विस्तृत उत्तर
कन्या पूजन का महत्व और विधि देवी भागवत पुराण और दुर्गा सप्तशती में वर्णित है:
कन्या पूजन क्यों
देवी भागवत में कहा गया है — कन्या (कुमारी) में देवी का अंश विद्यमान होता है। 1 से 16 वर्ष की कन्या देवी के नव रूपों की प्रतीक है। जो साधक कन्याओं की पूजा करता है, वह साक्षात् देवी की पूजा करता है।
कन्याओं की आयु और देवी रूप
| आयु | देवी रूप | शक्ति |
|-----|----------|--------|
| 1 वर्ष | कुमारी | सर्वमंगल |
| 2 वर्ष | त्रिमूर्ति | धन |
| 3 वर्ष | कल्याणी | सुख |
| 4 वर्ष | रोहिणी | रोग नाश |
| 5 वर्ष | काली | भय नाश |
| 6 वर्ष | चंडिका | विजय |
| 7 वर्ष | शांभवी | राज कृपा |
| 8 वर्ष | दुर्गा | शत्रु नाश |
| 9 वर्ष | सुभद्रा | मोक्ष |
कन्या पूजन का समय
अष्टमी या नवमी — नवरात्रि के आठवें या नवें दिन।
कन्या पूजन की विधि
- 1कन्याओं को आमंत्रण: 2 से 10 कन्याएं (1-10 वर्ष)
- 2चरण प्रक्षालन: गर्म जल से पाँव धोएं
- 3तिलक: रोली (कुमकुम) का तिलक लगाएं
- 4कलाई: लाल धागा बाँधें
- 5भोजन: हलवा, पूरी, काला चना का भोग
- 6दक्षिणा: यथाशक्ति
- 7आशीर्वाद लें: कन्याओं के चरण स्पर्श करें
एक लांगुरिया (बालक)
कुछ परंपराओं में कन्याओं के साथ एक छोटा बालक (लांगुरिया — भैरव का प्रतीक) भी भोजन कराया जाता है।
कन्या पूजन का फल
देवी भागवत: 'कन्यापूजनमात्रेण तुष्यन्ति सर्वदेवताः' — कन्या पूजन मात्र से सभी देवता प्रसन्न होते हैं।





