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वट सावित्री व्रत पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि एवं अनुष्ठानिक विश्लेषण
Puja Vidhi

वट सावित्री व्रत पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि

📿 पौराणिक•23 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2026
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वट सावित्री व्रत की शास्त्रसम्मत पूजा-विधि — वट वृक्ष पूजन, सावित्री-सत्यवान कथा, व्रत मंत्र एवं अनुष्ठानिक विश्लेषण का विस्तृत विवेचन।

ज्ञान-सार

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वट सावित्री व्रत: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि, अनुष्ठानिक प्रक्रिया एवं व्रत-विधान का गहन शोधपरक विश्लेषण

भारतीय सनातन परंपरा, धर्मशास्त्रों एवं पुराणों में 'वट सावित्री व्रत' को स्त्री-शक्ति, सतीत्व, अखंड सौभाग्य और पारलौकिक कल्याण का सर्वोच्च एवं अमोघ साधन माना गया है। महाभारत के वनपर्व में महर्षि मार्कण्डेय द्वारा युधिष्ठिर को सुनाए गए 'सावित्री-सत्यवान' आख्यान से उद्भूत यह व्रत कालान्तर में एक अत्यंत सुव्यवस्थित, तांत्रिक एवं वैदिक अनुष्ठान के रूप में विकसित हुआ। स्कन्द पुराण, भविष्य पुराण, निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु तथा व्रतराज जैसे प्रामाणिक और विशुद्ध कर्मकाण्डीय ग्रंथों में इस व्रत की अनुष्ठानिक प्रक्रियाओं का अत्यंत तार्किक और विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है। प्रस्तुत शोधपरक विश्लेषण पूर्णतः शास्त्रसम्मत विधियों, वट वृक्ष की तात्विक महत्ता, मंत्रों के शास्त्रीय अर्थ, तथा व्रत के सूक्ष्म नियमों व निषेधों पर केंद्रित है। इस विश्लेषण का मूल उद्देश्य वट सावित्री पूजन की प्रामाणिक विधि को अत्यंत गहराई के साथ प्रस्तुत करना है, ताकि अनुष्ठान का कोई भी दार्शनिक या व्यावहारिक पक्ष अछूता न रहे।

१. व्रत का शास्त्रीय स्वरूप एवं काल-निर्णय

सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की सफलता उसके सटीक 'काल' (समय) के निर्धारण पर निर्भर करती है। वट सावित्री व्रत के अनुष्ठान-काल को लेकर भारतीय पंचांग व्यवस्था में क्षेत्रीय एवं पंचांग-भेद के आधार पर दो प्रमुख मत प्रचलित हैं, जिनका स्पष्ट उल्लेख भविष्य पुराण और स्कन्द पुराण में मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, तिथियों के भेद के बावजूद व्रत का मूल उद्देश्य, अनुष्ठानिक प्रक्रिया और इसके इष्टदेव (ब्रह्मा-सावित्री तथा यम-सत्यवान-सावित्री) पूर्णतः समान रहते हैं。

१.१. पंचांग भेद और तिथियों का तार्किक विभाजन

भारतवर्ष में चांद्रमास की गणना के दो प्रमुख आधार हैं: पूर्णिमान्त (पूर्णिमा से समाप्त होने वाला मास) और अमान्त (अमावस्या से समाप्त होने वाला मास)। इस गणना-भेद के कारण व्रत की तिथियों में भिन्नता दृष्टिगोचर होती है, जिसे निम्नलिखित तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है:

पंचांग व्यवस्था मान्य क्षेत्र अनुष्ठान की तिथि व्रत का प्रचलित नाम शास्त्रीय संदर्भ
पूर्णिमान्त पंचांग उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि) एवं नेपाल ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या वट सावित्री अमावस्या स्कन्द पुराण, निर्णयामृतादि
अमान्त पंचांग दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा आदि ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा वट पूर्णिमा व्रत भविष्य पुराण, स्कन्द पुराण

यद्यपि तिथियों में यह भेद प्रतीत होता है, परंतु 'निर्णयसिन्धु' और 'धर्मसिन्धु' जैसे काल-निर्णायक ग्रंथों में यह स्पष्ट किया गया है कि दोनों ही तिथियाँ समान रूप से फलदायी हैं और व्रती अपनी क्षेत्रीय एवं कुल-परंपरा (देशाचार और कुलाचार) के अनुसार किसी भी एक तिथि का चयन कर सकती है。

१.२. व्रत के प्रकार: त्रिरात्र विधान बनाम एकदिन विधान

शास्त्रों में वट सावित्री व्रत के अनुष्ठान के दो प्रमुख स्वरूपों का विधान किया गया है, जो व्रती की शारीरिक सामर्थ्य और संकल्प शक्ति पर आधारित हैं :

