नवग्रह शांति पूजा: जन्मपत्रिका के दोष निवारण हेतु ग्रह-शांति यज्ञ की शास्त्रसम्मत विधि
वैदिक ज्योतिष एवं ब्रह्मांडीय दर्शन: एक शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य
सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष शास्त्र के गहन अध्ययन से यह प्रमाणित होता है कि मानव जीवन और ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के मध्य एक अटूट, सूक्ष्म और तार्किक संबंध है। 'यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे' (जो इस ब्रह्मांड में है, वही मानव शरीर या पिंड में भी विद्यमान है) के दार्शनिक सिद्धांत के अनुसार, अंतरिक्ष में परिक्रमा कर रहे ग्रह केवल जड़ खगोलीय पिंड नहीं हैं, अपितु वे चेतन सत्ता के प्रतिनिधि और ईश्वर की कर्म-फल प्रदाता शक्तियों के सजीव वाहक हैं। संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'ग्रह' शब्द 'ग्रह्' धातु से निष्पन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'पकड़ना', 'ग्रहण करना' अथवा 'नियंत्रित करना' । ये नवग्रह अपनी सूक्ष्म रश्मियों और गुरुत्वाकर्षण तरंगों के माध्यम से पृथ्वी पर जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी के प्रारब्ध, कर्म, विचार, स्वास्थ्य और नियति को अपने नियंत्रण में रखते हैं ।
महर्षि पराशर द्वारा प्रणीत 'बृहत् पाराशर होरा शास्त्र' (BPHS), जिसे वैदिक ज्योतिष का विश्वकोश माना जाता है, के प्रारंभिक अध्यायों में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि परब्रह्म स्वरूप भगवान श्री विष्णु ने जीवात्माओं को उनके पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का फल प्रदान करने के उद्देश्य से ही नवग्रहों का अवतार धारण किया है । जब किसी जातक के जन्म के समय इन ग्रहों की स्थिति गोचर या जन्मपत्रिका में प्रतिकूल, नीच, शत्रु-क्षेत्री अथवा पाप प्रभाव में होती है, तो जन्मपत्रिका में विभिन्न प्रकार के अरिष्ट और दोष उत्पन्न होते हैं। कालसर्प दोष, पितृ दोष, गुरु-चांडाल योग, अंगारक दोष, साढ़े-साती और मारकेश की दशाएं इन्ही ग्रहीय असंतुलनों का परिणाम हैं । इन दुष्प्रभावों को शांत करने, नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने और अनुकूल ग्रहों की रश्मियों को पुष्ट करने हेतु 'नवग्रह शांति पूजा' और 'ग्रह-शांति यज्ञ' (हवन) का अत्यंत विस्तृत विधान शास्त्रों में वर्णित है ।
मत्स्य पुराण (अध्याय 93), अग्नि पुराण (अध्याय 164) तथा विभिन्न यज्ञ-विधि ग्रंथों में नवग्रह होम और शांति विधान की प्रामाणिक प्रक्रिया का विवरण प्राप्त होता है । यह शांति अनुष्ठान कोई सामान्य कर्मकांड नहीं है, अपितु यह मंत्र-ध्वनि विज्ञान, अग्नि की तापीय ऊर्जा (Thermal Energy) और विशिष्ट वनस्पतियों (समिधा) के माध्यम से अंतरिक्ष में उपस्थित ग्रहीय ऊर्जाओं के साथ तादात्म्य स्थापित करने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है 0। इस शोध-रिपोर्ट में पूर्णतः शास्त्रसम्मत प्रमाणों के आधार पर नवग्रह पूजन के प्रत्येक चरण—संकल्प, वेदी निर्माण, आवाहन, मंत्र विज्ञान, हवन, समिधा, और दान-विधान—का अत्यंत गहन, तार्किक एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
अनुष्ठान की पात्रता, व्रत नियम एवं निषेध
नवग्रह शांति अनुष्ठान पूर्णतः सात्विक और शास्त्रीय मर्यादाओं से आबद्ध है। इसके सफल संपादन और पूर्ण फल-प्राप्ति हेतु यजमान (अनुष्ठानकर्ता) के लिए कठोर नियम निर्धारित हैं, जिनका पालन अपरिहार्य है।
पात्रता एवं आवश्यकता
शास्त्रों के अनुसार, नवग्रह शांति पूजा सार्वभौमिक रूप से कल्याणकारी है और इसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है, परंतु ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह उन जातकों के लिए अत्यंत अनिवार्य मानी गई है:
- जिनकी जन्मपत्रिका में राहु और केतु की स्थिति अत्यंत दूषित हो अथवा पूर्ण कालसर्प दोष निर्मित हो रहा हो ।
- जिनके जन्मांग चक्र में चार या उससे अधिक ग्रह नीच राशि में, वक्री अथवा पापकर्तरी प्रभाव में हों ।
- जातक पर मारकेश या बाधक ग्रहों की महादशा व अंतर्दशा चल रही हो, जिससे अकाल मृत्यु, दुर्घटना या असाध्य रोग का भय हो ।
- विवाह से पूर्व दांपत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने, गृह प्रवेश, अथवा किसी नवीन व्यावसायिक यात्रा के आरंभ में भी नवग्रहों की अनुकूलता हेतु यह पूजा प्रासंगिक है ।
