शारदीय नवरात्रि: शास्त्रसम्मत पूजन-विधान दैनिक अनुष्ठानिक क्रम एवं देवी आराधना का प्रामाणिक शोध
सनातन धर्म के शाश्वत वाङ्मय एवं तपो-विज्ञान में शक्ति-उपासना का सर्वोच्च एवं सर्वाधिक तार्किक पर्व नवरात्रि है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक चलने वाले इस नौ दिवसीय अनुष्ठान को 'शारदीय नवरात्रि' अथवा 'महानवरात्र' की संज्ञा दी गई है । धर्मसिन्धु निर्णयसिन्धु श्रीमद्देवीभागवत पुराण एवं मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत वर्णित दुर्गा सप्तशती जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार यह काल ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के जागरण प्रकृति के संतुलन और आत्म-चेतना के ऊर्ध्वगमन का सर्वश्रेष्ठ समय है 。
काल-गणना एवं खगोल-शास्त्र के परिप्रेक्ष्य में वर्ष में दो बार सूर्य भूमध्य रेखा पर सीधा आता है जिसे 'विषुव' कहा जाता है। वसंत विषुव और शरद् विषुव के इन संधिकालों में ऋतु परिवर्तन की तीव्रता होती है जिसका सीधा प्रभाव मानव शरीर मन और प्रकृति पर पड़ता है । इसी कारण प्राचीन ऋषियों ने इस संधिकाल में आत्मशोधन उपवास जप-तप और देवी-पूजन का विधान निर्मित किया ताकि नवीन ऋतु में शरीर और चेतना दोनों पूर्णतः संतुलित रहें । श्रीमद्देवीभागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध में स्वयं भगवती ने महर्षि व्यास को उपदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि शरद् ऋतु में महापूजा अत्यंत तन्मयता एवं भक्तिभाव से की जानी चाहिए । यह अनुष्ठान केवल एक कर्मकांड मात्र नहीं है अपितु मन वचन और कर्म से स्वयं को ब्रह्माण्डीय मातृ-शक्ति (आद्या शक्ति) के साथ एकाकार करने की एक अत्यंत गूढ़ एवं वैज्ञानिक तपोविधि है 。
व्रत के नियम निषेध एवं पात्रता का शास्त्रीय विवेचन
नवरात्रि अनुष्ठान की सफलता पूर्णतः साधक के आचरण संयम और यम-नियमों के तार्किक पालन पर निर्भर करती है। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि शरीर और मन की शुद्धि के बिना की गई कोई भी साधना फलीभूत नहीं होती ।
शारीरिक एवं मानसिक शुद्धता बनाए रखने हेतु अनुष्ठान के समय ब्रह्मचर्य का पूर्णतः पालन भूमिशयन (भूमि पर शयन करना) सत्यवचन तथा इन्द्रिय संयम अत्यंत अनिवार्य है । साधक को तामसिक प्रवृत्तियों से सर्वथा मुक्त रहना चाहिए। व्रत करने की विधियाँ साधक के शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार निर्धारित की गई हैं जिनमें 'एकभुक्त' (दिन में केवल एक बार सात्त्विक भोजन करना) 'अयाचित' (बिना मांगे जो प्राप्त हो जाए उसे ग्रहण करना) या पूर्ण उपवास (केवल जल या फलाहार पर निर्भर रहना) सम्मिलित हैं ।
शास्त्रों ने नवरात्रि व्रत में तामसिक आहार को पूर्णतः निषिद्ध माना है। लहसुन प्याज हींग मांस मदिरा बासी तथा दूषित अन्न का सेवन सर्वथा वर्जित है क्योंकि ये पदार्थ शरीर में प्रमाद (आलस्य) और जड़ता उत्पन्न करते हैं जो साधना की ऊर्जा को क्षीण करते हैं । इसके अतिरिक्त कुछ विशिष्ट शाक व अन्न जैसे बैंगन मसूर की दाल गाजर मूली और कुम्हड़ा (कद्दू) का सेवन भी व्रत के दौरान निषिद्ध है । शारीरिक कर्मों के संदर्भ में धर्मशास्त्र निर्देश देते हैं कि महालय अमावस्या (नवरात्रि से एक दिन पूर्व) को ही क्षौर कर्म (बाल दाढ़ी और नाखून काटना) संपन्न कर लेना चाहिए; नवरात्रि के नौ दिनों में यह सर्वथा वर्जित है । नींबू काटना भी इस अवधि में निषिद्ध है क्योंकि तंत्र-शास्त्रों में नींबू को काटना प्रतीकात्मक बलि के समान माना गया है । साथ ही दिन में शयन करना काले वस्त्र धारण करना तथा असत्य या क्रोधपूर्ण भाषण करना पूर्णतः निषिद्ध है 。
