चैत्र नवरात्रि: कलश स्थापना एवं घटस्थापना की शास्त्रसम्मत, तांत्रिक एवं पौराणिक विधि
प्रस्तावना
सनातन धर्म की शास्त्रीय एवं आगम परंपरा में 'नवरात्रि' केवल एक सामान्य पर्व या उत्सव मात्र नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) के साथ मानवीय चेतना के तादात्म्य को स्थापित करने वाला एक अत्यंत सूक्ष्म, वैज्ञानिक और तांत्रिक अनुष्ठान है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाली वासंतिक या चैत्र नवरात्रि का विशेष और युगान्तकारी महत्व है, क्योंकि इसी पवित्र दिन से हिंदू नववर्ष (विक्रम संवत्) का भी शुभारंभ होता है । यह कालखंड प्रकृति में ऋतु-परिवर्तन, नव-सृजन और ब्रह्मांडीय शक्तियों के जागरण का समय होता है। शक्ति-उपासना के इस पावन अवसर पर अनुष्ठान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, आधारभूत और रहस्यमयी कर्म 'कलश स्थापना' या 'घटस्थापना' है।
धर्मशास्त्रों, अठारह पुराणों (विशेषकर श्रीमद् देवी भागवत महापुराण एवं मार्कंडेय पुराण) तथा तंत्र-आगम ग्रंथों के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कलश केवल जल भरने का एक सामान्य मृत्तिका या धातु का पात्र नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड (हिरण्यगर्भ) और मानव शरीर का सूक्ष्म प्रतीक है। घटस्थापना के माध्यम से साधक पञ्चमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को एक विशिष्ट अनुपात में संतुलित करता है और निर्गुण, निराकार, अवाङ्मनसगोचर परब्रह्म की महाशक्ति को एक सगुण, साकार रूप (कलश) में आवाह्न कर प्रतिष्ठित करता है। प्रस्तुत शोध-प्रबंध में चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन संपन्न होने वाली कलश स्थापना की पूर्ण शास्त्रसम्मत विधि, सटीक शुभ मुहूर्त का ज्योतिषीय निर्धारण, संकल्प-प्रक्रिया, स्थल एवं वेदी शुद्धि, बीजारोपण (जौ बोने की विधि), पञ्चतत्वों के तात्विक रहस्य, तथा देवी-आवाहन के गूढ़ अनुष्ठानिक पक्षों का पूर्णतः प्रामाणिक और विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
शास्त्रसम्मत काल एवं मुहूर्त निर्धारण: चैत्र नवरात्रि २०२६
नवरात्रि में घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अत्यंत सतर्कता, सूक्ष्म ज्योतिषीय गणनाओं और शास्त्रीय नियमों के अधीन किया जाना अनिवार्य है। 'निर्णयसिन्धु' और 'धर्मसिन्धु' जैसे प्रामाणिक धर्मशास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार, देवी के आवाह्न और घटस्थापना के समय काल-दोषों का पूर्णतः परिहार होना चाहिए।
शास्त्रों में मुहूर्त निर्धारण के लिए कुछ कठोर नियम प्रतिपादित किए गए हैं। कलश स्थापना के समय प्रतिपदा तिथि की व्याप्ति होना सर्वथा अनिवार्य है, और सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त प्रतिपदा के प्रथम एक-तिहाई भाग (प्रातःकाल) में ही माना जाता है। यदि किसी अपरिहार्य कारणवश प्रातःकाल का यह विशिष्ट समय उपलब्ध न हो, या कोई अन्य ज्योतिषीय दोष उत्पन्न हो रहा हो, तो 'अभिजित मुहूर्त' (मध्याह्न काल) में घटस्थापना की जा सकती है, जो कि एक अत्यंत शुभ और दोष-निवारक विकल्प है । इसके अतिरिक्त, घटस्थापना के लिए 'द्विस्वभाव लग्न' (जैसे मीन, मिथुन, कन्या, धनु) को तंत्र और ज्योतिष शास्त्रों में अत्यंत फलदायी माना गया है, क्योंकि द्विस्वभाव राशियां स्थिरता और गतिशीलता का एक आदर्श संतुलन प्रदान करती हैं, जो नौ दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान की ऊर्जा को धारण करने के लिए आवश्यक है।
इसके विपरीत, शास्त्रों में कुछ समय-खंडों को घटस्थापना के लिए पूर्णतः निषिद्ध (वर्जित) माना गया है। 'निर्णयसिन्धु' के स्पष्ट निर्देशानुसार चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के समय कलश स्थापना कदापि नहीं करनी चाहिए। साथ ही, रात्रि के अंधकार में और अमावस्या तिथि के प्रभाव काल में कलश स्थापना पूर्णतः निषिद्ध है, क्योंकि अमावस्या क्षीण चंद्रमा का काल है जो देवी के सत्वगुण संपन्न आवाह्न के लिए उपयुक्त नहीं है।
वर्ष २०२६ में चैत्र नवरात्रि का पावन आरंभ गुरुवार, १९ मार्च को हो रहा है। इस दिन के लिए 'दृक पञ्चाङ्ग' तथा अन्य सूक्ष्म ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर मुहूर्त का विस्तृत विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किया गया है:
| अनुष्ठान / खगोलीय घटना | समय (भारतीय समयानुसार - बेंगलुरु स्थानीय सूर्योदय के आधार पर) | शास्त्रीय आधार एवं महत्व |
|---|---|---|
| प्रतिपदा तिथि का आरंभ | १९ मार्च २०२६, प्रातः ०६:४० / ०६:५२ बजे | देवी अनुष्ठान का मूल आधार |
| प्रतिपदा तिथि की समाप्ति | २० मार्च २०२६, प्रातः ०४:५२ बजे | तिथि व्याप्ति |
| प्रातःकालीन घटस्थापना मुहूर्त (प्राथमिक एवं सर्वश्रेष्ठ) | प्रातः ०६:५२ बजे से प्रातः ०७:४३ बजे तक | द्विस्वभाव मीन लग्न की व्याप्ति एवं शुद्ध प्रतिपदा का संयोग |
| अभिजित मुहूर्त (द्वितीयक एवं वैकल्पिक) | दोपहर १२:०५ बजे से दोपहर १२:५३ बजे तक | मध्याह्न व्याप्ति, यदि प्रातः का समय चूक जाए |
| मीन लग्न की कुल अवधि | प्रातः ०६:२६ बजे से प्रातः ०७:४३ बजे तक | द्विस्वभाव लग्न का शुभ प्रभाव |