व्रत एवं आचरण के नियम
नवग्रह शांति अनुष्ठान के दौरान यजमान को शारीरिक और मानसिक पवित्रता बनाए रखने हेतु ब्रह्मचर्य का कठोर पालन, सात्विक आहार (अथवा फलाहार उपवास) और सत्य भाषण का व्रत लेना चाहिए । जिस विशिष्ट ग्रह की शांति मुख्य रूप से करनी हो, उस ग्रह के वार (दिन) को उपवास रखना अत्यंत फलदायी होता है (जैसे सूर्य के लिए रविवार, चंद्र के लिए सोमवार, शनि के लिए शनिवार) । पूजा के दिन यजमान को प्रातःकाल उठकर तीर्थों के जल अथवा गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर शुद्ध, बिना सिले हुए अथवा नवीन सूती/रेशमी वस्त्र धारण करने चाहिए ।
निषेध
शास्त्रों में इस अनुष्ठान की अवधि (जो एक दिन से लेकर नौ दिन तक हो सकती है) के दौरान तामसिक पदार्थों—मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, और बासी भोजन—का पूर्णतः निषेध किया गया है । इसके अतिरिक्त, पूजा के समय काले अथवा गहरे नीले वस्त्रों का धारण सामान्यतः निषिद्ध माना जाता है, जब तक कि अनुष्ठान विशेष रूप से और केवल शनि या राहु की तांत्रिक शांति के लिए न किया जा रहा हो (पारंपरिक सामूहिक नवग्रह पूजा में श्वेत, पीत या लाल वस्त्र ही श्रेष्ठ माने गए हैं) । रजस्वला स्त्रियों और अशौच (सूतक-पातक) की स्थिति में यह यज्ञ कदापि नहीं करना चाहिए।
पूर्व-कर्म: स्नान, शुद्धि-विधान एवं महासंकल्प
वैदिक कर्मकांड में किसी भी अनुष्ठान का आरंभ बाह्य और आंतरिक शुद्धि से होता है। 'नित्य कर्म पूजा प्रकाश' और धर्मशास्त्रों में इसके स्पष्ट नियम बतलाए गए हैं ।
स्नान एवं पवित्रीकरण
अनुष्ठान के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, यजमान पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर कुशा या ऊन के आसन पर बैठता है। कुशा (पवित्र दर्भ घास) के माध्यम से जल लेकर शरीर और पूजा सामग्री पर निम्नलिखित पवित्रीकरण मंत्र के उच्चारण के साथ जल छिड़का जाता है, जो शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की अशुद्धियों का नाश करता है :
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥पवित्रीकरण के पश्चात, मन, वाणी और हृदय की शुद्धि हेतु तीन बार जल का आचमन किया जाता है (ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः), और फिर प्राणायाम के माध्यम से श्वास को नियंत्रित कर ध्यान केंद्रित किया जाता है ।
महासंकल्प विधान
महासंकल्प वह पारलौकिक और आध्यात्मिक प्रतिज्ञा है जो यजमान की चेतना को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जोड़ती है और अनुष्ठान की दिशा निर्धारित करती है। बिना संकल्प के किया गया कोई भी कर्म फलहीन माना जाता है ।
यजमान अपने दाहिने हाथ में जल, अक्षत (साबुत चावल), पुष्प, कुशा, चंदन और द्रव्य (दक्षिणा) लेकर महासंकल्प करता है । महासंकल्प में अत्यंत सूक्ष्म काल-गणना का उच्चारण किया जाता है—सृष्टि के आरंभ से लेकर वर्तमान कल्प (श्वेतवाराह कल्प), मन्वंतर (वैवस्वत), युग (कलियुग), संवत्सर, अयन (उत्तरायण/दक्षिणायन), ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार और नक्षत्र का सटीक उल्लेख किया जाता है। तदुपरांत भौगोलिक स्थिति (जम्बूद्वीपे, भारतखंडे, आर्यावर्तान्तर्गते) का उच्चारण होता है ।
अंत में यजमान अपना नाम, गोत्र और अनुष्ठान का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट करता है: "...मम सपरिवारस्य श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फल-प्राप्त्यर्थं, अप्राप्त-लक्ष्मी-प्राप्त्यर्थं, प्राप्त-लक्ष्म्याः चिरकाल-संरक्षणार्थं, जन्मपत्रिकायां स्थितानां सूर्यादि-नवग्रहानां अरिष्ट-निवारणार्थं, शुभ-फल-प्राप्त्यर्थं च नवग्रह-शांति-यज्ञं अहं करिष्ये।" यह संकल्प-जल एक पात्र या भूमि पर छोड़ दिया जाता है, जो इस बात का प्रमाण है कि यह कर्म सकाम भाव से नवग्रहों की प्रसन्नता हेतु ब्रह्मांड को समर्पित कर दिया गया है।
नवग्रह मण्डल एवं वेदी निर्माण का शास्त्रीय विधान
मत्स्य पुराण के 93वें अध्याय तथा अन्य यज्ञ-विधि ग्रंथों में नवग्रहों की भौतिक स्थापना हेतु एक विशिष्ट ज्यामितीय संरचना (मण्डल) के निर्माण का अत्यंत सूक्ष्म निर्देश दिया गया है । यह मण्डल केवल एक चित्र नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं को आकर्षित करने वाला एक सिद्ध यंत्र (Cosmic Receiver) है।
