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श्री शीतला सप्तमी एवं अष्टमी व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक पाठ

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श्री शीतला सप्तमी एवं अष्टमी व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं अक्षुण्ण व्रत-कथा

प्रथम अध्याय: मंगलाचरण, देवी महात्म्य एवं कथा का पारंपरिक आरंभ

श्री गणेशाय नमः। श्री भगवती शीतलायै नमः।
परम कृपामयी, सर्व-संताप-हारिणी, जगदम्बा माता शीतला के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन है。

पौराणिक आख्यानों और पारंपरिक व्रत-कथा ग्रंथों के अनुसार, द्वापर युग में एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्णचंद्र से लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होकर एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न किया ।

धर्मराज युधिष्ठिर ने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनयपूर्वक पूछा— "हे त्रिलोकीनाथ! हे माधव! इस मृत्युलोक में प्राणी अपने कर्मों के अनुसार नाना प्रकार के दुखों, कष्टों और व्याधियों से निरंतर पीड़ित रहते हैं। विशेषकर ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही संसार में भयंकर ज्वर, चेचक, विस्फोटक, नेत्र-रोग और दाह-जनित महामारियों का प्रकोप बढ़ने लगता है, जिससे अबोध बालकों से लेकर वृद्ध जन तक अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं । हे प्रभु! संसार के इन दुखी और व्याकुल प्राणियों की रक्षा के लिए, शारीरिक संतापों को शांत करने के लिए तथा दरिद्रता और रोगों के पूर्ण समूल नाश के लिए शास्त्रों में कौन-सा ऐसा परम कल्याणकारी व्रत और अनुष्ठान बताया गया है, जिसके प्रभाव से मनुष्य मृत्युलोक में सुख भोगकर अंत में सद्गति को प्राप्त कर सके? कृपा कर उस व्रत का अक्षुण्ण विधान और उसकी पावन कथा मुझे श्रवण कराएं ।"

धर्मराज युधिष्ठिर के इस अत्यंत परोपकारी और लोक-हितकारी प्रश्न को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा— "हे नृपश्रेष्ठ! हे धर्मराज! आपने संपूर्ण जगत के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है । आप ध्यानपूर्वक एकाग्र चित्त होकर श्रवण करें। त्रैलोक्य में माता शीतला का व्रत और उनकी आराधना सभी प्रकार के संतापों, दाह-ज्वर, और महामारियों को हरने वाली है । स्कन्द पुराण तथा भविष्य पुराण में इस परम पावन व्रत का विस्तृत वर्णन मिलता है ।

जो भी स्त्री अथवा पुरुष फाल्गुन अथवा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि को पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक नियमों के साथ भगवती शीतला का व्रत धारण करता है, माता शीतला स्वयं उसकी और उसके संपूर्ण कुल की रक्षा करती हैं । हे युधिष्ठिर, मैं आपको इस परम पावन व्रत की अक्षुण्ण और पारंपरिक कथाएं विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, जिनके केवल श्रवण मात्र से ही प्राणियों के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं और घर में सुख-समृद्धि तथा आरोग्य का वास होता है ।"

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा— "हे राजन्! माता शीतला अत्यंत दयालु हैं, परंतु उनके व्रत के कुछ कठोर पारंपरिक नियम हैं। इस व्रत में शीतलता का ही सर्वोपरि महत्त्व है। अतः व्रत के दिन घर में चूल्हा प्रज्वलित नहीं किया जाता, न ही कोई उष्ण (गर्म) पदार्थ पकाया जाता है। एक दिन पूर्व ही रात्रिकाल में माता के भोग के लिए नाना प्रकार के व्यंजन बना लिए जाते हैं, जिसे पारंपरिक भाषा में 'बसोड़ा' या 'बासी भोजन' कहा जाता है। इस पावन दिन पर माता को उसी शीतल और बासी भोजन का भोग लगाया जाता है तथा सपरिवार उसी को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। अब मैं तुम्हें वह कथाएं सुनाता हूँ जो इस व्रत के महात्म्य को प्रकट करती हैं।"


द्वितीय अध्याय: राजा इन्द्रद्युम्न एवं पतिव्रता शुभकरी का आख्यान

भगवान श्रीकृष्ण बोले— हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल की बात है, हस्तिनापुर नाम का एक अत्यंत प्रसिद्ध, समृद्ध और लोकोत्तर वैभव से संपन्न नगर था । उस हस्तिनापुर नगर में राजा इन्द्रद्युम्न राज्य करते थे । राजा इन्द्रद्युम्न अत्यंत धर्मनिष्ठ, शूरवीर, दानवीर और अपनी प्रजा का पुत्रवत् पालन करने वाले थे। उनके राज्य में कोई भी प्राणी दुखी अथवा दरिद्र नहीं था। उनकी पत्नी का नाम महारानी प्रमिला था, जो एक अत्यंत पतिव्रता, धर्मपरायण, शीलवती और ईश्वर-भक्त स्त्री थीं。

राजा इन्द्रद्युम्न के राज्य में एक अत्यंत पवित्र और अक्षुण्ण परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही थी कि राज्य का प्रत्येक नागरिक—चाहे वह धनी हो या निर्धन, ब्राह्मण हो या शूद्र—प्रतिवर्ष फाल्गुन-चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी/अष्टमी के दिन पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ शीतला माता का व्रत किया करता था। पूरे राज्य में उस दिन चूल्हा नहीं जलता था और सभी शीतल पदार्थों से भगवती का पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते थे。

