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श्री शनि प्रदोष व्रत कथा: संपूर्ण एवं अक्षुण्ण पारंपरिक पाठ

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श्री शनि प्रदोष व्रत की संपूर्ण एवं अक्षुण्ण पारंपरिक कथा

पारंपरिक प्रारंभ: नैमिषारण्य में सूत-शौनक संवाद

परम पावन और समस्त पापों का नाश करने वाली भागीरथी गंगा नदी के सुरम्य तट पर स्थित पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ में, जहाँ अनेक सिद्ध, यति, मुनि और तपस्वी सदैव भगवद्-भक्ति और कठोर तपस्या में लीन रहते थे, एक समय महान वेदों के ज्ञाता, अठारह पुराणों के वक्ता और भगवान के परम भक्त श्री सूत जी महाराज पधारे । श्री सूत जी को अपने आश्रम की ओर आते देख शौनक आदि अठासी हजार सनकादि ऋषियों ने अत्यंत हर्ष के साथ उठकर उनका आदरपूर्वक अभिवादन किया और उन्हें एक सर्वोच्च और पवित्र आसन पर विराजमान किया ।

शौनक आदि ऋषियों ने हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर और अत्यंत विनम्र भाव से सूत जी से प्रश्न किया, "हे महाज्ञानी सूत जी! हे पुराणों के मर्मज्ञ! कलियुग के आगमन पर जब मनुष्य धर्म के आचरण से सर्वथा हटकर अधर्म की राह पर जा रहा होगा, जब चारों ओर केवल अन्याय, पापाचार और अनाचार का बोलबाला होगा, और जब मानव अपने परम कर्तव्य से विमुख होकर नीच कर्मों में संलग्न होगा, तब उस घोर अंधकार और पापमय समय में मनुष्यों के कष्टों का निवारण किस प्रकार होगा? कृपया ऐसा कोई अत्यंत सुलभ, श्रेष्ठ और परम फलदायी व्रत अथवा अनुष्ठान बताएँ जो प्राणी मात्र को भगवान शिव की कृपा का पात्र बनाए और जिसके पुण्य प्रताप से नीच गति से मुक्त होकर मनुष्य उत्तम लोक को प्राप्त कर सके ।"

महर्षियों के इस अत्यंत लोक-कल्याणकारी और धर्म-युक्त प्रश्न को सुनकर श्री सूत जी महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने देवाधिदेव महादेव भगवान सदाशिव और जगज्जननी माता पार्वती का हृदय में ध्यान किया और फिर मुस्कुराते हुए बोले— "हे शौनक आदि मुनीश्वरों! आपने संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण और जीवों के उद्धार हेतु अत्यंत उत्तम और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। मैं आप सभी को उस परम पावन, दुर्लभ और समस्त पापों का समूल नाश करने वाले व्रत की कथा सुनाता हूँ, जो भगवान आशुतोष को अत्यंत प्रिय है। वह परम कल्याणकारी व्रत है 'प्रदोष व्रत' । स्कन्द पुराण और शिव पुराण के अनुसार, प्रत्येक मास के दोनों पक्षों—शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष—की त्रयोदशी तिथि के संध्याकाल को प्रदोष काल कहा जाता है । जब यह त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तो वह अत्यंत पुण्यदायी 'शनि प्रदोष व्रत' कहलाता है । हे ऋषियों! अब मैं आप सभी को इसी शनि प्रदोष व्रत की वह परम कल्याणकारी, अक्षुण्ण और पारंपरिक कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, जो पुराणों में वर्णित है और जिसे पढ़ने तथा सुनने मात्र से जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता का नाश हो जाता है । आप सभी एकाग्रचित्त होकर इस पावन कथा का श्रवण करें।"


प्रथम आख्यान: निर्धन ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त का प्रसंग

