प्रवेश कर जाती है, और कुमारी (अक्षुण्ण ऊर्जा) का वह विशिष्ट आध्यात्मिक गुण समाप्त माना जाता है जिसकी इस विशिष्ट अनुष्ठान में आवश्यकता होती है।
इसके विपरीत, पूजा के लिए वही कन्या प्रशस्त और योग्य मानी गई है जो पूर्णतः स्वस्थ हो, रोगरहित हो, सौन्दर्यमयी हो, जिसके अंगों में कोई विकार या व्रण (घाव) न हो, और जो एक ज्ञात एवं श्रेष्ठ कुल में अपने ही माता-पिता से उत्पन्न हुई हो।
साधक के उद्देश्य और वर्ण के आधार पर शास्त्रों में कन्याओं के चयन का एक विशिष्ट और तार्किक विधान भी प्रस्तुत किया गया है। 'श्रीमद्देवीभागवत' के अनुसार, यदि साधक सर्वकार्य सिद्धि, आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष की कामना करता है, तो उसे ब्राह्मण कुल में उत्पन्न कन्या का पूजन करना चाहिए। यदि साधक को मुकदमों में विजय, राज्य सत्ता, या शत्रुओं पर जीत प्राप्त करनी है, तो उसे राजवंश या क्षत्रिय कुल में उत्पन्न कन्या का पूजन करना चाहिए। इसी प्रकार, धन-धान्य की असीम वृद्धि और व्यापारिक सफलता के लिए वैश्य अथवा शूद्र वंश में उत्पन्न कन्या पूजन के लिए योग्य मानी गई है। वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत यह भी छूट दी गई है कि ब्राह्मण को केवल ब्राह्मण कन्या का, क्षत्रियों को ब्राह्मण कन्या का, वैश्यों को ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णों की कन्याओं का, तथा शूद्र को बिना किसी भेदभाव के चारों वर्णों में उत्पन्न कन्याओं का आदरपूर्वक पूजन करने का अधिकार प्राप्त है। शिल्पकर्म या अन्य व्यवसायों में लगे मनुष्यों को अपने ही वंश की कन्याओं का पूजन करना चाहिए।
एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि यद्यपि साधक को अपने घर में अपनी स्वयं की पुत्री का देवी रूप में सम्मान और नित्य चरण स्पर्श करना चाहिए, परंतु नव-कन्याओं की शास्त्रीय गिनती (अनुष्ठानिक नौ की संख्या) में अपनी पुत्री को शामिल नहीं करना चाहिए । कन्याएं बाहर से या अन्य कुलों और पड़ोस से आमंत्रित होनी चाहिए। अपनी पुत्री को उन आमंत्रित कन्याओं के साथ अलग से बैठाकर भोजन अवश्य कराना चाहिए, ताकि उसका मन खिन्न न हो, परंतु अनुष्ठानिक संकल्प की पूर्ति हेतु वह नौ की संख्या में नहीं गिनी जाएगी, क्योंकि वह साधक के अपने ही परिवार का अभिन्न अंग है और संकल्पित कर्मकाण्ड में दान-दक्षिणा के नियम अपने ही आश्रितों पर पूर्णतः लागू नहीं होते।
नौ कन्याओं की आयु, विशिष्ट नवदुर्गा स्वरूप और फल-श्रुति
शास्त्रों में यह स्पष्ट और तार्किक निर्देश है कि एक वर्ष की आयु वाली कन्या का पूजन किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए। इसके पीछे का व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि एक वर्ष की अबोध बालिका गंध, रस, और नैवेद्य के स्वाद से पूर्णतः अनभिज्ञ होती है। वह अर्पित किए गए प्रसाद को अपने हाथों से ग्रहण करने, मंत्रों की ध्वनि के प्रति प्रतिक्रिया देने, और यजमान के भावों को स्वीकार करने में शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम होती है। अतः 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याओं को ही नवदुर्गा का साक्षात्, चैतन्य और जाग्रत स्वरूप मानकर पूजने का विधान है।
नीचे दी गई तालिका 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' के तृतीय स्कंध और 'रुद्रयामल' जैसे तंत्र-ग्रंथों के संयुक्त प्रमाणों पर आधारित है, जो प्रत्येक कन्या की आयु, उनके विशिष्ट देवी स्वरूप के नाम, और उनके श्रृंगारित पूजन से साधक को प्राप्त होने वाले फलों (Phal-Shruti) का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन करती है:
