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श्री महाशिवरात्रि व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं पौराणिक पाठ

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श्री महाशिवरात्रि व्रत कथा: संपूर्ण, पारंपरिक एवं अक्षुण्ण पौराणिक पाठ

महाशिवरात्रि व्रत के प्रमुख पौराणिक प्रसंग एवं स्रोत

यह परम पावन महाशिवरात्रि व्रत कथा विभिन्न पुराणों में वर्णित शिव महिमा का अद्भुत और अक्षुण्ण संग्रह है। इस कथा के अंतर्गत श्रवण किए जाने वाले प्रमुख प्रसंग और उनके पौराणिक स्रोत निम्नलिखित हैं:

क्रम प्रसंग का नाम मुख्य पात्र पौराणिक स्रोत / संहिता महात्म्य / फल
पारंपरिक प्रारंभ शौनक-सूत संवाद, शिव-पार्वती शिव पुराण (कोटिरुद्रसंहिता), स्कन्द पुराण व्रत की महिमा एवं सर्वपाप नाश
व्याध (शिकारी) की कथा चित्रभानु (गुह), साहूकार, मृग परिवार शिव पुराण (कोटिरुद्रसंहिता अध्याय ४०) अनजाने में व्रत का फल, मोक्ष एवं सायुज्य प्राप्ति
लिङ्गोद्भव प्रसंग ब्रह्मा, विष्णु, भगवान शिव (ज्योतिर्लिंग) शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता अध्याय ६-९), लिंग पुराण अज्ञान-नाश, शिव की सर्वोच्च सत्ता का ज्ञान
समुद्र-मंथन एवं विषपान देवगण, असुरगण, नीलकंठ महादेव शिव पुराण, भागवत पुराण सृष्टि की रक्षा, भगवान की परम करुणा
सेठ-सेठानी एवं चिड़िया धनी सेठ, चिड़िया, साधु रूपी शिव लोक-प्रचलित शिवरात्रि महात्म्य भक्ति का उदय, संतान की आयु-वृद्धि

पारंपरिक प्रारंभ: श्री पार्वती-शिव संवाद एवं सूत-शौनक प्रसंग

परम पावन नैमिषारण्य के पवित्र, शांत एवं ज्ञान से परिपूर्ण क्षेत्र में, जहाँ वेदों और पुराणों की अजस्र धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है, एक समय शौनक आदि अठासी हजार तपस्वी ऋषिगण एकत्र हुए । उन सभी मुनीश्वरों ने पुराणों के मर्मज्ञ, व्यास-शिष्य एवं परम ज्ञानी श्री सूतजी महाराज को सादर साष्टांग प्रणाम कर उनसे भगवान साम्बसदाशिव की महिमा और उनके परम कल्याणकारी व्रतों के विषय में अपनी जिज्ञासा प्रकट की ।

ऋषिगण हाथ जोड़कर अत्यंत विनीत भाव से बोले— "हे सूतजी! हे महाप्राज्ञ! आपकी अमृतमयी और ज्ञानवर्धक वाणी को सुनकर हम सभी ऋषियों का हृदय अत्यंत आनंदित हुआ है। हे मुनिश्रेष्ठ! हम उस सर्वोत्तम, दुर्लभ और सर्वपापहारी व्रत के विषय में विस्तारपूर्वक श्रवण करना चाहते हैं, जिसे करने से भगवान उमापति, देवाधिदेव महादेव सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। हे सूतजी! कृपया हमें यह भी बताएँ कि इस उत्तम व्रत को पूर्वकाल में सबसे पहले किसने किया था? यदि अज्ञानतावश भी कोई प्राणी इस व्रत का पालन कर ले, तो उसे कौन-सा उत्तम फल प्राप्त होता है?" ।

ऋषियों के इस अत्यंत पुनीत और लोक-कल्याणकारी प्रश्न को सुनकर सूतजी महाराज ने भगवान साम्बसदाशिव का ध्यान किया। वे बोले— "हे ऋषिगणों! मैं आप सभी को उस परम पावन इतिहास का श्रवण कराता हूँ, जो सर्वपापों का नाश करने वाला, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान करने वाला और भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय है। इस महान व्रत को 'महाशिवरात्रि व्रत' कहा जाता है। पूर्वकाल में माता पार्वती ने भी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव से ठीक यही प्रश्न किया था"。

सूतजी आगे कहते हैं— "हे ऋषियों! जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि हे नाथ! आपका सबसे प्रिय व्रत कौन-सा है जो सब पापों का नाश करने वाला है? तब देवाधिदेव महादेव ने माता पार्वती को उत्तर देते हुए कहा था कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का परम पवित्र पर्व होता है, जो मुझे अत्यंत प्रिय है। भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा— 'हे देवी! यदि महाभाग विष्णु तुम्हीं से प्रकट हुए हैं, तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे ही बालक हुए। फिर मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ? हे देवी! यह महाशिवरात्रि का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो भी प्राणी इस दिन निराहार रहकर, रात्रि के चारों प्रहरों में मेरी उपासना करता है, वह मेरे सायुज्य को प्राप्त कर लेता है'。

इसी महाशिवरात्रि की महिमा को प्रकट करने वाला एक अत्यंत प्राचीन इतिहास शिव पुराण की कोटिरुद्रसंहिता के चालीसवें अध्याय में वर्णित है, जिसे मैं आप सभी के समक्ष ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप सभी एकाग्रचित्त होकर इस पावन कथा का श्रवण करें"。