हवन कुंड की पूर्वोत्तर (ईशान) दिशा में देवताओं की स्थापना हेतु एक वेदी का निर्माण किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार यह वेदी दो बीता लंबी-चौड़ी, एक बीता ऊंची और चौरस (वर्गाकार) होनी चाहिए । इस वेदी पर रंगे हुए अक्षत (चावल) या अन्य शुद्ध प्राकृतिक रंगों से नवग्रह मण्डल बनाया जाता है । प्रत्येक ग्रह का मण्डल में एक निश्चित स्थान, विशिष्ट ज्यामितीय आकृति और वर्ण (रंग) शास्त्रसम्मत रूप से निर्धारित है ।
नीचे दी गई तालिका में मत्स्य पुराण (अध्याय 93) और पारंपरिक ज्योतिष ग्रंथों के आधार पर नवग्रह मण्डल का विस्तृत विवरण प्रस्तुत है:
| ग्रह | दिशा (Direction) | वेदी की ज्यामितीय आकृति (Shape) | वेदी का वर्ण/रंग | मण्डल में स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | मध्य (Center) | वृत्त (गोलाकार - Circle) | लाल (रक्त) | मण्डल के ठीक मध्य में |
| चंद्र | दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) | चतुरस्त्र (वर्गाकार - Square) | श्वेत (सफेद) | सूर्य के पूर्व दिशा में |
| मंगल | दक्षिण (South) | त्रिकोण (Triangle) | लाल (रक्त) | सूर्य के दक्षिण दिशा में |
| बुध | उत्तर-पूर्व (ईशान) | बाण (तीर - Arrow) | हरा / पीला | सूर्य के उत्तर दिशा में |
| बृहस्पति | उत्तर (North) | दीर्घ चतुरस्त्र (आयताकार - Rectangle) | पीला (पीत) | सूर्य के पश्चिम दिशा में |
| शुक्र | पूर्व (East) | पंचकोण (Pentagon) | श्वेत (सफेद) | सूर्य के उत्तर-पूर्व (ईशान) में |
| शनि | पश्चिम (West) | धनुषाकार (Bow shaped) | कृष्ण / काला | सूर्य के दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) में |
| राहु | दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) | सूप (Winnowing basket) | धूम्रवर्ण / काला | सूर्य के दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) में |
| केतु | उत्तर-पश्चिम (वायव्य) | ध्वज (पताका - Flag) | कपोत वर्ण / धूम्र | सूर्य के उत्तर-पश्चिम (वायव्य) में |
(संदर्भ: मत्स्य पुराण अध्याय 93, अग्नि पुराण, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र एवं सदगोपन ग्रंथ )
वेदी के निर्माण के पश्चात, कलश स्थापना की जाती है। मत्स्य पुराण के स्पष्ट निर्देशानुसार, वेदी पर शुद्ध वस्त्र से आवेष्टित (ढके हुए) जल से भरे दो कलश स्थापित किए जाते हैं, जिनके भीतर सप्तमृत्तिका, सर्वोषधि, और पंचरत्न डाले जाते हैं । इसके अतिरिक्त, अष्टदिक्पालों—इंद्र (पूर्व), अग्नि (आग्नेय), यम (दक्षिण), निरृति (नैऋत्य), वरुण (पश्चिम), वायु (वायव्य), कुबेर (उत्तर), और ईशान (ईशान)—का भी उनकी संबंधित दिशाओं में आवाहन किया जाता है, जो इस ब्रह्मांडीय यज्ञ व्यवस्था के रक्षक माने गए हैं ।
अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता एवं षोडशोपचार आवाहन प्रक्रिया
वैदिक देवशास्त्र में कोई भी ग्रहीय सत्ता एकाकी कार्य नहीं करती; उनकी एक पूरी पदानुक्रमित (Hierarchical) व्यवस्था है। नवग्रह पूजा में केवल नौ ग्रहों का ही नहीं, अपितु उनके 'अधिदेवता' (Primary presiding deity) और 'प्रत्यधिदेवता' (Co-presiding deity) का भी आवाहन और पूजन किया जाता है । यह त्रिकोणीय ऊर्जा संरचना अनुष्ठान को पूर्णता प्रदान करती है।
इनका विवरण इस प्रकार है :
- सूर्य: अधिदेवता - अग्नि / शिव; प्रत्यधिदेवता - रुद्र।
- चंद्र: अधिदेवता - जल / उमा; प्रत्यधिदेवता - गौरी।
- मंगल: अधिदेवता - पृथ्वी / स्कंद (कार्तिकेय); प्रत्यधिदेवता - क्षेत्रपाल।
- बुध: अधिदेवता - विष्णु / नारायण; प्रत्यधिदेवता - श्री विष्णु।
- बृहस्पति: अधिदेवता - इंद्र / ब्रह्मा; प्रत्यधिदेवता - ब्रह्माणस्पति।
- शुक्र: अधिदेवता - इंद्राणी / इंद्र; प्रत्यधिदेवता - इंद्र।
- शनि: अधिदेवता - यम; प्रत्यधिदेवता - प्रजापति।
- राहु: अधिदेवता - काल / दुर्गा; प्रत्यधिदेवता - सर्प / निरृति।
- केतु: अधिदेवता - चित्रगुप्त / ब्रह्मा; प्रत्यधिदेवता - ब्रह्मा।
प्रधान वेदी पर नवग्रहों के पूजन से पूर्व, निर्विघ्नता हेतु भगवान श्री गणेश और माता अंबिका का पूजन किया जाता है । इसके पश्चात, पुण्य-वाचन, मातृका पूजन, और नान्दीश्राद्ध (पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु) संपन्न किया जाता है।