| कन्या की आयु | देवी का नाम (स्वरूप) | प्रतीकात्मक अर्थ एवं पूजन का शास्त्रीय फल (Phal-Shruti) |
|---|---|---|
| 2 वर्ष | कुमारी | दो वर्ष की बालिका को 'कुमारी' कहा जाता। यह अवस्था शुद्धतम ऊर्जा का प्रतीक है। कुमारी स्वरूप के पूजन से साधक की घोर दरिद्रता, दुःख और क्लेशों का नाश होता है। इनके पूजन से घर में आयु, बल और सौभाग्य की निरंतर वृद्धि होती है। |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति | तीन वर्ष की कन्या 'त्रिमूर्ति' स्वरूप मानी जाती है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संयुक्त सृजनात्मक, पालक और संहारक शक्तियों का भौतिक प्रतीक है। इनके पूजन से धर्म, अर्थ और काम—तीनों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है तथा परिवार में दीर्घायु की प्राप्ति होती है। |
| 4 वर्ष | कल्याणी | चार वर्ष की आयु वाली कन्या साक्षात् 'कल्याणी' देवी का रूप है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का मंगल और कल्याण करने वाली शक्ति हैं। इनके पूजन से साधक की समस्त लौकिक मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और समाज में राजसुख व असीम सम्मान प्राप्त होता है। |
| 5 वर्ष | रोहिणी | पांच वर्ष की कन्या को 'रोहिणी' के नाम से संबोधित किया जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से ये पूर्वजन्म के संचित कर्मों का क्षय कर जीवन में नए बीजों (संभावनाओं) का रोपण करती हैं। इनका विधिवत पूजन करने से असाध्य रोगों से मुक्ति और उत्कृष्ट स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। |
| 6 वर्ष | कालिका | छह वर्ष की कन्या 'कालिका' स्वरूप है। यह चराचर जगत को कल्प के अंत में अपने भीतर समाहित करने वाली महाशक्ति हैं। इनके पूजन से घोर शत्रुओं का शमन होता है, तंत्र-बाधा से मुक्ति मिलती है और साधक को अष्ट-सिद्धियों की प्राप्ति होती है। |
| 7 वर्ष | चण्डिका | सात वर्ष की बालिका को 'चण्डिका' का रूप माना गया है। अत्यंत उग्र स्वभाव वाली चण्डिका के पूजन से ऐश्वर्य, विपुल धन-संपत्ति, राज्य सत्ता की प्राप्ति और सभी प्रकार के पापों व भय का समूल नाश होता है। |
| 8 वर्ष | शाम्भवी | आठ वर्ष की कन्या ज्ञान और वेदों की अधिष्ठात्री 'शाम्भवी' स्वरूपा है। यह अकारण उत्पन्न होने वाली आनंदमयी शक्ति है। शाम्भवी का पूजन करने से विवादों में विजय, मुकदमों में जीत और अथाह बुद्धिमत्ता व सम्मोहन शक्ति की प्राप्ति होती है। |
| 9 वर्ष | दुर्गा | नौ वर्ष की कन्या साक्षात् 'दुर्गा' देवी का जाग्रत रूप है। दुर्गति का नाश करने वाली इस शक्ति के पूजन से परलौकिक तथा इहलौकिक पूर्णता प्राप्त होती है। यह कठिन से कठिन कार्यों को सुलभ बनाती है और शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल करती है। |
| 10 वर्ष | सुभद्रा / भद्रा | दस वर्ष की कन्या को 'सुभद्रा' या भद्रा कहा जाता है। भक्तों का हर प्रकार से मंगल करने वाली और अमंगल का हरण करने वाली सुभद्रा के पूजन से साधक की सभी अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर निर्बाध गति प्राप्त होती है। |
इस प्रकार, आयु के क्रमिक विकास के साथ-साथ कन्याओं में देवी की सूक्ष्म ऊर्जा का स्वरूप भी परिवर्तित होता रहता है। एक सिद्ध साधक अपनी विशिष्ट कामना (जैसे—आरोग्य के लिए रोहिणी, विजय के लिए चण्डिका, या ज्ञान के लिए शाम्भवी) के अनुसार उसी विशिष्ट आयु की एक या अनेक कन्याओं का पूजन भी कर सकता है, अथवा संपूर्णता के लिए सभी आयु वर्ग की नौ कन्याओं का एक साथ पूजन कर नवदुर्गा के संपूर्ण ब्रह्मांडीय चक्र को अपने घर में आमंत्रित कर सकता है।
अनुष्ठान में बटुक भैरव (लांगूर) का अनिवार्य समावेश