मुख्य कथा १: निषाद (व्याध) चित्रभानु की कथा और रात्रि-जागरण

सूतजी महाराज ने कहा— "हे शौनक! पूर्व समय में किसी घने वन में गुरुगुह (चित्रभानु) नामक एक अत्यंत बलवान, निर्दयी और क्रूरकर्मों में तत्पर रहने वाला भील (शिकारी) अपने कुटुम्ब के साथ निवास करता था । वह स्वभाव से ही अत्यंत हिंसक, पाषाण-हृदय और पाप-कर्मों में लिप्त था। वह सदैव वन में जाकर प्रतिदिन मूक पशुओं का वध करके अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था। पशु-वध के अतिरिक्त वह वन के मार्गों से गुजरने वाले निहत्थे पथिकों को लूटकर अनेक प्रकार की चोरियाँ भी किया करता था। बाल्यावस्था से लेकर यौवन तक उस व्याध ने कभी कोई शुभ कर्म, जप, तप या दान नहीं किया था। इस प्रकार वन में पापमय जीवन व्यतीत करते हुए उस दुष्टात्मा का बहुत समय बीत गया।

एक बार की बात है, वह व्याध अपने नगर के एक साहूकार का भारी कर्जदार हो गया। ऋण चुकाने का समय व्यतीत हो जाने पर भी जब वह धन न दे सका, तो क्रोधित साहूकार ने अपने सेवकों द्वारा उस शिकारी चित्रभानु को बंदी बना लिया और उसे एक शिव-मठ (मंदिर) में कैद कर दिया। संयोगवश, जिस दिन उसे बंदी बनाया गया, वह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात् भगवान शिव को अत्यंत प्रिय महाशिवरात्रि का ही परम पावन दिन था।

बंदीगृह (शिव-मठ) में रहते हुए, उस शिकारी ने दिन भर भूखे-प्यासे रहकर अनजाने में ही शिवरात्रि का उपवास कर लिया। उसी मठ में शिवभक्तों द्वारा शिवरात्रि व्रत की कथा, पारम्परिक शिव-पूजन और शिव-नाम का संकीर्तन चल रहा था। व्याध ने अपने कानों से वह कथा और शिव से जुड़ी धार्मिक बातें श्रवण कीं। संध्या के समय साहूकार ने उसे बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में कठोरता से पूछा। व्याध ने अत्यंत दीन होकर साहूकार को वचन दिया कि वह अगले ही दिन किसी भी प्रकार से शिकार करके उसका संपूर्ण ऋण चुका देगा। उसके दृढ़ वचन को सुनकर साहूकार ने उसे बंधन से मुक्त कर दिया।

बंधन से छूटते ही वह शिकारी अपने धनुष-बाण लेकर शिकार की खोज में पुनः घने जंगल की ओर निकल पड़ा। दिन भर बंदी रहने के कारण वह भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल था। उसका कंठ सूख रहा था और शरीर शिथिल हो रहा था, परंतु उसे मार्ग में कोई भी शिकार प्राप्त न हो सका। दैवयोग से उस समय तक सूर्यास्त हो गया और संपूर्ण वन गहन अंधकार में डूब गया। व्याध अत्यंत दुखी और चिंतित होकर सोचने लगा— 'अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? आज मुझे कुछ भी शिकार नहीं मिला। घर में जो मेरे भूखे बालक हैं, माता-पिता और मेरी पत्नी है, उनकी क्या दशा होगी? मुझे कुछ-न-कुछ लेकर ही घर जाना चाहिए, बिना भोजन लिए घर लौटना व्यर्थ होगा'。

ऐसा विचार कर वह व्याध जल की खोज में वन के भीतर एक जलाशय के समीप पहुँचा, जहाँ वन्य जीव जल पीने आते थे। जलाशय के किनारे एक अत्यंत विशाल और प्राचीन बिल्ववृक्ष (बेल का पेड़) खड़ा था। व्याध ने सोचा कि इस जलाशय पर अपनी प्यास बुझाने के लिए कोई-न-कोई वन्य जीव अवश्य आएगा, तब उसे मारकर मैं अपना कार्य सिद्ध कर लूँगा और आनंदपूर्वक अपने घर चला जाऊँगा। यही विचार कर वह अपने साथ थोड़ा जल लेकर उस बिल्ववृक्ष की डाल पर चढ़कर छिपकर बैठ गया और शिकार की प्रतीक्षा करने लगा।

वह व्याध इस बात से पूर्णतः अनभिज्ञ था कि उस घने बिल्ववृक्ष के ठीक नीचे भगवान शिव का एक अति प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जो सूखे बिल्वपत्रों और घास-फूस से ढका हुआ था। व्याध जब वृक्ष की शाखाओं पर अपने बैठने और छिपने के लिए स्थान बना रहा था, तो उसने कुछ टहनियाँ और पत्ते तोड़े। ऐसा करने से अनजाने में ही वृक्ष से ओस की बूँदें (जल) और कुछ बिल्वपत्र टूटकर सीधे नीचे स्थित शिवलिंग पर जा गिरे। इस प्रकार, भूख-प्यास से व्याकुल उस व्याध द्वारा अनजाने में ही महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर की शिव-पूजा संपन्न हो गई।