महारानी प्रमिला की कोख से एक अत्यंत रूपवान, सर्वगुण संपन्न और सुशील कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम शुभकरी रखा गया । जब शुभकरी विवाह योग्य हुई, तो राजा इन्द्रद्युम्न ने उसका विवाह एक अत्यंत पराक्रमी और रूपवान राजकुमार 'गुणवान' के साथ अत्यंत धूमधाम और राजसी ठाट-बाट से संपन्न कर दिया ।

समय व्यतीत होता गया। एक बार शीतला सप्तमी के पावन पर्व के अवसर पर राजकुमारी शुभकरी अपने पिता के राज्य हस्तिनापुर में आई हुई थी। चूंकि हस्तिनापुर में यह उत्सव अत्यंत महात्म्य के साथ मनाया जाता था, अतः राज्य की पावन परंपरा के अनुसार शुभकरी ने भी अपने माता-पिता के साथ शीतला सप्तमी का व्रत धारण करने का निश्चय किया。

व्रत से एक दिन पूर्व (षष्ठी के दिन) ही राजमहल में विविध प्रकार के शीतल व्यंजन—राबड़ी, पुए, मीठे चावल, पूड़ी, और नाना प्रकार के पकवान—बनाकर रख लिए गए। व्रत के दिन, प्रातःकाल स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर राजकुमारी शुभकरी अपनी सखियों और दासियों के साथ माता शीतला के विधिवत पूजन हेतु आवश्यक सामग्री लेकर एक पवित्र सरोवर की ओर प्रस्थान कर गई。

परंतु, वन मार्ग अत्यंत घना था और सरोवर तक जाने वाला मार्ग अत्यंत भ्रमित करने वाला था। सरोवर की खोज करते-करते शुभकरी और उसकी सखियाँ उस गहन वन में भटक गईं और अपना मार्ग भूल गईं। घने जंगल में नाText तो कोई बस्ती थी और ना ही कोई पथिक दिखाई दे रहा था। धूप चढ़ने लगी थी और शुभकरी अत्यंत व्याकुल हो उठी कि यदि वह समय पर सरोवर तक नहीं पहुँची, तो उसका व्रत खंडित हो जाएगा और माता शीतला का पूजन कैसे संपन्न होगा。

राजकुमारी की इस सच्ची व्याकुलता और निष्कपट भक्ति को देखकर स्वयं करुणासागर भगवती शीतला का हृदय पसीज गया। अपने भक्तों की रक्षा करने वाली माता शीतला ने तत्काल एक साधारण, वृद्ध स्त्री का रूप धारण किया और वन में उसी स्थान पर प्रकट हो गईं जहाँ शुभकरी अपनी सखियों के साथ मार्ग ढूंढ रही थी。

उस वृद्धा ने अत्यंत मधुर और शांत स्वर में पूछा— "हे पुत्रियों! तुम राजकुल की प्रतीत होती हो। इस घने वन में इस प्रकार व्याकुल होकर किसे ढूंढ रही हो?"

शुभकरी ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा— "हे माते! आज भगवती शीतला का परम पावन व्रत है। हम सभी माता के पूजन हेतु पवित्र सरोवर की ओर जा रही थीं, परंतु मार्ग भटक गई हैं। यदि समय पर पूजन संपन्न न हुआ, तो हमारा व्रत भंग हो जाएगा। कृपया आप हमारा मार्गदर्शन करें।"

वृद्धा रूपी माता शीतला ने मुस्कुराते हुए कहा— "तुम चिंता न करो पुत्री। मेरे पीछे-पीछे चली आओ, मैं तुम्हें उस पावन सरोवर तक पहुँचा देती हूँ।" उस वृद्धा ने सखियों सहित शुभकरी का मार्गदर्शन किया और उन्हें सही मार्ग दिखाते हुए सरोवर तक पहुँचा दिया। इतना ही नहीं, उस वृद्ध स्त्री ने व्रत और पूजन के सभी पारंपरिक विधान भी शुभकरी को समझाए कि किस प्रकार जल, रोली, मोली, चावल, ठंडे पकवान और दूर्वा से भगवती का पूजन करना है。

वृद्धा के निर्देशानुसार शुभकरी ने पूर्ण विधि-विधान से माता शीतला की पूजा की, उन्हें शीतल व्यंजनों का भोग लगाया और अपना व्रत संपन्न किया। शुभकरी की अगाध श्रद्धा, धर्म-निष्ठा और व्रत के प्रति समर्पण को देखकर भगवती शीतला अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपने वृद्धा के वेश को त्याग कर अपने वास्तविक, चतुर्भुज और अलौकिक स्वरूप में आकर शुभकरी को दर्शन दिए。

माता के इस दिव्य स्वरूप—रासभ (गर्दभ) पर सवार, हाथ में कलश, झाड़ू और सूप धारण किए हुए—को देखकर शुभकरी और उसकी सखियाँ माता के चरणों में नतमस्तक हो गईं। माता शीतला ने प्रसन्न होकर कहा— "हे पुत्री! मैं तेरे व्रत और निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तू मनचाहा वरदान मांग ले।"

शुभकरी ने माता के चरणों में पुनः प्रणाम करते हुए अत्यंत विनयपूर्वक कहा— "हे जगदम्बे! हे करुणामयी! आपके दर्शन मात्र से ही मेरी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो गई हैं। मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। फिर भी यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मैं आपके इस अमोघ वरदान को सुरक्षित रखती हूँ और भविष्य में जब मुझे इसकी वास्तविक आवश्यकता होगी, तब मैं आपसे इसका उपयोग करने की आज्ञा मांग लूँगी।" माता शीतला 'तथास्तु' कहकर अंतर्धान हो गईं。