नवरात्रि व्रत की पात्रता सार्वभौमिक है। इसे प्रत्येक वर्ण नर नारी बाल और वृद्ध कर सकते हैं । रजस्वला (मासिक धर्म) की अवस्था में स्त्रियों को यद्यपि प्रत्यक्ष मूर्ति-स्पर्श तथा बाह्य पूजन से वर्जित किया गया है परंतु वे मानसिक संकल्प मानसिक पूजा तथा श्रवण-माध्यमों से कथा एवं दुर्गा सप्तशती का पाठ सुन सकती हैं; धर्मशास्त्रों के अनुसार उन्हें व्रत और साधना का पूर्ण फल प्राप्त होता है 。
संकल्प स्नान एवं शुद्धिकरण विधान
किसी भी वैदिक अथवा तांत्रिक अनुष्ठान का प्रथम और अनिवार्य चरण 'संकल्प' होता है। दिशाहीन कर्म ऊर्जा का अपव्यय मात्र है अतः संकल्प के माध्यम से साधक अपनी साधना और प्राण-ऊर्जा को एक निश्चित उद्देश्य प्रदान करता है 。
प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शय्या त्याग कर स्नान करना चाहिए। स्नान के जल में पवित्र नदियों का जल (गंगाजल) अथवा शुद्ध जल का उपयोग करना चाहिए । स्नान के पश्चात् स्वच्छ धुले हुए और बिना सिले वस्त्र (यथासंभव लाल पीले या श्वेत रंग के) धारण करने चाहिए । पूजन स्थल पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल ऊनी या कुशा के आसन पर बैठना चाहिए 。
आसन शुद्धि के पश्चात साधक को अपने बाएं हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से स्वयं पर और पूजन सामग्री पर जल छिड़कते हुए "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा..." मंत्र का पाठ कर मार्जन (बाह्य एवं आंतरिक शुद्धिकरण) करना चाहिए । तदुपरांत दाहिने हाथ में जल अक्षत (बिना टूटे हुए पूर्ण चावल) पुष्प और द्रव्य (सिक्का) लेकर अपना नाम गोत्र स्थान तिथि और व्रत का उद्देश्य (सकाम या निष्काम भावना) उच्चारित कर संकल्प लेना चाहिए और अंत में वह जल भूमि पर या ताम्र-पात्र में छोड़ देना चाहिए 。
घट-स्थापना एवं जवारे (यव) रोहण का तात्विक रहस्य
शारदीय नवरात्रि में आश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन घट-स्थापना (कलश स्थापना) का विशेष महत्त्व है। यह केवल प्रथम दिन के शुभ मुहूर्त में ही की जानी चाहिए। पंचांग के अनुसार प्रातःकाल अथवा अभिजीत मुहूर्त इसके लिए सर्वोत्तम माने गए हैं; राहुकाल में घट-स्थापना सर्वथा वर्जित है क्योंकि यह काल विध्वंसक और नकारात्मक ऊर्जा का संवाहक होता है 。
कलश को संपूर्ण ब्रह्माण्ड और मानव शरीर का प्रतीक माना जाता है जिसमें समस्त तीर्थों नदियों और देव-शक्तियों का आवाहन किया जाता है । एक स्वच्छ काष्ठ (लकड़ी) की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। कलश पर सिंदूर से स्वास्तिक बनाकर उसमें शुद्ध जल अक्षत रोली दुर्वा एक सिक्का और लौंग-सुपारी डाली जाती है। उसके मुख पर आम्र या अशोक के पल्लव (पत्ते) रखकर एक पूर्णपात्र (नारियल जिसे लाल चुनरी या सूती धागे में लपेटा गया हो) स्थापित किया जाता है 。