| राहु काल (वर्जित समय) | दोपहर ०२:४८ बजे से शाम ०४:१८ बजे तक (लगभग) | इस काल में कोई भी शुभ कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए |
विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि १९ मार्च २०२६ को प्रातः ०६:५२ तक अमावस्या तिथि का प्रभाव रहेगा, अतः घटस्थापना का अनुष्ठान प्रातः ०६:५२ के पश्चात् ही किया जाना चाहिए, जब शुद्ध प्रतिपदा तिथि और शुभ मीन लग्न का उत्कृष्ट संयोग उपस्थित हो ।
अधिकार, पात्रता एवं अनुष्ठानिक शुद्धि
शारदीय या चैत्र नवरात्रि में भगवती की उपासना का अधिकार प्रत्येक उस श्रद्धालु को है जो आस्तिकता, पूर्ण श्रद्धा और शास्त्र-मर्यादा का कठोरता से पालन करता है। आध्यात्मिक गुरु स्वामी मुकुंदानंद जी के वचनानुसार, ईश्वरीय उपासना में "हृदय का भाव कर्मकांड के भौतिक उपकरणों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है" (The heart matters more than the hardware) । विक्षिप्त, चंचल और अश्रद्धेय मन से सजाई गई स्वर्ण-रजत जटित वेदी भी मात्र एक सजावट है, जबकि पूर्ण समर्पण, वैराग्य और भक्ति के साथ स्थापित एक साधारण मिट्टी का कलश भी ईश्वरीय कृपा और अनंत ऊर्जा का 'पावरहाउस' (Powerhouse) बन जाता है । यह कलश इस बात का प्रतीक है कि साधक नवें दिन तक स्वयं कैसा बनना चाहता है—स्थिर, पूर्ण, सीधा और अनंत आकाश की ओर उन्मुख ।
बाह्य एवं आभ्यंतर शुद्धि (Bahya and Antar Shuddhi)
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अनुसार, महादेवी की उपासना और कलश स्थापना से पूर्व साधक के लिए 'बाह्य शुद्धि' (स्नानादि से शरीर की पवित्रता) और 'आभ्यंतर शुद्धि' (मानसिक और आध्यात्मिक पवित्रता) सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
अनुष्ठान का वास्तविक आरंभ वाक्-संयम (मौन या केवल ईश्वरीय नाम का उच्चारण) और 'आचमन' (पवित्र जल ग्रहण करने की प्रक्रिया) से होता है। साधक दाहिने हाथ की हथेली में जल लेकर "ॐ केशवाय स्वाहा, ॐ नारायणाय स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा" मंत्रों का उच्चारण करते हुए तीन बार जल ग्रहण करता है, जिससे त्रिविध तापों की शांति होती है और आभ्यंतर शुद्धि सिद्ध होती है। आचमन के पश्चात् 'प्राणायाम' के माध्यम से श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है, जो मन को अनुष्ठान के लिए एकाग्र करता है।
भूतशुद्धि एवं न्यास (Bhuta Shuddhi and Nyasa)
तांत्रिक और आगम ग्रंथों में 'भूतशुद्धि' एक अत्यंत रहस्यमयी और अनिवार्य प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत साधक ध्यान की अवस्था में अपने स्थूल शरीर का मानसिक रूप से लय करता है। ध्यान की इस गहन प्रक्रिया में पञ्चतत्वों को क्रमशः एक-दूसरे में विलीन किया जाता है—पृथ्वी तत्व को जल में, जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में, वायु को आकाश में, आकाश को 'अहंकार' में, अहंकार को 'महत' (महान ऊर्जा) में और अंततः महत को परब्रह्म की आदि 'प्रकृति' या 'माया' (महाशक्ति) में समाहित कर दिया जाता है। इस तात्विक लय के पश्चात् एक नए, दिव्य और शुद्ध शरीर की भावना की जाती है जो देवी की उपासना के योग्य होता है।
तत्पश्चात्, साधक परब्रह्म देवी के साथ अपने तादात्म्य को स्थापित करने हेतु 'जीव शुद्धि' करता है तथा 'न्यास' (Kara Nyasa and Anga Nyasa) की प्रक्रिया संपन्न करता है। न्यास का अर्थ है स्थापना करना। इसमें विशिष्ट बीजाक्षरों (जैसे 'ऐं', 'ह्रीं', 'क्लीं', 'सौः') का उच्चारण करते हुए हाथ की उंगलियों और शरीर के विभिन्न अंगों (जैसे 'ऐं हृदयाय नमः') का स्पर्श किया जाता है। यह प्रक्रिया साधक के भौतिक शरीर को मंत्रमय और देव-स्वरूप बना देती है।
कलश स्थापना: पञ्चमहाभूतों का तात्विक रहस्य एवं सामग्री
शास्त्रों में कलश स्थापना को सृष्टि की उत्पत्ति का सूक्ष्म प्रतिरूप माना गया है। यह कोई सामान्य कर्मकांड नहीं है, अपितु यह पञ्चमहाभूतों (Five Elements of Nature) के एकत्रीकरण और संतुलन का उच्चस्तरीय विज्ञान है। अनुष्ठान में प्रयुक्त प्रत्येक भौतिक सामग्री का एक विशिष्ट तात्विक, ब्रह्मांडीय और दार्शनिक अर्थ है।
तालिका: पञ्चमहाभूतों का कलश अनुष्ठान में प्रतिनिधित्व एवं तार्किक महत्व
| अनुष्ठानिक सामग्री | संबंधित महाभूत (Element) | शास्त्रीय एवं तार्किक महत्व |
|---|---|---|
| मिट्टी का पात्र, मृत्तिका एवं जौ (सप्तधान्य) | पृथ्वी तत्व (Earth element) | यह जीवन की उर्वरता, स्थिरता, स्थायित्व और सृजन के आधार का प्रतीक है। |
| कलश में भरा गया पवित्र जल (गंगाजल) | जल तत्व (Water element) | यह जीवन-शक्ति, तरलता, भावनाओं की शुद्धि और ब्रह्मांडीय चेतना के प्रवाह का सूचक है। |
| अखण्ड ज्योति (निरंतर प्रज्वलित दीपक) | अग्नि तत्व (Fire element) | अग्नि अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाले ईश्वरीय ज्ञान, तेज, ऊष्मा और वैराग्य का प्रतीक है। |
| दुर्गा सप्तशती का सस्वर मंत्रोच्चार | वायु तत्व (Air element) | मंत्रों से उत्पन्न ध्वनि तरंगें और स्पंदन वायु तत्व को जाग्रत एवं संतुलित कर वातावरण को ऊर्जान्वित करते हैं। |
| कलश के मुख पर रखा श्रीफल (नारियल) व पल्लव | आकाश तत्व (Ether element) | नारियल को मानव चेतना या 'शिर' (मस्तिष्क) का प्रतीक माना जाता है, जो असीम आकाश और ब्रह्मांडीय शून्यता से जुड़ता है। |