चार प्रहरों का विवरण एवं घटनाक्रम

प्रहर का नाम वन में उपस्थित पात्र व्याध का कर्म शिवलिंग पर अर्पण परिणाम / घटना
प्रथम प्रहर गर्भिणी हिरणी शिकार का प्रयास, हिरणी को वचन देकर छोड़ना अनजाने में बिल्वपत्र एवं जल प्रथम प्रहर की पूजा संपन्न
द्वितीय प्रहर पति को खोजती हिरणी धनुष तानना, करुण पुकार सुनकर क्षमा करना अनजाने में बिल्वपत्र एवं जल द्वितीय प्रहर की पूजा संपन्न
तृतीय प्रहर बच्चों के साथ हिरणी बच्चों को सौंपने के वचन पर विश्वास करना अनजाने में बिल्वपत्र एवं जल तृतीय प्रहर की पूजा संपन्न
चतुर्थ प्रहर हृष्ट-पुष्ट मृग परिवार के वियोग की बात सुन जीवनदान देना अनजाने में बिल्वपत्र एवं जल चतुर्थ प्रहर की पूजा संपन्न, पाप नाश

प्रथम प्रहर का प्रसंग

रात्रि का प्रथम प्रहर व्यतीत हो रहा था। तभी प्यास से व्याकुल एक गर्भिणी हिरणी चकित होकर कूदती-फाँदती उस जलाशय के तट पर जल पीने के लिए आई। हिरणी की आहट पाकर शिकारी अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने उसे मारने के लिए शीघ्र ही अपने धनुष पर बाण चढ़ाया। धनुष की प्रत्यंचा खिंचने की ध्वनि सुनकर हिरणी ने ऊपर देखा और भयभीत होकर व्याध से बोली— 'हे व्याध! तुम यह क्या कर रहे हो?'

शिकारी ने क्रूरतापूर्वक उत्तर दिया— 'मैं अपने और अपने भूखे परिवार के भरण-पोषण के लिए तेरा वध करूँगा।'

यह सुनकर वह गर्भिणी हिरणी अत्यंत कातर स्वर में बोली— 'हे निषाद! मैं गर्भिणी हूँ और शीघ्र ही प्रसव करने वाली हूँ। यदि तुम मुझे मार दोगे, तो मेरे साथ मेरे गर्भ में पल रहे अजन्मे शिशु की भी हत्या हो जाएगी और तुम्हें एक साथ दो जीवों की हत्या का घोर पाप लगेगा। मैं तुम्हें वचन देती हूँ कि प्रसव के पश्चात मैं अपने नवजात शिशु को सुरक्षित स्थान पर अपने स्वामी को सौंपकर पुनः तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊँगी, तब तुम मेरा वध कर लेना'。

व्याध को हिरणी की बात पर तनिक भी विश्वास नहीं हुआ, परंतु हिरणी के अत्यंत आग्रह और सत्य-वचन की दुहाई देने पर व्याध का कठोर मन तनिक विचलित हुआ और उसने अपने धनुष से बाण उतार लिया। उसने उस गर्भिणी हिरणी को जाने दिया। बाण उतारते समय वृक्ष के हिलने से पुनः कुछ बिल्वपत्र और जल नीचे शिवलिंग पर जा गिरे। इस प्रकार अनजाने में ही शिकारी द्वारा दूसरे प्रहर की पूजा का विधान भी पूरा हो गया ।

द्वितीय प्रहर का प्रसंग

कुछ समय पश्चात्, रात्रि के द्वितीय प्रहर में एक अन्य हिरणी उसी जलाशय पर जल पीने आई। यह हिरणी अत्यंत व्याकुल थी और अपने प्रिय (पति) की खोज में भटक रही थी। उसे देखकर शिकारी ने पुनः अपना धनुष उठाया और बाण का संधान किया।

हिरणी ने शिकारी को बाण साधे हुए देखकर कहा— 'हे व्याध! तुम मेरा वध क्यों करना चाहते हो?'

शिकारी बोला— 'मुझे और मेरे परिवार को भूख लगी है, मैं तुम्हारा मांस ले जाकर उनकी क्षुधा शांत करूँगा।'

हिरणी ने करुण स्वर में कहा— 'हे निषाद! मैं ऋतुमती हूँ और अपने पति की खोज में यहाँ-वहाँ भटक रही हूँ। मैं इस समय कामातुर हूँ। यदि तुम मुझे अभी मार दोगे, तो मेरा पत्नी-धर्म और मेरा जीवन-लक्ष्य अपूर्ण रह जाएगा। कृपा करके मुझे जाने दो। मैं अपने पति से मिलन के पश्चात्, अपनी तृप्ति करके कल प्रातःकाल तुम्हारे पास लौट आऊँगी। मैं सत्य की शपथ खाकर कहती हूँ कि मैं अवश्य लौटूंगी'。

व्याध ने उस हिरणी की दीन पुकार सुनकर उसे भी छोड़ दिया। इस बार भी उसके हिलने-डुलने से कुछ पत्ते नीचे गिरे और अनजाने में ही शिवलिंग की पूजा हो गई।