चौकी के समक्ष या कलश के नीचे मिट्टी के एक वेदी-पात्र में शुद्ध मिट्टी फैलाकर उसमें जौ (यव) बोए जाते हैं । शास्त्रानुसार सृष्टि के निर्माण के पश्चात् जौ ही धरती की पहली फसल थी अतः इसे 'पूर्ण अन्न' और साक्षात 'ब्रह्मा' का स्वरूप माना गया है । जौ का अंकुरण और उनका हरा-भरा होना यह संकेत देता है कि माता ने पूजा स्वीकार कर ली है और आगामी वर्ष सुख-समृद्धि उर्वरकता एवं कल्याणकारी ऊर्जा से परिपूर्ण रहेगा । शिव महापुराण के संदर्भों के अनुसार जिस घर में विधिपूर्वक जवारे बोए जाते हैं वहाँ साक्षात मातृ-शक्ति का वास होता है तथा उस स्थान से अहंकार काम क्रोध और समस्त क्लेशों का शमन हो जाता है ।
नवरात्रि के नौ दिनों तक कलश के समक्ष गाय के शुद्ध घी अथवा तिल के तेल की अखंड ज्योति प्रज्वलित करने का विधान है । दीप 'तेज' और 'ज्ञान' का प्रतीक है जो ब्रह्माण्डीय ऊर्जा तरंगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस दीप से उत्पन्न ऊर्जा-तरंगें घर के वास्तु में निरंतर भ्रमण करती हैं जिससे वातावरण में तेज की वृद्धि होती है और नकारात्मक शक्तियों का शमन होता है । दीप बुझने न पाए इसके लिए पुरानी बाती के क्षीण होने से पूर्व ही नई बाती प्रज्वलित कर देनी चाहिए ।
देवी आवाहन एवं षोडशोपचार पूजन-विधान
घट-स्थापना के उपरांत भगवती दुर्गा का आवाहन किया जाता है। आवाहन का दार्शनिक अर्थ है अपनी अंतरात्मा की सुप्त ऊर्जा को जाग्रत कर उसे मूर्ति या कलश में श्रद्धापूर्वक स्थापित करना । तंत्र शास्त्रों एवं नारद पुराण के अनुसार देवी को 'षोडशोपचार' (सोलह प्रकार के उपचारों या चरणों) के माध्यम से पूजना चाहिए क्योंकि भगवती को यह अर्चन अत्यंत प्रिय है 。
षोडशोपचार के अंतर्गत निम्नलिखित चरण सम्मिलित हैं: प्रथम देवी का 'आवाहन' कर उन्हें आमंत्रित किया जाता है। द्वितीय उन्हें 'आसन' (विराजने हेतु स्थान) प्रदान किया जाता है। तृतीय 'पाद्य' (चरण प्रक्षालन हेतु जल) चतुर्थ 'अर्घ्य' (हाथ धोने हेतु जल) और पंचम 'आचमन' (मुख शुद्धि हेतु जल) अर्पित किया जाता है। षष्ठम चरण में देवी को शुद्ध जल दुग्ध और पंचामृत से 'स्नान' कराया जाता है। इसके पश्चात सप्तम 'वस्त्र' (चुनरी) और अष्टम 'आभूषण' (अलंकार) अर्पित किए जाते हैं। नवम 'चंदन या सिंदूर' से तिलक किया जाता है। दशम 'पुष्प' (विशेषकर लाल पुष्प और बिल्व पत्र) चढ़ाए जाते हैं। एकादश 'धूप' और द्वादश 'दीप' प्रज्वलित कर दर्शन कराए जाते हैं। त्रयोदश 'नैवेद्य' (विविध प्रकार का शुद्ध सात्त्विक भोग) अर्पित किया जाता है। चतुर्दश 'ताम्बूल' (पान-सुपारी और लौंग-इलायची) भेंट किया जाता है। पंचदश 'प्रदक्षिणा' (परिक्रमा) कर देवी की व्यापकता को स्वीकार किया जाता है और अंततः षोडश चरण में साष्टांग 'नमस्कार' करते हुए पूजा में रही त्रुटियों के लिए 'क्षमा-प्रार्थना' की जाती है 。
पूजन के संपूर्ण क्रम में साधक को "सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्रियम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।" मंत्र का निरंतर मानसिक या उपांशु (अत्यंत मंद स्वर में) जप करते रहना चाहिए ।
नौ दिवसीय देवी-आराधना का शास्त्रीय एवं तार्किक क्रम
नवरात्रि के नौ दिन देवी के नौ विशिष्ट स्वरूपों (नवदुर्गा) को समर्पित हैं। योग और तंत्र-शास्त्र के अनुसार ये नौ दिन मानव शरीर में स्थित षट्चक्रों (मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक) और अंततः सहस्रार चक्र के भेदन की एक आध्यात्मिक यात्रा हैं । मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के अनुसार ये नौ देवियाँ नौ दिव्य औषधियों की भी प्रतीक हैं जो दैहिक एवं मानसिक व्याधियों का नाश करती हैं ।