व्रत का स्वरूप अवधि एवं तिथि शास्त्रीय अनुष्ठानिक नियम
त्रिरात्र व्रत ज्येष्ठ त्रयोदशी से अमावस्या/पूर्णिमा तक (३ दिन) त्रयोदशी को 'नक्तव्रत' (सूर्यास्त के बाद तारों की छाँव में भोजन), चतुर्दशी को 'अयाचित व्रत' (बिना मांगे जो प्राप्त हो जाए उसका भक्षण), और अमावस्या/पूर्णिमा को पूर्ण 'निर्जला उपवास' किया जाता है ।
एकदिन व्रत केवल मुख्य तिथि (अमावस्या या पूर्णिमा) जो स्त्रियाँ शारीरिक दुर्बलता के कारण तीन दिन का व्रत करने में असमर्थ होती हैं, वे केवल अंतिम दिन उपवास कर इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त कर सकती हैं।

प्राचीन काल में त्रिरात्र व्रत का प्रचलन अधिक था, जहाँ स्त्रियाँ तीन रात्रियों तक सावित्री के समान ही घोर तपस्या का अभ्यास करती थीं। वर्तमान समय में अधिकांश स्त्रियाँ एक दिवसीय विधान का ही पालन करती हैं, जिसे शास्त्रों ने पूर्णतः प्रामाणिक और मान्य ठहराया है。

२. व्रत की पात्रता एवं अधिकार

सनातन धर्मशास्त्रों में प्रत्येक व्रत और अनुष्ठान के लिए 'अधिकार' (Eligibility) का स्पष्ट निर्धारण किया गया है। वट सावित्री व्रत मुख्य रूप से सधवा (सुहागिन) स्त्रियों के लिए विहित है। इसका प्रधान लक्ष्य पति की अकाल मृत्यु का निवारण, आरोग्य की प्राप्ति और जन्म-जन्मांतर तक अखंड सौभाग्य का रक्षण है。

स्कन्द पुराण के एक विशिष्ट संदर्भ के अनुसार, यह व्रत केवल सधवा स्त्रियों तक सीमित नहीं है, अपितु यह "विधवा, सधवा, बालिका और वृद्धा सभी के लिए कल्याणकारक है"। यद्यपि विधवा या कुमारिका स्त्रियाँ इसे आत्मिक शांति, पारलौकिक कल्याण या उत्तम वर की प्राप्ति के लिए कर सकती हैं, किंतु अनुष्ठानिक कर्मकाण्ड—विशेषकर वट वृक्ष को रक्षा-सूत्र बाँधना, सिंदूर अर्पण करना और सुहाग सामग्री (वायन) का दान करना—पूर्णतः सधवा स्त्रियों के 'पतिव्रत धर्म' को केंद्र में रखकर ही संरचित किया गया है। यह व्रत स्त्री के आत्मबल और आध्यात्मिक सामर्थ्य का परिचायक है, जो यह प्रमाणित करता है कि तपस्या और धर्मनिष्ठा के बल पर नियति (यमराज) के अमिट विधान को भी परिवर्तित किया जा सकता है。

३. व्रत के नियम, संयम एवं निषेध (धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु के परिप्रेक्ष्य में)

किसी भी व्रत की पूर्णता केवल अन्न के त्याग से नहीं, अपितु शारीरिक, मानसिक और वाचिक संयम से होती है। 'धर्मसिन्धु' में व्रत की शास्त्रीय परिभाषा को अत्यंत गहराई से स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति बिना किसी विशिष्ट संकल्प, देव-आवाहन और नियमों के केवल भोजन का त्याग करता है, तो वह 'व्रत' नहीं, अपितु मात्र 'शरीर-क्लेश' (शारीरिक कष्ट) है। अतः वट सावित्री व्रत के लिए शास्त्रों में कठोर विधि-निषेधों का प्रतिपादन किया गया है。

३.१. शास्त्रीय नियम एवं संयम (Do's)

व्रत के अनुष्ठान में व्रती स्त्री को निम्नलिखित सात्विक नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है:

  • ब्रह्मचर्य का पालन: व्रत के दिन तथा उससे एक दिन पूर्व (अर्थात त्रयोदशी और चतुर्दशी से ही) पति-पत्नी को पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। मन, कर्म और वचन से कामुक विचारों का त्याग व्रत की प्रथम शर्त है।
  • सत्यभाषण एवं क्षमा-भाव: व्रत के दिन क्रोध, विवाद, अहंकार, छल-कपट और असत्य भाषण का सर्वथा त्याग करना चाहिए। पारिवारिक सदस्यों, विशेषकर जीवनसाथी के साथ किसी भी प्रकार का विवाद व्रत के पुण्य को क्षीण कर देता है।
  • वेशभूषा एवं शृंगार: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जल में तिल या गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। व्रत के दिन मंगलकारी रंगों—जैसे लाल, पीला, हरा या संतरी—के वस्त्र धारण करने का विधान है। स्त्रियों को पूर्ण सोलह शृंगार (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ, आलता आदि) करके ही पूजा में सम्मिलित होना चाहिए।