शास्त्रों और लोक-परंपराओं में नवरात्रि का कन्या पूजन तब तक पूर्ण और फलदायी नहीं माना जाता है जब तक कि नौ देवियों के साथ कम से कम एक बालक (बटुक) का पूजन न किया जाए। लोक भाषा में इस बालक को 'लांगूर' या 'लंगूर' भी कहा जाता है।
आगम और तंत्र शास्त्रों में भगवान भैरव को आदिशक्ति माता रानी का परम रक्षक, सेवक और द्वारपाल माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब आसुरी शक्तियों का आतंक बढ़ा, तो भगवान शिव ने देवी की रक्षा और उनके अनुष्ठानों की पूर्णता हेतु अपने ही अंश से बटुक भैरव (बाल रूप) को प्रकट किया था। काल भैरव के विपरीत, बटुक भैरव अत्यंत सौम्य, कृपालु और क्षमाशील हैं, जो एक अबोध बालक के रूप में देवी के साथ निवास करते हैं।
प्रतीकात्मक और दार्शनिक अर्थों में, जिस प्रकार शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व अधूरा है और शक्ति के बिना शिव शव के समान हैं, उसी प्रकार भैरव की उपस्थिति के बिना शक्ति की ऊर्जा का पूर्ण रक्षण नहीं होता। कन्याओं की आयु के समान ही एक छोटे बालक (2 से 10 वर्ष की आयु) को बटुक भैरव अथवा भगवान श्री गणेश का स्वरूप मानकर कन्याओं के साथ ही उसी पंक्ति में आसन पर आदरपूर्वक बैठाया जाता है।
भैरव को प्रसन्न किए बिना देवी साधना का फल साधक तक सुरक्षित नहीं पहुँचता; मार्ग में ही नकारात्मक शक्तियां या विघ्न उस पुण्य को क्षीण कर सकते हैं। बटुक भैरव की उपस्थिति अनुष्ठान को अकाल मृत्यु, तंत्र-बाधा, और राहु-केतु जैसे क्रूर ग्रहों के कुप्रभावों से बचाती है। कन्या पूजन के दौरान बटुक को तिलक करते समय और उन्हें नैवेद्य अर्पण करते समय बटुक भैरव के विशिष्ट मंत्र— "ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय" अथवा "ॐ ह्रीं आपदुद्धारणाय कुरु कुरु स्वाहा"—का मानसिक जप अवश्य किया जाना चाहिए। यह मंत्र साधक के जीवन से अचानक आने वाली विपत्तियों का तुरंत शमन करता है और अनुष्ठान को निर्विघ्न संपन्न कराता है।
पूजन का काल, मुहूर्त एवं अनुष्ठानिक पूर्व-तैयारी
शास्त्रों में कन्या पूजन के लिए चैत्र अथवा शारदीय नवरात्रि की अष्टमी (दुर्गाष्टमी / महाष्टमी) या नवमी (महानवमी) तिथि को सर्वाधिक प्रशस्त माना गया है। दुर्गाष्टमी के दिन माँ महागौरी का पूजन होता है, जो पूर्णतः शांति और करुणा की देवी हैं। अतः इस दिन कन्याओं का पूजन अत्यंत शुभ फलदायी होता है। इसके अतिरिक्त, नवमी तिथि माँ सिद्धिदात्री को समर्पित है, जहाँ सभी सिद्धियां पूर्णता को प्राप्त होती हैं, अतः महानवमी के दिन भी यह अनुष्ठान अपनी पूर्णता तक पहुँचता है।
'श्रीमद्देवीभागवत' के अनुसार, यदि कोई साधक अपनी शारीरिक असमर्थता या अन्य कारणों से पूरे नौ दिन का उपवास या व्रत नहीं कर पाता है, तो उसे केवल सप्तमी, अष्टमी और नवमी—इन तीन रात्रियों में देवी की आराधना करनी चाहिए और अष्टमी या नवमी को कन्याओं को जिमाना चाहिए। ऐसा करने से उसे संपूर्ण नौ दिनों के नवरात्रि व्रत का फल बिना किसी संशय के प्राप्त हो जाता है। प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने वाली महाभयंकर भगवती भद्रकाली करोड़ों योगिनियों के साथ अष्टमी तिथि को ही प्रकट हुई थीं, इसलिए अष्टमी को कन्या पूजन का विशिष्ट तांत्रिक महत्व भी है।
अनुष्ठान से पूर्व की तैयारियां (Pre-requisites):
कन्याओं के आगमन से पूर्व यजमान को घर और पूजन स्थल की पवित्रता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- स्थान शुद्धि: घर के जिस कक्ष या आंगन में कन्याओं को बैठाना है, उसे जल से धोकर साफ करना चाहिए और वहां गंगाजल या गोमूत्र छिड़क कर उसे तांत्रिक रूप से पवित्र (Sanctify) किया जाना चाहिए।