शास्त्रों में प्रत्येक दिन की देवी के लिए विशिष्ट मंत्र नैवेद्य (भोग) और दान का विधान है। दान के विषय में यह नियम है कि दान सदैव सत्पात्र (योग्य व्यक्ति ब्राह्मण या निर्धन कन्याओं) को ही देना चाहिए। निम्नलिखित तालिका में प्रत्येक दिन की आराधना का सविस्तार वर्णन प्रस्तुत है :
| आराधना का दिन | देवी का स्वरूप एवं तात्विक अर्थ | शास्त्रसम्मत बीज/स्तुति मंत्र | प्रिय नैवेद्य (भोग) एवं उसका आध्यात्मिक फल | विशिष्ट दान-विधान एवं शास्त्रीय लाभ |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम दिन | माँ शैलपुत्री: मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री। यह चेतना की स्थिरता शक्ति और नई शुरुआत का प्रतीक हैं 。 | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः | गाय का शुद्ध घी या उससे बनी श्वेत मिठाई। इसके अर्पण से आरोग्य शक्ति और जीवन में दृढ़ता प्राप्त होती है 。 | केला या श्वेत वस्तु: निर्धनों को केले का दान शुभता लाता है और दरिद्रता का समूल नाश करता है 。 |
| द्वितीय दिन | माँ ब्रह्मचारिणी: स्वाधिष्ठान चक्र पर केंद्रित। तप ज्ञान और वैराग्य की प्रतीक जो इन्द्रियों पर नियंत्रण सिखाती हैं 。 | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नमः | शक्कर मिश्री अथवा पंचामृत। यह भोग इन्द्रिय संयम में सहायक है और आयु व बौद्धिक क्षमता में वृद्धि करता है 。 | विद्या सामग्री/किताबें: ज्ञानार्थियों को पुस्तकें दान करने से अज्ञान रूपी अंधकार मिटता है और देवी सरस्वती की कृपा मिलती है 。 |
| तृतीय दिन | माँ चन्द्रघण्टा: मणिपूर चक्र की जाग्रति। यह दुष्टों की संहारक और अकारण भय से मुक्ति दिलाने वाली निर्भयता की प्रतीक हैं । | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नमः | दूध या मावे से बनी मिठाई/खीर। यह मानसिक शांति एकाग्रता और समस्त संतापों से मुक्ति प्रदान करता है 。 | घंटी या लाल चूड़ियाँ: मंदिर में घंटी या सुहागिनों को लाल चूड़ियाँ दान करने से घर से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है 。 |
| चतुर्थ दिन | माँ कूष्माण्डा: अनाहत चक्र की अधिष्ठात्री। इन्होंने अपनी मंद मुस्कान से संपूर्ण ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था । | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः | मालपुआ। यह भोग बौद्धिक विकास कार्य-क्षेत्र में सफलता और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को आकर्षित करता है 。 | कुमकुम या हरे वस्त्र: इनका दान रोग-दोष की शांति तथा जीवन में भौतिक सुखों की निर्बाध प्राप्ति कराता है 。 |
| पंचम दिन | माँ स्कन्दमाता: विशुद्ध चक्र में स्थित। भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) की माता के रूप में यह वात्सल्य और मातृत्व की प्रतीक हैं 。 | ॐ ह्रीं क्लीं स्कन्दमातायै नमः | केला। केले का भोग सादगी का प्रतीक है जो संतान सुख बुद्धि विकास एवं परिवार में असीम शांति लाता है 。 | मिश्री या फल: बच्चों को मिश्री बाँटने से संतान की प्रगति होती है और पारिवारिक संबंधों में मधुरता स्थापित होती है 。 |
| षष्ठम दिन | माँ कात्यायनी: आज्ञा चक्र की जागृति। महर्षि कात्यायन की पुत्री एवं महिषासुर मर्दिनी। विवाह बाधा निवारक 。 | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायन्यै नमः | शहद (मधु)। यह सकारात्मक ऊर्जा का संवाहक है। इससे वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मिठास आती है 。 | वस्त्र दान (कन्याओं को): योग्य कन्याओं को वस्त्र दान करने से मनोवांछित वर की प्राप्ति तथा शारीरिक सौंदर्य में वृद्धि होती है 。 |