३.२. वर्जित कर्म एवं निषेध (Don'ts / Prohibitions)

शास्त्रों में वट सावित्री व्रत के दौरान कुछ कार्यों को सर्वथा वर्जित माना गया है:

  • अशुभ रंगों का निषेध: शास्त्रों के अनुसार इस दिन काले, नीले या गहरे भूरे रंग के वस्त्र, चूड़ियाँ या बिंदी पहनना पूर्णतः वर्जित है। चूँकि काला और नीला रंग शनि, राहु और केतु जैसे पापी और विच्छेदकारी ग्रहों का प्रतीक माना जाता है, अतः सौभाग्य के इस महान पर्व पर इनका त्याग अनिवार्य है।
  • शारीरिक निषेध: अमावस्या तिथि पितरों और यमराज से भी संबंधित होती है। धर्मशास्त्रों के अनुसार अमावस्या के दिन बाल काटना, नाखून काटना, या क्षौर कर्म पूर्णतः निषिद्ध है।
  • आहार संबंधी निषेध: व्रत के एक दिन पूर्व से ही तामसिक आहार का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा, मसूर की दाल, और कोदो का भक्षण निषिद्ध है। व्रत के दिन पूर्णतः सात्विक रहना चाहिए।

४. अनुष्ठानिक सामग्री एवं वट-वायन (बांस की टोकरी) का विधान

वट सावित्री पूजन में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक सामग्री का अपना एक विशिष्ट तात्विक और प्रतीकात्मक अर्थ होता है। इस पूजन में 'बांस' (Bamboo) और 'वट' (Banyan) का विशेष महत्व है। भारतीय दर्शन में बांस को वंश वृद्धि, निरंतरता और लचीलेपन का प्रतीक माना जाता है, जबकि वट वृक्ष को अमरता, स्थायित्व और अक्षय जीवन का。

४.१. शास्त्रीय पूजन सामग्री की विस्तृत सूची

व्रत-पूर्व तैयारी के अंतर्गत निम्नलिखित सामग्रियों का एकत्रीकरण किया जाना चाहिए:

सामग्री का नाम शास्त्रीय व प्रतीकात्मक महत्व एवं प्रयोग
बांस की दो टोकरियाँ (डलिया) एक टोकरी ब्रह्मा-सावित्री की स्थापना के लिए और दूसरी सत्यवान-सावित्री-यमराज की स्थापना के लिए प्रयुक्त होती है। बांस वंश वृद्धि का परिचायक है।
बांस का पंखा (बियना) ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ मास) में यमराज और सत्यवान को शीतलता प्रदान करने हेतु वायु करने के लिए तथा ब्राह्मण/सास को दान देने के लिए।
कच्चा सूत (सफेद या लाल कलावा) वट वृक्ष की परिक्रमा के समय तने पर लपेटने के लिए। यह पति-पत्नी के अटूट बंधन और रक्षा-कवच का प्रतीक है।
भीगे हुए काले चने अंकुरित काले चने नव-जीवन, सृजन और संतान सुख के प्रतीक हैं। इसी से व्रत का पारण (समापन) भी होता है ।
सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) टोकरी में आधार के रूप में बिछाने के लिए। यह प्रकृति की अन्नपूर्णा शक्ति और भरण-पोषण का प्रतीक है।
वट वृक्ष की टहनी यदि घर पर पूजा करनी हो तो गमले में लगाने के लिए। यद्यपि साक्षात् प्राचीन वृक्ष की पूजा सर्वोपरि है।
सुहाग सामग्री (शृंगार) सिंदूर, रोली, अक्षत, मेहंदी, आलता, कांच की चूड़ियाँ, बिंदी, काजल, मांगटीका आदि देवी को अर्पण हेतु।
नैवेद्य एवं मिष्ठान १२ की संख्या में गुड़ और गेहूं के आटे से बने पुए (गुलगुले), शक्कर के बताशे, और पंचामृत।
ऋतुफल आम, कटहल, लीची, खरबूजा, तरबूज, केले आदि (मुख्यतः ५ प्रकार के फल)।
वस्त्र एवं आभूषण सावित्री-सत्यवान की मूर्ति (या गुड्डा-गुड्डी) को अर्पित करने हेतु सवा मीटर पीला या लाल कोरा कपड़ा।
जल कलश एवं दीप तांबे या मिट्टी का शुद्ध जल से भरा कलश, गंगाजल, गाय के शुद्ध घी का दीपक, दशांग धूप, और कर्पूर।

५. व्रत-पूर्व तैयारी, प्रातःकालीन कृत्य एवं स्नान-विधि

अनुष्ठान का आरंभ बाह्य और आंतरिक शुद्धि से होता है। व्रती स्त्री को ज्येष्ठ अमावस्या (या पूर्णिमा) की प्रातः वेला में ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व) में शय्या का त्याग करना चाहिए। नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, तीर्थ जल (गंगाजल) मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए। स्नान करते समय वरुण देव और पवित्र नदियों का स्मरण करना चाहिए。