- आसन व्यवस्था: कन्याओं को सीधे नग्न भूमि पर बैठाना शास्त्रों में घोर अपमान माना गया है। उनके बैठने के लिए कुशा का आसन, ऊनी कंबल, या लकड़ी की साफ चौकियों (पीढ़ा) की व्यवस्था की जानी चाहिए।
- पूजन सामग्री का एकत्रीकरण: कलश, आम के पल्लव, रोली (कुमकुम), हल्दी, शुद्ध अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), धूप, दीप (गाय के घी का), शुद्ध जल का पात्र, तौलिया, लाल मौली (कलावा), और सुगन्धित पुष्पों की व्यवस्था पहले ही कर लेनी चाहिए ताकि अनुष्ठान के मध्य में यजमान को उठना न पड़े।
चरणबद्ध अनुष्ठानिक पूजन-विधि
कन्या पूजन एक अत्यंत संवेदनशील, भावपूर्ण और शास्त्र-सम्मत अनुष्ठान है। 'रुद्रयामल तंत्र', 'धर्मसिंधु' और आगम ग्रंथों के अनुसार इसकी विधि निम्नलिखित निश्चित क्रम में ही संपादित की जानी चाहिए:
1. निमंत्रण एवं स्वागत (Nimantran & Swagat)
साधक को कन्याओं को उनके घर जाकर एक दिन पूर्व, या कम से कम पूजन से कुछ घंटे पूर्व, अत्यंत आदरपूर्वक आमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रण देते समय भाव यह होना चाहिए कि वे साक्षात् भगवती को अपने गृह में पधारने का न्योता दे रहे हैं। जब कन्याएं और बटुक घर के मुख्य द्वार पर पहुंचें, तो पूरे परिवार को उनके समक्ष नतमस्तक होकर, पुष्पांजलि अर्पित करते हुए और माता के जयकारों के साथ उनका गृह-प्रवेश कराना चाहिए।
2. पाद प्रक्षालन (चरण धोना)
कन्याओं को उनके निर्धारित और स्वच्छ आसनों पर क्रमशः बैठाने के पश्चात्, घर के यजमान (जिसमें पति और पत्नी दोनों सम्मिलित हों) को एक कांसे, तांबे या पीतल के विस्तृत पात्र (थाली) में प्रत्येक कन्या के पैर रखने चाहिए।
- एक शुद्ध जल के पात्र (जिसमें थोड़ा गंगाजल, दूध और पुष्प की पंखुड़ियां मिली हों) से उनके नन्हे चरणों को अपने हाथों से मलकर धोना चाहिए।
- विद्वानों और तंत्रवेत्ताओं के अनुसार, पाद-प्रक्षालन की यह प्रक्रिया साधक के अहंकार (Ego) के पूर्ण त्याग और परम दैवीय सत्ता के प्रति बिना शर्त समर्पण का सर्वोत्कृष्ट भौतिक प्रतीक है।
- पैर धोने के पश्चात् एक स्वच्छ और कोमल वस्त्र (तौलिया) से उनके चरणों को पोंछना चाहिए और उन पर थोड़ा सा कुमकुम या हल्दी का लेप (अल्ता) लगाना चाहिए।
3. वैदिक संकल्प (Sankalpa)
हिंदू धर्म के किसी भी अनुष्ठान, जप या व्रत में 'संकल्प' का सर्वाधिक और अभेद्य महत्व है। संकल्प के बिना किया गया कोई भी कर्म दिशाहीन होता है और उसका पूर्ण फल साधक को प्राप्त नहीं होता। यह साधक की इच्छा, उसकी चेतना और उसके उद्देश्य को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एक सूत्र में बांधता है। हाथ में शुद्ध जल, अक्षत (चावल), और एक पुष्प लेकर यजमान को वैदिक संकल्प लेना चाहिए। 'धर्मसिंधु' और पूजा-प्रकाश ग्रंथों के आधार पर कन्या पूजन का प्रामाणिक संकल्प मंत्र इस प्रकार है:
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे... अमुक संवत्सरे... शुभायने शुभ ऋतौ शुभ मासे शुभ पक्षे शुभ तिथौ शुभ वासरे... अमुक गोत्रोत्पन्नः अमुक नामधेयोऽहम् मम जन्मनि जन्मान्तरे वा श्री दुर्गा देवी प्रीत्यर्थं सर्वपापक्षय पूर्वक दीर्घायु विपुल धनधान्य पुत्र पौत्रादि अनवच्छिन्न संतति वृद्धि श्री लक्ष्मी कीर्ति लाभ शत्रु पराजय सदाभीष्ट सिद्ध्यर्थं नव-कुमारी पूजनम् अहम् करिष्ये।