| सप्तम दिन | माँ कालरात्रि: सहस्रार की ओर यात्रा। यह तंत्र-मंत्र नाशक घोर अंधकार स्वरूपा और महायोगिनी हैं 。 | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः | गुड़ या गुड़ से बनी वस्तुएँ। यह भोग घोर शत्रु-बाधा का शमन करता है और अकाल मृत्यु के भय को नष्ट करता है 。 | काले तिल: पीपल के वृक्ष के नीचे काले तिल अर्पित करने से तंत्र बाधाओं अदालती विवादों व विपत्तियों का नाश होता है । |
| अष्टम दिन | माँ महागौरी: पूर्ण शुद्धिकरण। शिव की जटा-गंगा से पवित्र होकर यह परम शांति सौम्यता और पवित्रता की प्रतीक बन गईं 。 | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नमः | नारियल। यह पूर्णता का प्रतीक है। इसके अर्पण से हृदय की पवित्रता प्राप्त होती है और सर्व मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं 。 | सफेद मिठाई (बर्फी): श्वेत वस्तुओं का दान भौतिक कष्टों का शमन करता है और पारिवारिक कलह को मिटाकर सौम्यता लाता है । |
| नवम दिन | माँ सिद्धिदात्री: साधना की पूर्णता। यह समस्त अष्ट-सिद्धियों और नव-निधियों की प्रदाता हैं 。 | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नमः | हलवा पूरी और काले चने। यह भोग संपूर्णता परम संतोष एवं नौ दिवसीय साधना की अंतिम सफलता का द्योतक है 。 | सतनाजा (सात अनाज) या घी: पक्षियों को अन्न तथा विप्र को घी दान करने से चिरकालिक दरिद्रता का नाश होता है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है 。 |
मार्कण्डेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती पाठ-विधान
नवरात्रि में महर्षि मार्कण्डेय द्वारा रचित 'दुर्गा सप्तशती' (जिसे चंडी पाठ भी कहा जाता है) के पठन एवं श्रवण का सर्वाधिक और सर्वोपरि महत्त्व है। मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत वर्णित इस ग्रंथ में ७०० श्लोक और १३ अध्याय हैं जो साक्षात भगवती का वाङ्मय (शब्द-रूपी) स्वरूप हैं । भुवनेश्वरी संहिता के अनुसार जिस प्रकार वेद अनादि और अपौरुषेय हैं उसी प्रकार दुर्गा सप्तशती भी अनादि है ।
सप्तशती का पाठ अत्यंत तार्किक व्यवस्थित और ध्वनि-विज्ञान (ऊर्जा-विज्ञान) पर आधारित है। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि इस पवित्र पुस्तक को कभी भी नंगे हाथों में पकड़कर नहीं पढ़ना चाहिए; इसे एक शुद्ध काष्ठ (लकड़ी) के आधार (रेहल) या चौकी पर स्थापित करके कुमकुम अक्षत और पुष्प से इसका पंचोपचार पूजन करना चाहिए । मानसिक पाठ के स्थान पर मध्यम और स्पष्ट स्वर में संस्कृत श्लोकों का उच्चारण करना चाहिए क्योंकि संस्कृत की ध्वनियाँ वायुमंडल को शुद्ध करती हैं। अध्यायों के अंत में 'इति' 'अध्याय:' और 'वध' जैसे शब्दों का उच्चारण वर्जित माना गया है ।
पाठ का शास्त्रीय अनुक्रम एवं न्यास विधि
सप्तशती के पठन का क्रम एक विशिष्ट सुरक्षा आवरण का निर्माण करता है:
- १. शापोद्धार एवं उत्कीलन: शिव जी द्वारा तंत्र और मंत्रों के दुरुपयोग को रोकने हेतु सप्तशती को कीलित (कील से बंधित या शापित) किया गया है। अतः 'ददाति प्रतिगृह्णाति' के नियम से अथवा शापोद्धार मंत्रों के उच्चारण से इसका उत्कीलन अत्यंत आवश्यक है अन्यथा पाठ का फल नहीं मिलता 。