तृतीय प्रहर का प्रसंग

रात्रि का तृतीय प्रहर आरंभ हो चुका था। तभी एक तीसरी हिरणी अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ उस जलाशय के किनारे आई। वह हिरणी अपनी पहली दोनों बहनों की खोज में थी। इतने सारे शिकार एक साथ देखकर व्याध की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। उसने तुरंत बाण को धनुष पर चढ़ाकर प्रत्यंचा खींच ली।

यह देखकर हिरणी ने कहा— 'हे शिकारी! तुम हम पर प्रहार मत करो।'

शिकारी हँसते हुए बोला— 'मैं मूर्ख नहीं हूँ जो सामने आए शिकार को छोड़ दूँ। मैंने पहले ही दो हिरणियों को जीवनदान दे दिया है और अब मैं भूख से तड़प रहा हूँ। अब मैं तुम्हें किसी भी स्थिति में नहीं छोडूंगा।'

हिरणी ने अत्यंत विनीत भाव से कहा— 'हे किरात! मेरे ये बच्चे अभी अत्यंत छोटे और असहाय हैं। यदि तुम मुझे मार दोगे, तो मेरे बिना ये बालक अनाथ होकर वन में भूखे मर जाएँगे। मैं तुमसे प्रार्थना करती हूँ कि मुझे केवल इतनी मोहलत दे दो कि मैं इन बालकों को ले जाकर इनके पिता को सौंप आऊँ। मैं तुम्हें वचन देती हूँ कि इन बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर मैं स्वयं तुम्हारे पास अपना शरीर सौंपने के लिए वापस आ जाऊँगी'。

शिकारी को उस हिरणी के वात्सल्य और मातृ-प्रेम पर दया आ गई। उसने उस हिरणी और उसके बच्चों को भी जाने की अनुमति दे दी। इस हलचल में एक बार फिर वृक्ष से बिल्वपत्र टूटे और शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार शिकारी द्वारा अनजाने में ही महाशिवरात्रि के तीसरे प्रहर का व्रत और पूजन भी संपन्न हो गया।

चतुर्थ प्रहर का प्रसंग

अब रात्रि का चतुर्थ और अंतिम प्रहर आ गया था। व्याध भूख, प्यास और थकान से अत्यंत क्षीण हो चुका था। तभी उस मार्ग पर एक अत्यंत हृष्ट-पुष्ट और विशाल सींगों वाला मृग (हिरण) आया। वह मृग अपनी तीनों पत्नियों और बच्चों को वन में खोज रहा था।

इतना हृष्ट-पुष्ट शिकार देखकर शिकारी ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब चाहे जो हो जाए, वह इस मृग को नहीं छोड़ेगा। उसने पूरी शक्ति से धनुष पर बाण चढ़ाया।

मृग ने शिकारी को लक्ष्य साधते देख निर्भय होकर पूछा— 'हे व्याध! यदि तुमने इससे पूर्व यहाँ से गुजरी मेरी तीनों पत्नियों और मेरे बालकों को मार दिया है, तो विलंब न करो और मुझे भी शीघ्र मार दो, क्योंकि मैं उनके वियोग का यह असहनीय दुःख सहन नहीं कर पाऊँगा। और यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है, तो कृपा करके मुझे भी कुछ क्षणों के लिए जीवनदान दे दो। मैं जाकर अपनी पत्नियों और बच्चों से अंतिम बार मिल आऊँ और उन्हें आश्वासन दे आऊँ। उसके पश्चात मैं तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा, तब तुम मेरा शिकार कर लेना'。

शिकारी ने आश्चर्यचकित होकर कहा— 'मैंने तुम्हारी तीनों पत्नियों को इसी शर्त पर छोड़ा है कि वे लौटकर आएँगी। क्या तुम सभी सत्य बोल रहे हो?'

मृग ने उत्तर दिया— 'हे निषाद! जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है और सत्य से ही समुद्र अपनी मर्यादा में रहता है, वैसे ही मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं अपने पूरे परिवार के साथ तुम्हारे पास आऊँगा।'

व्याध ने उस मृग की सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उसे भी जाने दिया। इस प्रक्रिया में एक बार पुनः उस बिल्ववृक्ष से जल की बूँदें और बिल्वपत्र नीचे स्थापित शिवलिंग पर गिरे, जिससे महाशिवरात्रि के चौथे प्रहर की परम कल्याणकारी शुभ पूजा भी पूर्ण हो गई।

व्याध का हृदय-परिवर्तन और शिव-कृपा से मोक्ष की प्राप्ति

प्रातःकाल होने को था। रात्रि-जागरण, चारों प्रहर के उपवास और शिवलिंग पर अनजाने में अर्पित हुए बिल्वपत्रों के अद्भुत प्रभाव से उस शिकारी के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप तत्काल भस्म हो गए। उसका अंतःकरण शिव-कृपा से पूर्णतः निर्मल और ज्ञान-युक्त हो गया।

कुछ ही देर बाद, जब सूर्य की प्रथम किरणें वन में प्रवेश कर रही थीं, शिकारी ने देखा कि वह विशाल मृग, उसकी तीनों पत्नियाँ और उनके सभी छोटे-छोटे बालक एक साथ उसके समक्ष आ खड़े हुए हैं। उन सबको एक साथ आया हुआ देख व्याध को बड़ा हर्ष हुआ।