(इस संकल्प का गूढ़ अर्थ यह है कि: ॐ विष्णु का स्मरण करते हुए, इस असीमित ब्रह्मांडीय कालचक्र में—ब्रह्मा के दूसरे परार्ध में, श्वेतवाराह कल्प में, वैवस्वत मन्वन्तर में, और कलियुग के प्रथम चरण में—इस जम्बूद्वीप के भारतवर्ष में, आज के इस विशिष्ट संवत्सर, मास, पक्ष और तिथि को, मैं अमुक गोत्र में उत्पन्न और अमुक नाम वाला व्यक्ति, अपने इस जन्म और पूर्व जन्मों के सभी पापों के विनाश के लिए, लंबी आयु, विपुल धन-संपत्ति, संतान की वृद्धि, यश की प्राप्ति, अपने शत्रुओं पर विजय और माता नवदुर्गा की असीम कृपा व प्रसन्नता प्राप्त करने हेतु इस पवित्र नव-कुमारी पूजन का संकल्प लेता हूँ।) यह संकल्प पढ़कर हाथ का जल और अक्षत भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ देना चाहिए।
4. तिलक, रक्षासूत्र एवं शृंगार
- तिलक: इसके उपरांत प्रत्येक कन्या और बटुक भैरव के ललाट (माथे) पर कुमकुम (रोली), हल्दी और अष्टगंध चंदन का तिलक लगाना चाहिए। माथे पर आज्ञा चक्र स्थित होता है, और कुमकुम का तिलक उसी चेतना-केंद्र को जागृत करने का प्रतीक है। तिलक के ऊपर साबुत अक्षत (चावल) लगाने चाहिए।
- रक्षासूत्र: उनके दाहिने हाथ की कलाई पर लाल कलावा (मौली) बांधना चाहिए। यह मौली साधक और देवी के मध्य एक रक्षा-कवच और आध्यात्मिक बंधन का प्रतीक है।
- शृंगार और वस्त्र: कन्याओं को साक्षात् देवी का स्वरूप मानकर उनके सिर पर लाल या गोटेदार चुनरी ओढ़ानी चाहिए । यदि सामर्थ्य हो तो उन्हें सुगन्धित पुष्पों की माला पहनानी चाहिए और पुष्प अर्पित करने चाहिए।
नव-कन्याओं के विशिष्ट पूजन मंत्र (श्रीमद्देवीभागवत के आधार पर)
'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' (तृतीय स्कंध) और 'कुमारी स्तोत्र' के अनुसार, प्रत्येक आयु की कन्या का पूजन करते समय साधक को कुछ विशिष्ट श्लोकों और मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए। गंध, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करते हुए इन मंत्रों का सस्वर पाठ अत्यंत चमत्कारी और फलदायी होता है। इन मंत्रों में प्रत्येक कन्या के देवी स्वरूप की स्तुति और उनके विशिष्ट गुणों का वर्णन है:
1. दो वर्ष की कुमारी कन्या के लिए मंत्र:
कुमारस्य च तत्त्वानि या सृजत्यपि लीलया । कादीनपि च देवांस्तां कुमारीं पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: जो भगवती अत्यंत सहजता और लीलापूर्वक ब्रह्मादि देवताओं और कुमार के गूढ़ तत्त्वों की रचना करती हैं, उन 'कुमारी' शक्ति का मैं असीम श्रद्धा से पूजन करता हूँ।)
2. तीन वर्ष की त्रिमूर्ति कन्या के लिए मंत्र:
सत्त्वादिभिस्त्रिमूर्तिर्या तैर्हि नानास्वरूपिणी । त्रिकालव्यापिनी शक्तिस्त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: जो सत्त्व, रज और तम—इन तीनों लौकिक गुणों से युक्त होकर अनेक रूप धारण करती हैं और भूत, वर्तमान व भविष्य—तीनों कालों में सर्वत्र व्याप्त हैं, उन 'त्रिमूर्ति' शक्ति की मैं पूजा करता हूँ।)
3. चार वर्ष की कल्याणी कन्या के लिए मंत्र:
कल्याणकारिणी नित्यं भक्तानां पूजिताऽनिशम् । पूजयामि च तां भक्त्या कल्याणीं सर्वकामदाम् ॥
(अर्थ: जो निरंतर पूजित होने पर अपने भक्तों का सर्वदा और नित्य कल्याण करती हैं, सभी लौकिक और पारलौकिक कामनाओं को पूर्ण करने वाली उन 'कल्याणी' देवी का मैं भक्तिपूर्वक पूजन करता हूँ।)
4. पांच वर्ष की रोहिणी कन्या के लिए मंत्र:
रोहयन्ती च बीजानि प्राग्जन्मसञ्चितानि वै । या देवी सर्वभूतानां रोहिणीं पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: जो देवी सम्पूर्ण जीवों के पूर्वजन्म के संचित कर्मरूपी बीजों का रोपण करती हैं और प्रारब्ध का निर्धारण करती हैं, उन भगवती 'रोहिणी' की मैं पूर्ण निष्ठा से उपासना करता हूँ।)
5. छह वर्ष की कालिका कन्या के लिए मंत्र:
काली कालयते सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम् । कल्पान्तसमये या तां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: जो देवी महाप्रलय या कल्प के अंत में चराचरसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने ही महा-स्वरूप में लीन कर लेती हैं, उन अजेय 'कालिका' की मैं पूजा करता हूँ।)