- २. कवच अर्गला और कीलक का रहस्य: क्षेत्रीय भेदों (जैसे योग रत्नावली बनाम चिदंबरम संहिता) के उपरांत भी इन तीनों का पाठ अपरिहार्य है । कवच एक अभेद्य बीज है जो साधक के भौतिक और सूक्ष्म शरीर के सभी अंगों की रक्षा करता है। अर्गला वह ऊर्जा या रस-संचार है जो अंकुरण के बाद साधक के भीतर शक्ति का प्रवाह करता है (आंतरिक बंधनों को खोलता है) और कीलक उस जाग्रत ऊर्जा को साधक के भीतर स्थिर (पिन) करता है ताकि मन भटके नहीं ।
- ३. रात्रिसूक्तम्: इसके पश्चात देवी के योगनिद्रा स्वरूप की स्तुति हेतु रात्रिसूक्त का पाठ किया जाता है 。
- ४. नवार्ण मंत्र जप (न्यास सहित): पाठ आरंभ करने से पूर्व १०८ बार न्यास सहित नवार्ण मंत्र का जप अनिवार्य है ।
- ५. मूल पाठ (१३ अध्याय): संपूर्ण ग्रंथ को तीन 'चरित्रों' में विभाजित किया गया है जो त्रिदेवियों की कथाएँ हैं:
- प्रथम चरित्र (अध्याय १): इसमें महाकाली की स्तुति है जहाँ वे भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जगाकर मधु और कैटभ नामक असुरों का वध करवाती हैं 。
- मध्यम चरित्र (अध्याय २-४): इसमें महालक्ष्मी की स्तुति है जिसमें देवताओं के तेज से देवी का प्राकट्य और महिषासुर का वध वर्णित है 。
- उत्तम चरित्र (अध्याय ५-१३): इसमें महासरस्वती की स्तुति है जिसमें शुम्भ निशुम्भ चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे घोर असुरों का संहार किया गया है 。
- ६. नवार्ण मंत्र जप (पुनः): पाठ की पूर्णता पर ऊर्जा को समेटने के लिए पुनः १०८ बार नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है ।
- ७. रहस्य-त्रय: इसके पश्चात् प्राधानिक वैकृतिक और मूर्ति रहस्य का पाठ किया जाता है जो देवी के निर्गुण और सगुण स्वरूपों का तात्विक विवेचन है ।
- ८. सिद्ध कुंजिका स्तोत्र: यह स्तोत्र सप्तशती का परम रहस्य और सार है। भगवान शिव के अनुसार यदि समय का अत्यंत अभाव हो तो केवल इस स्तोत्र के पाठ से भी संपूर्ण सप्तशती के समतुल्य फल प्राप्त हो जाता है 。
- ९. क्षमा-प्रार्थना (अपराध क्षमापन स्तोत्र): संस्कृत के कठिन उच्चारण या कर्मकांड की विधि में हुई अज्ञात त्रुटियों के लिए अंत में देवी से क्षमा याचना की जाती है 。
सप्ताह परायण विधि:
यदि गृहस्थ जीवन की व्यस्तता के कारण एक दिन में संपूर्ण ७०० श्लोकों का पाठ संभव न हो तो इसे अत्यंत सुगमता से ७ दिनों में विभाजित किया जा सकता है। इसका शास्त्रसम्मत क्रम इस प्रकार है: प्रथम दिन १ अध्याय द्वितीय दिन २ और ३ अध्याय तृतीय दिन ४ अध्याय चतुर्थ दिन ५ ६ ७ और ८ अध्याय पंचम दिन ९ और १० अध्याय षष्ठ दिन ११ अध्याय और सप्तम दिन १२ और १३ अध्याय का पाठ करना चाहिए 。
सम्पुट पाठ विधि का तांत्रिक महत्त्व
जब किसी विशिष्ट अत्यंत गंभीर और अति-महत्वपूर्ण उद्देश्य (जैसे असाध्य रोग की शांति घोर शत्रु का समूल नाश अकाल मृत्यु से रक्षा या विशेष सिद्धि) की प्राप्ति करनी हो तो 'सम्पुट पाठ' का आश्रय लिया जाता है । 'सम्पुट' का अर्थ है किसी वस्तु को दोनों ओर से आवरण में सुरक्षित करना। इस विधि में सप्तशती के प्रत्येक श्लोक के आदि (प्रारंभ) और अंत में एक विशेष उद्देश्य-पूर्ण मंत्र (जैसे सर्व-कल्याण हेतु 'सर्व मंगल मांगल्ये...' या विपत्ति-नाश हेतु 'शरणागत दीनार्त...') को जोड़ा जाता है । यह एक विशुद्ध तांत्रिक एवं लक्ष्य-आधारित साधना है जिससे मूल मंत्र की ऊर्जा और प्रभाव सहस्रों गुना बढ़ जाता है। चूंकि यह अत्यंत तीव्र फलदायी होती है अतः इसे योग्य और विद्वान गुरु के संरक्षण और निर्देशन में ही करना शास्त्रसम्मत माना गया है 。