हिरण परिवार ने एक स्वर में कहा— 'हे व्याध शिरोमणि! हम अपने वचन के अनुसार आपके समक्ष उपस्थित हैं। शीघ्र ही हम पर बाण चलाकर हमारे शरीर को अपने लिए सार्थक करो और अपनी क्षुधा शांत करो'。

जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता और अपने परिवार के प्रति सामूहिक प्रेम-भावना को देखकर उस शिकारी को अपने पूर्व कृत्यों पर अत्यंत ग्लानि हुई। शिव-पूजा के प्रभाव से उसको दुर्लभ आत्मज्ञान प्राप्त हो गया। उसने सोचा— 'ये ज्ञानहीन पशु होने पर भी धन्य हैं, जो अज्ञानी होते हुए भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं और सत्य-धर्म का पालन कर रहे हैं। लेकिन धिक्कार है मेरे इस मनुष्य जीवन को, कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों और जीव-हिंसा से अपने परिवार का पालन करता रहा'。

यह सोचकर उस शिकारी के हाथ से धनुष और बाण छूटकर पृथ्वी पर गिर पड़े। उसके कठोर हृदय से जीव-हिंसा का भाव सर्वदा के लिए नष्ट हो गया और उसका हृदय कोमल व दयालु बन गया। उसके नेत्रों से पश्चात्ताप के आंसुओं की झड़ी बहने लगी। उसने सभी हिरणों को मुक्त कर दिया और उनसे कहा— 'तुम सब धन्य हो, तुम स्वतंत्रतापूर्वक अपने वन में लौट जाओ'。

देवलोक के समस्त देवता इस अद्भुत घटना को देख रहे थे और वे आकाश से पुष्प-वर्षा करने लगे। शिकारी के इस परोपकारी कार्य और निष्काम शिवरात्रि व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर, स्वयं देवाधिदेव भगवान शंकर तत्काल वहाँ प्रकट हो गए। भगवान शिव ने उसे अपने अत्यंत तेजस्वी और दिव्य स्वरूप के दर्शन करवाए तथा सुख-समृद्धि का वरदान देते हुए कहा— 'हे व्याध! आज से तुम्हारा नाम गुह होगा।' मित्रों, यह वही गुह था जिसके साथ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने मित्रता की थी (निषादराज गुह)।

सूतजी कहते हैं कि उस व्याध को भगवान शिव की अपार कृपा से सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब उसकी मृत्यु हुई, तो यमदूतों के स्थान पर शिवगण उसे लेने आए और उसे ससम्मान शिवलोक ले गए। उसी शिकारी ने भगवान शिव की कृपा से अपने अगले जन्म में राजा चित्रभानु के रूप में जन्म लिया। उसे अपने पूर्वजन्म की सभी घटनाएँ स्मरण रहीं और उसने जीवन-भर महाशिवरात्रि व्रत के महत्व का पालन किया।


मुख्य कथा २: सेठ-सेठानी एवं चिड़िया की कथा

महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर एक अन्य पारंपरिक कथा भी अत्यंत श्रद्धापूर्वक श्रवण की जाती है, जो हमें निष्काम भक्ति का मार्ग दिखाती है।

एक समय की बात है, एक नगर में एक अत्यंत धनी सेठ और सेठानी रहते थे। उनके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, परंतु उनके जीवन में संतान का सुख नहीं था। एक बार महाशिवरात्रि के दिन, अनजाने में एक चिड़िया ने शिवलिंग पर कुछ जल और बिल्वपत्र गिरा दिए। उस चिड़िया के इस पुण्य कर्म के प्रताप से, उस सेठ और सेठानी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई।

संतान प्राप्ति के पश्चात सेठ और सेठानी अत्यंत प्रसन्न रहने लगे, परंतु वे भगवान शिव की भक्ति और पूजा-पाठ से विमुख हो गए। एक दिन भगवान भोलेनाथ स्वयं एक साधु का वेश धारण करके उनके द्वार पर भिक्षा माँगने आए। सेठ और सेठानी ने साधु बाबा का सत्कार किया。

साधु बने भोलेनाथ ने उनसे कहा— 'तुम दोनों बहुत बड़ी गलती कर रहे हो।' यह सुनकर सेठ-सेठानी घबरा गए और हाथ जोड़कर बोले— 'हे साधु बाबा! यदि हमसे कोई गलती हो गई हो तो हमें क्षमा कीजिएगा। हमें बताइए कि हमारी क्या गलती है और हमें क्या करना चाहिए?'।

तब साधु बने भोलेनाथ बोले— 'तुम क्या समझते हो कि तुम्हारे नसीब में यह पुत्र था? यह तो एक चिड़िया की भक्ति के परिणाम स्वरूप तुम्हें प्राप्त हुआ है। उस चिड़िया ने तुम्हें संतान सुख तो दिलवा दिया, लेकिन भगवत भक्ति का लगाव तुम्हारे भीतर उत्पन्न नहीं कर सकी। आज से तुम दोनों पूजा-पाठ, दान-पुण्य आदि करो, गरीबों को भोजन कराओ और भगवत भक्ति में अपना मन लगाओ, जिससे तुम्हारे पुत्र को लंबी आयु प्राप्त होगी'。