पूजन सफलतापूर्वक संपन्न करने के पश्चात जब शुभकरी और उसकी सखियाँ वापस अपने राज्य हस्तिनापुर लौट रही थीं, तब वन के मार्ग में ही उन्होंने एक अत्यंत हृदय विदारक दृश्य देखा। मार्ग के किनारे एक निर्धन ब्राह्मण परिवार अपने एक मृत परिजन के शव के पास बैठकर अत्यंत करुण विलाप कर रहा था। उस ब्राह्मण के युवा पुत्र की वन में सर्पदंश के कारण अकाल मृत्यु हो गई थी। माता-पिता अपने इकलौते पुत्र के शव को गले लगाकर जिस प्रकार क्रंदन कर रहे थे, उसे देखकर पत्थर का भी हृदय पसीज जाए。

ब्राह्मण परिवार के उस करुण क्रंदन को सुनकर राजकुमारी शुभकरी के कदम वहीं रुक गए। उसका हृदय द्रवित हो उठा। उसने सोचा, "विधाता का यह कैसा कठोर विधान है! एक ओर मैं माता के व्रत का आनंद ले रही हूँ, और दूसरी ओर यह परिवार अपने पुत्र के वियोग में तड़प रहा है।"

तभी शुभकरी को माता शीतला द्वारा प्राप्त वह अमोघ वरदान स्मरण हो आया। उसने मन ही मन निश्चय किया कि उस वरदान के उपयोग का इससे उत्तम अवसर और क्या हो सकता है। शुभकरी ने जल हाथ में लेकर उसी क्षण भगवती शीतला का स्मरण किया और उनसे प्रार्थना करते हुए कहा— "हे जगदम्बा! हे शीतला माता! यदि मैंने आज पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से आपका व्रत किया है, यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो मैं अपना वह वरदान आज इस मृत ब्राह्मण पुत्र को जीवनदान देने के लिए उपयोग करना चाहती हूँ। हे माते! अपनी शीतलता से इस बालक के शरीर में व्याप्त सर्प-विष के ताप को नष्ट कर दीजिए और इसे पुनर्जीवन प्रदान कीजिए।"

इतना कहकर शुभकरी ने माता शीतला का ध्यान करते हुए थोड़ा सा जल उस मृत ब्राह्मण पुत्र के शरीर पर छिड़क दिया। माता शीतला की असीम कृपा और शुभकरी के व्रत के अचूक पुण्य-प्रताप से वह मृत ब्राह्मण पुत्र उसी क्षण एक गहरी नींद से जागने के समान उठकर बैठ गया और जीवित हो उठा。

अपने मृत पुत्र को पुनर्जीवित देखकर ब्राह्मण परिवार के हर्ष की कोई सीमा न रही। वे शुभकरी के चरणों में गिर पड़े। इस अद्भुत चमत्कार और भगवती शीतला की अपार कृपा को देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग और सखियाँ आश्चर्यचकित रह गईं। जब यह वृत्तांत हस्तिनापुर पहुँचा, तो पूरे राज्य में माता शीतला की महिमा का जयघोष होने लगा। राजा इन्द्रद्युम्न ने सारे नगर में यह मुनादी करवा दी कि माता शीतला का व्रत सर्व-संकट-हारी है। इस घटना के पश्चात राज्य के सभी लोगों की शीतला सप्तमी और अष्टमी व्रत के प्रति आस्था और अधिक दृढ़ हो गई और वे सभी अत्यंत निष्ठा के साथ इस व्रत को करने लगे。


तृतीय अध्याय: सास-बहू का दुस्साहस, शील की डूंगरी का प्राकट्य एवं माता का कोप-कृपा

भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः कहा— हे धर्मराज! माता शीतला जितनी कृपालु हैं, व्रत के नियमों का घोर उल्लंघन करने वालों के प्रति वे उतनी ही कोपवती भी हो जाती हैं। मैं तुम्हें एक और अत्यंत प्राचीन और पारंपरिक कथा सुनाता हूँ, जो इस व्रत में 'शीतलता' और 'बासी भोजन' (बसोड़ा) के महत्त्व को अक्षुण्ण रूप से सिद्ध करती है。

किसी नगर में एक संपन्न परिवार निवास करता था, जिसमें एक अत्यंत धर्मनिष्ठ सास और उसकी दो बहुएं रहती थीं । सास भगवती शीतला की परम भक्त थी और प्रतिवर्ष पूर्ण नियमों के साथ माता का व्रत किया करती थी。

फाल्गुन-चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में जब शीतला सप्तमी (बसोड़ा) का पावन पर्व समीप आया, तो सास के निर्देशानुसार पूरे परिवार ने व्रत का पालन करने का निश्चय किया। शीतला माता के इस पवित्र व्रत का सबसे कठोर और अनिवार्य नियम यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और केवल एक दिन पूर्व बना हुआ ठंडा और बासी भोजन ही माता को भोग लगाया जाता है तथा उसी को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है。

इसी नियम के पालन हेतु, परिवार में षष्ठी (छठ) की रात्रि को ही अगले दिन के भोग और खाने के लिए राबड़ी, पुए, मीठे चावल, पूड़ी, गुलगुले, हलवा और अन्य सभी पारंपरिक व्यंजन बनाकर रख लिए गए। रात को ही दही भी जमा दिया गया और घर के चूल्हे को बुझा कर, उसे गोबर और मिट्टी से लीप कर स्वच्छ कर दिया गया। सास ने दोनों बहुओं को कड़े निर्देश दिए कि कल किसी भी परिस्थिति में अग्नि प्रज्वलित नहीं होगी。