स्नान के पश्चात् स्वच्छ और मंगलकारी वस्त्र धारण कर, पूर्ण सोलह शृंगार करना चाहिए। इसके पश्चात घर के देवालय को स्वच्छ कर, सूर्य देव को अर्घ्य प्रदान कर अपने दिन का आरंभ करना चाहिए। तदुपरांत, वट वृक्ष के समीप (या घर के ईशान कोण में जहाँ वट की टहनी स्थापित की गई हो) पूजन स्थल को गाय के गोबर या शुद्ध जल से लीपकर पवित्र करना चाहिए。

६. संकल्प-विधान: व्रत का प्राण

'लघु-विष्णु' स्मृति और 'धर्मसिन्धु' के अनुसार किसी भी व्रत का प्राण उसका 'संकल्प' होता है। संकल्प वह मानसिक और वाचिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्रती ब्रह्मांडीय शक्तियों के समक्ष अपनी इच्छा और उद्देश्य की उद्घोषणा करता है। संकल्प के बिना किया गया अनुष्ठान दिशाहीन माना जाता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता。

वेदी के समक्ष उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख होकर बैठें। अपने दाहिने हाथ में शुद्ध जल, अक्षत (साबुत चावल), पुष्प, और कुछ द्रव्य (सिक्का) लें। इसके पश्चात् पूर्ण एकाग्रता के साथ निम्नलिखित शास्त्रसम्मत संकल्प मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें:

संकल्प मंत्र:

"मम वैधव्यादिसकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं, सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये।"

अथवा (विस्तृत रूप में):

"मम पत्युः दीर्घायु सिद्धार्थम् अकुटुम्बस्य क्षेम स्थैर्य आयुः आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्धि अर्थं सावित्री प्रीत्यर्थं वट सावित्री व्रतम् अहं करिष्ये।"

मंत्र का तार्किक अर्थ एवं भाव: "मैं (अपना नाम एवं गोत्र का स्मरण करें) अपने जीवन से वैधव्य (विधवा होने) आदि समस्त दुर्भाग्यपूर्ण दोषों के परिहार हेतु, मेरे पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, अचल संपत्ति, तथा मेरे संपूर्ण कुटुंब के कल्याण, स्थायित्व और ऐश्वर्य की अनवरत वृद्धि के लिए, भगवान ब्रह्मा एवं देवी सावित्री तथा सत्यवान एवं सती सावित्री की प्रसन्नता हेतु इस पावन वट सावित्री व्रत का अनुष्ठान कर रही हूँ।"

यह संकल्प वाक्य पूर्ण करने के पश्चात् हाथ में लिया हुआ जल और सामग्री वट वृक्ष की जड़ में या भगवान की वेदी के समक्ष छोड़ देनी चाहिए। यह क्रिया व्रती और ईश्वर के मध्य एक आध्यात्मिक अनुबंध की स्थापना करती है。

७. वेदी निर्माण एवं देव-स्थापन

संकल्प के पश्चात देव-स्थापन की प्रक्रिया आरंभ होती है। वट वृक्ष के मूल के समीप एक स्वच्छ स्थान पर अष्टदल कमल (रंगोली या चंदन से) बनाएँ। उस पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके दो बांस की टोकरियाँ (डलिया) स्थापित करें。

  • प्रथम टोकरी (सृजन का प्रतीक): इस टोकरी में नीचे सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) बिछाएँ। इसके ऊपर सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और उनकी शक्ति, वेदमाता सावित्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यह टोकरी ब्रह्मांडीय सृजन और ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है।
  • द्वितीय टोकरी (रक्षण और जीवन का प्रतीक): दूसरी टोकरी में भी सप्तधान्य बिछाकर सत्यवान, सती सावित्री तथा महिष (भैंसे) पर सवार यमराज की प्रतिमा (या सोने, मिट्टी अथवा कपड़े से बने प्रतीकात्मक स्वरूप/गुड्डा-गुड्डी) स्थापित करें। यह टोकरी मृत्यु पर जीवन की विजय और पातिव्रत्य धर्म की शक्ति का परिचायक है।

८. सावित्री-सत्यवान का 'षोडशोपचार' पूजन क्रम

धर्मशास्त्रों में किसी भी देव-पूजन की पूर्णता 'षोडशोपचार' (सोलह प्रकार के उपचारों) से मानी गई है। वट सावित्री व्रत में ब्रह्मा-सावित्री और सत्यवान-सावित्री का यह पूजन अत्यंत सुव्यवस्थित और भावपूर्ण होता है। प्रत्येक उपचार का अपना दार्शनिक महत्व है, जिसे निम्नलिखित तालिका में स्पष्ट किया गया है:

क्रम उपचार का नाम अनुष्ठानिक क्रिया एवं मंत्र भाव दार्शनिक एवं तात्विक अर्थ
१ आवाहन (Avahana) हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर ब्रह्मा-सावित्री तथा सत्यवान-सावित्री का आवाहन करें। परमसत्ता को अपने हृदय से निकालकर वेदी पर स्थापित करने की भावना। असीमित को सीमित में आमंत्रित करना।
२ आसन (Asana) इष्टदेवों को विराजने के लिए प्रतीकात्मक रूप से पुष्प या आसन अर्पित करें। ईश्वर को अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान प्रदान करना।
३ पाद्य (Padyam) भगवान के चरणों को धोने के भाव से तांबे के पात्र से जल अर्पित करें। श्रद्धावनत होकर ईश्वर के श्रीचरणों की वंदना करना।
४ अर्घ्य (Arghyam) अर्घ्य पात्र में जल, पुष्प और चंदन मिलाकर देवी सावित्री को अर्घ्य दें। (मंत्र नीचे वर्णित है) देवी को सम्मानपूर्वक अंजलि प्रदान करना। यह समर्पण का प्रतीक।
५ आचमन (Achamanam) मुख शुद्धि के लिए तीन बार जल अर्पित करें (ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः)। शारीरिक, मानसिक और वाचिक—तीनों प्रकार के तापों की शांति का भाव।
६ स्नान (Snanam) कलश के जल (या पंचामृत) से मूर्तियों को स्नान कराएं। आत्मा पर जमे अज्ञान रूपी मल को शुद्ध जल से प्रक्षालित करना।
७ वस्त्र (Vastram) सवा मीटर का पीला या लाल कोरा वस्त्र देवी सावित्री और सत्यवान को अर्पित करें। लोक-लाज और मर्यादा का प्रतीक। परमात्मा को आवरण प्रदान करना।
८ यज्ञोपवीत (Yajnopavita) भगवान ब्रह्मा और सत्यवान को जनेऊ (यज्ञोपवीत) पहनाएं। त्र्यंबक (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) और त्रिगुण (सत्व-रज-तम) के संतुलन का प्रतीक।
९ चंदन/गंध (Gandha) मूर्तियों को कुमकुम, हल्दी, अष्टगंध और रोली का तिलक लगाएं। जीवन में सुवास और सात्विकता का संचार करना।
१० पुष्प (Pushpa) ऋतुपुष्प, विशेषकर लाल और पीले फूल देवी सावित्री को अर्पित करें। अपने हृदय रूपी कोमल पुष्प को भगवान के चरणों में अर्पित करना।
११ धूप (Dhoop) दशांग धूप या अगरबत्ती जलाकर सुगंधित धुआं अर्पित करें। जिस प्रकार धूप स्वयं जलकर सुगन्ध फैलाती है, वैसे ही जीवन को परोपकार में लगाना।
१२ दीप (Deep) गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर देवताओं को दिखाएं। अज्ञान रूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान रूपी प्रकाश की प्राप्ति।
१३ नैवेद्य (Naivedyam) १२ की संख्या में पुए, गुलगुले, भीगे हुए काले चने, और पंच-ऋतुफल का भोग लगाएं। ईश्वर द्वारा प्रदत्त अन्न को प्रसाद रूप में पुनः उन्हें ही समर्पित करना।
१४ तांबूल (Tamboolam) पान के पत्ते पर लौंग, इलायची और सुपारी रखकर तांबूल अर्पित करें। भोजन के पश्चात मुख-शुद्धि और पूर्णता का परिचायक।
१५ दक्षिणा (Dakshina) अपनी सामर्थ्य के अनुसार द्रव्य (धन) अर्पित करें। पूजा में रही त्रुटियों की पूर्ति हेतु अर्थ का त्याग करना।
१६ नीराजन / आरती अंत में कर्पूर जलाकर आरती करें और पुष्पांजलि देते हुए क्षमा प्रार्थना करें। अपनी आत्मा की ज्योति को परमात्मा की ज्योति से मिलाना।

विशेष अर्घ्य एवं प्रार्थना मंत्र

उपरोक्त षोडशोपचार क्रम में देवी सावित्री को अर्घ्य प्रदान करते समय इस अत्यंत प्रभावशाली मंत्र का उच्चारण किया जाना चाहिए:

अर्घ्य मंत्र:

"अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥"

(अर्थ: हे सुव्रते देवी सावित्री! आप मुझे अखंड सौभाग्य और अवैधव्य (विधवा न होने का वर) प्रदान करें। मुझे पुत्र, पौत्र और समस्त सांसारिक सुख-समृद्धि प्रदान करें। मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को आप स्वीकार करें, आपको बारंबार नमस्कार है।)

इसके पश्चात् देवी सावित्री के ध्यान और उनकी कृपा प्राप्ति के लिए निम्नलिखित श्लोक का मानसिक या वाचिक जप करना चाहिए:

"ओंकारपूर्विके देवि वीणापुस्तकधारिणि। देव्यम्बिके नमस्तुभ्यमवैधव्यं प्रयच्छ मे॥"