6. सात वर्ष की चण्डिका कन्या के लिए मंत्र:
तां चण्डपापहरणीं चण्डिकां पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: अत्यंत उग्र रूप धारण कर चण्ड-मुण्ड जैसे राक्षसों का संहार करने वाली और प्राणियों के घोर पापों को हरने वाली महाशक्ति 'चण्डिका' की मैं पूजा करता हूँ।)
7. आठ वर्ष की शाम्भवी कन्या के लिए मंत्र:
अकारणात्समुत्पत्तिर्यन्मयैः परिकीर्तिता । यस्यास्तां सुखदां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: वेदों और श्रुतियों के द्वारा जिनकी उत्पत्ति बिना किसी बाह्य कारण के (स्वयंभू) बताई गई है, उन सुख और शांति प्रदान करने वाली 'शाम्भवी' देवी का मैं पूजन करता हूँ।)
8. नौ वर्ष की दुर्गा कन्या के लिए मंत्र:
दुर्गात्त्रायति भक्तं या सदा दुर्गातिनाशिनी । दुर्ज्ञेया सर्वदेवानां तां दुर्गां पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: जो सदा भयंकर संकटों से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और जो देवताओं के लिए भी अपनी माया के कारण दुर्जेय (समझने में कठिन) हैं, उन दुर्गतिनाशिनी साक्षात् 'दुर्गा' की मैं पूजा करता हूँ।)
9. दस वर्ष की सुभद्रा (भद्रा) कन्या के लिए मंत्र:
सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा । अभद्रनाशिनीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ॥
(अर्थ: जो श्रद्धापूर्वक पूजित होने पर सदा अपने भक्तों का मंगल ही मंगल करती हैं, उन समस्त अमंगलों और अभद्रों का नाश करने वाली 'सुभद्रा' देवी की मैं पूजा करता हूँ।)
उपर्युक्त श्लोकों के अतिरिक्त, संपूर्ण अनुष्ठान के दौरान साधक को नवार्ण मंत्र— "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"—का मानसिक जप निरंतर करते रहना चाहिए। तंत्र शास्त्र में नवार्ण मंत्र के नौ अक्षर नवदुर्गा की नौ शक्तियों के ही वाचक हैं। यह मंत्र वातावरण की समस्त नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर वहां देवी की साक्षात् उपस्थिति का निर्माण करता है। 'रुद्रयामल तंत्र' की 'कुमारी पूजा पद्धति' के अनुसार, साधक को अक्षत और पुष्प हाथ में लेकर "ॐ कुमार्यै नमः, ॐ त्रिमूर्त्यै नमः, ॐ कल्याण्यै नमः..." इत्यादि नाम-मंत्रों से भी पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए।
नैवेद्य (भोजन) अर्पण का शास्त्रीय विधान और सात्त्विकता
मंत्रों द्वारा पुष्पांजलि अर्पित करने और भगवती का आवाहन करने के पश्चात् कन्याओं को भोजन (नैवेद्य) कराया जाता है। भोजन अर्पण की यह प्रक्रिया अत्यंत शुद्धता और भाव के साथ संपन्न होनी चाहिए।
- पूर्ण सात्त्विकता: कन्याओं के लिए पकाया गया भोजन पूर्णतः शुद्ध, सात्त्विक और बिना प्याज-लहसुन का होना चाहिए। भोजन पकाने वाले व्यक्ति को स्नान करके, पवित्र वस्त्र धारण कर, और ईश्वर का स्मरण करते हुए (बिना क्रोध या झुंझलाहट के) भोजन तैयार करना चाहिए।
- पारंपरिक भोग: यद्यपि समय के साथ भोजन में कई विकल्प आ गए हैं, परंतु शास्त्रों और युगों पुरानी परंपराओं के अनुसार कन्याओं को सूजी का हलवा, शुद्ध घी में बनी पूड़ी और काले चने (Black chickpeas) का प्रसाद खिलाना सर्वाधिक प्रशस्त और अनिवार्य माना गया है। इसके साथ खीर, मालपुए या ताजे ऋतुफल भी परोसे जा सकते हैं।
- भगवती को प्रथम भोग: कन्याओं को भोजन परोसने से पूर्व, उस पके हुए भोजन का सबसे पहला भोग भगवती दुर्गा के मुख्य श्रीविग्रह (मूर्ति या कलश) के समक्ष मंत्रोच्चार के साथ लगाना चाहिए। देवी को अर्पित किए गए उस प्रसाद को ही बाद में कन्याओं के भोजन में मिलाकर उन्हें परोसना चाहिए।