अनाथ राजकुमार की प्राप्ति और ब्राह्मणी का आश्रय

सूत जी ने कथा का आरंभ करते हुए कहा— "हे ऋषियों! प्राचीन काल की बात है, किसी नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण की विधवा स्त्री निवास करती थी । पति के परलोक सिधार जाने के पश्चात् उस ब्राह्मणी का जीवन अत्यंत कष्ट, घोर दरिद्रता और अभावों में व्यतीत हो रहा था। उसके पास भरण-पोषण का कोई भी साधन शेष न था। इसी कारण, वह प्रतिदिन प्रातःकाल होते ही अपने छोटे पुत्र 'शुचिव्रत' को साथ लेकर भिक्षाटन के लिए निकल जाती थी और दिन भर चिलचिलाती धूप में दर-दर भटककर, अत्यंत दीन-हीन अवस्था में भिक्षा माँगने के पश्चात्, संध्याकाल होने पर अपनी जीर्ण-शीर्ण कुटिया में लौटती थी ।

एक दिन की बात है, जब वह ब्राह्मणी अपना भिक्षाटन पूर्ण करके संध्या के समय नदी के किनारे-किनारे अपने घर की ओर लौट रही थी, तो अचानक उसकी दृष्टि नदी के निर्जन तट पर पड़े एक अत्यंत सुंदर और सुकुमार बालक पर पड़ी । वह बालक पूर्ण रूप से अनाथ और असहाय प्रतीत हो रहा था। दयालु ब्राह्मणी का मातृ-हृदय उस अनाथ बालक को देखकर करुणा से द्रवित हो गया। उसने बिना कुछ सोचे-समझे उस बालक को स्नेहपूर्वक अपनी गोद में उठा लिया और उसे अपने साथ अपनी कुटिया में ले आई । ब्राह्मणी ने उस अज्ञात बालक को भी अपने निज पुत्र शुचिव्रत की भाँति ही अपना लिया और दोनों बालकों का अत्यंत प्रेम और वात्सल्य के साथ समान रूप से पालन-पोषण करने लगी ।

हे मुनिश्वरों! वह अनाथ बालक वास्तव में कोई सामान्य बालक नहीं था, अपितु वह विदर्भ देश के प्रतापी राजा का पुत्र, राजकुमार 'धर्मगुप्त' था । पूर्व काल में कुछ अत्यंत क्रूर शत्रुओं ने विदर्भ देश पर अचानक आक्रमण कर दिया था और भयंकर युद्ध में उसके पिता (विदर्भ नरेश) का वध करके उनका सारा राज्य और राजकोष हड़प लिया था । जब राज्य का पतन हो गया, तब उसकी माता (महारानी) उस छोटे से राजकुमार को गोद में लेकर प्राण बचाकर घने वन की ओर भाग गई थी। परंतु दुर्भाग्य ने वहाँ भी उनका साथ नहीं छोड़ा। वन में भटकते हुए जब उसकी माता नदी के तट पर जल पीने के लिए गई, तो एक अत्यंत विशाल और भयंकर ग्राह (मगरमच्छ) ने उस महारानी को अपना भोजन बना लिया । माता की अकाल मृत्यु के पश्चात् वह राजपुत्र धर्मगुप्त पूर्ण रूप से अनाथ होकर उसी नदी तट पर रोता हुआ रह गया था, जहाँ से देवयोग से उस दयामयी ब्राह्मणी ने उसे आश्रय प्रदान किया था ।

ऋषि शाण्डिल्य से भेंट और शनि प्रदोष व्रत का उपदेश

समय अपनी गति से व्यतीत होता रहा। कुछ समय पश्चात, दैवयोग से वह निर्धन ब्राह्मणी अपने दोनों बालकों—राजपुत्र धर्मगुप्त और अपने निज पुत्र शुचिव्रत—को साथ लेकर एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र देव मंदिर में भगवान के दर्शनार्थ गई । उसी मंदिर के प्रांगण में उनकी भेंट परम ज्ञानी, तपस्वी और दिव्य दृष्टि से संपन्न ऋषि शाण्डिल्य से हुई । ब्राह्मणी ने ऋषि शाण्डिल्य को देखते ही अत्यंत श्रद्धापूर्वक साष्टांग प्रणाम किया। तत्पश्चात्, उसने हाथ जोड़कर मुनिवर के समक्ष अपनी दीन-हीन दशा, घोर दरिद्रता और जीवन के कठोर संघर्षों से उत्पन्न व्याकुलता का सविस्तार वर्णन किया और अपने तथा इन दोनों बालकों के दुःख निवारण का कोई सुगम मार्ग पूछा ।