"जगत्पूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदैवते। पत्या सहवियोगं मे वटस्थे कुरु ते नमः॥"

(अर्थ: हे ओंकार स्वरूपा, वीणा और पुस्तक धारण करने वाली देवी अम्बिके! आपको मेरा नमस्कार है, आप मुझे अखंड सौभाग्य प्रदान करें। हे जगन्माता सावित्री, आप संपूर्ण जगत द्वारा पूजनीय हैं, आप आदर्श पतिव्रता हैं और इस वट वृक्ष में निवास करती हैं। कृपा करें कि मेरा मेरे पति से कभी वियोग न हो।)

९. वट वृक्ष की महत्ता, सिंचन एवं प्रार्थना

इस संपूर्ण अनुष्ठान का केंद्र बिंदु 'वट वृक्ष' (बरगद) है। हिंदू दर्शन और वनस्पति विज्ञान दोनों ही दृष्टियों से वट वृक्ष असाधारण है। पुराणों के अनुसार वट वृक्ष अमरता और अनंतता का प्रतीक है। इसके मूल (जड़) में ब्रह्मा, मध्य भाग (छाल) में विष्णु और अग्रभाग (शाखाओं) में भगवान शिव का वास माना गया है। 'अक्षय वट' के रूप में यह प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होता, अतः स्त्रियाँ इस वृक्ष की पूजा कर अपने पति की आयु को वट वृक्ष के समान ही अक्षय, दृढ़ और चिरस्थायी बनाने की प्रार्थना करती हैं。

वेदी पर देव-पूजन के पश्चात् व्रती स्त्री को वट वृक्ष के मूल को शुद्ध जल या गंगाजल से सींचना चाहिए। वृक्ष के तने पर रोली, हल्दी और चंदन का लेप करें। तत्पश्चात दोनों हाथ जोड़कर वट वृक्ष के समक्ष इस प्रकार प्रार्थना करें:

वट प्रार्थना श्लोक:

"वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः। यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥"

(अर्थ: हे विशाल वट वृक्ष! मैं अमृत के समान पवित्र और जीवनदायी जल से तुम्हारी जड़ों को सींचती हूँ। जिस प्रकार इस पृथ्वी पर तुम्हारी शाखाएं और प्रशाखाएं अनंत रूप से फैलती हैं और स्थायित्व प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार तुम मुझे पुत्र-पौत्रादि से सदैव संपन्न करो और मेरे परिवार की निरंतर वृद्धि करो।)

१०. सूत्र-वेष्टन (धागा बाँधना) एवं परिक्रमा विधान

वट वृक्ष की पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक अंग उसकी परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटना है। यह क्रिया पति के जीवन के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (रक्षा सूत्र) के निर्माण का तांत्रिक और मानसिक प्रतीक है。

  • विधि एवं प्रक्रिया: व्रती स्त्री को अपने दाहिने हाथ में कच्चे सूत (सफेद या लाल-पीला कलावा) का गोला पकड़कर वट वृक्ष के चारों ओर प्रदक्षिणा (Clockwise) करनी चाहिए।
  • परिक्रमा की संख्या: परिक्रमा की संख्या पारंपरिक रूप से ७, ११, २१ अथवा १०८ हो सकती है। परिक्रमा करते समय सूत को वृक्ष के तने पर अनवरत लपेटते जाना चाहिए।
  • भाव एवं वैज्ञानिकता: प्रदक्षिणा ब्रह्मांड की चक्रीय गति का प्रतीक है। प्रत्येक परिक्रमा के साथ मन में पति के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और यमराज से उनकी रक्षा की प्रार्थना अनवरत चलती रहनी चाहिए। कच्चे सूत का प्रयोग इस बात का सूचक है कि पति-पत्नी का संबंध कच्चे धागे के समान नाज़ुक होता है, जिसे प्रेम, विश्वास और श्रद्धा के साथ सहेजा जाना चाहिए। इस समय भगवान विष्णु के महामंत्रों (जैसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय') या सावित्री स्तोत्र का मानसिक जप अत्यंत उत्तम माना गया है।

११. कथा-श्रवण का शास्त्रीय विधान

परिक्रमा पूर्ण होने के पश्चात, व्रती स्त्रियों को वट वृक्ष की शीतल छाया में बैठकर 'वट सावित्री व्रत कथा' का सामूहिक या व्यक्तिगत श्रवण करना चाहिए। यह कथा महाभारत के वनपर्व और स्कन्द पुराण (प्रभास खण्ड, अध्याय १६६) से ली गई है ।