- आधुनिक निषेध: एक अत्यंत महत्वपूर्ण ध्यातव्य विषय यह है कि जिस समय कन्याएं साक्षात् नवदुर्गा के बाल-रूप में आसन पर विराजमान हों, उस समय उन्हें बाजार की अप्रमाणित और अशुद्ध वस्तुएं (जैसे चॉकलेट, फास्ट फूड, चिप्स आदि) कतई नहीं खिलानी चाहिए। यह भगवती की गरिमा, पद और अनुष्ठान की सात्त्विकता के पूर्णतः विरुद्ध है।
- भोजन के उपरांत उन्हें मुखवास (जैसे इलायची, सौंफ या सादा पान) अर्पित किया जा सकता है।
- भोजन कराते समय यजमान को अत्यंत विनम्र रहना चाहिए। कन्याओं पर अधिक खाने के लिए किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डालना चाहिए। वे जितना स्वेच्छा और प्रसन्नता से ग्रहण करें, उसे माता का प्रसाद मानकर आदरपूर्वक खिलाना चाहिए।
आरती, दक्षिणा एवं दान-विधान (Dan-Vidhan)
भोजन का सत्कार पूर्ण होने के पश्चात्, अनुष्ठान अपने अंतिम और सर्वाधिक भावपूर्ण चरण में प्रवेश करता है。
सामूहिक आरती:
कन्याओं के भोजन उपरांत हाथ-मुंह धुलवाकर उन्हें पुनः आसन पर बैठाना चाहिए। तत्पश्चात्, कर्पूर और शुद्ध गाय के घी के दीपक से सभी कन्याओं और बटुक भैरव की सामूहिक आरती उतारनी चाहिए। आरती के समय शंख, घंटी और मंजीरे बजाकर घर में पूर्ण हर्षोल्लास का वातावरण बनाना चाहिए। यदि संभव हो तो बच्चों को प्रसन्न करने के लिए कोई भजन या स्तुति भी गानी चाहिए, क्योंकि शास्त्रों का मत है कि कन्याओं की मुस्कान और प्रसन्नता में ही देवी का आशीर्वाद छिपा होता है।
दक्षिणा एवं उपहार (Dan-Vidhan):
दान और दक्षिणा के बिना हिंदू धर्म का कोई भी कर्मकांड या अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता। 'धर्मसिंधु' और 'निर्णयसिंधु' जैसे ग्रंथों में दान की महिमा का विस्तार से मनोवैज्ञानिक और कर्म-सिद्धांत के आधार पर वर्णन किया गया है।
यजमान को अपनी सामर्थ्य के अनुसार, बिना किसी कंजूसी (कृपणता) के, खुले हृदय से दान देना चाहिए। शास्त्रों का दृढ़ मत है कि कन्या पूजन में जो भी द्रव्य, धन या वस्तु खर्च की जाती है, महालक्ष्मी और नवदुर्गा उसका लाख गुना फल साधक को तत्काल किसी न किसी रूप में लौटाती हैं。
पारंपरिक विद्वान इसके संदर्भ में आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'कनकधारा स्तोत्र' का उदाहरण देते हैं, जहाँ एक दरिद्र ब्राह्मणी द्वारा श्रद्धापूर्वक मात्र एक सूखा आंवला दान करने पर देवी लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उसके घर में सोने के आंवलों की वर्षा कर दी थी। यही सिद्धांत कन्या पूजन के दान पर भी लागू होता है。
दान की वस्तुएं: दक्षिणा के रूप में नकद राशि (11, 21, 51, 101 रुपये या यथाशक्ति), श्रृंगार की सामग्री (चूड़ियाँ, बिंदी, लाल फीते), पठन-पाठन की सामग्री (कलम, सुंदर कॉपियां, धार्मिक कहानियों की पुस्तकें), खिलौने, या नए वस्त्र दिए जा सकते हैं ।
विदाई के समय प्रत्येक कन्या के हाथ में कुछ ऋतुफल (जैसे केला, सेब या श्रीफल/नारियल) अवश्य रखने चाहिए, क्योंकि तंत्र शास्त्र का वाक्य है "फलेन फलितम सर्वम" अर्थात् फल का दान करने से साधक को अपने कर्मों का उत्तम फल प्राप्त होता है。
साष्टांग प्रणाम एवं विदाई:
पूजन और दान प्रक्रिया के अंत में यजमान, उसकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों को कन्याओं के समक्ष साष्टांग (या पंचांग) प्रणाम कर उनके नन्हे चरणों का स्पर्श करना चाहिए। उनसे अनुष्ठान में हुई किसी भी ज्ञात-अज्ञात भूल-चूक के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए और अत्यंत ससम्मान उन्हें उनके द्वार तक विदा करना चाहिए。
यजमान के लिए व्रत के नियम, निषेध एवं पारणा (Parana) का शास्त्रीय विमर्श