ऋषि शाण्डिल्य ने अपने तपोबल और दिव्य दृष्टि से उस अज्ञात बालक की ओर ध्यानपूर्वक देखा और संपूर्ण भूत, भविष्य तथा वर्तमान को क्षण भर में जान लिया। मुनि ने ब्राह्मणी को संबोधित करते हुए कहा— "हे कल्याणी! यह जो सुंदर बालक तुम्हें नदी के तट पर मिला है, यह कोई साधारण अनाथ नहीं है, बल्कि यह विदर्भ देश के राजा का सुपुत्र, राजकुमार धर्मगुप्त है । युद्ध भूमि में इसके पिता वीरगति को प्राप्त हुए और इसकी अभागी माता को एक क्रूर ग्राह ने अपना ग्रास बना लिया। हे ब्राह्मणी! यह राजपुत्र आज अपनी नियति और पूर्व कर्मों के भोग के कारण तुम्हारी शरण में है । परंतु तुम्हारे कष्टों और इस राजपुत्र की दरिद्रता का अंत अवश्य होगा।"

तत्पश्चात्, महर्षि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी और उन दोनों बालकों के सभी कष्टों का नाश करने तथा उनका खोया हुआ वैभव पुनः लौटाने के लिए उन्हें परम पावन 'शनि प्रदोष व्रत' करने का कठोरतापूर्वक नियम और उपदेश दिया । मुनि ने समझाया कि यह प्रदोष व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और जो कोई प्राणी पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियम के साथ शनिवार के दिन आने वाले इस त्रयोदशी प्रदोष व्रत का पालन करता है, भगवान आशुतोष उसके जीवन के समस्त भयंकर कष्टों को हर लेते हैं । ऋषि शाण्डिल्य की इस पावन आज्ञा और उपदेश को अपने मस्तक पर धारण कर, उस ब्राह्मणी ने अपने दोनों बालकों के साथ पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा से शनि प्रदोष व्रत करना आरंभ कर दिया ।

शिव कृपा: स्वर्ण कलश की प्राप्ति

भगवान शिव की कृपा और शनि प्रदोष व्रत का चमत्कार अत्यंत शीघ्र ही प्रकट होने लगा। एक बार शनि प्रदोष व्रत के ही पावन दिन, ब्राह्मणी का छोटा पुत्र शुचिव्रत अपने गाँव के समीप ही स्थित एक अत्यंत पुराने कुएँ और तालाब के पास स्नान करने के लिए गया । स्नान करके लौटते समय, मार्ग में कुएँ के समीप ही उसे अचानक एक अत्यंत देदीप्यमान स्वर्ण कलश प्राप्त हुआ, जो पूर्ण रूप से बहुमूल्य स्वर्ण मुद्राओं से भरा हुआ था । निर्धनता में पले शुचिव्रत के लिए यह किसी अलौकिक स्वप्न के समान था। वह अत्यंत प्रसन्न होकर दौड़ता हुआ उस स्वर्ण कलश को अपनी माता के पास ले आया और उसे वह कलश सौंपते हुए संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया।

अपनी आँखों के समक्ष स्वर्ण मुद्राओं से भरा कलश देखकर ब्राह्मणी का हृदय गदगद हो उठा। उसने इसे भगवान शिव की असीम और साक्षात् कृपा माना। ब्राह्मणी ने तुरंत अपने आश्रित राजकुमार धर्मगुप्त को वहाँ बुलाया और कहा, "हे पुत्रों! यह साक्षात् देवाधिदेव महादेव का प्रसाद है, तुम दोनों भाई इस स्वर्ण मुद्राओं को आपस में आधा-आधा बाँट लो ताकि हमारी दरिद्रता का सदा के लिए अंत हो जाए ।"