आचार्य हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वैदिक मंत्रों के माध्यम से नवग्रहों का आवाहन करते हैं। मत्स्य पुराण के निर्देशों के अनुसार, यदि संभव हो तो ग्रहों की शास्त्रोक्त प्रतिमाएं (सूर्य की तांबे की, चंद्र की स्फटिक की, मंगल की लाल चंदन की, बुध की स्वर्ण की, गुरु की चांदी की, शुक्र की लोहे की, शनि की सीसे की) भी स्थापित की जानी चाहिए ।
आवाहन के पश्चात नवग्रहों का 'षोडशोपचार' (सोलह प्रकार के उपचारों से) पूजन किया जाता है—जिसमें पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं । नैवेद्य (भोग) में प्रत्येक ग्रह की प्रकृति का ध्यान रखा जाता है; जैसे सूर्य को गुड़ मिश्रित चावल, चंद्र को दूध और शर्करा मिश्रित चावल (खीर), मंगल को हविष्य, और बुध को दूध-चावल आदि का भोग लगाया जाता है ।
ग्रह-विशेष मंत्र विधान (वैदिक, पौराणिक एवं तांत्रिक/बीज मंत्र)
यज्ञ और पूजन का सबसे सशक्त माध्यम 'मंत्र' है। 'बृहत् पाराशर होरा शास्त्र' और 'अग्नि पुराण' के अनुसार, मंत्रों की ध्वनि तरंगें विशिष्ट ग्रहीय आवृत्तियों के साथ संपर्क स्थापित कर उन्हें यजमान के अनुकूल बनाती हैं । नवग्रहों के लिए तीन प्रकार के मंत्रों का विधान है:
- वैदिक मंत्र: श्रुतियों (वेदों) से उद्धृत ये मंत्र सर्वाधिक शक्तिशाली माने जाते हैं। इनका उच्चारण अत्यंत सस्वर, छंदोबद्ध और व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध होना चाहिए।
- पौराणिक मंत्र: महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित 'नवग्रह स्तोत्र' से उद्धृत श्लोक, जो ग्रहों के भौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप का ध्यान करने के लिए प्रयुक्त होते हैं और जनसामान्य के लिए सुलभ हैं ।
- तांत्रिक / बीज मंत्र: ये ग्रहों के सूक्ष्म 'बीज' (Seed) ध्वनियों पर आधारित हैं। इनमें निहित 'ह्रीं', 'क्रौं', 'श्रौं' जैसी ध्वनियां ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एकाग्र कर तीव्र प्रभाव उत्पन्न करती हैं ।
नीचे प्रत्येक ग्रह के शास्त्रीय मंत्र, उनके अर्थ, प्रयोग और निर्धारित जप संख्या का अत्यंत गहन विश्लेषण प्रस्तुत है:
१. सूर्य (Surya)
सूर्य नवग्रहों के अधिपति हैं। ज्योतिष शास्त्र में इन्हें आत्मा, जीवन शक्ति, आरोग्य, यश, राज्यसत्ता और पिता का नैसर्गिक कारक माना गया है ।
वैदिक मंत्र: ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ (ऋग्वेद १.३५.२)
अर्थ एवं भाव: सत्य और प्रकाश से युक्त, अंतरिक्ष के अंधकार को दूर करते हुए, देवों और मनुष्यों को उनके कर्मों में नियुक्त करते हुए, भगवान सूर्य अपने हिरण्मय (स्वर्ण) रथ पर आरूढ़ होकर समस्त भुवनों को प्रकाशित करते हुए आ रहे हैं । यह मंत्र सूर्य के प्रकाश को आत्मा के जागरण से जोड़ता है。
पौराणिक (व्यास) श्लोक: जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
अर्थ: जो जपाकुसुम (गुड़हल) के पुष्प के समान रक्त वर्ण वाले हैं, महर्षि कश्यप के पुत्र हैं, अत्यंत तेजस्वी हैं, अंधकार के शत्रु और समस्त पापों का नाश करने वाले हैं, उन दिवाकर को मैं प्रणाम करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
जप संख्या: ७,००० (कलियुग में चार गुना अर्थात २८,००० जप का भी विधान है) ।
२. चंद्र (Chandra)
चंद्रमा को मन, माता, भावना, शांति, रचनात्मकता और जल तत्व का कारक माना जाता है ।
वैदिक मंत्र: ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा॥ (यजुर्वेद)
(अथवा ॐ आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्णियम्... )
भाव: हे देवताओं! हमें शत्रुरहित करें। महान राज्य और ज्येष्ठता के लिए सोम (चंद्र) हमारी रक्षा करें। यह मंत्र मानसिक शांति और साम्राज्य वृद्धि का प्रतीक है。
पौराणिक श्लोक: दधिशंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम्। नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुट भूषणम्॥
अर्थ: जो दही, शंख और हिम (बर्फ) के समान उज्ज्वल हैं, जिनकी उत्पत्ति क्षीरसागर के मंथन से हुई है और जो भगवान शिव के मुकुट का आभूषण हैं, मैं उन चंद्रदेव को नमन करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः।
जप संख्या: ११,००० ।