नवरात्रि का व्रत और अनुष्ठान करने वाले यजमान के लिए धर्मशास्त्रों में कुछ कड़े नियम और आचार-संहिता निर्धारित की गई है, जिनका पालन कन्या पूजन के दिन भी अनिवार्य है:
यजमान के लिए निषेध (Prohibitions for Yajaman)
- दिन में शयन का निषेध: 'धर्मसिंधु' के अनुसार व्रती को दिन के समय कदापि शयन नहीं (सोना नहीं) चाहिए। दिन में सोने से अर्जित पुण्य का क्षय होता है, यकृत (Liver) की कार्यप्रणाली पर बुरा प्रभाव पड़ता है, शरीर में कफ की वृद्धि होती है और आयु क्षीण होती है।
- क्रोध एवं कामुकता से दूरी: व्रत और अनुष्ठान के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन, असत्य भाषण से दूरी, और मन, वचन व कर्म से किसी भी जीव की हिंसा सर्वथा वर्जित है। सात्त्विक पूजा में निष्काम भाव रखने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
व्रत की पारणा (Breaking the Fast) का निर्णयसिंधु आधारित विमर्श
कन्या पूजन पूर्ण होने और कन्याओं को विदा करने के पश्चात् ही यजमान को देवी का प्रसाद ग्रहण कर अपना नौ दिन का व्रत खोलना चाहिए, जिसे 'पारणा' कहा जाता है。
'निर्णयसिंधु' ग्रंथ में व्रत के पारणा के सटीक समय को लेकर तत्कालीन विद्वानों के मतों का अत्यंत गहन विश्लेषण किया गया है:
- कुछ प्राचीन आचार्यों और स्मृतियों का मत है कि पारणा महानवमी तिथि के चौथे चरण (अंतिम भाग) में ही कर लेना चाहिए, क्योंकि नवमी ही व्रत की अंतिम तिथि होती है।
- वहीं दूसरी ओर, अन्य आचार्यों का तर्क है कि नवमी तिथि के पूर्णतः समाप्त होने के बाद, दशमी तिथि के प्रथम चरण में पारणा करना अधिक शास्त्रसम्मत है, ताकि नवमी की पूर्णता खंडित न हो।
'निर्णयसिंधु' के प्रणेता कमलाकर भट्ट के अनुसार ये दोनों ही मत शास्त्र-सम्मत हैं और इनमें से किसी का भी पूर्णतः निषेध नहीं किया गया है। अतः साधक अपनी पारिवारिक परंपरा (कुलाचार), क्षेत्रीय मान्यता (देशाचार) और गुरु के निर्देशानुसार नवमी के चौथे चरण अथवा दशमी के प्रथम चरण में पारणा कर सकता है。
उपसंहार एवं दार्शनिक निष्कर्ष
दुर्गाष्टमी (तथा महानवमी) के पावन अवसर पर किया जाने वाला नौ कन्याओं का पूजन मात्र एक कर्मकांडीय औपचारिकता या लौकिक प्रथा नहीं है; यह सनातन धर्म के उस अत्यंत गूढ़ और उच्च आध्यात्मिक रहस्य का प्रकटीकरण है जहाँ साक्षात् ब्रह्मांडीय ऊर्जा (मैक्रोकोस्म) को एक नन्ही और विकाररहित कन्या (माइक्रोकोस्म) के भौतिक शरीर में स्थापित कर पूजा जाता है। 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण', 'रुद्रयामल तंत्र' तथा 'धर्मसिंधु' व 'निर्णयसिंधु' जैसे प्रामाणिक धर्मशास्त्रों के साक्ष्य यह निर्विवाद रूप से सिद्ध करते हैं कि जो साधक आयु-क्रम से सुपात्र कन्याओं का चयन कर, शुद्ध सात्त्विक और निष्काम भाव से उनका पाद-प्रक्षालन करता है, वैदिक और तांत्रिक मंत्रों द्वारा उनका आवाहन करता है, उन्हें नैवेद्य अर्पण करता है, और बिना किसी कृपणता के उनका शृंगार व दक्षिणा से वंदन करता है, वह इस लोक में अतुलनीय ऐश्वर्य, यश, आरोग्य और भौतिक सुख भोगकर अंत में परम मोक्ष (कैवल्य पद) को प्राप्त करता है。
यह अनुष्ठान समाज में स्त्री-तत्व के प्रति अगाध सम्मान, पवित्रता की स्थापना और मानवता को यह स्मरण कराने का एक अद्वितीय और मनोवैज्ञानिक उपकरण भी है कि सृष्टि की मूल संचालक शक्ति उसी कोमलता और पवित्रता में निवास करती है, जो एक कन्या के मुखमंडल पर दृष्टिगोचर होती है। सात्त्विक विधि, शास्त्रोक्त मंत्रों के सटीक उच्चारण और हृदय की असीम श्रद्धा के साथ किया गया कुमारी पूजन साधक के जीवन के समस्त संतापों को भस्म कर उसे नवदुर्गा के अभेद्य रक्षा-कवच से आच्छादित कर देता है。