इन तत्वों के संपूर्ण और शास्त्रसम्मत सामंजस्य से कलश नव-दिनों के लिए ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक अजेय और स्पंदित 'पावरहाउस' बन जाता है। नौ दिनों की पूजा के पश्चात् यह ऊर्जाकृत जल अत्यंत पवित्र हो जाता है और शरीर, मन तथा घर से नकारात्मक ऊर्जा (Negative energy) को दूर करने के लिए इसका मार्जन (छिड़काव) किया जाता है।
आवश्यक पूजन सामग्री की विस्तृत सूची (Detailed Samagri List)
शास्त्रों के अनुसार एक आदर्श और पूर्ण घटस्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्रियाँ पूर्व-संध्या पर ही एकत्रित कर लेनी चाहिए, ताकि प्रातःकाल के शुभ मुहूर्त में कोई व्यवधान न आए:
१. पात्र एवं आधार-निर्माण: एक चौड़े मुँह वाला मिट्टी का पात्र या वेदी (सप्तधान्य बोने हेतु), तथा एक सुंदर मिट्टी, तांबे या पीतल का कलश। २. मृत्तिका एवं धान्य (Saptamrittika and Sapta Dhanya): स्वच्छ और पवित्र मिट्टी। शास्त्रों में 'सप्तमृत्तिका' (सात पवित्र स्थानों की मिट्टी) का विधान है, जो आध्यात्मिक वातावरण को शुद्ध करती है। इसके अतिरिक्त बोने के लिए सप्तधान्य (सात प्रकार के अनाज) जिसमें मुख्य रूप से जौ, गेहूं, काले तिल, पीली सरसों आदि सम्मिलित होते हैं। जौ उर्वरता और प्रचुरता का प्रतीक है, जबकि पीली सरसों पवित्रता और काले तिल शुद्धिकरण के गुणों से युक्त माने जाते हैं। ३. कलश में प्रवाहित करने हेतु (जल एवं रत्न): शुद्ध जल एवं गंगाजल, साबुत सुपारी (Betel nuts), सिक्के (स्वर्ण, रजत या सामान्य मुद्रा), दूर्वा घास, अक्षत (बिना टूटे पवित्र चावल), इत्र (सुगंध), तथा सर्वौषधि (हल्दी की गांठ आदि)। ४. आवरण एवं पल्लव: अशोक या आम वृक्ष के ५ या ७ पत्ते (पल्लव), कलश को ढकने के लिए एक पात्र (ढक्कन/पूर्णपात्र), और पूर्णपात्र में रखने हेतु अक्षत। ५. श्रीफल (नारियल): जटा वाला और जल-युक्त अछीला नारियल (Unpeeled Coconut) जो ईश्वरीय चेतना का परिचायक है, नारियल को लपेटने के लिए लाल वस्त्र या चुनरी (लाल रंग माता की राजसिक ऊर्जा का प्रतीक है), और रक्षा-सूत्र (मौली/कलावा)। ६. षोडशोपचार पूजन सामग्री: पुष्प (विशेषकर गेंदा और लाल पुष्प), पुष्पमाला, चंदन, कुमकुम, सिंदूर, काजल, सौभाग्य सूत्र, बिल्वपत्र, धूप, दीप, और विभिन्न प्रकार के नैवेद्य (प्रसाद)। ७. यंत्र: यदि संभव हो तो भगवती की मूर्ति या चित्र के साथ नवार्ण यंत्र की भी स्थापना की जानी चाहिए।
अनुष्ठान का विधिवत आरंभ: स्थल-शुद्धि एवं संकल्प विधान
स्थल-शुद्धि एवं वेदी-निर्माण
सर्वप्रथम पूजा-स्थल को अत्यंत सावधानी से गाय के गोबर या शुद्ध जल (गंगाजल) से लीपकर या धोकर पवित्र किया जाता है। इस कृत्य से वह स्थान 'सात्विक' और ध्यान के लिए शांतिपूर्ण बन जाता है। तदुपरांत, कुशा के आसन या ऊनी कंबल पर पूर्वाभिमुख (पूर्व दिशा की ओर मुख करके) या उत्तराभिमुख होकर बैठा जाता है। दीपक प्रज्वलित करने के पश्चात्, वातावरण की नकारात्मक और ठहरी हुई (stagnant) ऊर्जा को समूल नष्ट करने के लिए गुग्गुल (Guggula) और सिह्लक (लोबान) की धूप जलाई जाती है, जो देवी को अत्यंत प्रिय है और स्थान को पूर्णतः शुद्ध कर देती है।
महासंकल्प (The Sacred Vow and Intent)
वैदिक और तांत्रिक कर्मकांड में बिना संकल्प के किया गया कोई भी कर्म फलदायी नहीं होता। 'संकल्प' का अर्थ है—दृढ़ निश्चय (Intention, Resolve, or Goal)। वैदिक ऋषियों ने इस प्रक्रिया का निर्माण इसलिए किया था ताकि साधक अपनी एकाग्र और लक्षित इच्छा को ब्रह्मांडीय शक्तियों तक पहुंचा सके। इसके माध्यम से साधक अपने कर्म और इच्छा को ईश्वरीय संकल्प के साथ जोड़कर पूर्णतः समर्पित कर देता है।
संकल्प की शास्त्रीय और क्रमबद्ध विधि:
१. गणपति ध्यान (Ganapathi Dhyanam): सर्वप्रथम विघ्नों के नाश के लिए भगवान श्री गणेश का ध्यान किया जाता है। विष्णु सहस्रनाम के प्रथम श्लोक का उच्चारण करते हुए भगवान के शांत स्वरूप का स्मरण किया जाता है: "शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥"
२. प्राणायाम (Pranayamam): इसके पश्चात् विशिष्ट वैदिक मंत्रों के साथ श्वास का नियमन किया जाता है: "ॐ भूः ॐ भुवः ओम् सुवः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ओम् सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ओमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥" तदनंतर "ॐ, ॐ, ॐ" कहते हुए तीन बार अपने दोनों कानों का स्पर्श किया जाता है।
३. मुख्य महासंकल्प (The Core Sankalpam): साधक अपने दाहिने हाथ (Right hand) में जल, अक्षत, पुष्प, कुशा और द्रव्य (सिक्का) लेकर देश-काल का कीर्तन करते हुए निम्नलिखित संकल्प मंत्र का उच्चारण करता है :
"ममोपात्त-समस्त-दुरितक्षय-द्वारा (मेरे जीवन के समस्त कष्टों और पापों के नाश हेतु), श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थम् / श्री भगवती दुर्गा प्रीत्यर्थम् (परमेश्वर या भगवती की प्रसन्नता के लिए), श्री पार्वती प्रसाद सिद्ध्यर्थम् (देवी की कृपा प्राप्ति हेतु), अस्माकं सहकुटुम्बानां (मेरे और मेरे पूरे परिवार के), क्षेम, धैर्य, विजय, आयुः, आरोग्य, ऐश्वर्य अभिवृद्ध्यर्थम् (कल्याण, साहस, विजय, लंबी आयु, स्वास्थ्य और धन की वृद्धि के लिए)..."