परंतु, उन दोनों बहुओं को कुछ ही समय पूर्व संतान की प्राप्ति हुई थी। उनके शिशु अत्यंत छोटे थे । दोनों बहुओं के मन में यह भय और शंका उत्पन्न हो गई कि यदि वे माता के व्रत का यह बासी और ठंडा भोजन ग्रहण करेंगी, तो वे स्वयं बीमार पड़ जाएंगी और उनके स्तनपान करने वाले नवजात शिशु भी रोगग्रस्त हो जाएंगे । अपने इसी अज्ञान, भय और स्वार्थ के वशीभूत होकर उन्होंने व्रत के नियम को तोड़ने का पापपूर्ण निश्चय कर लिया。

अगले दिन प्रातःकाल, जब सास पूरे विधि-विधान और भक्ति-भाव से माता शीतला की पूजा-अर्चना में मग्न थी, तब दोनों बहुओं ने एक छल किया। उन्होंने पशुओं के लिए भोजन पकाने के बहाने से, घर के एक कोने में छिपकर गुपचुप तरीके से चूल्हा जला लिया । उन्होंने ताजी और गर्म रोटियां सेंक लीं और उनका गर्म-गर्म चूरमा बनाकर अत्यंत तृप्ति से खा लिया ।

पूजा संपन्न होने के पश्चात जब सास ने माता का पावन प्रसाद अपनी दोनों बहुओं को बासी और ठंडे भोजन के रूप में ग्रहण करने के लिए दिया, तो दोनों ने घर के कार्य और बच्चों की व्यस्तता का झूठा बहाना बनाकर उस शीतल प्रसाद को खाने से टाल दिया ।

माता शीतला, जो घट-घट की वासिनी हैं, उन दोनों के इस छल-कपट और व्रत के नियमों के घोर उल्लंघन से अत्यंत कुपित हो उठीं। व्रत के दिन अग्नि प्रज्वलित कर उष्ण (गर्म) भोजन पकाना और माता के शीतल प्रसाद का तिरस्कार करना भयंकर पाप था。

कुछ समय पश्चात जब दोनों बहुएं अपने-अपने कक्ष में अपने नवजात शिशुओं को दूध पिलाने के लिए गईं, तो उन्होंने देखा कि उनके दोनों शिशु पलंग पर निष्प्राण पड़े हैं । माता के कोप के कारण उनके शिशुओं की अकाल मृत्यु हो चुकी थी। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों बहुएं चीख-चीख कर विलाप करने लगीं। घर में हाहाकार मच गया。

जब सास दौड़कर वहाँ आई और उसने मृत पोतों को देखा, तो वह शोक से मूर्छित होने लगी। परंतु जब उसे बहुओं के इस पाप कर्म और ठंडे भोजन का तिरस्कार कर गुपचुप गर्म भोजन पकाने की पूरी कहानी का ज्ञान हुआ, तो उसका शोक भयंकर क्रोध में परिवर्तित हो गया। उसने दोनों को फटकारते हुए कहा— "रे दुष्ट और दुराचारिणी स्त्रियों! तुमने भगवती शीतला के व्रत का घोर अपमान किया है। तुमने ठंडे भोजन के स्थान पर गर्म भोजन पकाया। यह तुम्हारे उसी पाप का फल है। तुम जैसी पापिनी स्त्रियों के लिए मेरे घर में कोई स्थान नहीं है। मेरे मृत पोतों के शवों को लेकर यहाँ से निकल जाओ!" यह कहकर सास ने दोनों बहुओं को घर से निकाल दिया ।

अपने मृत बच्चों के शवों को अपनी छाती से चिपकाए, फूट-फूट कर विलाप करती हुई दोनों अभागी बहुएं वन की ओर भटकने लगीं। उन्हें अपने किए पर अब घोर पश्चाताप हो रहा था। मार्ग में चलते-चलते दोपहर हो गई, वे अत्यंत थक गईं और प्यास व शोक से व्याकुल होकर विश्राम करने हेतु एक विशाल बरगद के वृक्ष के नीचे रुक गईं ।

उसी बरगद के वृक्ष के नीचे 'ओरी' और 'शीतला' नामक दो बहनें बैठी थीं। वे दोनों बहनें अपने सिर में पड़ी असंख्य जूँओं के कारण अत्यंत त्रस्त, व्याकुल और खुजली से पीड़ित थीं । अपने इतने बड़े दुःख और अपने बच्चों के शव गोद में होने के बावजूद, दोनों बहुओं का स्वभाव मूल रूप से दयालु था। उन्हें उन त्रस्त बहनों पर अत्यंत दया आ गई。

दोनों बहुओं ने अपने मृत शिशुओं को एक स्वच्छ वस्त्र पर एक ओर लेटाया और उन दोनों बहनों की सहायता करने बैठ गईं। बहुओं ने अत्यंत धैर्य और प्रेम के साथ उन बहनों के सिर से एक-एक करके सारी जूँएं निकालीं और उनके मस्तक को स्वच्छ कर दिया ।

सिर की भयंकर पीड़ा शांत होने पर उन दोनों बहनों को बड़ा चैन और आराम मिला। अत्यंत प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों बहुओं को आशीष दिया— "हे पुत्रियों! जिस प्रकार तुमने आज हमारी पीड़ा दूर की है और हमें शीतलता प्रदान की है, उसी प्रकार माता भगवती तुम्हारी गोद हमेशा हरी-भरी रखें" ।