परंतु जब माता ने राजपुत्र धर्मगुप्त को उस धन का अपना आधा हिस्सा ग्रहण करने के लिए कहा, तो धर्मगुप्त ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक और धर्म-सम्मत वचनों के साथ वह धन लेने से स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। धर्मगुप्त ने कहा, "हे माता! यह कलश और यह धन मेरे भाई शुचिव्रत को प्राप्त हुआ है, अतः यह उसके ही पुण्यों का और शिव कृपा का फल है। मैं किसी भी प्रकार से इसका अधिकारी नहीं हूँ । हे माते! मेरा यह अत्यंत दृढ़ संकल्प है कि जब भगवान शंकर और माता पार्वती मुझे स्वयं अपनी प्रत्यक्ष कृपा से कुछ प्रदान करेंगे, मैं केवल तभी उसे सहर्ष स्वीकार करूँगा ।" ऐसा कहकर राजकुमार धर्मगुप्त ने उस धन का पूर्ण रूप से त्याग कर दिया और स्वयं को पूर्ण रूप से भगवान शिव की परम भक्ति, तपस्या और शनि प्रदोष व्रत की आराधना में लीन कर लिया।

गंधर्व कन्या अंशुमती से भेंट

सूत जी कथा को आगे बढ़ाते हुए बोले— "हे शौनक आदि मुनियों! समय अपनी निर्बाध गति से व्यतीत होता रहा और दोनों बालक युवावस्था को प्राप्त हुए। एक दिन दोनों भाई, धर्मगुप्त और शुचिव्रत, भ्रमण करते हुए वन में बहुत दूर निकल गए । वन में उन्होंने एक अत्यंत मनोहारी दृश्य देखा। वहाँ कुछ अत्यंत सुंदर गंधर्व कन्याएँ बड़े उल्लास के साथ जल-क्रीड़ा कर रही थीं ।

यह देखकर शुचिव्रत तो संकोचवश वहीं एक ओर रुक गया और कुछ देर पश्चात् वापस अपने घर लौट आया, किंतु राजकुमार धर्मगुप्त उन स्त्रियों के समूह के अत्यंत निकट पहुँच गया । उन गंधर्व कन्याओं के मध्य 'विद्रविक' नामक एक अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रतापी गन्धर्व राज की रूपवती पुत्री 'अंशुमती' भी उपस्थित थी । जब अंशुमती की दृष्टि राजकुमार धर्मगुप्त के तेजवान मुखमंडल और सुडौल स्वरूप पर पड़ी, तो वह उस पर अत्यंत मोहित हो गई ।

अंशुमती ने निर्भीक होकर आगे बढ़कर राजकुमार से उनका पूर्ण परिचय पूछा। तब धर्मगुप्त ने अत्यंत शालीनतापूर्वक और सत्य वचन कहते हुए उत्तर दिया कि वह विदर्भ नरेश का अनाथ पुत्र है और वर्तमान में अत्यंत निर्धन अवस्था में अपना जीवन यापन कर रहा है । राजकुमार के ये सत्य, सरल और धर्मपूर्ण वचन सुनकर अंशुमती का उसके प्रति प्रेम और भी अधिक प्रगाढ़ हो गया। उसने बिना किसी संकोच के अपने गले से एक अत्यंत बहुमूल्य मोतियों का हार उतारा और उसे राजकुमार धर्मगुप्त को अपने प्रेमोपहार के स्वरूप पहना दिया ।

राजकुमार ने पुनः अपनी घोर निर्धनता और राज्यहीनता का स्मरण कराया, किंतु अंशुमती ने उसे ही अपने पति के रूप में पूर्ण रूप से स्वीकार करने का दृढ़ वचन दिया। अंशुमती ने राजकुमार से निवेदन किया कि वह अगले दिन पुनः इसी स्थान पर उससे मिलने आए, ताकि वह उसे अपने पिता, गंधर्व राज विद्रविक से मिलवा सके ।