साधक अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार इसमें अन्य उद्देश्य भी जोड़ सकता है:
सकल विघ्न निवृत्ति द्वारा कार्य सिद्ध्यर्थम् (सभी बाधाओं को दूर कर कार्यों में सफलता हेतु)।
सकल व्याधि निवृत्त्यर्थम् (समस्त रोगों के नाश के लिए)।
ज्ञान अवाप्त्यर्थम् (ज्ञान की प्राप्ति हेतु)।
धन-धान्य समृद्ध्यर्थम् (धन और संपत्ति की वृद्धि के लिए)।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चतुर्विध फल पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थम् (जीवन के चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए)।
सकल विघ्न निवृत्ति द्वारा कार्य सिद्ध्यर्थम् (सभी बाधाओं को दूर कर कार्यों में सफलता हेतु)।
सकल व्याधि निवृत्त्यर्थम् (समस्त रोगों के नाश के लिए)।
ज्ञान अवाप्त्यर्थम् (ज्ञान की प्राप्ति हेतु)।
धन-धान्य समृद्ध्यर्थम् (धन और संपत्ति की वृद्धि के लिए)।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चतुर्विध फल पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थम् (जीवन के चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए)।
अंत में साधक कहता है: "श्री नवदुर्गा देवता प्रीत्यर्थं कलश-स्थापनं तथा च नवदरात्र-व्रतमहं करिष्ये।" यह कहकर हाथ में लिया हुआ जल और सामग्री भूमि पर या एक पात्र में छोड़ दी जाती है।
घटस्थापना एवं बीजारोपण की पूर्ण शास्त्रीय प्रक्रिया (Step-by-Step Vidhi)
संकल्प के पश्चात् कलश स्थापना की मुख्य और तात्विक प्रक्रिया आरंभ होती है, जो अत्यंत सावधानी और विधि-विधान से संपन्न की जानी चाहिए।
चरण १: जौ/बीज रोपण (सप्तधान्य स्थापन - पृथ्वी तत्व)
सबसे पहले एक चौड़े मुँह वाले मिट्टी के पात्र (वेदी) को पूजा स्थल पर रखा जाता है। इसमें स्वच्छ और पवित्र मिट्टी (या बालू) की एक परत बिछाई जाती है। यह पात्र और मिट्टी जीवन की उपजाऊ भूमि और সৃষ্টির उद्गम का साक्षात प्रमाण हैं। इस मिट्टी की शय्या (Bed) में सप्तधान्य (मुख्य रूप से जौ, गेहूं आदि) बोए जाते हैं।
दार्शनिक भावार्थ: बीज बोते समय साधक यह भावना करता है कि जिस प्रकार यह सुप्त बीज अंकुरित होकर पूर्णता और वृद्धि को प्राप्त करेगा, ठीक उसी प्रकार साधक के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिकता का नव-विकास होगा। नौ दिनों तक इनमें अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में जल का सिंचन किया जाता है। दशमी के दिन उत्पन्न होने वाले इन हरे अंकुरों (जिन्हें 'जयंती' कहा जाता है) को ३ से ५ इंच का होने पर काटा जाता है और देवी के प्रसाद स्वरूप परिवार के सदस्यों को धारण कराया जाता है।
चरण २: कलश की तैयारी, जल भरण एवं वरुण आवाहन (जल तत्व)
एक सुंदर मिट्टी, तांबे या पीतल के कलश के कंठ (गर्दन) पर रक्षा-सूत्र (मौली/कलावा) बांधा जाता है। इसके पश्चात् इस कलश को उस जौ बोए गए पात्र (वेदी) के ठीक मध्य में स्थापित किया जाता है।
अब कलश में शुद्ध जल और गंगाजल भरा जाता है। जल भरते समय जल के देवता 'वरुण' का आवाह्न किया जाता है, क्योंकि वरुण ही सभी जलों के अधिपति और शुद्धिकरण के देवता हैं। इस समय निम्नलिखित अत्यंत पवित्र वैदिक मंत्रों का गान किया जाता है:
वरुण/कलश स्थापन के वैदिक मंत्र: "ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद् रयिः॥" (भावार्थ: हे कलश! आप हमारी ओर अभिमुख हों। आनंददायक और जीवनदायी जल-बिंदु आपमें प्रवेश करें। आप ऊर्जा से परिपूर्ण होकर हमारे लिए सहस्रों धाराओं के समान ऐश्वर्य और पुष्टि का दोहन करें।)
"ॐ वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्। देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्वा कामधुक्षः॥" (भावार्थ: हे जल! आप सैकड़ों और हजारों धाराओं वाले पवित्रकर्ता हैं। देव सविता आपको पुनीत करें और आप हमारी कामनाओं को पूर्ण करने वाले बनें।)
"ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥" (भावार्थ: सृष्टि के आरंभ में हिरण्यगर्भ (ब्रह्मांडीय स्वर्ण अंड) ही विद्यमान थे। वही उत्पन्न हुए संपूर्ण जगत के एकमात्र स्वामी हैं। उन्होंने ही पृथ्वी और द्युलोक को धारण किया है। हम उन प्रजापति देव की हवि के द्वारा उपासना करते हैं।)
इन वैदिक मंत्रों से अभिमंत्रित करने के पश्चात् कलश के जल में गंध (सुगंधित इत्र), दूर्वा घास, अक्षत, साबुत सुपारी, स्वर्ण मुद्रा या सिक्के और सर्वौषधि (हल्दी आदि) डाली जाती है। तत्पश्चात् वरुण देव की पञ्चोपचार पूजा "ॐ वरुणाय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि, शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि, गंधाक्षतं समर्पयामि, पुष्पं समर्पयामि, धूपं दीपं नैवेद्यं समर्पयामि" इत्यादि मंत्रों से की जाती है।
चरण ३: पल्लव एवं पूर्णपात्र स्थापन
कलश के मुख (किनारे) पर आम या अशोक वृक्ष के ५ या ७ पत्ते (पल्लव) इस प्रकार सजाकर रखे जाते हैं कि पत्तों का अग्र भाग बाहर की ओर हो। ये पल्लव घर में समृद्धि, नव-जीवन और प्रजनन क्षमता (Fertility) का स्पष्ट प्रतीक माने जाते हैं। इन पत्तों के ऊपर एक ढक्कन (पूर्णपात्र) रखा जाता है, जिसे अक्षत (कच्चे और बिना टूटे चावल) से पूरी तरह भर दिया जाता है। अक्षत से भरा यह पात्र जीवन में पूर्णता और अन्न-धन के अक्षय भंडार का सूचक है।