'गोद हरी-भरी रहे'—यह आशीर्वाद सुनते ही दोनों बहुओं के धैर्य का बांध टूट गया और वे पुनः जोर-जोर से रोने लगीं। उन्होंने अपने मृत शिशुओं के शवों को दिखाते हुए अत्यंत करुण स्वर में कहा— "हे देवियों! हमारी हरी-भरी गोद तो आज ही लुट चुकी है। हमारे नवजात शिशु मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, अब आपका यह आशीर्वाद हमारे किस काम का? हम तो अपने पापों का दंड भोग रही हैं" ।

यह सुनकर वे दोनों बहनें मुस्कुराईं और उसी क्षण उन्होंने अपने साधारण रूप को त्याग दिया। वे साक्षात माता शीतला और उनकी बहन ओरी माता के अपने अलौ কুলिक और दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गईं । भगवती शीतला ने उन्हें फटकार लगाते हुए परंतु दयालु स्वर में कहा— "पाप कर्म का दंड तो इस संसार में भुगतना ही पड़ता है। तुमने शीतला सप्तमी के पवित्र दिन अग्नि जलाई, गर्म भोजन पकाया, व्रत के नियमों का घोर उल्लंघन किया और अपनी सास से छल किया। यह तुम्हारे उसी कुकृत्य का परिणाम था" ।

यह सुनते ही दोनों बहुएं पहचान गईं कि ये साक्षात जगदम्बा माता शीतला हैं। वे तुरंत माता के चरणों में गिर पड़ीं और अत्यंत विलाप करते हुए अपनी भूल की क्षमा याचना करने लगीं। उन्होंने प्रतिज्ञा करते हुए कहा— "हे माता! हम अत्यंत भोली और अज्ञानी थीं। हम आपके प्रताप और इस पावन व्रत की महिमा को जान नहीं पाई थीं। अज्ञानतावश और शिशु-मोह में हमसे यह घोर पाप हुआ है। हम शपथ लेती हैं कि अब हम जीवन में कभी भी शीतला सप्तमी अथवा अष्टमी के दिन ताज़ा और गर्म भोजन ग्रहण नहीं करेंगी। सदैव बासी भोजन का ही भोग लगाएंगी और उसी को प्रसाद मानकर खाएंगी। कृप्या हम अबलाओं पर दया करें और हमारे अपराध को क्षमा करें" ।

बहुओं के सच्चे पश्चाताप, उनकी करुण पुकार और उनके द्वारा की गई निःस्वार्थ सेवा को देखकर माता शीतला का हृदय द्रवित हो गया। माता अत्यंत कृपालु हैं। उन्होंने दयालु होकर उन दोनों पर अपनी अमृतमयी कृपा-दृष्टि डाली। माता की दृष्टि पड़ते ही दोनों मृत बालक अंगड़ाई लेते हुए नींद से जाग गए और पुनः जीवित हो उठे ।

दोनों बहुएं आनंद और उल्लास से भर गईं। उन्होंने माता के चरणों की धूल माथे पर लगाई और अपने जीवित बच्चों को छाती से लगाकर खुशी-खुशी अपने गांव लौट आईं। गांव के सभी लोगों और उनकी सास ने जब यह अद्भुत चमत्कार देखा कि मृत बच्चे लौट आए हैं और बहुओं को साक्षात शीतला माता के दर्शन हुए हैं, तो सभी ने उनका धूमधाम से स्वागत करके गांव में प्रवेश करवाया。

इसके पश्चात बहुओं ने गांव वालों के साथ मिलकर माता शीतला के एक अत्यंत भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे 'शील की डूंगरी' कहा गया। पूरे गांव ने मिलकर यह प्रतिज्ञा ली कि भविष्य में चैत्र मास की शीतला सप्तमी/अष्टमी के दिन केवल ठंडा और बासी भोजन ही ग्रहण किया जाएगा। माता की कृपा से वह परिवार और संपूर्ण गांव सुख-शांति से परिपूर्ण हो गया ।


चतुर्थ अध्याय: राजा और काछी-पुत्र का प्रसंग - शीतलता का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महात्म्य

हे युधिष्ठिर! माता शीतला अग्नि तत्त्व की घोर विरोधी हैं। वे शीतलता और स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। जो मनुष्य इस रहस्य को नहीं जानता, वह घोर विपत्ति में पड़ जाता है। इस संदर्भ में पारंपरिक व्रत-कथा ग्रंथों में एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रसंग आता है जो माता की शीतलता के नियम को पुष्ट करता है ।

एक बार किसी राज्य के राजा के इकलौते और अत्यंत प्रिय राजकुमार को भयंकर शीतला (चेचक) का रोग हो गया । राजकुमार के संपूर्ण शरीर पर अत्यंत पीड़ादायक बड़े-बड़े दाने निकल आए और वह भीषण ताप (ज्वर) से अग्नि के समान जलने लगा। राजा अपने पुत्र की इस दयनीय दशा को देखकर अत्यंत व्याकुल हो उठा。

अज्ञानतावश और माता शीतला की शीतल प्रकृति को न समझते हुए, राजा ने भगवती को प्रसन्न करने के उद्देश्य से राजमहल के मंडप में बड़े-बड़े ब्राह्मणों को बुलवाकर शतचंडी का महापाठ और एक अत्यंत विशाल यज्ञ-हवन आरंभ करवा दिया । राजा ने सोचा कि यज्ञ की अग्नि से माता प्रसन्न होंगी。