नवार्ण मंत्र जप-विधान एवं तांत्रिक रहस्य
नवरात्रि साधना में नवार्ण मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) का जप सर्वोच्च और अमोघ माना गया है। यह नौ अक्षरों का महामंत्र ब्रह्माण्ड की तीनों परम शक्तियों का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है ।
- 'ऐं' (वाग्बीज): यह महासरस्वती का प्रतीक है जो ज्ञान प्रज्ञा और चेतना प्रदान करता है।
- 'ह्रीं' (मायाबीज): यह महालक्ष्मी का प्रतीक है जो ऐश्वर्य समृद्धि और पालन-पोषण का स्रोत है।
- 'क्लीं' (कामबीज): यह महाकाली का प्रतीक है जो शक्ति साहस और शत्रुओं के संहार का कारक है ।
- 'चामुण्डायै विच्चे': इसका अर्थ है चंड और मुंड (अज्ञान और बुराई) का नाश करने वाली देवी को नमस्कार ।
जप के नियम: साधक को शुद्ध लाल आसन पर बैठकर रुद्राक्ष स्फटिक या हल्दी की माला (अपनी मनोकामना के अनुसार) से इस महामंत्र का जप करना चाहिए । जप के समय मेरु-दंड (रीढ़ की हड्डी) पूर्णतः सीधी होनी चाहिए ताकि ऊर्जा का प्रवाह निर्बाध रहे। होंठ या जिह्वा अधिक हिलनी नहीं चाहिए; उपांशु (अत्यंत धीमा) या मानसिक जप ही सर्वोत्तम माना गया है । जो साधक संपूर्ण नौ दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इस मंत्र का अनुष्ठानिक जप (जैसे १०००० या सवा लाख बार) करता है उसके भीतर सुप्त पड़ी कुंडलिनी शक्ति जागृत होने लगती है इन्द्रियों पर उसका पूर्ण नियंत्रण स्थापित होता है और वह अलौकिक सिद्धियों की ओर अग्रसर होता है 。
कन्या (कुमारी) पूजन एवं विसर्जन विधान
नवरात्रि अनुष्ठान की तार्किक और भौतिक परिणति कन्या पूजन के बिना सर्वथा अधूरी है। देवी पुराण और धर्मसिन्धु में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि भगवती जगदम्बा होम दान व्रत या जप से उतनी प्रसन्नता व्यक्त नहीं करतीं जितनी वे कुमारियों (छोटी कन्याओं) को सम्मान और भोजन देने से होती हैं ।
कन्या पूजन का क्रम
अष्टमी या नवमी तिथि के दिन २ वर्ष से लेकर १० वर्ष तक की ९ कन्याओं और १ बालक (जिसे बटुक भैरव या लंगूर का स्वरूप माना जाता है) को अत्यंत आदरपूर्वक घर आमंत्रित करना चाहिए । स्कन्द पुराण में आयु के अनुसार कन्याओं का वर्गीकरण और उनके नाम निर्धारित किए गए हैं: २ वर्ष की कन्या 'कुमारिका' ३ वर्ष की 'त्रिमूर्ति' ४ वर्ष की 'कल्याणी' ५ वर्ष की 'रोहिणी' ६ वर्ष की 'काली' ७ वर्ष की 'चण्डिका' ८ वर्ष की 'शाम्भवी' ९ वर्ष की 'दुर्गा' और १० वर्ष की कन्या 'सुभद्रा' कहलाती है ।
सर्वप्रथम उनके चरण स्वच्छ जल से धोने चाहिए जो अहंकार के शमन का प्रतीक है। तदुपरांत उन्हें कुमकुम का पवित्र तिलक लगाकर नवमी का विशिष्ट और शुद्ध नैवेद्य (हलवा पूरी और काले चने) खिलाना चाहिए । भोजन के पश्चात उन्हें सामर्थ्यानुसार दक्षिणा लाल चुन्नी और पठन-पाठन सामग्री भेंट कर उनके चरण स्पर्श करने चाहिए । इस कृत्य से साधक के भीतर साक्षात देवी के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत होता है और उसे समस्त सुखों की प्राप्ति होती है。
देवी विसर्जन विधान
नवरात्रि के दसवें दिन अर्थात् दशमी तिथि (विजयदशमी) को माता को अश्रुपूर्ण नेत्रों से विदाई दी जाती है । विसर्जन का तात्विक अर्थ मूर्ति को फेंकना नहीं है अपितु उस सगुण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को पुनः उसके निर्गुण निराकार और सर्वव्यापी मूल स्वरूप में विलीन करना है。