चरण ४: श्रीफल (नारियल) स्थापन (आकाश तत्व)
अंत में एक अछीले (जटा वाले) नारियल को लाल वस्त्र या चुनरी में लपेटकर उस पर मौली बांधी जाती है। इस पूर्णतः सज्जित नारियल को कलश के मुख पर रखे पूर्णपात्र के अक्षतों के ऊपर स्थापित किया जाता है।
दिशा का ज्ञान: यद्यपि संकलित ग्रंथों में प्रत्यक्षतः उल्लेखित नहीं है, किंतु पारंपरिक ज्ञान के अनुसार नारियल का मुख (जिस ओर वह टहनी से जुड़ा होता है) सदैव साधक की ओर होना चाहिए। कुछ परंपराओं में नारियल के स्थान पर पुष्पमाला से भी कलश को आच्छादित करने का विधान है।
इस प्रकार विधि-विधान से स्थापित यह कलश पूर्णता को प्राप्त होता है, जो आगामी नौ दिनों तक भगवती माँ दुर्गा की दिव्य ऊर्जा का निवास स्थान (Divine Seat) बन जाता है।
महादेवी का आवाहन एवं देवी भागवत पुराणोक्त पूजन-विधि
कलश के विधिवत स्थापित हो जाने के पश्चात्, उस कलश (घट) में निराकार भगवती नवदुर्गा का सगुण रूप में आवाह्न किया जाता है। साधक अपने दोनों हाथों में पुष्प, अक्षत और कुमकुम लेकर देवी का ध्यान करता है। इस समय दुर्गा सूक्तम अथवा नवदुर्गा के विशिष्ट बीज मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।
नवदुर्गा आवाहन एवं ध्यान मंत्र (प्रथम दिवस - माँ शैलपुत्री)
चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिन (प्रतिपदा) भगवती 'शैलपुत्री' को समर्पित है। माता शैलपुत्री हिमालय की पुत्री हैं और वे मानव के भीतर छिपी आंतरिक शक्ति, दृढ़ता और प्रकृति की आदि-ऊर्जा की साक्षात प्रतीक हैं। साधक निम्नलिखित मंत्र से भगवती का आवाह्न करता है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नमः। (Om Aim Hreem Kleem Chamundaye Viche Om Shailputri Devyai Namah)
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अनुसार विशिष्ट देवी-पूजा विधान
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण शाक्त परंपरा का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। इसके एकादश स्कन्ध, अध्याय १८ में स्वयं भगवान नारायण ने देवर्षि नारद को देवी पूजा (षोडशोपचार पूजा) की अत्यंत विशिष्ट और रहस्यमयी विधि का उपदेश दिया है, जिसके पालन से साधक को सांसारिक भोग (Enjoyment) और मोक्ष (Liberation) दोनों की एक साथ प्राप्ति होती है और उसके सभी अनिष्टों का नाश हो जाता है। यह विस्तृत विधि इस प्रकार है:
१. पीठ पूजा एवं ध्यान: सर्वप्रथम गुरु की आज्ञा लेकर उस पीठ (आसन) की पूजा की जाती है जिस पर देवी (कलश) विराजमान हैं, तत्पश्चात् देवी का एकाग्र मन से ध्यान (Dhyan) किया जाता है। २. स्नान (Snana) एवं पञ्चामृत रहस्य: देवी को विभिन्न द्रव्यों से प्रतीकात्मक स्नान कराया जाता है। प्रत्येक द्रव्य से स्नान कराने का एक विशिष्ट लौकिक और पारलौकिक फल है:
ईख का रस (Sugarcane Juice): जो साधक सौ घड़ों ईख के रस से भगवती को स्नान कराता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ आम के रस या ईख के रस से स्नान कराने पर लक्ष्मी और सरस्वती उस साधक के द्वार पर चिरकाल तक आबद्ध (Bound) होकर निवास करती हैं。
द्राक्षा-रस (Grape Juice): अंगूर के रस से स्नान कराने पर साधक अपने संबंधियों सहित उतने वर्षों तक 'देवी-लोक' में वास करता है, जितने परमाणु उस रस में विद्यमान होते हैं。
सुगंधित जल: कपूर, केसर, कस्तूरी और अगरु (अगर) मिश्रित सुगंधित जल से स्नान कराने से साधक सौ जन्मों के अर्जित पापों से मुक्त हो जाता है。
दुग्ध एवं दधि: दूध से स्नान कराने पर साधक एक कल्प तक क्षीरसागर (Ocean of milk) में निवास करता है, तथा दही से स्नान कराने पर वह दधिकुण्ड का स्वामी बन जाता है。
मधु एवं घृत: शहद, घी, शर्करा (चीनी) अथवा सहस्र घड़े जल से स्नान कराने से इस लोक और परलोक दोनों में असीम सुख की प्राप्ति होती है।
ईख का रस (Sugarcane Juice): जो साधक सौ घड़ों ईख के रस से भगवती को स्नान कराता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ आम के रस या ईख के रस से स्नान कराने पर लक्ष्मी और सरस्वती उस साधक के द्वार पर चिरकाल तक आबद्ध (Bound) होकर निवास करती हैं。
द्राक्षा-रस (Grape Juice): अंगूर के रस से स्नान कराने पर साधक अपने संबंधियों सहित उतने वर्षों तक 'देवी-लोक' में वास करता है, जितने परमाणु उस रस में विद्यमान होते हैं。
सुगंधित जल: कपूर, केसर, कस्तूरी और अगरु (अगर) मिश्रित सुगंधित जल से स्नान कराने से साधक सौ जन्मों के अर्जित पापों से मुक्त हो जाता है。
दुग्ध एवं दधि: दूध से स्नान कराने पर साधक एक कल्प तक क्षीरसागर (Ocean of milk) में निवास करता है, तथा दही से स्नान कराने पर वह दधिकुण्ड का स्वामी बन जाता है。
मधु एवं घृत: शहद, घी, शर्करा (चीनी) अथवा सहस्र घड़े जल से स्नान कराने से इस लोक और परलोक दोनों में असीम सुख की प्राप्ति होती है।