गंधर्वराज को भगवान शिव का स्वप्न-आदेश

अगले दिन जब राजकुमार धर्मगुप्त पुनः उसी वन में अंशुमती से मिलने पहुँचा, तो वहाँ अंशुमती के पिता, गंधर्व राज विद्रविक स्वयं उपस्थित थे । गंधर्व राज ने राजकुमार का अत्यंत आदरपूर्वक सत्कार किया, उसे एक उच्च आसन पर बिठाया और हाथ जोड़कर अत्यंत विनीत भाव से कहा—

'हे राजकुमार! मैं कल रात्रि ही भगवान शिव के पवित्र धाम कैलाश पर्वत पर गया था । वहाँ स्वयं देवाधिदेव महादेव शंकर जी ने मुझे साक्षात् दर्शन दिए और अत्यंत स्पष्ट रूप से आज्ञा देते हुए मुझसे कहा कि धर्मगुप्त नाम का जो राजपुत्र है, वह यद्यपि इस समय राज्य विहीन और अत्यंत निर्धन है, परंतु वह मेरा परम और अनन्य भक्त है । हे गंधर्व राज! तुम मेरी आज्ञा से अपनी कन्या अंशुमती का विवाह उस राजकुमार के साथ विधिवत संपन्न करो और उसकी हर प्रकार से सहायता करो । मैं तुम्हारी सहायता से उसे पुनः विदर्भ देश की राजगद्दी पर बिठाऊँगा । हे धर्मगुप्त! महादेव की इसी परम आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए, मैं अपनी यह कन्या आपको सौंपता हूँ ।'

तदुपरांत, गंधर्व राज विद्रविक ने अपनी सुपुत्री अंशुमती का पाणिग्रहण संस्कार पूर्ण वैदिक रीति-रिवाज और विधिवत रूप से राजकुमार धर्मगुप्त के साथ संपन्न कर दिया । विवाह के पश्चात् गंधर्व राज ने भगवान शिव की आज्ञानुसार राजकुमार को अपार धन-संपत्ति, श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र और एक अत्यंत विशाल एवं अजेय गंधर्व सेना प्रदान की ।

राज्य की पुनः प्राप्ति और राज्याभिषेक

विशेष धन, शक्तिशाली चतुरंगिणी सेना और अंशुमती जैसी सुलक्षणा एवं शिवभक्त पत्नी को पाकर राजपुत्र धर्मगुप्त अत्यंत प्रसन्न हुआ । तत्पश्चात्, भगवान शंकर की अपार कृपा और गंधर्व सेना की प्रचंड सहायता से राजकुमार धर्मगुप्त ने अपने पिता के खोये हुए राज्य, विदर्भ देश पर प्रबल आक्रमण कर दिया । उस भयंकर युद्ध में उसने अपने अद्भुत पराक्रम से शत्रुओं का समूल नाश करके उनका कठोर दमन किया और विदर्भ देश पर पुनः अपना पूर्ण आधिपत्य स्थापित कर लिया ।

अपनी राजधानी में विजयी होकर प्रवेश करते ही, विदर्भ देश के श्रेष्ठ ब्राह्मणों, मंत्रियों और प्रजाजनों ने मिलकर अत्यंत उल्लास के साथ राजकुमार धर्मगुप्त का राज्याभिषेक किया । राजसिंहासन पर विराजमान होने के पश्चात् राजा धर्मगुप्त ने सबसे पहला कार्य यह किया कि उसने उस निर्धन ब्राह्मणी को राजमाता के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित किया, जिसने उसे अनाथ अवस्था में अपने निज पुत्र की भाँति पाला था । उस ब्राह्मणी का पुत्र शुचिव्रत राजा धर्मगुप्त का भ्राता होकर राज्य का सुख भोगने लगा और गंधर्व राज की पुत्री अंशुमती महारानी के पद पर सुशोभित हुई ।