३. मंगल (Mangal)
मंगल साहस, पराक्रम, सेना, रक्त, भूमि, और ऋणमुक्ति के कारक हैं ।
वैदिक मंत्र: ॐ अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति॥
भाव: जो अग्नि के समान तेजस्वी हैं, जो द्युलोक (स्वर्ग) के मूर्धा और पृथ्वी के रक्षक हैं, वह मंगल हमारी रक्षा करें。
पौराणिक श्लोक: धरणीगर्भ सम्भूतं विद्युत्कांति समप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणम्यहम्॥
अर्थ: जो पृथ्वी (धरणी) के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी कांति विद्युत (बिजली) के समान है, जिनके हाथों में शक्ति नामक अस्त्र है, उन कुमार मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः।
जप संख्या: १०,००० ।
४. बुध (Budha)
बुध बुद्धि, विवेक, तर्क शक्ति, वाणी, व्यापार और संचार के नैसर्गिंक कारक हैं ।
वैदिक मंत्र: ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेथामयं च। अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत॥
भाव: हे अग्नि! जागृत हों और यजमान के इष्ट (यज्ञ) और पूर्त (परोपकार) कर्मों को पूर्ण करें। यह मंत्र चेतना और बुद्धि के जागरण का प्रतीक है。
पौराणिक श्लोक: प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्। सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणम्यहम्॥
अर्थ: जिनका वर्ण प्रियंगु की कली के समान श्याम (हरा) है, जिनका रूप अप्रतिम है, जो अत्यंत सौम्य और शुभ गुणों से युक्त हैं, उन बुध को मैं नमन करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।
जप संख्या: ९,००० ।
५. बृहस्पति / गुरु (Brihaspati)
बृहस्पति नवग्रहों में सर्वाधिक शुभ ग्रह हैं। यह ज्ञान, धर्म, संतान, भाग्य, दर्शन और विस्तार के कारक हैं ।
वैदिक मंत्र: ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥
भाव: हे देवगुरु बृहस्पति! जो धन और ज्ञान शत्रुओं से परे है, जो यज्ञकर्ताओं में प्रकाशमान है, वह श्रेष्ठ ऐश्वर्य आप हमें प्रदान करें ।
पौराणिक श्लोक: देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥
अर्थ: जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं, जिनकी आभा स्वर्ण (कांचन) के समान है, जो त्रिलोकी के ज्ञाता और बुद्धि के स्वामी हैं, उन बृहस्पति को मैं नमन करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः।
जप संख्या: १९,००० ।
६. शुक्र (Shukra)
शुक्र सौंदर्य, प्रेम, कला, दांपत्य जीवन, आकर्षण और भौतिक सुख-सुविधाओं के कारक हैं ।
वैदिक मंत्र: ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु॥
(अथवा प्र वः शुक्राय भानवे... )
भाव: यह मंत्र अमृत, मधु और सोम के रसों के माध्यम से शुक्र की जीवनी शक्ति और तेजस्विता का आह्वाहन करता है。
पौराणिक श्लोक: हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणम्यहम्॥
अर्थ: जिनकी आभा बर्फ (हिम), कुंद के फूल और कमलनाल के समान शुभ्र है, जो दैत्यों के परम गुरु हैं, और समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, उन भार्गव (शुक्र) को मैं प्रणाम करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।
जप संख्या: १६,००० ।
७. शनि (Shani)
शनि कर्म-फल दाता, न्यायधीश, वैराग्य, विलंब, अनुशासन, और आयु के नैसर्गिक कारक हैं। इनकी शांति अत्यंत आवश्यक मानी जाती है ।
वैदिक मंत्र: ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः॥
भाव: दिव्य जल हमारे लिए कल्याणकारी हो, हमारी अभीष्ट सिद्धि और पीने के लिए शुभ हो, और हम पर सुखों की वर्षा करे。
पौराणिक श्लोक: नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तंड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
अर्थ: जिनका वर्ण नीले अंजन के समान है, जो सूर्यदेव के पुत्र और यमराज के बड़े भाई हैं, जो छाया और मार्तंड (सूर्य) से उत्पन्न हुए हैं, उन शनैश्चर को मैं नमन करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।
जप संख्या: २३,००० ।
८. राहु (Rahu - North Node)
राहु भौतिक लालसा, भ्रम, रहस्यमय विद्याओं, कूटनीति, और छाया का कारक है । कालसर्प दोष में इसकी मुख्य भूमिका होती है。
वैदिक मंत्र: ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता॥
भाव: हमारे अद्भुत और सदा वृद्धि करने वाले मित्र (ईश्वर) किस रक्षण साधन के साथ हमारे पास आएंगे?