३. वस्त्र एवं आभूषण (Vastra and Abhushana): स्नान के उपरांत देवी को अत्यंत सुंदर रेशमी वस्त्रों का जोड़ा तथा दिव्य रत्नों से जड़ित आभूषण अर्पित किए जाते हैं। ४. गंध, कुमकुम एवं सिंदूर लेपन: भगवती को लाल चंदन, केसर, कस्तूरी, सिंदूर और आलता (Alaktak - महावर) अर्पित किया जाता है। जो साधक ये वस्तुएं अर्पित करता है, वह मृत्युपरांत स्वर्ग प्राप्त कर अगले जन्म में इंद्र के समान ऐश्वर्यवान बनता है। ५. पुष्प एवं पत्र समर्पण (Pushpanjali): देवी को पुष्प अर्पित करने की एक विशिष्ट तांत्रिक विधि है。
बिल्वपत्र (बेलपत्र): साधक को तीन पत्तियों वाले पूर्ण बिल्वपत्र (Tri-leaves) पर लाल चंदन से देवी का बीज मंत्र "ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः" तीन बार लिखकर अर्पित करना चाहिए। यदि कोई एक करोड़ ताजे, हरे बिल्वपत्रों से देवी का पूजन करता है, तो वह संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी बनने की क्षमता प्राप्त कर लेता है。
कुंद, मल्लिका और मालती: इन पुष्पों को अष्टगंध (जटामांसी, कपूर आदि से युक्त) में लपेटकर देवी को चढ़ाना चाहिए। एक करोड़ मल्लिका पुष्प चढ़ाने से ब्रह्मा, दस करोड़ चढ़ाने से विष्णु और सौ करोड़ चढ़ाने से हिरण्यगर्भ का पद प्राप्त होता है। पुष्प चढ़ाते समय इस मंत्र का गान किया जाता है: "ॐ जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी। दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा, स्वधा नमोऽस्तु ते॥ एष सचन्दन गन्ध पुष्प बिल्व पत्राञ्जली ॐ ह्रीं दुर्गायै नमः॥" ६. धूप एवं दीप (Dhupa and Dipa): देवी को सुगन्धित धूप अर्पित की जाती है, जो काले अगरु, कपूर, लाल चंदन, सिह्लक और गुग्गुल को घी में संतृप्त करके बनाई जाती है। तत्पश्चात् सौ या हजार कपूर के दीपक या घृत (घी) का अखण्ड दीपक प्रज्वलित किया जाता है। ७. नैवेद्य एवं तांबूल (Naivedya and Tambula): देवी को स्वर्ण या रजत के चौड़े पात्रों (Cups and plates) में षड्रस (छह रसों) से युक्त पर्वताकार भोजन अर्पित किया जाता है, जिसमें चबाने, चूसने, चाटने और पीने योग्य सभी प्रकार के सुस्वादु व्यंजन और फल सम्मिलित होते हैं। भोजन के उपरांत शीतल गंगाजल और कपूर, इलायची व लौंग से युक्त तांबूल (पान) अर्पित किया जाता है। ८. आरती, वाद्य एवं राजोपचार: भगवती को प्रसन्न करने के लिए मृदंग, बांसुरी, नगाड़े (Dhahkas) और दुंदुभि की मंगल ध्वनि की जाती है। वेद मंत्रों का सस्वर पाठ, पुराणों का पठन और भजनों का गायन किया जाता है। साथ ही राजसी सम्मान प्रदर्शित करने के लिए छत्र और चंवर डुलाया जाता है। ९. प्रदक्षिणा एवं क्षमा प्रार्थना (Pradakshina and Kshamapan): पूजा के अंत में साधक देवी की परिक्रमा करता है, साष्टांग दंडवत प्रणाम करता है और अनुष्ठान में हुई किसी भी भूल-चूक (मंत्र-हीनता, क्रिया-हीनता) के लिए क्षमा-याचना करता है।
बिल्वपत्र (बेलपत्र): साधक को तीन पत्तियों वाले पूर्ण बिल्वपत्र (Tri-leaves) पर लाल चंदन से देवी का बीज मंत्र "ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः" तीन बार लिखकर अर्पित करना चाहिए। यदि कोई एक करोड़ ताजे, हरे बिल्वपत्रों से देवी का पूजन करता है, तो वह संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी बनने की क्षमता प्राप्त कर लेता है。
कुंद, मल्लिका और मालती: इन पुष्पों को अष्टगंध (जटामांसी, कपूर आदि से युक्त) में लपेटकर देवी को चढ़ाना चाहिए। एक करोड़ मल्लिका पुष्प चढ़ाने से ब्रह्मा, दस करोड़ चढ़ाने से विष्णु और सौ करोड़ चढ़ाने से हिरण्यगर्भ का पद प्राप्त होता है। पुष्प चढ़ाते समय इस मंत्र का गान किया जाता है: "ॐ जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी। दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा, स्वधा नमोऽस्तु ते॥ एष सचन्दन गन्ध पुष्प बिल्व पत्राञ्जली ॐ ह्रीं दुर्गायै नमः॥" ६. धूप एवं दीप (Dhupa and Dipa): देवी को सुगन्धित धूप अर्पित की जाती है, जो काले अगरु, कपूर, लाल चंदन, सिह्लक और गुग्गुल को घी में संतृप्त करके बनाई जाती है। तत्पश्चात् सौ या हजार कपूर के दीपक या घृत (घी) का अखण्ड दीपक प्रज्वलित किया जाता है। ७. नैवेद्य एवं तांबूल (Naivedya and Tambula): देवी को स्वर्ण या रजत के चौड़े पात्रों (Cups and plates) में षड्रस (छह रसों) से युक्त पर्वताकार भोजन अर्पित किया जाता है, जिसमें चबाने, चूसने, चाटने और पीने योग्य सभी प्रकार के सुस्वादु व्यंजन और फल सम्मिलित होते हैं। भोजन के उपरांत शीतल गंगाजल और कपूर, इलायची व लौंग से युक्त तांबूल (पान) अर्पित किया जाता है। ८. आरती, वाद्य एवं राजोपचार: भगवती को प्रसन्न करने के लिए मृदंग, बांसुरी, नगाड़े (Dhahkas) और दुंदुभि की मंगल ध्वनि की जाती है। वेद मंत्रों का सस्वर पाठ, पुराणों का पठन और भजनों का गायन किया जाता है। साथ ही राजसी सम्मान प्रदर्शित करने के लिए छत्र और चंवर डुलाया जाता है। ९. प्रदक्षिणा एवं क्षमा प्रार्थना (Pradakshina and Kshamapan): पूजा के अंत में साधक देवी की परिक्रमा करता है, साष्टांग दंडवत प्रणाम करता है और अनुष्ठान में हुई किसी भी भूल-चूक (मंत्र-हीनता, क्रिया-हीनता) के लिए क्षमा-याचना करता है।
मार्कंडेय पुराणोक्त 'दुर्गा सप्तशती' पाठ विधान एवं महत्व