यह सब केवल उस निर्धन ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के द्वारा पूर्ण श्रद्धा और नियम से किए गए शनि प्रदोष व्रत का ही अलौकिक और प्रत्यक्ष फल था । भगवान शिव की निरंतर आराधना और शनि प्रदोष व्रत के पुण्य प्रताप से धर्मगुप्त अपने खोये हुए राज्य, सम्मान, वैभव और वैवाहिक सुख-समृद्धि को प्राप्त कर जीवन भर धर्मपूर्वक शासन करता रहा ।


द्वितीय आख्यान: निःसंतान सेठ-सेठानी एवं शिव-भक्त साधु का प्रसंग

नगर सेठ की घोर व्यथा

सूत जी ने पुनः शौनक आदि ऋषियों को संबोधित करते हुए कहा— "हे तपोधनों! शनि प्रदोष व्रत की महिमा अत्यंत अपार है। इसी शनि प्रदोष व्रत के अलौकिक प्रभाव को दर्शाने वाली एक और अत्यंत पावन कथा जो पारंपरिक रूप से कही और सुनी जाती है, उसे भी आप सभी एकाग्र मन से श्रवण करें ।

प्राचीन काल में किसी समृद्ध नगर में एक अत्यंत धनी और प्रतिष्ठित 'नगर सेठ' निवास करता था । वह सेठ स्वभाव से अत्यंत धर्मनिष्ठ, दयालु और परोपकारी था। उसके घर में धन-धान्य, स्वर्ण, आभूषण, वैभव, और भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी । परंतु इतने अपार वैभव और सुख के होते हुए भी, सेठ और उसकी पत्नी (सेठानी) के मुख पर सदैव एक गहरी उदासी और घोर दुःख छाया रहता था। उनके इस असीम दुःख का एकमात्र कारण यह था कि उनके घर के आंगन में किसी संतान की किलकारी नहीं गूँजी थी । संतानहीनता के कारण सेठ और सेठानी दिन-रात इसी भयंकर चिंता में मग्न रहते थे कि उनके उपरांत इस अपार संपत्ति का उत्तराधिकारी कौन होगा और उनके वंश का तर्पण कौन करेगा।

जब सेठ का आधा जीवन इसी दुःख और सोच-विचार में व्यतीत हो गया, तब एक दिन उसने अत्यंत उद्विग्न होकर अपनी पत्नी से कहा कि अब हमें यह समस्त गृहस्थी, धन-संपत्ति और व्यापार त्याग कर तीर्थयात्रा पर निकल जाना चाहिए, कदाचित भगवान की शरण में जाने से हमारे पूर्व जन्म के पापों का शमन हो जाए और हमारे भाग्य में संतान सुख का योग बन सके । सेठानी ने भी पति के इस धर्म-युक्त प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

अगले ही दिन सेठ ने अपनी संपूर्ण संपत्ति, व्यापार और घर की देख-रेख का पूर्ण उत्तरदायित्व अपने विश्वासपात्र नौकरों और मुनीमों को सौंप दिया । तत्पश्चात् सेठ और सेठानी दोनों ईश्वरीय चिंतन करते हुए अपने नगर की सीमा से बाहर तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े ।

सिद्ध साधु से भेंट और प्रतीक्षा

वे अभी नगर के मुख्य द्वार से कुछ ही दूर वन के मार्ग पर निकले थे कि उन्हें मार्ग में एक अत्यंत शांत, एकांत और पवित्र स्थान पर एक वृद्ध और तेजस्वी साधु दिखाई दिए । वे साधु महाराज अपनी आँखें बंद किए हुए घोर ध्यान और समाधि में मग्न बैठे थे। सेठ ने अपनी पत्नी से कहा, "हे प्रिये! हमारे समक्ष ये सिद्ध साधु तपस्या में लीन हैं। यह अत्यंत शुभ शकुन है। क्यों न हम अपनी आगे की तीर्थयात्रा आरंभ करने से पूर्व इन महात्मा का दर्शन और उनका पावन आशीर्वाद प्राप्त कर लें ।"