परंतु, माता शीतला तो शीतलता की देवी हैं। हवन कुंड की अग्नि और राजमहल में हो रहे उस यज्ञ के गर्म वातावरण के कारण माता का कोप शांत होने के बजाय और अधिक प्रज्वलित हो गया। परिणाम यह हुआ कि राजकुमार का ज्वर और शीतला का प्रकोप घटने के बजाय अत्यंत तीव्रता से बढ़ने लगा और उसकी अवस्था मृत्यु-तुल्य हो गई । राजा का सारा उपचार और अनुष्ठान विपरीत परिणाम देने लगा。

उसी समय, राजा के गुप्तचरों ने आकर सूचना दी कि राज्य में एक अत्यंत निर्धन काछी (सब्जी उगाने वाली जाति) की स्त्री के पुत्र को भी ठीक उसी समय शीतला माता निकली थीं, परंतु वह बालक अब पूर्ण रूप से स्वस्थ हो रहा है ।

यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा कि जब राजमहल के इतने बड़े अनुष्ठान विफल हो गए, तो उस निर्धन काछी स्त्री ने अपने पुत्र की रक्षा के लिए ऐसा कौन सा उपाय किया?

गुप्तचरों ने बताया कि उस काछी स्त्री ने राजमहल की तरह कोई हवन, यज्ञ या अग्नि का अनुष्ठान नहीं किया, बल्कि उसने माता शीतला के पारंपरिक नियमों का पूर्ण शुद्धता और शीतलता से पालन किया। उसके घर में नमक का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित कर दिया गया था । घर के किसी भी भोजन में छौंक (तड़का) नहीं लगाया जाता था, और न ही कोई भुनी, तली हुई या गर्म वस्तु पकाई जाती थी । काछी स्त्री न तो स्वयं किसी गर्म वस्तु का सेवन करती थी और न ही अपने रोगग्रस्त पुत्र को कोई गर्म वस्तु देती थी। वह अपने बालक को केवल शीतल पदार्थ देती और उसके आसपास पूर्ण स्वच्छता और शीतलता बनाए रखती। इसी पूर्ण शीतलता के प्रभाव से उसका पुत्र बिना किसी औषधि के अत्यंत शीघ्र स्वस्थ हो गया ।

यह वृत्तांत सुनकर राजा को अपनी अज्ञानता और भूल का आभास हुआ। उसी रात्रि, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए साक्षात भगवती शीतला ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा— "हे राजन्! तुमने मेरे ताप को शांत करने के बजाय, विशाल हवन कुण्ड की अग्नि प्रज्वलित कर मुझे और अधिक तपा दिया है। मेरी प्रकृति शीतल है और मैं शीतलता से ही प्रसन्न होती हूँ। यदि तू अपने पुत्र का जीवन चाहता है, तो इस अग्नि अनुष्ठान को तुरंत रोक दे" ।

प्रातःकाल उठते ही राजा ने माता की आज्ञानुसार राजमहल में चल रहे सभी यज्ञ-हवन तुरंत रुकवा दिए। उसने भी उस काछी स्त्री के समान ही शीतलता, स्वच्छता और बासी भोजन के पारंपरिक नियमों का कड़ाई से पालन करना प्रारंभ कर दिया । राजकुमार को केवल शीतल पदार्थ दिए जाने लगे। इन शीतल नियमों के प्रभाव से देखते ही देखते राजकुमार पूर्ण रूप से रोगमुक्त हो गया। तदुपरांत राजा ने अपनी भूल स्वीकार की और पूरे राज्य में माता शीतला की महिमा और उनके शीतल नियमों का गुणगान करवाया ।


पंचम अध्याय: कुम्हारिन (बुढ़िया माई) की कथा और अग्नि-प्रकोप से रक्षा

भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः कहा— हे राजन्! जो भी माता शीतला के नियमों का पालन करता है, माता उस पर आने वाली हर विपत्ति, विशेषकर अग्नि प्रकोप को शांत कर देती हैं। लोक-परंपरा में अक्षुण्ण रूप से गाई जाने वाली एक और कथा है जो इस सत्य को प्रमाणित करती है。

एक समय की बात है, किसी बड़े नगर में एक अत्यंत निर्धन बुढ़िया माई (कुम्हारिन) अपनी छोटी सी झोपड़ी में निवास करती थी। काल के प्रभाव से उस संपूर्ण नगर के लोग माता शीतला के व्रत, उनके महात्म्य और उनके बासी भोजन (बसोड़ा) के नियम को पूर्ण रूप से भूल चुके थे। होली के पश्चात आने वाली सप्तमी/अष्टमी के दिन भी पूरा नगर गर्म भोजन पकाता और माता का कोई ध्यान नहीं करता था。

पूरे नगर में केवल वह बुढ़िया माई ही एकमात्र ऐसी स्त्री थी, जिसे माता के व्रत की याद थी। वह प्रतिवर्ष फाल्गुन-चैत्र मास की शीतला सप्तमी/अष्टमी के दिन माता को ठंडे और बासी भोजन का भोग लगाती थी और विधिवत व्रत का पालन करती थी ।

व्रत के दिन बुढ़िया माई ने अपनी झोपड़ी में चूल्हा नहीं जलाया, ठंडे भोजन का भोग लगाया और माता की स्तुति की। नगर के अन्य सभी लोग अपने-अपने घरों में चूल्हा जलाकर गर्म भोजन कर रहे थे। बुढ़िया की इस अनन्य और एकांत भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन स्वयं शीतला माता एक साधारण स्त्री का रूप धारण करके उस बुढ़िया के पास आईं。