नवरात्रि में कलश स्थापना और नित्य षोडशोपचार पूजन के पश्चात् महर्षि मार्कंडेय द्वारा रचित 'दुर्गा सप्तशती' (जिसे देवी माहात्म्य या चंडी पाठ भी कहा जाता है) का सस्वर पाठ करना संपूर्ण अनुष्ठान का प्राण माना गया है। मार्कंडेय पुराण का यह विशिष्ट अंश ७०० श्लोकों का एक अत्यंत जाग्रत और शक्तिशाली मंत्र-समूह है, जो १३ अध्यायों में विभक्त है। यह शाक्त परंपरा का मूल आधार (Base and root) है, जिसमें देवी दुर्गा द्वारा अज्ञान और अंधकार के प्रतीक महिषासुर तथा अन्य दैत्यों के वध का ओजस्वी वर्णन है। इस ग्रंथ का सकाम या निष्काम भाव से नित्य पठन साधक को अभेद्य आध्यात्मिक सुरक्षा, अदम्य साहस और लौकिक ऐश्वर्य प्रदान करता है।
पाठ का शास्त्रीय क्रम और नियम (Recitation Order and Rules)
दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत अनुशासन, पवित्रता और संकल्पबद्ध होकर किया जाना चाहिए। पाठ आरंभ करने से पूर्व कुछ विशिष्ट नियमों का पालन अनिवार्य है:
प्रातःकाल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, एक शुद्ध आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए。
सप्तशती की पुस्तक को भूमि पर नहीं, अपितु एक स्वच्छ काष्ठ (लकड़ी) या तांबे की चौकी (Stand/Plate) पर रखना चाहिए。
पाठ के दौरान गहरी एकाग्रता और भक्ति बनाए रखनी चाहिए। बीच में किसी से वार्तालाप करना, जम्हाई लेना (Yawning), या किसी अध्याय को अधूरा छोड़ना सख्त वर्जित है。
अध्यायों के आरंभ और अंत में घंटी (Bell) बजाने को अत्यंत शुभ माना जाता है।
प्रातःकाल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, एक शुद्ध आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए。
सप्तशती की पुस्तक को भूमि पर नहीं, अपितु एक स्वच्छ काष्ठ (लकड़ी) या तांबे की चौकी (Stand/Plate) पर रखना चाहिए。
पाठ के दौरान गहरी एकाग्रता और भक्ति बनाए रखनी चाहिए। बीच में किसी से वार्तालाप करना, जम्हाई लेना (Yawning), या किसी अध्याय को अधूरा छोड़ना सख्त वर्जित है。
अध्यायों के आरंभ और अंत में घंटी (Bell) बजाने को अत्यंत शुभ माना जाता है।
पाठ का एक विशिष्ट अनुक्रम (Sequence) है, जिसमें मूल ७०० श्लोकों के पूर्व और पश्चात कुछ अन्य स्तोत्रों का पाठ किया जाता है, जिसे 'नवंग' या 'त्रयंग' पाठ कहा जाता है। यह क्रम निम्नलिखित है : १. देवी सूक्तम् (Devi Suktam) २. देवी कवचम् (Devi Kavacham - शारीरिक और आध्यात्मिक रक्षा हेतु) ३. अर्गला स्तोत्रम् (Argala Stotram - मार्ग की बाधाओं के निवारण हेतु) ४. कीलकम् (Keelakam - विश्वामित्र आदि ऋषियों द्वारा शापित मंत्रों के उत्कीलन अर्थात उन्हें जाग्रत करने हेतु) ५. रात्रि सूक्तम् (Ratri Suktam) ६. मूल सप्तशती पाठ (अध्याय १ से १३ तक) ७. क्षमा प्रार्थना (Kshama Prarthana)
नवरात्रि के नौ दिनों में पाठ का वैज्ञानिक विभाजन
यद्यपि शक्ति-उपासक एक ही बैठक में संपूर्ण सप्तशती का पाठ कर सकते हैं, किंतु सुविधा और शास्त्रीय निर्देशानुसार इसे नौ दिनों में भी विभाजित किया जा सकता है। इसका मानक क्रम इस प्रकार है:
तालिका: दुर्गा सप्तशती पाठ का दैनिक विभाजन एवं नवदुर्गा मंत्र
| नवरात्रि का दिन | नवदुर्गा का स्वरूप | सप्तशती पाठ (अध्याय) | देवी का विशिष्ट बीज मंत्र (जप हेतु) |
|---|---|---|---|
| प्रथम दिन (प्रतिपदा) | माँ शैलपुत्री | अध्याय १ (मधु-कैटभ वध) | ह्रीं श्रीं शैलपुत्र्यै नमः |
| द्वितीय दिन (द्वितीया) | माँ ब्रह्मचारिणी | अध्याय २ और ३ | ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः |
| तृतीय दिन (तृतीया) | माँ चंद्रघंटा | अध्याय ४ | ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः |
| चतुर्थ दिन (चतुर्थी) | माँ कूष्मांडा | अध्याय ५, ६, ७, और ८ | ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः |
| पंचम दिन (पंचमी) | माँ स्कंदमाता | अध्याय ९ और १० | ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः |
| षष्ठ दिन (षष्ठी) | माँ कात्यायनी | अध्याय ११ | ॐ देवी कात्यायन्यै नमः |
| सप्तम दिन (सप्तमी) | माँ कालरात्रि | अध्याय १२ | ॐ देवी कालरात्र्यै नमः |
| अष्टम दिन (अष्टमी) | माँ महागौरी | अध्याय १३ | ॐ देवी महागौर्यै नमः |
| नवम दिन (नवमी) | माँ सिद्धिदात्री | क्षमा प्रार्थना एवं हवन | ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः |
विशेष अनुष्ठानों में 'नवचंडी सिद्ध पाठ' किया जाता है, जिसमें नौ दिनों के भीतर सप्तशती के समस्त ७०० श्लोकों का १०८ बार आवर्तन किया जाता है, जो नकारात्मक शक्तियों के पूर्ण विनाश और असीम समृद्धि की प्राप्ति का अचूक मार्ग है।
नवरात्रि के नियम, निषेध एवं फल-श्रुति
शास्त्रों में नौ दिनों के इस तपस्या-काल के लिए अत्यंत कठोर किंतु वैज्ञानिक रूप से पुष्ट नियमों (Niyama) का विधान किया गया है। ये नियम केवल शारीरिक शोधन के लिए नहीं, अपितु आध्यात्मिक ऊर्जा के संरक्षण और कुण्डलिनी जागरण के लिए नितांत आवश्यक हैं।
व्रत, आहार एवं आचरण के नियम (Rules for Fasting and Conduct)
सात्विक आहार: पूर्ण नौ दिनों तक केवल सात्विक आहार का सेवन करना चाहिए। व्रत के दौरान कुट्टू (Kuttu), सिंघाड़ा, राजगिरा, ताजे फल, दूध, दही, पनीर और सेंधा नमक (Rock salt) का प्रयोग शास्त्रसम्मत है。
वर्जित आहार (Nishedh): तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और सामान्य अन्न (गेहूं, चावल) का व्रत काल में पूर्णतः निषेध है。