यह सत्य वचन सुनकर सेठ और सेठानी को अपने पूर्व आचरण पर बहुत पछतावा हुआ। अब उन दोनों के मन में भगवत भक्ति की लौ जल चुकी थी। वे दोनों खूब पूजा-पाठ करने लगे और प्रभु का गुणगान करने लगे। फिर जब फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि आई, तो दोनों पति-पत्नी ने पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से शिवरात्रि का व्रत किया, भोलेनाथ की पूजा करी और उनका अखंड आशीर्वाद प्राप्त किया।


मुख्य कथा ३: लिङ्गोद्भव प्रसंग (ब्रह्मा एवं विष्णु का विवाद और ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य)

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में वर्णित 'लिङ्गोद्भव' प्रसंग का पाठ भी परम कल्याणकारी माना गया है।

सूतजी महाराज शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं— "हे ऋषियों! ईशान कल्प के आरंभ की बात है। एक समय जब भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर की अनंत गहराइयों में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में विचरण कर रहे थे, तभी उनके समीप एक अत्यंत तेजोमय प्रकाश प्रकट हुआ। उस प्रकाश से चतुर्मुख ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने अपने समक्ष भगवान विष्णु को योगनिद्रा में देखा। उन्होंने श्री विष्णु के सन्निकट पहुँचकर अत्यंत विस्मयपूर्वक और कुछ अभिमान के साथ पूछा— 'आप कौन हैं और इस समुद्र के मध्य जल का आश्रय लेकर क्यों सो रहे हैं?'।

भगवान श्री विष्णु ने अपनी निद्रा से जागकर ब्रह्मा जी को देखा और शांतिपूर्वक उत्तर दिया— 'हे ब्रह्मन! मैं इस संपूर्ण जगत का पालनकर्ता हूँ और प्रत्येक कल्प में इसी स्थान का आश्रय लेकर शयन करता हूँ। स्वर्ग, लोक, आकाश, पृथ्वी तथा पाताल—इन सबका परम पद मैं ही हूँ'。

परंतु भगवान शिव की माया से मोहित होकर पितामह ब्रह्मा जी श्री विष्णु देव से विवाद करने लगे। उन्होंने कहा— 'जिस प्रकार आप स्वयं को इस जगत का कर्ता और प्रजापति मानते हैं, उसी प्रकार मैं भी स्वयं को ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में प्रस्तुत करता हूँ। यह सृष्टि मेरे ही संकल्प से उत्पन्न हुई है, अतः मैं ही श्रेष्ठ हूँ'。

इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही देवता स्वयं को प्रभु और श्रेष्ठ सिद्ध करते-करते परस्पर भयंकर विवाद करने लगे। विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों एक-दूसरे का वध करने को तैयार हो गए। ब्रह्मा जी अपने वाहन हंस पर और विष्णु जी अपने वाहन गरुड़ पर आरूढ़ होकर युद्ध-भूमि में आ डटे। विष्णु जी ने ब्रह्मा जी के वक्षस्थल पर अनेकों अस्त्रों का भयंकर प्रहार करके उन्हें व्याकुल कर दिया। इससे कुपित होकर ब्रह्मा जी ने भी पलटकर विष्णु जी पर भयानक अस्त्रों से प्रहार किए। ब्रह्मा और विष्णु के इस घोर संग्राम से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। उनके पारस्परिक आघातों से देवताओं में भारी हलचल और भय व्याप्त हो गया।

सभी भयभीत देवता घबराकर त्रिशूलधारी भगवान शिव के परम धाम कैलाश पर्वत पर पहुँचे। वहाँ महादेव जी अपनी सभा में माता उमा (पार्वती) देवी सहित सिंहासन पर विराजमान थे और मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। देवताओं ने त्राहिमाम-त्राहिमाम करते हुए उन्हें सारी व्यथा सुनाई। भगवान शिव ने देवताओं को आश्वस्त करते हुए कहा— 'हे पुत्रों! मैं जानता हूँ कि तुम ब्रह्मा और विष्णु के परस्पर युद्ध से बहुत दुखी और भयभीत हो। तुम डरो मत, मैं अपने गणों के साथ अभी तुम्हारे साथ चलता हूँ'。

भगवान शिव अपने वाहन नंदी पर आरूढ़ होकर देवताओं सहित कुरुक्षेत्र रूपी युद्ध-स्थल की ओर चल दिए। वहाँ छिपकर वे ब्रह्मा और विष्णु के उस विनाशकारी युद्ध को देखने लगे। शिवजी को यह ज्ञात हुआ कि वे दोनों अज्ञानतावश एक-दूसरे को नष्ट करने की इच्छा से अत्यंत भयंकर 'माहेश्वर अस्त्र' और 'पाशुपत अस्त्र' का प्रयोग करने जा रहे हैं, जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड भस्म हो सकता है।

उन दोनों के अस्त्रों को शांत करने और उनके अहंकार को दूर करने के लिए, देवाधिदेव महादेव उन दोनों के मध्य में 'महा अग्नि के तुल्य एक अनंत स्तंभ' (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हो गए। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की उस अर्धरात्रि को वह महान तेजोमय लिंग प्रकट हुआ था, जिसका न कोई आदि था और न ही कोई अंत। उस प्रखर अग्नि स्तंभ (लिंगोद्भव) को देखकर ब्रह्मा और विष्णु दोनों अत्यंत विस्मित रह गए। उनके दोनों महाविनाशकारी अस्त्र उस ज्योतिर्लिंग में स्वतः ही लीन होकर शांत हो गए।

ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने उस अग्नि स्तंभ को देखा और कहा— 'यह अलौकिक और अनंत अग्नि स्तंभ क्या है? हमें इसके आदि (मूल) और अंत (शिखर) का पता लगाना चाहिए'। तब यह निश्चय हुआ कि जो भी इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत सबसे पहले ढूंढ लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। भगवान विष्णु ने 'वराह' (सूअर) का रूप धारण किया और उस ज्योतिर्लिंग का मूल (जड़) खोजने के लिए पाताल की ओर अनंत गहराइयों में चले गए। दूसरी ओर, ब्रह्मा जी ने 'हंस' का रूप धारण किया और उस ज्योतिर्लिंग का शिखर खोजने के लिए आकाश की ओर उड़ चले।

हजारों वर्षों तक निरंतर यात्रा करने के पश्चात् भी, वराह रूपी विष्णु जी को उस परम ज्योतिर्लिंग का कोई अंत (मूल) नहीं मिला। वे थक-हार कर वापस उसी स्थान पर लौट आए। उधर आकाश में उड़ते हुए हंस रूपी ब्रह्मा जी को भी उस स्तंभ का कोई शिखर नहीं मिला। मार्ग में उन्हें केतकी का पुष्प नीचे गिरता हुआ दिखा, जिसे लेकर वे असत्य बोलते हुए वापस आए कि उन्होंने शिखर ढूँढ लिया है, परंतु शिव जी ने ब्रह्मा जी के असत्य को जानकर उन्हें श्राप दे दिया कि उनकी पूजा कहीं नहीं होगी।

अंततः भगवान शिव उस अनंत अग्नि स्तंभ से अपने मूल स्वरूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने शिव जी की स्तुति की और यह स्वीकार किया कि भगवान शिव ही परब्रह्म, सर्वेश्वर, अनादि और अनंत हैं। वे ही सगुण और निर्गुण, दोनों स्वरूपों में विद्यमान परम सत्य हैं। भगवान शिव ने उन्हें ज्ञान दिया और कहा कि तुम दोनों मेरे ही अंश से उत्पन्न हुए हो और तीसरा जो रुद्र है वह भी मेरे ही अंश से उत्पन्न होगा। जिस दिन यह महान ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ, वह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी का पावन दिन था। भगवान शिव ने वरदान दिया कि जो भी मनुष्य महाशिवरात्रि के दिन मेरे इस लिंग स्वरूप की पूजा करेगा, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे और वह शिवलोक को प्राप्त करेगा।


मुख्य कथा ४: समुद्र-मंथन और भगवान शिव द्वारा हलाहल विषपान

महाशिवरात्रि के पुनीत अवसर पर भगवान नीलकंठ के हलाहल विषपान की कथा का भी विशेष वाचन किया जाता है, जो शिव की परम करुणा, परोपकार और ब्रह्मांड रक्षा का प्रतीक है।

सूतजी कहते हैं कि प्राचीन काल में जब महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण देवराज इंद्र और अन्य देवता श्रीहीन होकर अपना सारा ऐश्वर्य खो बैठे थे, तब उन्होंने त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान विष्णु की शरण ली। भगवान विष्णु और महादेव के सुझाव पर देवताओं ने दैत्यों (असुरों) के साथ शत्रुता भुलाकर क्षीरसागर का मंथन करने का निश्चय किया ताकि अमृत प्राप्त किया जा सके। मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती (रस्सी) बनाकर समुद्र मंथन का महान कार्य आरंभ हुआ । एक ओर देवता थे और दूसरी ओर असुर बलपूर्वक वासुकि नाग को खींच रहे थे।

इस महान समुद्र मंथन से चौदह प्रकार के अद्भुत और दिव्य रत्न प्रकट हुए, जिनमें कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष, ऐरावत हाथी, माता लक्ष्मी, और अंत में अमृत का कलश धन्वंतरि वैद्य के हाथों में लेकर निकला। परंतु इन समस्त रत्नों के प्रकट होने से पूर्व, समुद्र के गर्भ से अत्यंत भयंकर, ज्वलनशील और विनाशकारी विष उत्पन्न हुआ, जिसे 'हलाहल' (या कालकूट) विष कहा गया।

उस हलाहल विष की ज्वाला इतनी तीव्र थी कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड को जलाने लगी। देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व और मानव—सभी उस विष की भीषण अग्नि से त्राहि-त्राहि करने लगे। विष की ज्वाला से वासुकि नाग भी मूर्छित होने लगे। संपूर्ण चराचर जगत में हाहाकार मच गया।

जब किसी भी देवता में उस विष के ताप को सहने की क्षमता नहीं रही, तो ब्रह्मा और विष्णु सहित समस्त देवता भगवान शिव की शरण में कैलाश पर्वत पर पहुँचे। उन्होंने भगवान उमानाथ से प्रार्थना की— "हे महादेव! हे करुणासागर! इस हलाहल विष से संपूर्ण सृष्टि जलकर भस्म होने वाली है। कृपा करके इस चराचर जगत की रक्षा करें।"