माता ने बुढ़िया माई की पूजा स्वीकार की और जाते समय उसे एक मिट्टी के करवे (पात्र) में थोड़ा सा जल दिया। माता ने कहा, "पुत्री! तूने आज मेरा सच्चा व्रत किया है। इस करवे के जल को आज अपनी झोपड़ी के चारों ओर छिड़क लेना। कल इस संपूर्ण नगर में भयंकर अग्नि का प्रकोप होगा और सब कुछ जल जाएगा, लेकिन तेरी यह झोपड़ी इस शीतल जल के प्रभाव से सुरक्षित रहेगी"। इतना कहकर माता शीतला अंतर्ध्यान हो गईं。

बुढ़िया माई ने माता के आदेशानुसार रात में वह शीतल जल अपनी झोपड़ी के चारों ओर छिड़क लिया। अगले दिन नगर में अज्ञात कारणों से एक भयंकर आग लग गई। अग्नि इतनी विकराल थी कि देखते ही देखते पूरा नगर धू-धू कर जलने लगा। महलों से लेकर घरों तक सब कुछ जलकर राख होने लगा, नगर में हाहाकार मच गया。

परंतु, उस भयंकर और विकराल ज्वाला के बीच भी एक अद्भुत चमत्कार हुआ। उस बुढ़िया माई की साधारण सी घास-फूस की झोपड़ी पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं हुआ। आग की लपटें झोपड़ी के पास आतीं और स्वतः शांत हो जातीं。

नगर के राजा ने जब देखा कि पूरे राज्य में सब कुछ नष्ट हो गया है और केवल एक कुम्हारिन की झोपड़ी सुरक्षित बची है, तो उसे यह अत्यंत आश्चर्यजनक लगा। राजा ने तुरंत बुढ़िया को अपने दरबार में बुलवाया और उससे पूछा, "हे माई! पूरे नगर में भयंकर आग लगी, सब कुछ भस्म हो गया, यहाँ तक कि पत्थरों के महल भी जल गए, पर तेरी यह घास-फूस की झोपड़ी कैसे बच गई? क्या तू कोई जादू-टोना जानती है?"।

बुढ़िया ने राजा को प्रणाम किया और माता शीतला की कृपा, उनके व्रत की महिमा और ठंडे भोजन (बसोड़ा) के भोग का संपूर्ण वृत्तांत राजा को विस्तारपूर्वक सुना दिया। बुढ़िया ने कहा, "महाराज! मैं कोई जादू नहीं जानती। मैं तो केवल माता शीतला का व्रत करती हूँ। कल शीतला अष्टमी थी, मैंने बासी और ठंडा भोजन चढ़ाया और माता के नियमों का पालन किया। माता ने मुझे जो जल दिया था, उसी की शीतलता के कारण मेरी झोपड़ी अग्नि के ताप से बच गई। नगर के लोगों ने माता का अपमान किया, इसलिए उन पर यह विपत्ति आई।"

बुढ़िया के सत्य वचन सुनकर राजा की आँखें खुल गईं। राजा को अपनी और अपनी प्रजा की भूल का आभास हुआ। राजा ने तत्काल पूरे नगर में मुनादी (ढिंढोरा) पिटवा दी कि भविष्य में फाल्गुन-चैत्र मास की शीतला सप्तमी और अष्टमी के दिन पूरे राज्य में कोई भी अपने घर में चूल्हा नहीं जलाएगा。

राजा ने आदेश दिया कि— "सभी लोग माता का 'अगता' रखेंगे, जिसका अर्थ है कि उस दिन कोई सिर नहीं धोएगा, सिलना, कूटना और पीसना नहीं करेगा। सभी प्रजाजन केवल एक दिन पूर्व बने हुए ठंडे और बासी भोजन (छठ के बने भोजन) से माता की सप्तमी/अष्टमी को पूजा करेंगे और वही ठंडा भोजन प्रसाद स्वरूप ग्रहण करेंगे।"

नगर के लोगों ने राजा की आज्ञानुसार वैसा ही किया। अगले वर्ष से पूरे नगर में धूमधाम से शीतला माता का व्रत किया जाने लगा। माता शीतला अत्यंत प्रसन्न हुईं और सारे नगर में आनंद, शीतलता और आरोग्य छा गया। जिन घरों में माता शीतला की पूजा होती है, वहाँ अग्नि का प्रकोप और दरिद्रता कभी प्रवेश नहीं करती。


षष्ठम अध्याय: श्री शीतलाष्टक स्तोत्र एवं पारंपरिक फल-श्रुति

कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— हे युधिष्ठिर! स्कन्द पुराण के अंतर्गत वर्णित महात्म्य के अनुसार, स्वयं भगवान शिव (महादेव) ने लोक-कल्याण हेतु और प्राणियों को भयंकर रोगों से बचाने के लिए इस 'शीतलाष्टक' स्तोत्र की रचना की थी。

व्रत की कथा के पश्चात इस अष्टक का पाठ अवश्य करना चाहिए। जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है या इसे श्रवण करता है, उसे सभी प्रकार के रोगों, भयों और संकटों से मुक्ति प्राप्त होती है。

श्री शीतलाष्टक (पारंपरिक मूल पाठ एवं अर्थ)

यह स्तोत्र माता के दिव्य स्वरूप और उनके महात्म्य को प्रकट करता है:

श्लोक संख्या संस्कृत मूल पाठ (Sanskrit Text) पारंपरिक हिन्दी भावार्थ (Traditional Hindi Meaning)
प्रारंभ ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः ॥ ॐ ह्रीं श्रीं भगवती शीतला माता को कोटि-कोटि नमस्कार है।
१. ईश्वर उवाच:

वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्।

मार्जनीकलशोपेतां, शूर्पालङ्कृतमस्तकाम् ॥
भगवान शिव बोले: मैं गर्दभ (गधे) पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू (मार्जनी) तथा कलश धारण करने वाली, और सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की वंदना करता हूँ।
२. वन्देऽहं शीतलां देवीं सर्वरोगभयापहाम्।

यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटकभयं महत् ॥
मैं सभी प्रकार के रोगों और भयों का सर्वथा नाश करने वाली भगवती शीतला की वंदना करता हूँ, जिनकी शरण में जाने से महाभयानक विस्फोटक (चेचक आदि) रोगों का भय पूर्णतः निवृत्त हो जाता है।
३. शीतले शीतले चेति यो ब्रूयाद् दाहपीडितः।

विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥
जो भी प्राणी भीषण दाह (ज्वर) से पीड़ित होकर पूर्ण श्रद्धा से 'हे शीतले! हे शीतले!' इस प्रकार पुकारता है, उसका घोर विस्फोटक रोग का भय शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
४. यस्त्वामुदकमध्ये तु ध्यात्वा सम्पूजयेन्नरः।

विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥
जो मनुष्य जल के मध्य (शीतलता में) आपका ध्यान करते हुए आपकी भली-भांति पूजा करता है, उसके घर में कभी भी घोर विस्फोटक रोग का भय उत्पन्न नहीं होता।
५. मृणालतान्तुसदृशीं नाभिहृन्मध्यसंस्थिताम्।

यस्त्वां संचिन्तयेद्देवि तस्य मृत्युर्न जायते ॥
हे देवी! कमल-नाल के तंतु के समान कोमल स्वभाव वाली तथा नाभि और हृदय के मध्य विराजमान रहने वाली आप भगवती का जो भी मनुष्य ध्यान करता है, उसकी कभी अकाल मृत्यु नहीं होती।
६-७. रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाखनन्दनः।

शीतलावाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ॥

एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत्।

तस्य गेहे शिशूनां च शीतलारुङ् न जायते ॥
रासभ, गर्दभ, खर, वैशाखनन्दन, शीतलावाहन और दूर्वाकन्द-निकृन्तन — भगवती शीतला के वाहन के इन नामों का जो व्यक्ति माता के समक्ष बैठकर पाठ करता है, उसके घर में शिशुओं को कभी शीतला रोग (चेचक) नहीं होता।
८. शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।

शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ॥
हे शीतला देवी! आप ही जगत की माता हैं, आप ही जगत के पिता हैं, और आप ही इस संपूर्ण जगत का पालन करने वाली धात्री हैं। ऐसी भगवती शीतला को बारंबार नमो नमः।

(नोट: पारंपरिक स्तोत्र के मुख्य अंश यहाँ प्रस्तुत हैं, जो व्रत के दौरान पढ़े जाते हैं)

पारंपरिक फल-श्रुति एवं देवी प्रार्थना

कथा का समापन करते हुए पारंपरिक रूप से जो फल-वचन कहा जाता है, वह इस प्रकार है:

"हे वत्स! मैंने यह शीतला सप्तमी/अष्टमी व्रत तुम्हें कह दिया है। इस पवित्र व्रत में दधोदन (दही और चावल), शीतल ककड़ी, शीतल फल और बावली का शीतल जल ही माता को अर्पित किया जाता है, क्योंकि इस व्रत के देवता स्वयं शीतल हैं। इस व्रत को करने वाले प्राणी तीनों प्रकार के तापों (तापत्रय—दैहिक, दैविक, भौतिक) के संताप से शीतल हो जाते हैं और अकाल मृत्यु से मुक्त होते हैं।

जो भी स्त्री या पुरुष पूर्ण श्रद्धा, नियम और शुद्धता के साथ फाल्गुन-चैत्र मास की इस सप्तमी अथवा अष्टमी के दिन माता शीतला को बासी और ठंडे भोजन का भोग लगाता है, व्रत रखता है और इस कथा का श्रवण करता है, माता उसके घर की दरिद्रता को सर्वदा के लिए दूर कर देती हैं। जो अंध नेत्र पाता है, उसे दृष्टि देती हैं, जो बाँझ है उसे पुत्र देती हैं।

अतः अंत में हम सब हाथ जोड़कर माता से यह प्रार्थना करते हैं:

हे शीतला माता! जैसी कृपा आपने राजा इन्द्रद्युम्न की पुत्री शुभकरी पर की, जैसी दया आपने वन में भटकती उन दोनों बहुओं पर की और उनके मृत बालकों को पुनर्जीवन दिया, जैसी शीतलता आपने रोगग्रस्त काछी के पुत्र को प्रदान की, और जैसी रक्षा आपने अग्नि के भीषण प्रकोप से उस बुढ़िया माई की झोपड़ी की करी, वैसी ही असीम कृपा और रक्षा आप इस व्रत को करने वाले, इस पावन कथा को कहने वाले, इस कथा को एकाग्रचित्त होकर सुनने वाले, और कथा में हुँकारा भरने वाले सभी जनों पर सदैव करना।

सबके घर में अन्न-धन के भंडार भरे रखना, सबकी गोद हमेशा हरी-भरी रखना, और अपनी शीतलता से सभी की रोगों, कष्टों और विपत्तियों से रक्षा करना। पूजा, पाठ, व्रत अथवा कथा-श्रवण में जो भी भूल-चूक हुई हो, उसे अबोध बालक जानकर क्षमा करना माता।"

॥ बोलिए श्री शीतला माता की जय ॥

॥ श्री भगवती जगदम्बा की जय ॥

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