विसर्जन से पूर्व माता का अंतिम बार षोडशोपचार पूजन किया जाता है। कलश के जल को आम के पत्तों से संपूर्ण घर में छिड़कना चाहिए जिससे घर का वास्तु शुद्ध हो जाए और शेष जल को तुलसी या अन्य पवित्र पौधों में प्रवाहित कर देना चाहिए । कलश के ऊपर रखे पूर्णपात्र (नारियल) को परिवार के सदस्यों द्वारा प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जा सकता है अथवा उसे बहते जल में प्रवाहित कर दिया जाता है । वेदी में बोए गए जवारों (यव) को उखाड़कर परिवार के सभी सदस्यों को माता के आशीर्वाद स्वरूप अपने मस्तक व कानों पर धारण करना चाहिए और शेष बचे जवारों को नदी या किसी शुद्ध जलाशय में विसर्जित कर देना चाहिए ।
विसर्जन के समय साधक को हाथ जोड़कर यह क्षमा-प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए:
"आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥"
अर्थात हे परमेश्वरि! मैं न तो आपका आवाहन करना जानता हूँ न विसर्जन की विधि जानता हूँ और न ही पूजा का विधान जानता हूँ। अतः मेरी भूलों को क्षमा कर मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें ।
फल-श्रुति: व्रत एवं पाठ का पारमार्थिक एवं लौकिक परिणाम
मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती के १२वें अध्याय जिसे 'फलश्रुति' कहा जाता है) और देवी भागवत पुराण में नवरात्रि साधना और सप्तशती पाठ के परिणामों का अत्यंत विशद और वैज्ञानिक वर्णन है ।
- १. शारीरिक एवं मानसिक रक्षा: देवी कवच के पाठ से साधक चेचक कोढ़ महामारी और अपमृत्यु (अकाल मृत्यु) जैसे घोर कष्टों से सुरक्षित रहता है। उस पर किसी भी प्रकार के विष (स्थावर अर्थात् वनस्पतियों का विष या जंगम अर्थात् सर्पादि का विष) का प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अतिरिक्त तांत्रिक मारण-मोहन और उच्चाटन जैसे नकारात्मक प्रयोगों का प्रभाव कवच धारण करने वाले पर सर्वथा शून्य हो जाता है ।
- २. शत्रु दरिद्रता एवं भय का समूल नाश: भगवती की स्तुति से प्रबल और अजेय शत्रुओं का दमन होता है। जो व्यक्ति अकारण मानसिक भय चिंता और दुःस्वप्न (बुरे सपनों) से ग्रसित रहता है सप्तशती के प्रभाव से उसके दुःस्वप्न शुभ फलों में परिवर्तित हो जाते हैं और अकारण भय शांत हो जाता है। देवी दरिद्रता का नाश कर अतुलनीय ऐश्वर्य प्रदान करती हैं ।
- ३. मोक्ष एवं परम पद की प्राप्ति: कलियुग में सप्तश्लोकी दुर्गा और नवार्ण मंत्र समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाले अचूक साधन हैं। नवरात्रि का यह नौ दिवसीय अनुष्ठान केवल लौकिक या भौतिक सुख (धन-धान्य विजय और पुत्र) ही प्रदान नहीं करता अपितु यह मोक्ष प्रदाता भी है । नौ दिनों की यह प्रगाढ़ साधना व्यक्ति की चेतना को मूलाधार चक्र (भौतिकता) से उठाकर सहस्रार चक्र (आध्यात्मिक पूर्णता) तक ले जाती है 。
निष्कर्ष
निष्कर्षतः शारदीय नवरात्रि प्रकृति मनुष्य और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के तादात्म्य का अनुपम महापर्व है। जो साधक शास्त्रोक्त नियमों—कठोर संयम सात्त्विक आहार दृढ़ संकल्प षोडशोपचार पूजन नवार्ण जप दुर्गा सप्तशती पाठ और निस्वार्थ कन्या पूजन—का तार्किक क्रमबद्ध एवं पूर्ण भक्तिपूर्ण निर्वहन करता है वह समस्त भौतिक बाधाओं और आधिभौतिक संतापों को पार कर परम आध्यात्मिक पूर्णता एवं भगवती के शाश्वत आशीर्वाद को प्राप्त करता है 。