देवताओं की करुण पुकार सुनकर और सृष्टि को संकट में देखकर, परम दयालु भगवान शंकर तुरंत उस समुद्र तट पर आ गए जहाँ विष उबल रहा था। भगवान शिव ने बिना किसी विलंब के उस संपूर्ण भयंकर हलाहल विष को अपनी अंजलि में लिया और एक ही घूंट में पी लिया। परंतु उन्होंने उस विष को अपने उदर (पेट) में नहीं जाने दिया, बल्कि योगबल से उसे अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया।

हलाहल विष के अत्यंत भयंकर प्रभाव से भगवान शिव का उज्ज्वल कंठ नीला पड़ गया। उसी दिन से तीनों लोकों में भगवान शिव को 'नीलकंठ' के नाम से जाना जाने लगा।

विष के तीव्र ताप से भगवान शिव के शरीर में भयंकर जलन होने लगी। उस समय विष की उस भयंकर उष्णता और दाह को शांत करने के लिए समस्त देवताओं ने भगवान शिव के मस्तक पर गंगाजल और शीतल जल का निरंतर अभिषेक किया। उन्हें शीतलता प्रदान करने वाले बिल्वपत्र (बेलपत्र), धतूरा, भांग और आक के पुष्प अर्पित किए गए। यह घटना भी फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को ही घटित हुई थी। इसी कारण महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भगवान शिव के शिवलिंग पर जल, गंगाजल और बिल्वपत्र अर्पण करने की अक्षुण्ण परंपरा चली आ रही है। माता पार्वती ने भगवान शिव की तपस्या और सेवा करके इस पावन रात्रि को और भी कल्याणकारी बना दिया। जो भी शिवभक्त महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण कर शिव जी को बिल्वपत्र और जल अर्पित करता है, महादेव उसके समस्त दुखों और विष-रूपी कष्टों को स्वयं पीकर उसे अमृत-रूपी सुख प्रदान करते हैं।


पारंपरिक फल-वचन एवं व्रत महात्म्य (फलश्रुति)

कथा के अंत में महर्षि सूतजी शौनक आदि ऋषियों से शिवरात्रि व्रत का पारंपरिक फल-वचन और महात्म्य कहते हैं।

भगवान शंकर माता पार्वती से कहते हैं— "हे देवी! यह महाशिवरात्रि का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला, मंगलरूप और उत्तम फल प्रदान करने वाला है। जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और विधि-विधान के साथ इस महाशिवरात्रि के दिन उपवास रखता है, रात्रि के चारों प्रहरों में जागरण करके शिवलिंग पर बिल्वपत्र और जल अर्पित करता है, तथा इस पावन कथा का श्रवण करता है, उसका निश्चय ही उद्धार हो जाता है"。

सूतजी कहते हैं— "हे ऋषियों! जो भक्ति भाव से संपन्न होकर इस व्रत को करते हैं, वे भगवान शिव का शुभ सायुज्य (मोक्ष) प्राप्त कर लेते हैं, इसके लिए तो कहना ही क्या है। संपूर्ण शास्त्रों तथा अनेक प्रकार के धर्मों के विषय में भली-भांति विचार करके इस शिवरात्रि व्रत को सबसे उत्तम बताया गया है । इस लोक में जो नाना प्रकार के व्रत, विविध तीर्थ, भांति-भांति के विचित्र दान, अनेक प्रकार के यज्ञ, तरह-तरह के तप और बहुत से जप हैं—वे सब इस महाशिवरात्रि व्रत की समानता नहीं कर सकते। इसलिए अपना हित चाहने वाले मनुष्य को इस शुभतर व्रत का अवश्य ही पालन करना चाहिए"。

"यह शिवरात्रि का व्रत दिव्य है। इससे इस लोक में सदा भोग और मृत्यु के पश्चात् मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे महर्षियों! इस शुभ शिवरात्रि व्रत को 'व्रतराज' के नाम से भी जाना जाता है। जो कोई भी मनुष्य इस कथा को पढ़ता है, अथवा भक्ति-भाव से सुनता है, उसके इक्कीस कुलों का उद्धार हो जाता है और वह शीघ्र ही शिवत्व को प्राप्त करता है जहाँ धर्म और अधर्म का भय नहीं रहता"。

महादेव ने यह भी कहा है कि जो स्त्रियां शुद्धता और धर्म के नियमों का पालन करते हुए शिवलिंग की पूजा करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य और सुख की प्राप्ति होती है। अनजान में ही व्रत कर लेने से जब एक पापी व्याध को मोक्ष और 'गुह' नाम की ख्याति मिल गई, तो संकल्पबद्ध होकर श्रद्धा-भाव से यह व्रत करने वाले भक्तों की सद्गति के विषय में क्या ही संदेह है!。

सूतजी पुनः कहते हैं— "श्रद्धा भाव से जो इस कथा को सुनता है, उसका उद्धार निश्चित है। हंस और राजहंस भी इस कथा को बारंबार सुनते हैं। जो भी भक्त इस कथा को सुनाते हैं या श्रवण करते हैं, भोलेनाथ उन भोले भक्तों को पार लगाते हैं और उनके समस्त कष्ट कट जाते हैं"。

इसी के साथ शिव पुराण की कोटिरुद्रसंहिता और विद्येश्वरसंहिता में वर्णित श्री महाशिवरात्रि की यह पवित्र, पारंपरिक और संपूर्ण व्रत-कथा संपन्न होती है।

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