ऐसा निश्चय करके सेठ और सेठानी दोनों उन साधु महाराज के समीप जाकर अत्यंत श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर बैठ गए । वे दोनों वहाँ शांत भाव से साधु के नेत्र खोलने की प्रतीक्षा करने लगे। उन्होंने साधु की समाधि में कोई विघ्न नहीं डाला और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते रहे। इस प्रकार मौन भाव से प्रतीक्षा करते-करते सुबह से संध्या हो गई, परंतु वे अपने स्थान से टस-से-मस नहीं हुए ।

शनि प्रदोष व्रत का उपदेश और शिव वंदना

अंततः जब बहुत समय व्यतीत हो जाने के पश्चात् साधु महाराज की समाधि टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले, तो अपने समक्ष सेठ और सेठानी को हाथ जोड़े, अत्यंत विनयशील अवस्था में बैठे हुए देखा । साधु ने अपने तपोबल और अंतर्दृष्टि से उनके जीवन का संपूर्ण वृत्तांत और उनके मन की गहरी पीड़ा को क्षण भर में ही जान लिया ।

साधु ने अत्यंत मधुर और करुणापूर्ण वाणी में सेठ और सेठानी से कहा— "हे वत्स! मैं तुम्हारे हृदय का दुःख और तुम्हारी इस दीर्घ प्रतीक्षा का कारण भली-भांति जानता हूँ। तुम दोनों संतान न होने के कारण अत्यंत दुखी हो और इसी दुःख के निवारण हेतु तीर्थयात्रा पर निकले हो । मैं तुम्हारे धैर्य, तुम्हारी धर्मनिष्ठा और तुम्हारी भक्ति-भावना से अत्यंत प्रसन्न हूँ । हे सेठ! तुम्हारे कष्टों का निवारण महादेव अवश्य करेंगे। तुम दोनों पति-पत्नी मिलकर 'शनि प्रदोष व्रत' का नियमपूर्वक पालन करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारी झोली अवश्य भरेगी और तुम्हें शीघ्र ही एक उत्तम संतान की प्राप्ति होगी ।

साधु महाराज ने सेठ और सेठानी को शनि प्रदोष व्रत की पूर्ण विधि समझाई और संतान प्राप्ति के निमित्त भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु एक अत्यंत चमत्कारी और पावन शिव-वंदना (मंत्र) का उपदेश दिया। साधु ने कहा, "प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करते समय दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण भक्ति भाव से इस स्तुति का गान करना ।"

पारंपरिक कथा में वर्णित वह पावन शिव वंदना इस प्रकार है:

हे रुद्रदेव शिव नमस्कार।
शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥
हे नीलकंठ सुर नमस्कार।
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥
हे उमाकान्त सुधि नमस्कार।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार।
विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥

(स्रोत: पारंपरिक शनि प्रदोष कथा )

पुत्र रत्न की प्राप्ति

सिद्ध साधु महाराज से शनि प्रदोष व्रत का ज्ञान, यह अचूक शिव वंदना और उनका अमूल्य आशीर्वाद प्राप्त कर सेठ और सेठानी अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके मन का अज्ञान और दुःख रूपी अंधकार उसी क्षण दूर हो गया। तदुपरांत वे दोनों साधु महाराज की परिक्रमा करके अपनी तीर्थयात्रा के लिए आगे बढ़ गए ।

अपनी तीर्थयात्रा सफलतापूर्वक पूर्ण करने के पश्चात् जब दोनों पति-पत्नी वापस अपने घर लौटे, तो उन्होंने साधु की आज्ञा और उपदेश के अनुसार पूर्ण नियम, श्रद्धा और विधि-विधान के साथ 'शनि प्रदोष व्रत' करना आरंभ कर दिया । वे प्रत्येक शनि प्रदोष को निराहार रहकर संध्याकाल में साधु द्वारा बताई गई उसी स्तुति का गान कर भगवान शंकर की आराधना करने लगे।

भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा और शनि प्रदोष व्रत के पुण्य प्रताप से कालान्तर में सेठानी ने गर्भ धारण किया । समय पूर्ण होने पर सेठ की पत्नी ने एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया । पुत्र-रत्न की प्राप्ति होते ही सेठ के घर और संपूर्ण नगर में खुशियों की लहर दौड़ गई। शनि प्रदोष व्रत के महान प्रभाव से उनके जीवन में छाया हुआ संतानहीनता का घोर अंधकार सदा के लिए लुप्त हो गया और दोनों पति-पत्नी अपने पुत्र के साथ जीवन भर आनंदपूर्वक भगवान शिव का गुणगान करते हुए सुख भोगने लगे ।


पारंपरिक फल-श्रुति एवं महात्म्य

सूत जी ने कथा को पूर्ण करते हुए शौनक आदि ऋषियों से कहा— "हे महर्षियों! यह जो कथा मैंने आप सभी को सुनाई है, यह शनि प्रदोष व्रत की अत्यंत दुर्लभ, पवित्र और परम फलदायी कथा है। स्कन्द पुराण और शिव पुराण में स्पष्ट रूप से यह उद्घोष किया गया है कि जिस प्रकार भगवान शंकर की आराधना करके विदर्भ देश के राजकुमार धर्मगुप्त ने अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया और जिस प्रकार उस सेठ-सेठानी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, उसी प्रकार जो भी भक्त प्रदोष व्रत के दिन गिरिजापति भगवान शिव की आराधना करके एकाग्र मन से इस शनि प्रदोष व्रत की कथा को सुनता है अथवा पढ़ता है, उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं सताती ।

पारंपरिक शनि प्रदोष व्रत कथा के मुख्य पात्र और उन पर हुई शिव कृपा का फल इस प्रकार है:

पात्र जीवन का संकट शनि प्रदोष व्रत का फल / शिव कृपा
निर्धन ब्राह्मणी घोर दरिद्रता और भिक्षाटन का जीवन स्वर्ण कलश की प्राप्ति एवं 'राजमाता' का सर्वोच्च पद
राजकुमार धर्मगुप्त अनाथ, राज्यहीन, दरिद्रता में पला-बढ़ा गंधर्व कन्या से विवाह, सेना की प्राप्ति एवं पुनः राज्य की प्राप्ति
गंधर्वराज विद्रविक पुत्री के विवाह की चिंता भगवान शिव के साक्षात् स्वप्न-दर्शन एवं योग्य वर की प्राप्ति
नगर सेठ एवं सेठानी अपार धन होते हुए भी संतानहीनता का घोर दुःख सुंदर और तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति

भगवान शिव और माता पार्वती उन भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं जो इस व्रत का पालन करते हैं। जो स्त्री-पुरुष इस व्रत को पूरे विधि-विधान और निष्ठा के साथ करते हैं और उद्यापन करते हैं, उनके जीवन के समस्त कष्ट, शनि-दोष, भय और रोग दूर हो जाते हैं। उन्हें इस लोक में सभी प्रकार के धन, धान्य, सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और अंतकाल में भगवान शिव की कृपा से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

इस पवित्र कथा का श्रवण करने के पश्चात्, भगवान सदाशिव की आरती और जय-जयकार अवश्य करनी चाहिए।


पारंपरिक शिव आरती

कथा की पूर्णता पर भक्तगण अत्यंत श्रद्धा और प्रेमपूर्वक भगवान शिव की यह पारंपरिक आरती गाते हैं—

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥

॥ इति श्री स्कान्दपुराणान्तर्गत शनि प्रदोष व्रत कथा सम्पूर्णम् ॥

॥ बोलिए उमापति महादेव की जय ॥

॥ बोलिए शनिदेव महाराज की जय ॥

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