कथा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह कथा मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री द्वारा अपने अदम्य साहस, पतिव्रत धर्म, और तार्किक संवाद से साक्षात् यमराज को पराजित कर अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस लाने का वृत्तांत है। कथा श्रवण के समय हाथ में भीगे हुए काले चने (अंकुरित) और कुशा रखनी चाहिए। यह आख्यान केवल एक पौराणिक गाथा नहीं है, बल्कि यह नारी की बौद्धिक क्षमता, उसके धर्मशास्त्रों के ज्ञान और उसकी आध्यात्मिक शक्ति का ज्वलंत प्रमाण है। सावित्री ने विलाप कर नहीं, अपितु कर्मफल, धर्म और वेदांत के तर्कों से यमराज को निरुत्तर किया था। कथा पूर्ण होने पर हाथ में लिए गए चनों को वट वृक्ष की जड़ में अर्पित कर देना चाहिए。

१२. वायन दान एवं दक्षिणा विधान (Vayana Dana)

सनातन कर्मकाण्ड में किसी भी व्रत या अनुष्ठान का पुण्य तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसके निमित्त 'दान' (Charity) न किया जाए। वट सावित्री व्रत में 'वायन' दान करने का विशेष शास्त्रसम्मत विधान है। 'वायन' उस विशिष्ट नैवेद्य और शृंगार सामग्री को कहते हैं जो देव-पूजन के पश्चात् ब्राह्मणों, सुहागिन स्त्रियों या सास को ससम्मान भेंट किया जाता है। दान की यह प्रक्रिया पुण्य के हस्तांतरण और परिवार में सौहार्द बढ़ाने का माध्यम है。

१२.१. वायन तैयार करने की विधि

एक नई बांस की टोकरी (सूप या डलिया) लें। उसमें सवा किलो या अपनी सामर्थ्य अनुसार कोई भी अनाज (गेहूं या चावल) रखें। इसके ऊपर वस्त्र, १२ मीठे पुए, मौसमी फल (विशेषकर आम और खरबूजा), भीगे हुए चने, और पूर्ण सुहाग सामग्री (सिंदूर, बिंदी, आलता, चूड़ियाँ, कंघी, दर्पण आदि) सजाएं。

१२.२. वायन दान की अनुष्ठानिक प्रक्रिया

  • सास या सुहागिन को दान: यह सजी हुई टोकरी (वायन) अपनी सास के चरण स्पर्श कर उन्हें सौंपनी चाहिए। यदि सास उपस्थित न हों, तो यह वायन ननद, जेठानी या किसी भी वयोवृद्ध सुहागिन स्त्री को दिया जा सकता है। यह पारिवारिक आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
  • ब्राह्मण को दान: एक अन्य बांस के पंखे (बियना) पर फल, मिष्ठान्न, वस्त्र और कुछ नकद दक्षिणा रखकर किसी योग्य, सदाचारी और वेदपाठी ब्राह्मण को दान करनी चाहिए। यह दान करते समय 'यमराज' और 'सावित्री' का स्मरण करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए कि इस दान के पुण्य से पति की आयु में वृद्धि हो। दान देते समय "श्रीशः सम्प्रीयताम्" (भगवान श्रीहरि प्रसन्न हों) का भाव मन में होना चाहिए।

१३. पारण विधि: व्रत का समापन (Breaking the Fast)

व्रत का समापन (पारण) भी विशिष्ट शास्त्रीय नियमों के अधीन होता है। जो स्त्रियाँ 'त्रिरात्र व्रत' करती हैं, वे अमावस्या/पूर्णिमा के अगले दिन (प्रतिपदा को) प्रातःकाल पारण करती हैं। जो स्त्रियाँ एक दिवसीय व्रत करती हैं, वे पूजा के पश्चात् उसी दिन दोपहर या संध्याकाल में पारण कर सकती हैं。

१३.१. वट कलिका और काले चने से पारण का तात्विक अर्थ

पारण की अत्यंत विशिष्ट और प्रतीकात्मक विधि है। व्रती स्त्री को वट वृक्ष की नई लाल कोपलों (कलिकों) और ११ भीगे हुए काले चनों को जल के साथ बिना चबाए (सीधे निगल कर) व्रत खोलना चाहिए。

वैज्ञानिक और तात्विक दृष्टिकोण: काले चने और वट वृक्ष की कोपलें नवजीवन, उर्वरता (Fertility) और बीज-शक्ति का प्रतीक हैं। इन्हें चबाने से 'बीज-नाश' का दोष लगता है, अतः जीवन-शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए इन्हें सीधे निगलने का विधान है。

इसके पश्चात् शुद्ध और सात्विक आहार (फलाहार या मीठा भोजन) ग्रहण करना चाहिए। पारण से पूर्व कलश का अभिमंत्रित जल पूरे घर में छिड़कना चाहिए और पति के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए。

१४. वट सावित्री व्रत की फल-श्रुति (Phal-Shruti)

पुराणों और धर्मशास्त्रों में प्रत्येक अनुष्ठान के अंत में उसकी 'फल-श्रुति' (अर्थात इस कर्म से क्या पुण्य प्राप्त होगा) का उल्लेख अनिवार्य रूप से किया गया है। स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार वट सावित्री व्रत की फल-श्रुति अत्यंत व्यापक और पारलौकिक है。