पौराणिक श्लोक: अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम्। सिंहिकागर्भ सम्भूतं तं राहुं प्रणम्यहम्॥
अर्थ: जिनका केवल आधा शरीर है, जो महान पराक्रमी हैं, जो सूर्य और चंद्र को भी ग्रसने (ग्रहण लगाने) की शक्ति रखते हैं, सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न उन राहु को मैं प्रणाम करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।
जप संख्या: १८,००० ।
९. केतु (Ketu - South Node)
केतु अध्यात्म, मोक्ष, वैराग्य, गुप्त विद्याओं, तंत्र और कर्म-मुक्ति का कारक है ।
वैदिक मंत्र: ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथाः॥
भाव: ज्ञानहीन को ज्ञान देने वाले और रूपहीन को रूप देने वाले केतुदेव! आप उषाकाल की रश्मियों के साथ प्रकट हों。
पौराणिक श्लोक: पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणम्यहम्॥
अर्थ: जिनका वर्ण पलाश के पुष्प के समान है, जो तारों और ग्रहों के मस्तक स्वरूप हैं, जो अत्यंत रौद्र और भयंकर हैं, उन केतु को मैं नमन करता हूँ ।
बीज मंत्र: ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।
जप संख्या: १७,००० ।
शास्त्रीय निर्देश: उपर्युक्त मंत्रों का जप शास्त्रों में निर्दिष्ट संख्या के अनुसार किसी सुयोग्य ब्राह्मण, आचार्य या पुरोहित द्वारा यजमान के निमित्त अनुष्ठान की अवधि में संपन्न कराया जाना चाहिए । स्वयं अशुद्ध उच्चारण से मंत्रों का प्रभाव विपरीत भी हो सकता है。
नवग्रह हवन (यज्ञ) विधान एवं समिधा का विज्ञान
मंत्र जप के पश्चात अनुष्ठान का सर्वाधिक ऊर्जावान और महत्त्वपूर्ण चरण 'यज्ञ' (हवन) होता है। अग्नि पुराण और मत्स्य पुराण में वर्णित है कि अग्नि देव देवताओं के मुख हैं और उन्हें हविष्य पहुँचाने वाले दूत हैं (अग्निं दूतं वृणीमहे) । यज्ञ विज्ञान के अनुसार, जब विशिष्ट समिधा (लकड़ी) अग्नि के संपर्क में आती है, तो वह तापीय ऊर्जा (Thermal Energy) उत्पन्न करती है, जो मंत्रों की ध्वनि ऊर्जा (Sound Energy) के साथ मिश्रित होकर यजमान के सूक्ष्म शरीर और आसपास के वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन लाती है ।
हवन के लिए शास्त्रोक्त यज्ञ कुण्ड का निर्माण किया जाता है (जैसे कामना के आधार पर चतुरस्त्र, योनि, अर्धचंद्र आदि) । नवग्रह हवन में प्रत्येक ग्रह के लिए एक विशिष्ट वृक्ष की लकड़ी (समिधा) का उपयोग किया जाता है। भृगु संहिता और यज्ञ विधि ग्रंथों के अनुसार, इन समिधाओं को घृत (गाय का शुद्ध घी), शहद, दही और नवग्रह हवन सामग्री (जिसमें तिल, जौ, चावल, गुग्गुल, चंदन आदि मिश्रित होते हैं) में डुबोकर आहुति दी जाती है ।
ग्रहानुसार समिधा एवं आहुति विवरण
सामान्य नवग्रह शांति में प्रत्येक ग्रह के लिए १०८ या २८ आहुतियाँ दी जाती हैं । परंतु विशिष्ट कामना या घोर अरिष्ट होने पर यह संख्या आयुत (१०,०००), लक्ष (१,००,०००) या कोटि (एक करोड़) तक भी हो सकती है ।
| ग्रह | समिधा (Sacred Wood) | समिधा का शास्त्रीय व आयुर्वेदिक प्रभाव | आहुति द्रव्य (Oblation Material) |
|---|---|---|---|
| सूर्य | मदार / आक (Arka) | आत्मा की शुद्धि, जीवन शक्ति और ओज में वृद्धि, रोगों का नाश । | घृत, अक्षत, शहद |
| चंद्र | पलाश (Palash) | मानसिक शांति, चंद्र दोष का शमन, तंत्रिका तंत्र को शीतलता प्रदान करना । | घृत, खीर (पायस) |
| मंगल | खैर / खदिर (Khadir) | साहस में वृद्धि, रक्त विकारों का शमन, ऊर्जा का संचार । | घृत, हविष्य (अन्न) |
| बुध | अपामार्ग (Apamarg) | स्नायु तंत्र की शुद्धि, वाक्-सिद्धि, मेधा और बुद्धि का विकास । | घृत, दुग्ध मिश्रित अक्षत |
| गुरु | पीपल (Pippal) | ज्ञान, धर्म, सात्विकता और सकारात्मक ऊर्जा का अत्यंत तीव्र विस्तार । | घृत, दही मिश्रित चावल |
| शुक्र | गूलर (Audumbar) | आकर्षण, दांपत्य सुख, प्रजनन क्षमता और भौतिक समृद्धि की प्राप्ति । | घृत, मधुर हविष्य |