ब्रह्मचर्य एवं मनःस्थिति: शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का अखंड रूप से पालन करना अनिवार्य है। साधक को अपने विचारों, कर्मों और पर्यावरण में अत्यधिक शुद्धता (Purity) बनाए रखनी चाहिए। कलह, ईर्ष्या, क्रोध, काम या निंदा जैसे नकारात्मक व्यवहार से सर्वथा बचना चाहिए, क्योंकि ये वृत्तियाँ तपस्या की ऊर्जा को क्षीण कर देती हैं।
वर्जित आहार (Nishedh): तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और सामान्य अन्न (गेहूं, चावल) का व्रत काल में पूर्णतः निषेध है。
ब्रह्मचर्य एवं मनःस्थिति: शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का अखंड रूप से पालन करना अनिवार्य है। साधक को अपने विचारों, कर्मों और पर्यावरण में अत्यधिक शुद्धता (Purity) बनाए रखनी चाहिए। कलह, ईर्ष्या, क्रोध, काम या निंदा जैसे नकारात्मक व्यवहार से सर्वथा बचना चाहिए, क्योंकि ये वृत्तियाँ तपस्या की ऊर्जा को क्षीण कर देती हैं।
अखण्ड ज्योति के कड़े नियम (Rules for Akhand Jyoti)
यदि साधक ने संकल्प में 'अखण्ड दीप' प्रज्वलित करने का प्रण लिया है, तो उस दीपक को पूरे नौ दिन और नौ रात क्षण भर के लिए भी बुझने नहीं देना चाहिए। दीपक अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जो अनुष्ठान का साक्षी है। इसमें घृत (घी) या तेल निरंतर डालते रहना चाहिए और वायु से इसकी रक्षा करनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि यदि घर में कलश और अखण्ड ज्योति स्थापित है, तो उस घर को एक क्षण के लिए भी खाली या सूना छोड़कर नहीं जाना चाहिए।
अनुष्ठान की फल-श्रुति (The Fruits of Worship)
दुर्गा सप्तशती, देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण के अनुसार, जो साधक इस शास्त्रोक्त और तांत्रिक विधि से कलश स्थापना कर पूर्ण निष्काम या सकाम भाव से भगवती की आराधना करता है, उसके लिए इस ब्रह्मांड में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ।
१. लौकिक और भौतिक लाभ (Artha and Kama): इस अनुष्ठान के प्रभाव से दरिद्रता का समूल नाश होता है। दुर्गा सप्तशती के मंत्रों और नवार्ण यंत्र की पूजा से धन-धान्य, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की असीमित वर्षा होती है। साधक को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ आयु और मुकदमों (Court cases) या विवादों में निश्चित विजय प्राप्त होती है। भगवती के प्रताप से जीवन की कठिन से कठिन और निराशाजनक प्रतीत होने वाली बाधाओं (Hopeless hardships) पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है तथा शत्रुओं का पूर्ण दमन होता है।
२. पारलौकिक और आध्यात्मिक लाभ (Dharma and Moksha): इस नव-दिवसीय अनुष्ठान का परम लक्ष्य केवल भौतिक सुख नहीं है। कलश और अखण्ड ज्योति की ऊर्जा के सान्निध्य में जब नवार्ण मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) का जप किया जाता है, तो साधक की मूलाधार में सुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर षट्चक्रों का भेदन करती है । यह अनुष्ठान चेतना का ऊर्ध्वरोहण करता है। देवी माहात्म्य के श्रवण और पठन से साधक को देवी-लोक की प्राप्ति होती है और अंततः वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परब्रह्म स्वरूपा माता के श्रीचरणों में 'मोक्ष' (Spiritual Liberation) प्राप्त करता है।
निष्कर्ष
चैत्र नवरात्रि में संपन्न होने वाली घटस्थापना (कलश स्थापना) मात्र एक पौराणिक आख्यान या अंध-कर्मकांडीय प्रक्रिया नहीं है; यह साधक के लौकिक अस्तित्व को परलौकिक चेतना से जोड़ने वाला एक अत्यंत सजीव, जाग्रत और वैज्ञानिक यंत्र है। शास्त्रों—विशेषकर 'श्रीमद् देवी भागवत महापुराण', 'मार्कंडेय पुराण' और 'निर्णयसिन्धु'—में वर्णित विस्तृत विधि-विधान इस तथ्य की अकाट्य पुष्टि करते हैं कि इस अनुष्ठान का प्रत्येक चरण एक गहन दार्शनिक आधार रखता है। चाहे वह वेदी-निर्माण और जौ रोपण के माध्यम से पृथ्वी तत्व को साधना हो, कलश में पञ्चतत्वों का एकीकरण हो, या षोडशोपचार पूजा के अंतर्गत देवी को विभिन्न द्रव्यों से स्नान कराना हो—प्रत्येक क्रिया ब्रह्मांडीय स्पंदनों (Cosmic vibrations) को साधक के पक्ष में अनुकूलित करती है।
वर्ष २०२६ में १९ मार्च को उदित हो रही वासंतिक चैत्र नवरात्रि में, शुद्ध प्रतिपदा और मीन लग्न के शास्त्रोक्त मुहूर्त में स्थापित किया गया यह कलश, साधक के अंतर्मन में ज्ञान, शक्ति और पवित्रता का प्रचंड संचार करेगा। जब साधक का शुद्ध संकल्प, 'दुर्गा सप्तशती' के सिद्ध श्लोकों की ध्वनि, और अखण्ड ज्योति का अग्नि तत्व एक बिंदु पर एकाकार होते हैं, तो वह सामान्य सा पूजा-स्थल ऊर्जा के एक ऐसे महा-केंद्र (Powerhouse) में परिवर्तित हो जाता है जो अज्ञान और पाप की समस्त मलिनताओं को दग्ध कर देता है। कलश में प्रवाहित यह ऊर्जा अंततः साधक को 'शिव' और 'शक्ति' के अद्वैत स्वरूप का साक्षात्कार कराती है। अतः, इस शास्त्रसम्मत विधि का पूर्ण तादात्म्य, श्रद्धा, तार्किकता और एकाग्रता के साथ पालन करना सर्वथा श्रेयस्कर, सर्व-बाधा-विनाशक और आत्मकल्याणकारी है।