  • अकाल मृत्यु का निवारण एवं दीर्घायु: जो स्त्री पूर्ण श्रद्धा, विधि-विधान और संकल्प के साथ वट वृक्ष की परिक्रमा और सावित्री-सत्यवान का षोडशोपचार पूजन करती है, उसके पति पर आने वाले बड़े से बड़े प्राणघातक संकट (अकाल मृत्यु) टल जाते हैं।
  • अखंड सौभाग्य एवं संतति सुख: 'अवैधव्यं च सौभाग्यं...' मंत्र के निरंतर जप और अर्घ्य के प्रभाव से स्त्री को सात जन्मों तक अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। अंकुरित चने और वट वृक्ष के सिंचन के पुण्य से वंश वृद्धि होती है और योग्य व स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है।
  • पारिवारिक ऐश्वर्य एवं सद्गति: इस व्रत के प्रभाव से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि होती है। पतिव्रत धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करने वाली स्त्री इस लोक के समस्त भौतिक सुखों का उपभोग कर अंत में परलोक में भी उत्तम गति (सद्गति) को प्राप्त होती है।

१५. निष्कर्ष

वट सावित्री व्रत भारतीय सनातन परंपरा में स्त्री-शक्ति, प्रगाढ़ प्रेम, अचल निष्ठा और दृढ़-संकल्प का सर्वोच्च उदाहरण है। धर्मसिन्धु, व्रतराज, स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के परिप्रेक्ष्य में किए गए इस विश्लेषण से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि यह व्रत मात्र एक शारीरिक उपवास या रूढ़िवादी परंपरा नहीं है, अपितु यह एक अत्यंत गहन तांत्रिक एवं वैदिक अनुष्ठान है。

इसकी प्रत्येक प्रक्रिया—चाहे वह 'संकल्प' द्वारा मानसिक ऊर्जा का ब्रह्मांडीय शक्तियों के साथ संकेंद्रण हो, 'षोडशोपचार' पूजन द्वारा परमसत्ता का आवाहन हो, वट वृक्ष की 'प्रदक्षिणा' और 'सूत्र-वेष्टन' द्वारा एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण हो, या 'वायन दान' द्वारा अपने अहंकार का विसर्जन कर पारिवारिक सौहार्द की स्थापना हो—पूर्णतः तार्किक, मनोवैज्ञानिक और पारलौकिक आधार पर निर्मित है。

वट वृक्ष जहाँ प्रकृति की असीमित जीवन-शक्ति, अमरता और त्रिमूर्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप है, वहीं देवी सावित्री भारतीय नारी के उस अदम्य बौद्धिक और आध्यात्मिक सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करती हैं जो साक्षात् मृत्युदेव यमराज को भी अपने तर्कों और तपोबल से पराजित करने की क्षमता रखती हैं। अतः शास्त्रसम्मत विधि, सात्विक नियमों और पूर्ण पवित्रता से अनुष्ठित किया गया यह वट सावित्री व्रत पतिव्रता स्त्री के जीवन में निश्चित रूप से 'अवैधव्य', आयु, आरोग्य और अखंड ऐश्वर्य की स्थापना करता है。

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

महिला एवं धर्म

वट सावित्री व्रत की कथा और विधि

सावित्री-सत्यवान (महाभारत)। यमराज से प्राण वापस। वट पूजा, 7 परिक्रमा, कलावा, कथा। सबसे प्राचीन।

महिला एवं धर्म

वट सावित्री व्रत विधि कथा

ज्येष्ठ; महाभारत कथा: सावित्री ने यमराज से पति प्राण वापस। वट पूजा+7 परिक्रमा+कलावा+कथा। वट=शाश्वत=पति दीर्घायु। बुद्धि+साहस+पतिव्रत।

व्रत विधि

बरगद पेड़ की पूजा — वट सावित्री व्रत में?

वट सावित्री=ज्येष्ठ अमावस्या(पति दीर्घायु)। बरगद पर जल+दूध+रोली→मौली बांधें→7 परिक्रमा→कथा सुनें→व्रत। सावित्री ने यमराज से पति प्राण वापस लिए। बरगद=अमरत्व।

व्रत पूजा

बरगद के पेड़ की पूजा वट सावित्री व्रत में कैसे करें

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या (उत्तर भारत) या ज्येष्ठ पूर्णिमा (महाराष्ट्र/दक्षिण) को मनाया जाता है। स्नान-श्रृंगार के बाद बरगद की जड़ में जल, रोली, अक्षत, पुष्प चढ़ाएँ। कच्चा सूत 7 बार तने पर लपेटते हुए 7 परिक्रमा करें। सावित्री-सत्यवान कथा सुनें। वट में त्रिदेवों का वास — स्कन्द/भविष्योत्तर पुराण।

विशिष्ट पूर्णिमा

वट सावित्री व्रत किस पूर्णिमा को होता है?

ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को वट सावित्री व्रत होता है। इसमें महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा कर पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं।

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