| शनि | शमी (Shami) | संकटों से रक्षा, कर्म-दोष का शमन, धैर्य की प्राप्ति, और तंत्र बाधा निवारण । | घृत, काले तिल, साबुत उड़द |
| राहु | दूर्वा (Durva) | भ्रम, मानसिक उद्वेग और आकस्मिक बाधाओं का नाश । | घृत, हविष्य |
| केतु | कुशा (Kusha / Darbha) | आध्यात्मिक उन्नति, पारलौकिक ज्ञान की जागृति, और अज्ञात कष्टों से मुक्ति । | घृत, नारियल मिश्रित चावल |
(टिप्पणी: यद्यपि अग्नि पुराण में कुछ वाममार्गी आहुतियों का उल्लेख मिलता है, किंतु आधुनिक सात्विक वैदिक यज्ञों में पूर्णतः वानस्पतिक हविष्य—तिल, जौ, अक्षत, घृत और शर्करा—का ही प्रयोग किया जाता है ।)
आहुति क्रम: आहुति का क्रम सदैव ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अनुसार सूर्य से आरंभ होकर केतु पर समाप्त होता है। आहुति देते समय प्रत्येक ग्रह के वैदिक या 'स्वाहा' युक्त बीज मंत्र का उच्चारण किया जाता है (उदाहरणार्थ: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय स्वाहा) ।
ग्रहानुसार दान-विधान, धातु एवं रत्न निर्देश
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (BPHS अध्याय 86) और पुराणों के अनुसार, केवल मंत्र-जप और हवन से ही ग्रह शांति पूर्ण नहीं होती; 'दान' और 'निग्रह' (त्याग) भी इस प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग है । ज्योतिषीय मान्यता है कि जिस ग्रह से संबंधित कोई दोष या पीड़ा होती है, उस ग्रह की नकारात्मक ऊर्जा यजमान के आभामंडल में संचित हो जाती है। उस ग्रह से संबंधित विशिष्ट वस्तुओं (रंग, धातु, अनाज, वस्त्र) का सुयोग्य ब्राह्मण या दरिद्र को दान करने से उस ऊर्जा का विसर्जन (Energy Transfer) हो जाता है और व्यक्ति कर्म-बंधन से मुक्त होता है ।
इसके विपरीत, रत्नों (Gemstones) का प्रयोग शांति के लिए नहीं, अपितु अनुकूल परन्तु निर्बल ग्रहों की रश्मियों को शरीर में अवशोषित कर उन्हें बल देने के लिए किया जाता है ।
शास्त्रीय दान एवं रत्न सूची
नीचे दी गई तालिका में ग्रहानुसार दान की जाने वाली सामग्री, दान का समय, धातु और रत्नों का विवरण है:
| ग्रह | दान सामग्री (Daan Items) | दान का शास्त्रोक्त समय | संबंधित धातु (Metal) | शुभ रत्न (Gemstone) |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | तांबा, गेहूं, लाल वस्त्र, गुड़, कमल पुष्प, लाल चंदन । | रविवार, प्रातःकाल सूर्योदय के समय | तांबा / स्वर्ण | माणिक्य (Ruby) |
| चंद्र | रजत (चांदी), चावल, श्वेत वस्त्र, दूध, दही, शंख, शर्करा । | सोमवार, सायंकाल | रजत / स्फटिक | मोती (Pearl) |
| मंगल | तांबा, मसूर की दाल, लाल वस्त्र, गुड़, रक्त पुष्प । | मंगलवार, मध्याह्न | तांबा / लाल चंदन | मूंगा (Red Coral) |
| बुध | कांस्य/स्वर्ण, साबुत हरी मूंग, हरा वस्त्र, हाथी दांत, सुगन्धित तैल । | बुधवार, प्रातःकाल | स्वर्ण | पन्ना (Emerald) |
| गुरु | चने की दाल, पीला वस्त्र, हल्दी, स्वर्ण, धार्मिक पुस्तकें, पीले फल । | गुरुवार, सायं (सूर्यास्त से पूर्व) | रजत / स्वर्ण | पुखराज (Yellow Sapphire) |
| शुक्र | श्वेत मिष्ठान, दही, चावल, श्वेत वस्त्र, रजत, कपूर, सुगन्धित द्रव्य (इत्र) । | शुक्रवार, सूर्योदय काल | लौह / रजत | हीरा (Diamond) |
| शनि | लोहा, काले तिल, साबुत उड़द, काला वस्त्र, सरसों का तेल, चमड़े के जूते । | शनिवार, मध्याह्न अथवा सांयकाल | सीसा / लौह | नीलम (Blue Sapphire) |
| राहु | सतनाजा (७ प्रकार के अनाज), नारियल, सीसा, नीला/काला वस्त्र, कोयला । | शनिवार, रात्रि काल | सीसा | गोमेद (Hessonite) |
| केतु | तिल, कंबल (काले-सफेद मिश्रित), लहसुनिया, सीसा, कस्तूरी । | मंगलवार/गुरुवार, रात्रि काल | लौह / सीसा | लहसुनिया (Cat's Eye) |
(शास्त्र निर्देश: दान सदैव योग्य, सात्विक, और वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण को ससम्मान दक्षिणा सहित देना चाहिए। बिना श्रद्धा और बिना उचित दक्षिणा के दिया गया दान पूर्णतः निष्फल होता है ।)
पूर्णाहुति, विसर्जन एवं फल-श्रुति
पूर्णाहुति एवं महा-आरती
नवग्रहों के निमित्त समिधा, घृत और हविष्य की आहुतियाँ पूर्ण होने के उपरांत अनुष्ठान का समापन 'पूर्णाहुति' से होता है। पूर्णाहुति का दार्शनिक अर्थ है यज्ञ की पूर्णता और ईश्वर के प्रति यजमान का संपूर्ण आत्म-समर्पण। इसमें एक सूखे नारियल (गोला) के भीतर सर्वोषधि, पंचमेवा, सुपारी, पान के पत्ते, पूर्ण घृत, और बची हुई समस्त हवन सामग्री को भरकर लाल वस्त्र या मौली से लपेटकर एक साथ यज्ञ-नारायण (अग्नि) को समर्पित किया जाता है ।
वसोर्धारा (घृत की निरंतर अविरल धारा) गिराते हुए वैदिक मंत्रों (जैसे पूर्णमदः पूर्णमिदं...) का पाठ किया जाता है। इसके पश्चात आरती (देव-आरती और कर्पूर गौरं...) की जाती है तथा उपस्थित जनों में यज्ञ-प्रसाद का वितरण होता है ।
विसर्जन एवं क्षमा प्रार्थना
पूजा के अंत में आवाहन किए गए समस्त देवी-देवताओं और नवग्रहों का विसर्जन किया जाता है। सनातन धर्म में विसर्जन का अर्थ देवताओं को वापस भेजना नहीं, अपितु उन्हें बाह्य प्रतिमा या कलश से यजमान के हृदय और ब्रह्मांड में पुनः सूक्ष्म रूप में स्थापित करना है । अंत में आचार्य और यजमान अनुष्ठान के दौरान हुई किसी भी ज्ञात-अज्ञात त्रुटि के लिए क्षमा-प्रार्थना करते हैं: आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥ इसके पश्चात, यजमान द्वारा आचार्य एवं अन्य ऋत्विजों (ब्राह्मणों) को शास्त्रोक्त रीति से भोजन कराकर उन्हें यथोचित दान-दक्षिणा (वस्त्र, द्रव्य, पात्र आदि) देकर ससम्मान विदा किया जाता है ।
शास्त्रीय फल-श्रुति (Cosmic Benefits of the Ritual)
मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण और महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ग्रंथों में नवग्रह शांति यज्ञ की अत्यंत विस्तृत महिमा गाई गई है । यह यज्ञ केवल तात्कालिक भौतिक संकटों को ही नहीं टालता, बल्कि जातक की जन्म-जन्मांतर की प्रारब्ध-ग्रंथियों को भी शिथिल करता है。
- अरिष्ट निवारण एवं आरोग्य: अग्नि पुराण (अध्याय 164) के अनुसार नवग्रह शांति से मृत्यु-भय (अपमृत्यु), असाध्य रोग, और विशेष रूप से स्नायु तंत्र (Nervous system) से संबंधित व्याधियों का शमन होता है । यह व्यक्ति के आभामंडल (Aura) को शुद्ध कर प्राणशक्ति को बढ़ाता है।
- शत्रु शमन एवं कर्म-बाधा निवारण: महर्षि पराशर के अनुसार नवग्रह स्तोत्र और शांति विधान से अदृश्य शत्रुओं का नाश होता है तथा व्यवसाय, नौकरी एवं शिक्षा में आ रही अज्ञात रुकावटें दूर होती हैं ।
- पारिवारिक शांति एवं दांपत्य सुख: विवाह से पूर्व या पश्चात यह यज्ञ घर के सूक्ष्म वास्तु दोषों को मिटाता है और दांपत्य जीवन में आ रही वैचारिक दूरियों को समाप्त कर प्रेम, सौहार्द और स्थिरता स्थापित करता है ।
- चतुर्वर्ग पुरुषार्थ की प्राप्ति: भगवान विष्णु ने स्वयं रुद्र से कहा है कि जो भी व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा, भक्ति-भाव और शास्त्र-सम्मत विधि से नवग्रहों की पूजा करता है, उसे जीवन के चारों परम पुरुषार्थ—'धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष'—सहज ही प्राप्त हो जाते हैं ।
निष्कर्षतः, नवग्रह शांति पूजा और यज्ञ मात्र एक कर्मकांडीय औपचारिकता नहीं है; यह 'पिंड' (मानव शरीर) और 'ब्रह्मांड' (Cosmos) के मध्य खोए हुए सामंजस्य को पुनः स्थापित करने की एक विशुद्ध वैदिक एवं वैज्ञानिक प्रक्रिया है । यदि यह अनुष्ठान श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त विधियों, शुद्ध सस्वर मंत्रोच्चारण, सात्विक समिधा, और पूर्ण निष्ठा के साथ संपन्न किया जाए, तो यह निश्चित ही जातक के जीवन से ग्रहजनित अंधकार को मिटाकर दैवीय प्रकाश, असीम शांति और लौकिक-पारलौकिक परमानंद की स्थापना करता है।






